Monday, 20 January 2025

आध्यात्म और भक्ति में भगवान से अन्य कुछ प्राप्ति की कामना/भावना हमारी अज्ञानता है। हमारा उद्देश्य केवल भगवत्-प्राप्ति है, न कि कुछ और --- .

आध्यात्म और भक्ति में भगवान से अन्य कुछ प्राप्ति की कामना/भावना हमारी अज्ञानता है। हमारा उद्देश्य केवल भगवत्-प्राप्ति है, न कि कुछ और ---

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सारी आध्यात्मिक साधनाएँ एक बहाना है, जैसे बच्चे के हाथ में खिलौना। जब बालक रोता है, तब माता उसके हाथ में एक खिलौना पकड़ा देती है। जो बालक खिलौने से संतुष्ट हो जाता है, माता उसकी ओर ध्यान नहीं देती। खिलौने से संतुष्ट नहीं होने पर ही माता उसे अपनी गोद में लेती है। यही बात भगवान के साथ है। भगवान हमारी माता भी हैं।
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हमारा एकमात्र लक्ष्य भगवत्-प्राप्ति है, न कि कुछ और। इसे समर्पण द्वारा ही प्राप्त कर सकते हैं, न कि किसी अन्य विधि से। भगवान से अतिरिक्त कुछ अन्य की कामना एक व्यापार है, न कि भक्ति। हमारा कल्याण व कृतकृत्यता हरिःकृपा पर निर्भर है, न कि किसी साधना पर। भगवान हमारे प्रेम और सत्यनिष्ठा से ही प्रभावित होते हैं, बाकी सब हमारा मिथ्या अहंकार है। जीवन का हर पल परमात्मा को निरंतर समर्पित हो। मृत्यु इस देह की होती है, न कि शाश्वत आत्मा की। हम एक शाश्वत आत्मा हैं, न कि यह शरीर। हमारा अस्तित्व परमात्मा की अभिव्यक्ति है। हमारे सारे गुण-दोष, संचित व प्रारब्ध कर्मफल, और सर्वस्व परमात्मा को समर्पित हैं। हमारा एकमात्र संबंध परमात्मा से है। परमात्मा से हमारा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ जनवरी २०२५

धन्य हैं वे सब भजनानंदी, जो भगवान का दिन-रात निरंतर भजन करते हैं ---

 धन्य हैं वे सब भजनानंदी, जो भगवान का दिन-रात निरंतर भजन करते हैं ---

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जिन्होंने अपने अंतःकरण, अपनी इंद्रियों व उनकी तन्मात्राओं पर विजय प्राप्त कर ली है, उन सब भजनानंदियों को मैं नमन करता हूँ। वे दिन-रात भगवान का भजन करते हैं। मैं तो उनके चरणों की धूल हूँ। मैं उन्हें शत शत नमन करता हूँ। बहुत जन्मों के पुण्यफलों से मुझे यह मनुष्य शरीर मिला था, जिस से आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। देवताओं को भी यह दुर्लभ है। लेकिन मैंने तो इसका दुरुपयोग ही किया है। अभी भी अनेक कमियाँ मुझ में हैं, जो भगवान की कृपा से ही दूर होंगी। वीतरागता और स्थितप्रज्ञता कहीं दिखाई नहीं दे रही हैं। उन का प्रादुर्भाव हरिःकृपा से ही होगा। सारे जप-तप, ध्यान आदि, और यह जीवन भी तभी सार्थक होगा। मेरा विवेक भी इस समय ढंग से काम नहीं कर रहा है।
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भगवान से प्रार्थना है कि कभी तो इधर भी अपनी कृपा-दृष्टि डालें। सारी दुनियाँ का उद्धार हो रहा है, केवल मैं ही बचा हूँ। क्या सबसे अंत में ही मेरा उद्धार होगा? आज नहीं तो कल, भगवान को आना तो पड़ेगा ही। तब तक प्रतीक्षा नहीं कर सकता। मेरे पास न तो वैराग्य है, न शम, दम, उपरति , तितिक्षा, समाधान और श्रद्धा। जिस दिन उन की अनुकंपा होगी, उस दिन ये सब आ जायेंगे।
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ब्रह्मविद्या के प्रथम आचार्य भगवान सनत्कुमार ने भूमाविद्या का जो ज्ञान अपने प्रिय शिष्य देवर्षि नारद को दिया था, उसमें उन्होंने प्रमाद को ही मृत्यु बताया है। लेकिन मेरे यहाँ तो प्रमाद रूपी महिषासुर का ही राज्य चल रहा है। पता नहीं, भगवती कब उसका संहार करेगी? अपने अच्युत स्वरूप को भूलकर च्युत हो गया हूँ। आवरण और विक्षेप नाम की दो भयानक राक्षसियाँ मेरे समक्ष सशस्त्र बैठी हैं। उनका साथ देने दीर्घसूत्र नाम का एक भयावह राक्षस भी आ गया है। भ्रामरी-गुफा में ये मुझे प्रवेश नहीं करने दे रहे। कैसे भी इनको चकमा देकर इन से पार जाना है।
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इन सब बाधाओं को पार कर चुके ब्रह्मस्वरूप सभी भजनानंदियों को मैं बारंबार शत्-शत् नमन करता हूँ। वे धन्य हैं, वे धन्य हैं, वे धन्य हैं। मैं उन्हीं का अनुसरण कर रहा हूँ।
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥
हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ जनवरी २०२५

