Sunday, 19 January 2025

इस समय राष्ट्र को ब्रह्मत्व की आवश्यकता है, स्वयं के शिवत्व को प्रकट करें ---

 इस समय राष्ट्र को ब्रह्मत्व की आवश्यकता है| स्वयं के शिवत्व को प्रकट करें| वर्तमान नकारात्मक घटना क्रमों की पृष्ठभूमि में आसुरी शक्तियाँ हैं| राक्षसों, असुरों और पिशाचों से मनुष्य अपने बल पर नहीं लड़ सकते| सिर्फ ईश्वर ही रक्षा कर सकते हैं| अपने अस्तित्त्व की रक्षा के लिये हमें भगवान् की शरण लेकर समर्पित होना ही होगा, अन्यथा नष्ट होने के लिये तैयार रहें|

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साधना ..... अपने आप को सम्पूर्ण ह्रदय और शक्ति के साथ भगवान के हाथों में सौंप देना है| कोई शर्त मत रखो, कोई चीज़ मत माँगो, यहाँ तक कि योग में सिद्धि भी मत माँगो| जो भी साधना या जो भी भक्तिभाव या जो भी पूजापाठ हम करते हैं वह हमारे लिये नहीं अपितु भगवान के लिये ही है| उसका उद्देश्य व्यक्तिगत मुक्ति नहीं है| उसका एकमात्र उद्देश्य है ---- "आत्म समर्पण"|
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भगवान का शाश्वत वचन है -- "मच्चितः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि|"
यानी अपने आपको ह्रदय और मन से मुझे दे देने से तूँ समस्त कठिनाइयों और संकटों को मेरे प्रसाद से पार कर जाएगा| "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणम् व्रज | अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः|" समस्त धर्मों (सभी सिद्धांतों, नियमों व हर तरह के साधन विधानों का) परित्याग कर और एकमात्र मेरी शरण में आजा ; मैं तुम्हें समस्त पापों और दोषों से मुक्त कार दूंगा --- शोक मत कर|
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हम केवल उस यजमान की तरह हैं जो यज्ञ को संपन्न होते हुए देखता है; जिसकी उपस्थिति यज्ञ की प्रत्येक क्रिया के लिये आवश्यक है| सारे कर्म तो जगन्माता स्वयं करती हैं और यज्ञरूप में परमात्मा को अर्पित करती है| कर्ताभाव एक भ्रम है| जो लोग भगवान से कुछ माँगते हैं, उन्हें वे वही चीज़ देते हैं जो वे माँगते हैं| परन्तु जो अपने आप को दे देते हैं और कुछ भी नहीं माँगते उन्हें वे अपना सब कुछ दे देते हैं| न केवल कर्ताभाव, कर्मफल आदि बल्कि कर्म तक को उन्हें समर्पित कर दो| साक्षीभाव या दृष्टाभाव तक उन्हें समर्पित कर दो| साध्य भी वे ही हैं, साधक भी वे ही हैं और साधना भी वे ही है| यहाँ तक कि दृष्य, दृष्टी और दृष्टा भी वे ही हैं|ॐ तत् सत्|
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"ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै |
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ||"
"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते |
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ||"
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय| हर हर महादेव| ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
20 जनवरी 2016.

चित्त की वृत्तियों का निरोध करना ..........

 चित्त की वृत्तियों का निरोध करना ..........

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चित्त की वृत्ति दो रूपों --- श्वास-प्रश्वास और वासनाओं द्वारा व्यक्त होती हैं| वासनाएँ तो अति सूक्ष्म होती हैं जो पकड़ में नहीं आतीं| अतः स्थूल रूप श्वास-प्रश्वास के माध्यम से प्राण तत्व की चंचलता को स्थिर किया जाता है| प्राण तत्व के स्थिर होने पर मन और चित्त की वृत्तियाँ भी स्थिर यानि नियंत्रित हो जाती हैं|
एक सूक्ष्म प्राणायाम है जो सुषुम्ना नाड़ी में किया जाता है| इस से प्राण तत्व की चंचलता कम होती है| यह चित्त की वृत्तियों के निरोध का एक अति प्रभावशाली साधन है|
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चित्त की वृत्तियों के निरोध को योग बताया गया है| चित्त की वृत्तियाँ अधोमुखी होती हैं, उनका अधोगमन रोक कर उन्हें ऊर्ध्वमुखी बनाना ही उनका निरोध है| चंचल मन सबसे बड़ी बाधा है जिस पर विजय पाई जाती है चंचल प्राण को स्थिर कर| प्राण तत्व तक पहुँचने के लिए श्वास-प्रश्वास एक माध्यम है| अजपाजाप इसमें बहुत सहायक है| पर बिना भक्ति के कोई एक क़दम भी नहीं चल सकता योग मार्ग पर|
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योग है .... महाशक्ति कुण्डलिनी का परमशिव से मिलन|
योग मार्ग में यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) और नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान) पर जोर इसी लिए दिया है कि बिना सदाचार के की गयी साधना साधक को या तो विक्षिप्त कर देती है या आसुरी जगत का उपकरण बनाकर असुर बना देती है| यह एक दुधारी तलवार है| सदाचार पूर्वक की गयी साधना दैवीय जगत से जोड़ती है|
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परमात्मा के प्रति अहैतुकी परमप्रेम एक ऐसी शक्ति है जो सब बाधाओं के पार पहुंचा देती है|
सभी को शुभ कामनाएँ| आप सब के ह्रदय में प्रभु के प्रति प्रेम जागृत हो|
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय| हर हर महादेव| ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
20 जनवरी 2016.

मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि "स्थितप्रज्ञता" है ---

 मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि "स्थितप्रज्ञता" है ---

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गीता में भगवान श्रीकृष्ण हमें स्थितप्रज्ञ होने को कहते हैं। जहाँ तक मेरी समझ है, अपने आत्म-स्वरूप में स्थित हो जाना ही स्थितप्रज्ञता है। यही भवसागर को पार करना है। भवसागर एक मृगतृष्णा मात्र है। जब हमें परमात्मा से परमप्रेम और आनंद की अनुभूति होने लगे, तब समझना चाहिए कि परमात्मा की कृपा हो रही है, और सारे भेद समाप्त हो रहे हैं।
स्थितप्रज्ञता बहुत बड़ी उपलब्धि है। स्थितप्रज्ञ कौन है? भगवान कहते हैं --
"प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥२:५५॥"
"दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥२:५६॥"
"यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥२:५७॥"
"यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥२:५८॥"
अर्थात् - हे पार्थ? जिस समय पुरुष मन में स्थित सब कामनाओं को त्याग देता है, और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है, उस समय वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है॥
दुख में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता, सुख में जिसकी स्पृहा निवृत्त हो गयी है, जिसके मन से राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं, वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है॥
जो सर्वत्र अति स्नेह से रहित हुआ उन शुभ तथा अशुभ वस्तुओं को प्राप्त कर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित (स्थिर) है॥
कछुवा अपने अंगों को जैसे समेट लेता है वैसे ही यह पुरुष जब सब ओर से अपनी इन्द्रियों को इन्द्रियों के विषयों से परावृत्त कर लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है॥
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मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धियों को क्रमशः हम कैसे प्राप्त करें? गीता में भगवान ने यह बहुत अच्छी तरह से समझाया है। वे परमात्मा हमारे अन्तःकरण को स्वीकार करें। अब तक उन्होने सदा हमारी रक्षा की है, आगे भी करते रहेंगे।
ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० जनवरी २०२४

Saturday, 18 January 2025

महत्व केवल इसी बात का है कि भगवान क्या चाहते हैं ---

इस बात का अब कोई महत्व नहीं रह गया है कि मेरी स्वयं से क्या अपेक्षाएँ हैं। महत्व केवल इसी बात का है कि भगवान क्या चाहते हैं। भगवान चाहते हैं --

"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥९:३४॥"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥१८:६५॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
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पूरी बात समझने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का स्वाध्याय करना होगा। भगवान से मेरी एक ही प्रार्थना है कि मेरे अन्तःकरण में किसी कामना का जन्म ही न हो। आप स्वयं ही अपनी पूर्णता में व्यक्त हों। मेरा कोई पृथक अस्तित्व न रहे। सिर्फ आप ही आप रहें।

ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१९ जनवरी २०२४

Friday, 17 January 2025

हमारा समर्पण सिर्फ और सिर्फ भगवान की अनंत असीम समग्रता के प्रति है, न कि उनकी किसी अभिव्यक्ति पर ---

हमारा समर्पण सिर्फ और सिर्फ भगवान की अनंत असीम समग्रता के प्रति है, न कि उनकी किसी अभिव्यक्ति पर। जब तक हम स्वयं को यह शरीर मानते हैं, तब तक आध्यात्मिक साधना में कोई प्रगति नहीं कर सकते। हमारी प्रगति उसी क्षण से प्रारंभ होती है जिस क्षण यह लगे कि हम यह शरीर नहीं हैं, और साधक साध्य व साधना सिर्फ भगवान हैं। भगवान अपनी साधना स्वयं कर रहे हैं, हम तो एक निमित्त मात्र हैं। वे ही दृष्टा, दृश्य व दृष्टि हैं। यह भौतिक सूक्ष्म व कारण शरीर, अंतकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार), कर्मेन्द्रियाँ, ज्ञानेंद्रियाँ, व उनकी तन्मात्राएं -- परमात्मा की सिर्फ अभिव्यक्तियाँ हैं।

