Saturday, 25 January 2025

विचित्र शिशु भगवान और मैं ---

 विचित्र शिशु भगवान और मैं


(इस आलेख में मुमुक्षुओं हेतु कुछ बड़ी काम यानि तत्व की दुर्लभ बातें हैं, जिन्हें समझना मेरा सौभाग्य है। जिन्हें भगवान से प्रेम है, वे इस आलेख को अवश्य पढ़ें)
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भगवान चाहे सर्वव्यापी हों, लेकिन मेरे लिए तो वे एक छोटे से शिशु की तरह हैं। उन्हें शिशु की तरह ही मनाना पड़ता है। उन का बाल-स्वभाव और बाल-हठ है। वे चाहते हैं कि मैं उन्हें अपना शत-प्रतिशत प्रेम दूँ, और इधर-उधर कहीं भी नहीं देखूँ। उन्हें मेरा ९९.९९% प्रेम भी पसंद नहीं है, उन्हें तो १००% + ही चाहिए। जब भी मेरा ध्यान इधर-उधर किसी भी अन्य विषय में चला जाता है, तो वे रूठ जाते हैं। फिर अन्य सब ओर से हटाकर उन में ही मन को लगाना पड़ता है, तभी वे प्रसन्न होते हैं। बड़े ईर्ष्यालु प्रेमी हैं। उन्होने मुझे बहुत दुःखी और परेशान किया है, लेकिन वह भी मेरा आनंद था। वे कहते हैं कि उन्हें "अनन्य-भक्ति" से ही प्राप्त किया जा सकता है। यह अनन्य-भक्ति, वेदान्त की पराकाष्ठा है। अब और उनसे पृथक नहीं रह सकता, अतः मैं भी एक शिशु की तरह उनके साथ एक हो गया हूँ।
मेरे में कोई बुद्धि नहीं है। इसीलिए ये बुद्धिहीन की सी बातें कर रहा हूँ।
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भगवान ने मुझे बहुत छोटा सा हृदय दिया, जिसमें रखने के लिए दुनियाँ भर के दुख-दर्द भी दे दिये। उन्हें रखना मेरे वश की बात नहीं थी। अतः उनका हृदय उन्हीं को बापस लौटा दिया है। इससे वे भी प्रसन्न है और मैं भी। मेरे पास कुछ है भी नहीं, और कुछ चाहिए भी नहीं। दुनियाँ भर के बंधन और पाश मेरे ऊपर डाल दिये, जैसे -- भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी, दुःख-सुख, जरा-मृत्यु आदि आदि। इन पाशों ने मुझे पशु बना दिया है। कोई बात नहीं, अभी उनका समय चल रहा है। मेरा भी समय आ रहा है। भगवान भी कब तक बचेंगे? होना तो उन्हें भी मेरे साथ एक ही है।
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गीता में उन्होंने स्वयं को पाने का मार्ग बताकर कितनी बड़ी बात कह दी है --
"पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥८:२२||"
अर्थात् हे पार्थ ! जिस (परमात्मा) के अन्तर्गत समस्त भूत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण (जगत्) व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त करने योग्य है।
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पुरुषार्थ क्या है? --
भगवान हम सब के इस शरीर रूपी पुर में शयन करते हैं, और सर्वत्र परिपूर्ण हैं, इसलिए भगवान का नाम पुरुष है। उन पुरुष से ही यह सारा संसार व्याप्त है, और उनके अतिरिक्त अन्य कुछ है भी नहीं, वे भगवान, अनन्य भक्ति से ही प्राप्य हैं।
"उन्हें प्राप्त करना ही पुरुषार्थ है।" यश-वैभव प्राप्त करना, और धन-संपत्ति एकत्र करना पुरुषार्थ नहीं है।
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उपासक का यह भाव रहता है कि मेरे से अन्य कोई है ही नहीं, मैं भगवान के साथ एक और सर्वत्र व्याप्त हूँ। इस आत्म-विषयक ज्ञान को ही भगवान श्रीकृष्ण ने 'अनन्य भक्ति' कहा है। भगवान से जब प्रेम ही हो गया है, तब उनके अतिरिक्त अन्य कुछ भी चिंतन, उन की दृष्टि में व्यभिचार है। सब कुछ भुलाकर हम भगवान की ही अनन्य भक्ति करें, जिसे गीता में भगवान ने "अव्यभिचारिणी-भक्ति" बताया है --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
अर्थात् अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥
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आज भगवान ने कुछ अधिक ही लिखवा दिया है। हे परमप्रेमी भगवन् , अब कुछ ऐसा करो कि सब कुछ भूल कर दिन-रात तुम्हारा ही भजन-चिंतन-ध्यान करता रहूँ, और तुम्हारे में विलीन होकर तुम्हारे साथ एक होकर, तुम्हारा प्रेम सब के हृदयों में जगा सकूँ। अन्य किसी अभिलाषा का जन्म ही न हो।
"अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँति। सब तजि भजनु करौं दिन राती॥"
ॐ तत्सत् !! ॐ ब्रह्मणे नमः ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ जनवरी २०२४ . पुनश्च: -- अब कुछ दिन मौज-मस्ती करेंगे। जब मौज-मस्ती से मन भर जाएगा तब बापस आ जाएँगे।
शब्दार्थ :---
मौज-मस्ती = भगवान का चिंतन, मनन, स्मरण, निदिध्यासन और ध्यान॥
व्यभिचार = भगवान से अन्यत्र कोई भी कामना या इच्छा॥
दुराचार = जो भगवान से दूर करे॥
सदाचार = जो सदा भगवान में मन को लगाए रखे॥
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मैं अगर फेसबुक पर कुछ दिन सक्रिय न रह सकूँ तो कोई बात नहीं, कुछ दिनों बाद बापस लौट आऊँगा। जय सियाराम !!

