Saturday, 11 January 2025

भारत में बढ़ रही शराब के नशे की प्रवृति बड़ी दुखद है .....

समाज के हर वर्ग में, क्या अमीर और क्या गरीब,यहाँ तक कि महिलाओं में भी पनप रही शराब पीने की प्रवृति बड़ी दुखद है| यह भ्रष्टाचार से भी अधिक भयावह है| यह भारत को खोखला कर रही है|
भारत में अंग्रेजों के आने से पूर्व मद्यपान बहुत कम लोग करते थे| अंग्रेजों ने इसे लोकप्रिय बनाया|
अंग्रेजों के आने से पूर्व नशा करने वाले भांग खाते थे और गांजा पीते थे जो बहुत कम हानि करता था| अमेरिका में तो एक समय भांग बहुत लोकप्रिय थी और वहां की सरकार इसके उत्पादन को प्रोत्साहन देती थी| भाँग गांजे के पौधे जंगली पौधे थे जिन पर लोग अपने पैसे बर्बाद नहीं करते थे, अपनी पत्नियों को नहीं पीटते थे, और किसी का कोई नुकसान नहीं करते थे| पर सरकार को इसमें कोई टेक्स नहीं मिलता था इसलिए सरकारों ने इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया| शराब की बिक्री से सरकार को 40% कर मिलता है इसलिए सरकारें शराब को प्रोत्साहन देती हैं|
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अब यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो रहा है कि भांग और गांजे से शराब के मुकाबले बहुत ही कम नुकसान होता है| भारत में साधू संत अति प्राचीन काल से भांग गांजे का सेवन करते आ रहे हैं| इसमें कोई बुराई नहीं है|
तम्बाकू खाकर अनेक लोग मरे हैं पर गांजा पीकर पूरे विश्व के इतिहास में आज तक एक भी व्यक्ति नहीं मरा है| सिमित मात्रा में नियमित भांग खाने वालों ने बहुत लम्बी उम्र पाई है|
अब अमेरिका में भांग गांजे पर से प्रतिबन्ध हटाने की माँग उठ रही है| वहाँ जब इस पर से प्रतिबन्ध हट जाएगा तो भारत में भी हट जाएगा क्योंकि हम हर बात में पश्चिम की नकल करते हैं, और पश्चिम की नक़ल कर के ही शराबखोरी को प्रोत्साहन दे रहे हैं|
प्राचीन भारत के राजा बड़े गर्व से कहते थे कि मेरे राज्य में कोई चोर नहीं है और कोई शराब नहीं पीता|
भारत में एक दिन ऐसा अवश्य आयेगा जब कोई चोर नहीं होगा व कोई दुराचारी और शराबी नहीं होगा|
जय श्री राम | ॐ ॐ ॐ ||
११ जनवरी २०१६

Friday, 10 January 2025

अपनी कमियों व कर्मों के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं, भगवान नहीं ---

 अपनी कमियों व कर्मों के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं, भगवान नहीं ---