यह भौतिक शरीर -- लोकयात्रा के लिए मिला हुआ एक वाहन मात्र है जैसे कोई मोटर साइकिल। जैसे मोटर साइकिल की देखभाल करते हैं, वैसे ही इस शरीर की भी करनी पड़ती है। संसार हमें इस मोटर साइकिल के रूप में ही जानता है। हमारे आत्म-तत्व को कोई अन्य नहीं जान सकता। सदा यह भाव रखें कि भगवान ही हमारे माध्यम से साँस ले रहे हैं, और वे ही सारे कार्य संपादित कर रहे हैं। हमारा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है। एकमात्र अस्तित्व भगवान का है।
वे ही यह मैं बन गए है, मेरे से अन्य कोई भी या कुछ भी नहीं है। इस सृष्टि का सम्पूर्ण अस्तित्व "मैं" हूँ। मेरे से अन्य कोई नहीं है। ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१८ जनवरी २०२४

Thursday, 16 January 2025

उपासना ---

उपासना ---

दिन में २४ घंटे, सप्ताह में सातों दिन, हर क्षण प्रयास यही रहता है कि सहस्त्रार से ऊपर इस भौतिक शरीर महाराज से बाहर परमशिव की अनंत विराट चेतना में ही रहते हुये उनकी उपासना हो।
जब तक प्राणरूप में जगन्माता भगवती इस देह को जीवित रखना चाहती है, रखे। वे जो भी काम करवाना चाहती है, वह करवाये। यह शरीर महाराज और उससे जुड़ा अंतःकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार) सब कुछ उन्हीं का है, मेरा कुछ भी नहीं है। मेरा सम्पूर्ण जीवन परमशिव को समर्पित है।

देवासुर-संग्राम हर युग में सदा से ही चलते आये हैं, और चलते रहेंगे। वर्तमान में भी चल रहे हैं। हमें आवश्यकता है -- आत्म-साक्षात्कार, यानि भगवत्-प्राप्ति की। फिर जो कुछ भी करना है, वह स्वयं परमात्मा करेंगे। हम परमात्मा के उपकरण बनें, परमात्मा में स्वयं को विलीन कर दें। अब परमात्मा के बिना नहीं रह सकते, उन्हें इसी क्षण यहीं आना ही पड़ेगा।

जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, वह सब एक दिन अदृश्य हो जाएगा। वह प्रकाश ही सत्य है जो सभी दीपों में प्रकाशित है। स्वयं को जलाकर उस प्रकाश में वृद्धि करें, सारा अन्धकार एक रोग है जिस से मुक्त हुआ जा सकता है। वास्तव में हम प्रकाशों के प्रकाश -- ज्योतिषांज्योति हैं।

तत्सत् !!
कृपा शंकर
१७ जनवरी २०२३

भगवान की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति भगवान के ध्यान में होती है ---

भगवान की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति भगवान के ध्यान में होती है। इस बात को वे ही समझ सकते हैं, जो उनका नित्य नियमित निरंतर ध्यान कर उन्हें स्वयं के माध्यम से व्यक्त होने देते हैं। ध्यान में सहस्त्रारचक्र खुल जाता है, और हमारी चेतना इस भौतिक देह में न रहकर भगवान की ज्योतिर्मय विराट अनंतता के साथ एक हो जाती है। उस अनंतता में भी जितना ऊपर उठ सकते हो, उतना ऊपर उठ जाओ। उस ज्योतिर्मय ब्रह्म में एक सूर्यमण्डल के दर्शन होंगे। उस सूर्यमण्डल में भगवान पुरुषोत्तम का ध्यान किया जाता है। ध्यान में भगवान हमारे साथ एक हो जाते हैं। भगवान स्वयं ही कर्ता होते हैं। उनसे पृथक हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। उनके साथ एकाकार होना ही ब्राह्मी-स्थिति है। यही कूटस्थ-चैतन्य है। अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को भगवान पुरुषोत्तम में विलीन कर दें। ज्योतिषांज्योति हम स्वयं हैं। गीता में भगवान कहते हैं --
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥ (श्रीमद्भगवद्गीता)
श्रुति भगवती कहती है --
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम्
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ (कठोपनिषद २-२-१५)
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गीता के पुरुषोत्तम-योग का कभी कभी स्वाध्याय करें, और सूर्यमण्डल में नित्य पुरुषोत्तम का दीर्घ व गहनतम ध्यान करें। सबसे बड़ी शक्ति जो हमें भगवान की ओर ले जा सकती है, वह है -- "परमप्रेम" यानि "अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति।" तब सारा मार्गदर्शन स्वयं भगवान ही करते हैं। वह परमप्रेम सब में जागृत हो।
ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ जनवरी २०२४