सांसारिक सफलता का मापदंड क्या है? क्या हम अपना Career, विवाह के बाद नहीं बना सकते? ---

 सांसारिक सफलता का मापदंड क्या है? क्या हम अपना Career, विवाह के बाद नहीं बना सकते? ---

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आजकल जीवन में हरेक युवा और युवती अपना अपना Career बनाने के चक्कर में अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ समय व्यतीत कर देते हैं। इसे ही वे सफलता मानते हैं। जहां तक मेरी सोच है -- एक युवक के लिए विवाह की सर्वश्रेष्ठ आयु है २२ से २५ वर्ष तक की, और युवती के लिए १८ से २१ वर्ष तक की। इस आयु में ही विपरीत लिंग के प्रति सबसे अधिक आकर्षण होता है। अच्छी संतान उत्पन्न करने, और उसका पालन-पोषण करने के लिए भी यही आयु सर्वश्रेष्ठ है। इसी आयु में एक युवती स्वयं को अपने पति के अनुसार, और अपनी ससुराल के नये वातावरण में स्वयं को ठीक से ढाल सकती है, और अपनी संतान का ठीक से पालन-पोषण कर सकती है।
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लेकिन आजकल विवाह करते करते युवक की आयु लगभग ३५+ वर्ष और युवती की आयु लगभग ३०+ वर्ष की हो जाती है। इस आयु में देरी से विवाह करने से होने वाली समस्याओं के बारे में मैं लिखना नहीं चाहता, क्योंकि समस्याएँ बहुत अधिक होती हैं। आजकल के युवकों और युवतियों की क्या अपेक्षाएँ होती हैं? उनका भी सबको पता है। बहुत अधिक विकृतियाँ आ गयी हैं। भारत के किसी भी जिले के पारिवारिक न्यायालय में जाकर देख लीजिये। स्थिति बहुत अधिक भयानक है।
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मेरा प्रश्न एक ही है कि क्या हम अपना Career, विवाह के बाद नहीं बना सकते?
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पुनश्च: -- A career can include the training and education required to perform a job. There are different types of careers: knowledge-based, skill-based, entrepreneur-based, and freelance. Consider what you're good at, what you enjoy and what motivates you. Also consider what kind of lifestyle you want, and what you want to get out of your career.