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भगवान की कोई इच्छा या अनिच्छा नहीं होती, उनकी कृपा सब पर बराबर है। हम अपनी असफलता/असमर्थता/असहायता के लिए भगवान को दोष देते हैं, यह गलत है। यह झूठ है कि -- वही होता है जैसी भगवान की इच्छा होती है। यहाँ भगवान की कोई इच्छा या अनिच्छा नहीं है, यह सृष्टि अपने नियमों के अनुसार चल रही ही। प्रकृति अपने नियमों से कोई समझौता नहीं करती। उन नियमों को न समझना हमारा अज्ञान है। जिसे हम नहीं समझते, उसे अपना भाग्य कह देते हैं। उस दुर्भाग्य या सौभाग्य के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं, भगवान नहीं।
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गुरुकृपा से मैंने कर्मफलों व पुनर्जन्म को बहुत अच्छी तरह से समझा है, और बहुत कुछ अनुभूत किया है जो अनिर्वचनीय है। मेरी भी अपनी सीमाएँ हैं, विवशता है। अपनी अनुभूतियों को शब्द देने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है। इसमें दोष किसी अन्य का या भगवान का नहीं है; मेरे अपने ही कर्मों का ही है, जिन का फल मैं भुगत रहा हूँ। अपने कई अनुभवों को मैं व्यक्त करना चाहता हूँ, लेकिन अपनी स्वयं कि कमजोरियों के कारण नहीं कर सकता। भगवान ने तो अपनी परमकृपा कर के अपने कई रहस्य मुझ पर अनावृत किए हैं -- जिनकी मुझमें पात्रता थी भी या नहीं, मुझे नहीं पता।
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सब बंधनों को तोड़ने का एकमात्र उपाय है - भगवान की भक्ति (परमप्रेम) और समर्पण; जैसा भगवान ने गीता में बताया है ---
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
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इस से अधिक कुछ लिखने की आंतरिक अनुमति मुझे नहीं है। आप सब में परमात्मा को नमन !! ॐ तत्सत् !! हरिः ॐ !!
कृपा शंकर
११ जनवरी २०२२ (23:32hrs.)