Friday, 24 January 2025

भाग्यशाली हैं वे लोग, भगवान जिन की परीक्षा लेता है ---

भाग्यशाली हैं वे लोग, भगवान जिन की परीक्षा लेता है| भगवान को भी पता है कि उनकी परीक्षा में कोई पास नहीं हो सकता, फिर भी वे मानते ही नहीं हैं, छोटे बच्चे की तरह जिद कर लेते हैं कि परीक्षा लेनी ही है|
अब वे ही जानें, परीक्षा लेने वाले भी वे ही हैं, देने वाले वाले भी वे ही हैं, और पास-फेल करने वाले भी वे ही हैं|
यहाँ तो भगवती के श्रीचरणों में आश्रय लेकर पड़ा हूँ, जो कुछ भी भगवान को करना है, वे करें| वे चाहे जितना भी घमासान करें, फिर भी वे निकटतम से भी अधिक निकट, और प्रियतम से भी अधिक प्रिय हैं| भगवान को भी इतनी बड़ी सृष्टि में कहीं कोई ठिकाना नहीं मिला, जो मेरे ही हृदय में आकर छिपे हुए हैं|
२४ जनवरी २०२१

भगवान श्रीराम के ध्यान से जीवन में निर्भीकता आती है, सारी कायरता, दब्बूपन और सभी कमज़ोरियाँ दूर होती हैं ---

भगवान श्रीराम के ध्यान से जीवन में निर्भीकता आती है, सारी कायरता, दब्बूपन और सभी कमज़ोरियाँ दूर होती हैं। वे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, वे परमब्रह्म परमात्मा विष्णु के अवतार हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के १० वें अध्याय के ३१ वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को ही शस्त्रधारी राम बताया है --"रामः शस्त्रभृतामहम्"। तत्वरूप में राम और शिव में भी कोई भेद नहीं है। राम नाम (रां) और ओंकार (ॐ) के जप का फल भी एक ही है। राम नाम के जप से चेतना ऊर्ध्वगामी और विस्तृत होती है। अपने विवेक के प्रकाश में पूर्ण भक्ति के साथ उन पुरुषोत्तम का ध्यान और मानसिक जप अपने कूटस्थ सूर्यमण्डल में करें। इस सृष्टि में कुछ भी निराकार नहीं है। ज्योतिर्मय ब्रह्म को ही निराकार कहते हैं। किसी भी रूप में पूर्ण भक्ति के साथ उनका ध्यान करें। ॐ तत्त्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ जनवरी २०२४