Sunday, 19 January 2025

इस समय राष्ट्र को ब्रह्मत्व की आवश्यकता है, स्वयं के शिवत्व को प्रकट करें ---

 इस समय राष्ट्र को ब्रह्मत्व की आवश्यकता है| स्वयं के शिवत्व को प्रकट करें| वर्तमान नकारात्मक घटना क्रमों की पृष्ठभूमि में आसुरी शक्तियाँ हैं| राक्षसों, असुरों और पिशाचों से मनुष्य अपने बल पर नहीं लड़ सकते| सिर्फ ईश्वर ही रक्षा कर सकते हैं| अपने अस्तित्त्व की रक्षा के लिये हमें भगवान् की शरण लेकर समर्पित होना ही होगा, अन्यथा नष्ट होने के लिये तैयार रहें|

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साधना ..... अपने आप को सम्पूर्ण ह्रदय और शक्ति के साथ भगवान के हाथों में सौंप देना है| कोई शर्त मत रखो, कोई चीज़ मत माँगो, यहाँ तक कि योग में सिद्धि भी मत माँगो| जो भी साधना या जो भी भक्तिभाव या जो भी पूजापाठ हम करते हैं वह हमारे लिये नहीं अपितु भगवान के लिये ही है| उसका उद्देश्य व्यक्तिगत मुक्ति नहीं है| उसका एकमात्र उद्देश्य है ---- "आत्म समर्पण"|
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भगवान का शाश्वत वचन है -- "मच्चितः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि|"
यानी अपने आपको ह्रदय और मन से मुझे दे देने से तूँ समस्त कठिनाइयों और संकटों को मेरे प्रसाद से पार कर जाएगा| "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणम् व्रज | अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः|" समस्त धर्मों (सभी सिद्धांतों, नियमों व हर तरह के साधन विधानों का) परित्याग कर और एकमात्र मेरी शरण में आजा ; मैं तुम्हें समस्त पापों और दोषों से मुक्त कार दूंगा --- शोक मत कर|
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हम केवल उस यजमान की तरह हैं जो यज्ञ को संपन्न होते हुए देखता है; जिसकी उपस्थिति यज्ञ की प्रत्येक क्रिया के लिये आवश्यक है| सारे कर्म तो जगन्माता स्वयं करती हैं और यज्ञरूप में परमात्मा को अर्पित करती है| कर्ताभाव एक भ्रम है| जो लोग भगवान से कुछ माँगते हैं, उन्हें वे वही चीज़ देते हैं जो वे माँगते हैं| परन्तु जो अपने आप को दे देते हैं और कुछ भी नहीं माँगते उन्हें वे अपना सब कुछ दे देते हैं| न केवल कर्ताभाव, कर्मफल आदि बल्कि कर्म तक को उन्हें समर्पित कर दो| साक्षीभाव या दृष्टाभाव तक उन्हें समर्पित कर दो| साध्य भी वे ही हैं, साधक भी वे ही हैं और साधना भी वे ही है| यहाँ तक कि दृष्य, दृष्टी और दृष्टा भी वे ही हैं|ॐ तत् सत्|
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"ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै |
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ||"
"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते |
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ||"
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय| हर हर महादेव| ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
20 जनवरी 2016.

चित्त की वृत्तियों का निरोध करना ..........

 चित्त की वृत्तियों का निरोध करना ..........