(संशोधित व पुनःप्रस्तुत) ग्रेट-निकोबार द्वीप व इंदिरा पॉइंट की कुछ स्मृतियाँ ---

 (संशोधित व पुनःप्रस्तुत) ग्रेट-निकोबार द्वीप व इंदिरा पॉइंट की कुछ स्मृतियाँ ---

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लगभग छह वर्ष पहिले लिखे एक बहुत पुराने यात्रा-वृतांत को संशोधित कर के यह लेख लिख रहा हूँ। २२-२३ वर्ष पूर्व भारत के सबसे दक्षिणी भाग में स्थित ग्रेट-निकोबार द्वीप की यात्रा का अवसर सन २००१ में मुझे दो बार मिला था। उसकी बड़ी मधुर स्मृति है। ग्रेट निकोबार द्वीप के समुद्र तट विश्व के सबसे शानदार और सबसे सुरक्षित समुद्र तटों में से हैं। सन २००४ में आई सुनामी में वहाँ बहुत लोग मरे, व सब कुछ नष्ट हो गया था। लेकिन शीघ्र ही सब कुछ पुनश्च: सुव्यवस्थित हो गया। वहाँ पर्यटकों के निवास के लिए आधारभूत सुविधाएं नहीं हैं, इसलिए पर्यटन व्यवसाय आरंभ नहीं हुआ है। विदेशी पर्यटकों को यहाँ आने की बिल्कुल भी अनुमति नहीं है। लगता है वहाँ तमिलनाडु से आकर बसे हुए लोग अधिक हैं। पंजाबी, बिहारी, तेलुगु और मलयाली भी हैं। हिन्दी वहाँ की सामान्य भाषा है, जो सभी को आती है। अधिकांश जनसंख्या हिंदुओं की है अतः कई हिन्दू मंदिर हैं, जिनमें मुझे पुजारी तमिल भाषी ही मिले, लेकिन उनको हिन्दी का अच्छा ज्ञान था। एक बहुत बड़ा रोमन केथोलिक चर्च भी था। निकोबारी लोग जरा हट कर रहते हैं। उनके मकान दूसरी तरह के होते हैं।
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वहाँ के अति सुंदर वीरान समुद्र तटों पर और जंगलों में मैं अकेला ही नित्य प्रातः कई दिनों तक निर्भय होकर घूमने जाता था, क्योंकि कोई हिंसक जीव वहाँ नहीं होते। कोई चोर व डकैत भी नहीं होते। एक बार मुझे लगा कि वहाँ कोई जंगली सूअर है तो दूसरे दिन आत्मरक्षा के लिए एक बल्लम हाथ में लेकर गया जिससे आत्मरक्षा का पूरा मुझे पूरा अभ्यास था। लेकिन उसकी आवश्यकता कभी नहीं पड़ी। फिर वहाँ के स्थानीय लोगों ने बताया कि डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। वहाँ कोई जंगली सूअर नहीं होते। दूर से किसी जंगली हिरण को मैंने सूअर समझ लिया होगा।
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वहाँ के इतिहास के अनुसार दक्षिण भारत के हिन्दू चोल साम्राज्य के राजा राजेन्द्र चोल का साम्राज्य पूरे इंडोनेशिया, लाओस, थाईलेंड और विएतनाम तक था। वे एक बार केरल से दस सहस्त्र सैनिकों के साथ इस द्वीप पर पधारे थे, और यहाँ एक सहस्त्र रुद्राक्ष के पेड़ लगवाये। रुद्राक्ष के पेड़ की आयु दो हजार वर्ष होती है। उनके समय के लगाए हुए पाँच सौ से अधिक रुद्राक्ष के वृक्ष अभी भी जीवित हैं। रुद्राक्ष की मालाएं वहाँ खूब मिलती हैं। इंडोनेशिया का सुमात्रा द्वीप अधिक दूर नहीं है। वहाँ भी खूब रुद्राक्ष के वृक्ष होते हैं।
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भारत के सबसे दक्षिणी भाग का नाम "इंदिरा पॉइंट" है। यह नाम स्वयं इंदिरा गाँधी ने दिया था। इस से पूर्व इस स्थान का नाम पिग्मेलियन पॉइंट था। यह बहुत सुन्दर एक छोटा सा गाँव है। नौसेना, वायुसेना, तटरक्षक व कुछ अन्य विभागों के सरकारी कर्मचारी यहाँ रहते थे। अब तो सुना है सेना का बहुत बड़ा प्रतिष्ठान वहाँ है। वहाँ के प्रकाश-स्तम्भ पर चढ़ कर बहुत सुन्दर दृश्य दिखाई देते हैं। मैं सन २००१ में वहाँ गया था। बाद में २००४ में आई सुनामी में यह प्रकाश स्तम्भ थोड़ा सा हटकर पानी से घिर गया था। इस सुनामी में यहाँ के २० परिवार, चार वैज्ञानिक और बहुत सारे सरकारी कर्मचारी मारे गए थे।
यहाँ के जंगलों में मैनें एक विशेष अति सुन्दर चिड़िया की तरह के पक्षी देखे जो भारत में अन्यत्र कहीं भी दिखाई नहीं दिये। ऐसे ही एक विशेष शक्ल के बन्दर देखे जो भारत में अन्यत्र कहीं भी नहीं दिखाई दिए। एक समुद्र तट यहाँ है जिस की रेत में अंडे देने के लिए समुद्री कछुए ऑस्ट्रेलिया तक से आते हैं।
यह स्थान अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में ग्रेट निकोबार द्वीप पर निकोबार तहसील की लक्ष्मी नगर पंचायत में है।
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ग्रेट निकोबार द्वीप पर सबसे बड़ा स्थान "कैम्पवेल बे" है जो अच्छी बसावट वाला एक छोटा सा नगर है। सारी सुविधाएँ यहाँ उपलब्ध हैं। यहाँ तमिलनाडू से आकर बहुत लोग बसे हैं, जो सब हिंदी बोलते हैं। यहाँ के समुद्र तट बहुत ही सुन्दर हैं। वहाँ प्रातःकाल घूमने का बड़ा ही आनंद आता है। 'कैम्पवेल बे' नगर में आने के लिए पोर्ट ब्लेयर से पवनहंस हेलिकोप्टर सेवा थी। सप्ताह में एक दिन एक यात्री जलयान भी पोर्ट ब्लेयर से यहाँ आता था। व्यवसायिक रूप से ताड़ के पेड़ और जायफल/जावित्री के पौधे भी खूब बड़े स्तर पर लगाए हुए थे। यहाँ के शास्त्री नगर से इंदिरा पॉइंट की दूरी २१ किलोमीटर है जो सड़क से जुड़ा हुआ है। मार्ग में गलाथिया नाम की एक नदी भी आती है जिस पर पुल बना हुआ है। बिजली उत्पादन का भी एक हाइड्रो-इलेक्ट्रिक संयंत्र उस समय लगवाया जा रहा था।
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यहाँ से सिर्फ १६३ किलोमीटर दक्षिण में इंडोनेशिया में सुमात्रा का सबांग जिला है। मैं अंडमान-निकोबार के कई द्वीपों में गया हूँ जिनमें से कुछ तो अविस्मरणीय हैं। मलयेशिया, इन्डोनेशिया और सिंगापूर का भी भ्रमण किया है।
कृपा शंकर
११ जनवरी २०२४