Wednesday, 22 January 2025

परमात्मा की ओर उठी दृष्टि अब उठी ही रहे, नीचे न आने पाये ---

 परमात्मा की ओर उठी दृष्टि अब उठी ही रहे, नीचे न आने पाये ---

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भगवान से एक बार प्रेम कर लो, फिर सब कुछ वे ही करेंगे, कभी छोड़ेंगे नहीं; जकड़ कर सदा साथ रखेंगे। यह मेरा पक्का वादा है। हम एक निमित्त मात्र हैं, कर्ता नहीं। हम केवल उस यजमान की तरह हैं जो यज्ञ को संपन्न होते हुए देखता है, जिस की उपस्थिति यज्ञ की प्रत्येक क्रिया के लिये आवश्यक है। सारी क्रियाएँ तो जगन्माता स्वयं सम्पन्न कर के यज्ञरूप में परमात्मा को अर्पित करती है। कर्ताभाव और पृथकता का बोध, एक भ्रम है। परमशिव ही सर्वस्व हैं।
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वेद और वेदांगों को समझना मेरी बौद्धिक क्षमता से परे है। ब्रह्मसूत्र जैसे ग्रंथ भी मुझे समझ में नहीं आते। अब तो उनको समझने का प्रयास करना भी छोड़ दिया है, क्योंकि सारे प्रश्न तिरोहित हो गये हैं; कोई शंका या संदेह नहीं है। कोई जिज्ञासा भी अब नहीं रही है, यह सीमित मन अब शांत है। कोई पीड़ा या व्याकुलता नहीं रही है, जीवन में पूर्ण संतुष्टि है।
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प्रकृति में कुछ भी निःशुल्क नहीं है। हर चीज का शुल्क देना पड़ता है, यानि मूल्य चुकाना पड़ता है। भगवान की कृपा भी मुफ्त में नहीं मिलती, उसकी भी कीमत चुकानी पड़ती है। वह कीमत है -- "हमारे ह्रदय का पूर्ण प्रेम, और हमारे आचार-विचार में पवित्रता"।
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ह्रदय के सिंहासन पर परम प्रिय स्वयं बिराजमान हैं, अन्य कोई आकर्षण नहीं रहा है। उनका मनोहारी रूप इतना आकर्षक है, जिसे शब्दों में व्यक्त करना असंभव है। बस, वे सदा बिराजमान रहें, और कुछ भी नहीं चाहिये। ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ जनवरी २०२५

संसार में सबसे तालमेल कैसे बैठाकर रखें ?

 संसार में सबसे तालमेल कैसे बैठाकर रखें ?

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यह एक बहुत बड़ी समस्या है, जिसका समाधान बड़ा कठिन है। भगवान से प्रार्थना की तो भगवान ने एक बड़ा सुंदर उपाय बता दिया। भगवान कहते हैं कि --
"परमप्रेममय होकर शत्रु-मित्र, सगे-संबंधी, परिचित-अपरिचित, सभी में, यहाँ तक कि स्वयं में भी मुझ परमात्मा को ही देखो। किसी के प्रति भी घृणा व द्वेष मत रखो।
युद्धभूमि में शत्रु का संहार भी प्रेममय रहते हुए बिना किसी घृणा व द्वेष के करो। अपने हरेक कर्म के पीछे कर्ता परमात्मा को बनाओ और स्वयं निमित्त मात्र बन कर रहो।"
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चारों ओर चाहे कितना भी घना अंधकार हो, लेकिन एक परम ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में एक दिव्य आलोक के दर्शन ध्यान में सभी साधकों को सूक्ष्म जगत से भी परे होते हैं। वही हमारा लक्ष्य और उपास्य है। उसी का ध्यान होता है, और उसी की साधना होती है। साधना में इधर-उधर अन्यत्र कहीं भी दृष्टि न हो। इसका बहुत गहरा अभ्यास करना पड़ेगा कि मेरे हर विचार में परमात्मा हो, हालाँकि कोई मेरे विचार से सहमत नहीं होगा। हो सकता है लोग मेरी हंसी भी उड़ायें, मुझे मूर्ख, बेवकूफ, अनाड़ी और पागल भी कहें; लेकिन सब स्वीकार्य है।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२३ जनवरी २०२३

क्या बताएँ? किसको बताएँ? कोई अन्य है ही नहीं, यह स्वयं का संवाद स्वयं से ही है ---

 क्या बताएँ? किसको बताएँ? कोई अन्य है ही नहीं, यह स्वयं का संवाद स्वयं से ही है ---