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चित्त की वृत्ति दो रूपों --- श्वास-प्रश्वास और वासनाओं द्वारा व्यक्त होती हैं| वासनाएँ तो अति सूक्ष्म होती हैं जो पकड़ में नहीं आतीं| अतः स्थूल रूप श्वास-प्रश्वास के माध्यम से प्राण तत्व की चंचलता को स्थिर किया जाता है| प्राण तत्व के स्थिर होने पर मन और चित्त की वृत्तियाँ भी स्थिर यानि नियंत्रित हो जाती हैं|
एक सूक्ष्म प्राणायाम है जो सुषुम्ना नाड़ी में किया जाता है| इस से प्राण तत्व की चंचलता कम होती है| यह चित्त की वृत्तियों के निरोध का एक अति प्रभावशाली साधन है|
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चित्त की वृत्तियों के निरोध को योग बताया गया है| चित्त की वृत्तियाँ अधोमुखी होती हैं, उनका अधोगमन रोक कर उन्हें ऊर्ध्वमुखी बनाना ही उनका निरोध है| चंचल मन सबसे बड़ी बाधा है जिस पर विजय पाई जाती है चंचल प्राण को स्थिर कर| प्राण तत्व तक पहुँचने के लिए श्वास-प्रश्वास एक माध्यम है| अजपाजाप इसमें बहुत सहायक है| पर बिना भक्ति के कोई एक क़दम भी नहीं चल सकता योग मार्ग पर|
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योग है .... महाशक्ति कुण्डलिनी का परमशिव से मिलन|
योग मार्ग में यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) और नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान) पर जोर इसी लिए दिया है कि बिना सदाचार के की गयी साधना साधक को या तो विक्षिप्त कर देती है या आसुरी जगत का उपकरण बनाकर असुर बना देती है| यह एक दुधारी तलवार है| सदाचार पूर्वक की गयी साधना दैवीय जगत से जोड़ती है|
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परमात्मा के प्रति अहैतुकी परमप्रेम एक ऐसी शक्ति है जो सब बाधाओं के पार पहुंचा देती है|
सभी को शुभ कामनाएँ| आप सब के ह्रदय में प्रभु के प्रति प्रेम जागृत हो|
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय| हर हर महादेव| ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
20 जनवरी 2016.

मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि "स्थितप्रज्ञता" है ---

 मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि "स्थितप्रज्ञता" है ---

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गीता में भगवान श्रीकृष्ण हमें स्थितप्रज्ञ होने को कहते हैं। जहाँ तक मेरी समझ है, अपने आत्म-स्वरूप में स्थित हो जाना ही स्थितप्रज्ञता है। यही भवसागर को पार करना है। भवसागर एक मृगतृष्णा मात्र है। जब हमें परमात्मा से परमप्रेम और आनंद की अनुभूति होने लगे, तब समझना चाहिए कि परमात्मा की कृपा हो रही है, और सारे भेद समाप्त हो रहे हैं।
स्थितप्रज्ञता बहुत बड़ी उपलब्धि है। स्थितप्रज्ञ कौन है? भगवान कहते हैं --
"प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥२:५५॥"
"दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥२:५६॥"
"यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥२:५७॥"
"यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥२:५८॥"
अर्थात् - हे पार्थ? जिस समय पुरुष मन में स्थित सब कामनाओं को त्याग देता है, और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है, उस समय वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है॥
दुख में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता, सुख में जिसकी स्पृहा निवृत्त हो गयी है, जिसके मन से राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं, वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है॥
जो सर्वत्र अति स्नेह से रहित हुआ उन शुभ तथा अशुभ वस्तुओं को प्राप्त कर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित (स्थिर) है॥
कछुवा अपने अंगों को जैसे समेट लेता है वैसे ही यह पुरुष जब सब ओर से अपनी इन्द्रियों को इन्द्रियों के विषयों से परावृत्त कर लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है॥
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मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धियों को क्रमशः हम कैसे प्राप्त करें? गीता में भगवान ने यह बहुत अच्छी तरह से समझाया है। वे परमात्मा हमारे अन्तःकरण को स्वीकार करें। अब तक उन्होने सदा हमारी रक्षा की है, आगे भी करते रहेंगे।
ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० जनवरी २०२४

Saturday, 18 January 2025

महत्व केवल इसी बात का है कि भगवान क्या चाहते हैं ---

इस बात का अब कोई महत्व नहीं रह गया है कि मेरी स्वयं से क्या अपेक्षाएँ हैं। महत्व केवल इसी बात का है कि भगवान क्या चाहते हैं। भगवान चाहते हैं --

"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥९:३४॥"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥१८:६५॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
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पूरी बात समझने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का स्वाध्याय करना होगा। भगवान से मेरी एक ही प्रार्थना है कि मेरे अन्तःकरण में किसी कामना का जन्म ही न हो। आप स्वयं ही अपनी पूर्णता में व्यक्त हों। मेरा कोई पृथक अस्तित्व न रहे। सिर्फ आप ही आप रहें।

ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१९ जनवरी २०२४