भगवान से कुछ मांगना भगवान का अपमान है ---

 भगवान से कुछ मांगना भगवान का अपमान है ---

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हम सर्वव्यापी भगवान को कुछ दे ही सकते हैं, उनसे कुछ ले नहीं सकते। भगवान स्वयं ही यह सब कुछ बन गए हैं। सब कुछ तो वे ही हैं। सारा सामान उन्हीं का है। हम भी उन्हीं के हैं, उनसे कुछ मांगना उनका अपमान है।
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भगवान को देने के लिए अन्तःकरण के रूप में हमारे पास चार ही चीजें हैं, वे भगवान को समर्पित कर दें, अन्य कुछ भी हमारे पास नहीं है। भगवान को हम अपना -- (१) मन, (२) बुद्धि, (३) चित्त, और (४) अहंकार, -- ये ही दे सकते हैं। बाकी हमारे पास अन्य कोई सामान नहीं है। उनको ये बापस लौटाने की प्रक्रिया ही आध्यात्मिक साधना है, यही हमारा स्वधर्म और भगवत्-प्राप्ति है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण का आदेश है कि मन को भगवान में लगा कर किसी अन्य विषय का चिंतन न करें --
"शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥६:२५॥"
"यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥६:२६॥"
अर्थात् - शनै: शनै: धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा (योगी) उपरामता (शांति) को प्राप्त होवे; मन को आत्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करे॥
यह चंचल और अस्थिर मन जिन कारणों से (विषयों में) विचरण करता है, उनसे संयमित करके उसे आत्मा के ही वश में लावे अर्थात् आत्मा में स्थिर करे॥
Little by little, by the help of his reason controlled by fortitude, let him attain peace; and, fixing his mind on the Self, let him not think of any other thing.
When the volatile and wavering mind would wander, let him restrain it and bring it again to its allegiance to the Self.
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ये सब बातें मैं फेसबुक नाम के मंच पर लिख रहा हूँ जिसका मालिक मार्क जुकरबर्ग नाम का एक अमेरिकन यहूदी है जो हनुमान जी का परम भक्त है, और ब्रह्मलीन नीमकरोरी बाबा का चेला है। इन्स्टाग्राम का मालिक भी वही है। सोशियल मीडिया के अन्य मालिक भी प्रायः अमेरिकन यहूदी हैं, जो किसी न किसी रूप में सनातन धर्म में आस्थावान हैं।
आप सभी को नमन !! ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! जय जय श्रीसीताराम !! श्रीमते रामचंद्राय नमः !! सर्वेश्वरश्रीरघुनाथोविजयतेतराम !!
कृपा शंकर
११ जनवरी २०२४

Thursday, 9 January 2025

भगवान के अस्तित्व का यहाँ पता चलेगा .....

भगवान के अस्तित्व का यहाँ पता चलेगा .....