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इसे आकांक्षा कहें या अभीप्सा? कुछ समझ में नहीं आ रहा है। जो कुछ भी अब तक समझ लिया है वह पर्याप्त है। अब और कुछ नया जानने, समझने व पाने की इच्छा भी नहीं रही है। सार्थकता सिर्फ भगवान को जानने में है। भगवान तो अनंत हैं, उनको जितना जान लिया है, जितना समझ लिया है, उसी में रमण करते रहें, उतना ही पर्याप्त है। इससे अधिक और कुछ नहीं चाहिए। किसी अन्य से कोई संवाद भी नहीं करना है, कोई अन्य है भी नहीं। घूम फिर कर हम स्वयं -- स्वयं से ही मिलते और बात करते रहते हैं।
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भगवान की आराधना क्या है? स्वयं के अहंकार की सीमितता यानि पृथकता के बोध को -- परमप्रेममय होकर स्वयं की सर्वव्यापक अनंतता में समर्पण ही भगवान की आराधना है। यह मेरी समझ है।
लगभग ग्यारह वर्ष पूर्व आचार्य सियारामदास नैयायिक वैष्णवाचार्य ने विष्णु-पुराण और अनेक उपनिषदों व ग्रन्थों से उद्धृत कर एक बहुत विस्तृत लेख लिखा था, जिसमें "भगवान" शब्द के अर्थ को समझाया गया था। यदि उनका लिखा वह लेख कहीं से मिल जाये तो उसे अवश्य पढ़ें।
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व्यवहारिक दृष्टि से भगवान की कृपा से ही हम भगवान को जान सकते हैं। सारी साधनाएँ व तपस्या आदि भी हम भगवान की कृपा से ही कर सकते हैं। अतः भगवान की कृपा कैसे हो? इसी विषय पर विचार करें। मेरा अनुभव मेरा है जो भगवान की कृपा से मुझे प्राप्त हुआ है, वह दूसरों के किसी काम का नहीं है। अतः जैसा भी आपके समझ में आता है उसी के अनुसार भगवान की आराधना करें।
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लेकिन यह याद रखें की दूसरों को ठग कर, दूसरों के गले काट कर, दूसरों को हानि पहुंचा कर, और झूठ बोलकर हम भगवान की कृपा को नहीं पा सकते। भगवान को समझने के लिए वीतराग और स्थितप्रज्ञ होना होगा।
उन सभी महान आत्माओं को नमन जिन्हें भगवान से प्रेम है। प्रेम में कोई मांग नहीं, सिर्फ समर्पण होता है। मांग में व्यापार होता है, कोई भक्ति नहीं।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२३ जनवरी २०२४

भारत के महानतम स्वतन्त्रता सेनानी, परम देशभक्त, प्रथम प्रधानमंत्री, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर कोटि-कोटि नमन !! जय हिन्द !!

 भारत के महानतम स्वतन्त्रता सेनानी, परम देशभक्त, प्रथम प्रधानमंत्री, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर कोटि-कोटि नमन !! जय हिन्द !!

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भारत के विभाजन का किसी को क्या अधिकार था? क्या इसके लिए कोई जनमत संग्रह करवाया गया था? जो लोग इसके लिए जिम्मेदार थे वे अब तक तो नर्कगामी हो गए होंगे, पर उन को दिये गए सभी सम्मान बापस लिए जाएँ, और उनकी आधिकारिक रूप से सार्वजनिक निंदा की जाये| उन के कारण ३५ लाख से अधिक निर्दोष लोगों की हत्याएँ हुईं, करोड़ों लोग विस्थापित हुए, और लाखों महिलाओं और बच्चों पर दुराचार हुए| विभाजन के लिए जिम्मेदार लोग मनुष्य नहीं, साक्षात नर-पिशाच हत्यारे थे|
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भारत को निर्दयता से पूरी तरह लूट कर अँगरेज़ भारत से इसलिए गए क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अंग्रेजी सेना की कमर टूट चुकी थी, और भारत के सैनिकों ने अँगरेज़ अधिकारियों को अभिवादन करना व उनके आदेश मानना बंद कर दिया था| १९४६ के नौसेना विद्रोह के बाद भारत के क्रांतिकारियों और आजाद हिन्द फौज से अँगरेज़ बहुत बुरी तरह डर गए थे, अतः उन्होंने भारत को छोड़ने में ही अपनी भलाई समझी| जाते जाते वे भारत का जितना नुकसान कर सकते थे, उतना कर गए और कैसे भी जोड़तोड़ कर के भारत की सत्ता एक काले अँगरेज़ को सौंप गए जिस के लिए ब्रिटिश हित ही सर्वोपरी था|
जय हिन्द, जय भारत ! वन्दे मातरम !!
२३ जनवरी २०२४