इंडोनेशिया. ज्वालामुखी माउंट ब्रोमो के मुहाने पर 700 साल पहले गणेशजी की स्थापना की गई थी। तब से विघ्नहर्ता गणेश यहां विराजे हैं।
इंडोनेशिया में 141 ज्वालामुखी हैं, जिनमें से 130 आज भी सक्रिय हैं। पूर्वी जावा का माउंट ब्रोमो उन्हीं में से एक है, जो हजारों वर्षों से धधक रहा है।
इंडोनेशिया से वहां की हिंदू धर्म परिषद के अध्यक्ष केतूत डोंडेर ने इस महान परंपरा के बारे में बताया...
ब्रोमो पहाड़ पर 2329 मीटर की ऊंचाई पर लावा पत्थरों से गणेशजी बने हैं। आसपास के 48 गांवों के 3 लाख हिंदुओं का विश्वास है कि गणेश उनके रक्षक हैं।
पहाड़ के सबसे पास के गांव केमोरो लवांग में हिंदू परिवार रहते हैं, जिन्हें टेंगरेस कहा जाता है। ये खुद को 12वीं सदी के माजपाहित शासक के वंशज कहते हैं।
इनकी मान्यता है कि इनके पूर्वजों ने गणेश प्रतिमा की स्थापना की थी। जिस जगह से ज्वालामुखी की चढ़ाई शुरू होती है, वहां काले पत्थरों से बना 9वीं शताब्दी का ब्रह्माजी का मंदिर है।
गणपति की पूजा नहीं होने से अनिष्ट हो सकता है
जावा की जैवनीज भाषा में ब्रह्मा को ब्रोमो कहते हैं। यूं तो माउंट ब्रोमो पर सालभर गणपति की पूजा होती है, पर मुख्य आयोजन जुलाई में 15 दिन तक चलता है।
500 साल से ज्यादा पुरानी यह परंपरा ‘याद्नया कासडा’ कहलाती है, जो कभी रुकी नहीं। चाहे ज्वालामुखी में भीषण विस्फोट ही क्यों न हो रहे हों।
2016 में ज्वालामुखी में विस्फोट हो रहे थे। तब भी सरकार ने सिर्फ 15 पुजारियों को पूजा की अनुमति दी थी। पर हजारों की संख्या में लोग पहुंच गए थे।
लोगों का मानना है कि गणपति की पूजा नहीं होने से अनिष्ट हो सकता है। इंडोनेशिया में गणेश की इतनी मान्यता है कि वहां के 20 हजार के नोट पर भी गणेश की तस्वीर है।
१० जनवरी २०२०
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भारत से बाहर पूरे विश्व में फैले हुए सनातन हिन्दू धर्मावलंबियों को नमन !
मुझे प्रायः सभी महाद्वीपों (एशिया, यूरोप, अफ्रीका, उत्तर व दक्षिण अमेरिका) के अनेक देशों में रहने वाले अनेक हिंदुओं से व्यक्तिगत रूप से मिलने का अवसर मिला है| वे हमारे से अधिक उत्साह से धर्मावलम्बी हैं| विषम से विषम परिस्थितियों में उन्होंने अपने धर्माचरण को सुरक्षित रखा है| वे धर्म के प्रहरी हैं, धर्म ने उनकी रक्षा की है|

वेद पाठ कैसे करें ??

 वेद पाठ कैसे करें ??

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प्रत्येक बालक को उपनयन संस्कार के साथ साथ संध्या विधि सिखा देनी चाहिए। फिर अभ्यास कराते कराते निम्न पाँच वैदिक सूक्तों का पाठ भी कंठस्थ करा देना चाहिए --
(१) भद्र सूक्त, (२) पुरुष सूक्त, (३) श्री सूक्त, (४) रुद्र सूक्त और (५) सूर्यसूक्त॥
सायं प्रातः दिन में दो बार संध्या/गायत्रीजप/प्राणायाम; और दिन में एक बार उपरोक्त पांचों सूक्तों का पाठ -- अपने धर्म पर अडिग बना देगा। ये वैदिक सूक्त बहुत छोटे छोटे हैं, लेकिन बहुत अधिक प्रभावशाली हैं।
जो बालक अङ्ग्रेज़ी स्कूलों में पढे हैं, और संस्कृत नहीं पढ़ सकते, उन्हें भी अभ्यास द्वारा ये सिखा देने चाहियें।
किसी भी परिस्थिति में एक दिन में कम से कम दस (की संख्या में) गायत्री मंत्र का जप तो अनिवार्य है।
ॐ तत्सत् !!
१० जनवरी २०२३

जोशीमठ (उत्तराखंड) के विनाश का कारण असुरों का कहर है, प्रकृति की कोई गलती नहीं है --- (संकलित लेख)

 आदरणीय देवेंद्र कैंथोला जी :- (पंडित रामेश्वर मिश्र पंकज जी के वाल से संकलित लेख)

प्रणाम... अपने एक मित्र, प्रोफ भगवती पुरोहित जी का परिचय आपसे कराने को देख रहा था कि जोशीमठ प्रकरण में उनका एक लेख सामने आया, सो संलग्न कर रहा हूँ... बाकी फ़ोन पर 🙏🏽
एक मित्र सुरेश चंद्र जोशीजी की वाल से
आदि शंकराचार्य की तपःस्थली और नृ-सिंह की भूमि कैसे बर्बाद हुई जानते हैं डॉ0 भगवती प्रसाद पुरोहित की कलम से आइये इसकी पड़ताल करते हैं-

जोशीमठ कोई शब्द नहीं है शब्द है "योशी" योशी का अर्थ होता है, जो दो घरों को गयी हो। हमारे पहाड़ों में इसे "द्वघरया" भी कहते हैं। साधारण तया द्वघरया का अर्थ होता है जो स्त्री अपने पहले पति को छोड़ कर दूसरे पति के घर चले जाती है वह द्वघरया कह लाती है। जिसे समाज में बहुत प्रतिष्ठा की दृष्टि से नहीं देखा जाता लेकिन इसके ठीक विपरीत जोशीमठ को दूनी प्रतिष्ठा की दृष्टि से देखा जाता है। पाण्डुकेश्वर के ताम्रपत्रों में जोशीमठ का नाम योशिका लिखा गया है। श्री बद्रीनाथ के ढट्टा-पट्टा (दान-पत्र) को मैंने पढा तो उसमें जोशीमठ शब्द 100 साल पहले तक कहीं नहीं लिखा मिला। जबकि इसकी जो सनदें मेरे पास हैं, (जो शायद श्री बद्रीनाथ मन्दिर समिति से अधिक सुरक्षित हैं) उसमें जोशीमठ के लिए जोसी या जूसी शब्द का प्रयोग किया गया है। जब मैंने बार-बार इस शब्द को पढा तो मैं समझ नहीं पाया कि ये जोसी या जूसी कौन है? अधिकांश जगह योशी लिखा मिला तो मैंने विख्यात इतिहास व पुरातत्वविद यशवंत सिंह कठौच जी को फोन लगाया कि ये क्या गड़बड़ है? उंन्होने कहा आप पाण्डुकेश्वर के ताम्रपत्रों को देख लो उसमें योशिका उत्कीर्ण है। मैंने ताम्र पत्रों के छाया चित्र और अनुवाद निकाले तो योशिका शब्द मिला।

मुझे यह आभास हो गया कि यह ऐतिहासिक स्थल है। इसके नाम का अवश्य वैज्ञानिक आधार होगा। तब मैंने तमाम सँस्कृत के शब्दकोशों और ग्रन्थों को टटोलना शुरू किया तो शब्द "योशी" का अर्थ लिखा मिला जिसके दो घर हों या जो रास्ता दो घरों को जाता हो उस स्थान को योशी (द्वघरया) कहते हैं।
मुझे लग गया यहां से एक घर श्री बद्रिकाश्रम और दूसरे घर कैलास को रास्ता जाता है दोनों घरों का ये बेस कैंप है इसलिए इसे योशी कहा जाता है। सँस्कृत में य का ज उच्चारण विद्वान करते हैं। इसलिए यज्ञ को आपने जग्य कहते लोगों को सुना होगा। इसी तरह उच्चारण में योशी जोशी हो गया और आदि गुरु शंकराचार्य के मठ के कारण इसका नाम जोशीमठ पुकारा जाने लगा। मुझे अफसोस है कि आज जोशीमठ ने अपने नाम तक को भुला दिया है और इस बात को भी कि वे कैलास मानसरोवर के भी मालिक रहे हैं। क्योंकि उत्तराखण्ड की यात्रा देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग,नन्दप्रयाग, विष्णुप्रयाग में स्नान, दान और यज्ञ-याग के बिना पूरी नहीं होती प्रयागों पर स्नान और यज्ञ अनुष्ठान द्वारा प्रजापति ब्रह्मा की उपासना पूर्ण होती है तब जाकर भगवान नारायण के दर्शन के लिए जोशीमठ से आगे बढ़ने की मर्यादा है। श्री बद्रीनारायण में जाकर पहले बामणी के उर्वसी मन्दिर में पूजा अर्चना कर पीठ की अधिष्ठात्री माता उर्वसी से भगवान नारायण के दर्शन की अनुमति लेनी पड़ती है। इसके लिए पहली रात्रि विश्राम बामणी में उर्वसी की पूजा के बाद करने की मर्यादा रही है। यदि आपने विधि पूर्वक उर्वसी की पूजा कर उन्हें प्रसन्न किया है और रात को आपके शरीर में काम विकार उतपन्न नहीं हुआ तो आप भगवान नारायण के दर्शन के पात्र हैं और यदि आपके मन में काम विकार उतपन्न हुआ है तो तब आप ऋषि गङ्गा के पार नारायण पर्वत पर कदम रखने के अधिकारी नहीं हैं। दर्शन तो बहुत दूर की बात। यह थी मर्यादा। इसीलिए कहते हैं-
"बामणी का बुड़यान बदरी निदेखि।" क्योंकि मर्यादा की कसौटी पर कसते कसते जिंदगी गुजर गयी पर भगवान नारायण के दर्शन की पात्रता प्राप्त नहीं हुई।

यात्री को जब भगवान श्री बद्रीनारायण के दर्शन पूजन हो जाते थे तब सारे अनुष्ठानों को सम्पन्न कर कुछ यात्री माना दर्रे से थोलिङ्ग मठ होते हुए मानसरोवर निकल जाते थे लेकिन अधिकांश यात्री वापस जोशीमठ आते और वहां से नीती के रास्ते कैलास मानसरोवर की यात्रा के लिए निकल जाते। यह रास्ता माणा की अपेक्षा आसान है। क्योंकि मुक्ति के लिए प्रयागों में ब्रह्मा, श्री बद्रीनारायण में भगवान विष्णु और अंत में मृत्यु के देवता कैलासवासी भगवान शिव के दर्शन पूजन आवश्यक है। तभी मोक्ष मिलता है। इसलिए कैलास मानसरोवर उत्तराखण्ड तीर्थयात्रा का अभिन्न हिस्सा है। बिना कैलास परिक्रमा के उत्तराखण्ड यात्रा अधूरी है।

जोशीमठ इसलिए भी मुख्य पड़ाव था क्योंकि यहां से श्री बद्रीनाथ और श्री कैलास मानसरोवर की यात्रा के लिए यात्रियों को गुमाश्ते (यात्रा गाइड/समान ढोने वाला) मिल जाते थे। ये गुमाश्ते अधिकतर उत्तराखण्ड के खस नौजवान होते थे। खस बहुत ही मेहनती और सूरबीर होते थे जो केवल क्षत्रिय ही नहीं बल्कि ब्राह्मण खस भी होते थे। तिब्ब्त में मातृ सत्तात्मक परिवार हैं, मुखिया महिलाएं होती हैं। पुरुष बुद्धिमान हुआ तो मठ में लामा बनता था और बुद्धि हीन हुआ तो परिवार का सेवक। वहां महिलाओं की चलती है। अब इतनी लंबी यात्रा के बाद तिब्ब्त के निर्जन में यात्रियों के रहने खाने की कोई व्यवस्था नहीं होती तो गुमाश्ते इन्हीं तिब्बती परिवारों के यहां यात्रियों की व्यवस्था करते।

इस प्रकार गढ़वाली गुमास्तों की यहां गहरी पहचान हो गई यह पहचान इतनी गहरी हो गई कि तिब्बती महिलाओं का अक्सर खूबसूरत गढ़वाली नौजवानों पर दिल आ जाता नतीजतन इनके यहां गढ़वाली नौजवानों से संताने उत्पन्न हो जाती अब जो लड़की हुई तो तिब्बती खुश हो जाते और गढ़वाली लड़के को पुरस्कृत करते जिसकी की लड़की हुई है लेकिन यदि लड़का हुआ तो उस गढ़वाली लड़के को दंडित किया जाता था और यह दंड था के लड़के के दूध पीने तक जच्चा बच्चा के खाने-पीने आदि का पूरा खर्चा वह गढ़वाली लड़का देगा जिसका के पुत्र हुआ है जब लड़के का मां का दूध पीना बंद हो जाएगा तब वह लड़का उसी व्यक्ति को ले जाना पड़ेगा जो कि उस बालक का जैविक पिता है जबकि लड़की को खुद रख लेते थे इस प्रकार तिब्बत में इन नाजायज पुत्रों की संख्या बढ़ गई जिनको इनके पिता अपने गांव भी नहीं ला सकते थे कालांतर में नीति माणा दर्रों के इस पार इन लड़कों को लाया गया और इनको बकरियां सौंप कर तिब्ब्त और भारत के बीच बकरियों के माध्यम से सामान को ढोने में प्रयुक्त किया गया। भोट देश में उतपन्न होने के कारण इन्हें भोटिया कहा गया। चूंकि ये तिब्ब्त में चँवरगाय के दूध की नमकीन चाय पीते थे तिब्ब्त में इन्हें मारछा कहते थे।

इनलोगों के भारत से तिब्ब्त और तिब्ब्त से नमक, ऊन, सुहागा, मूंगा आदि लाने लेजाने का मुख्य पड़ाव जोशीमठ बन गया।
इसलिए भी जोशीमठ का बहुत अधिक व्यापारिक महत्व रहा।
530 ईसबी पूर्व जब बौद्ध लुटेरे श्री बद्रीनारायण से चोरी कर मन्दिर को नष्ट-भ्र्ष्ट कर सबकुछ लूट कर थोलिंगमठ ले गये तो अधर्म अनाचार से देश त्रस्त होगया। तब 497 ईसवी पूर्व आदि गुरु शंकराचार्य केरल से इसी योशी में आये और भगवान श्रीमन्नारायन और कैलासवासी की इसी योशी को उंन्होने अपनी साधना हेतु चुना।
चूंकि आदि शंकराचार्य श्री विद्या के उपासक थे और उंन्होने योशी में श्रीयंत्र की स्थापना की इसकी साधना में वे आसन (मठ) लगा कर प्रवृत्त हुए। इसलिए इस स्थान का नाम उत्तर आम्नाय श्रीमठ हुआ। श्री शंकराचार्य परम्परा की सनदों में योशी की जगह उत्तरआम्नाय श्रीमठ ही लिखा हुआ है।

इसलिए समस्त ऐतिहासिक दस्तावेजों में सर्वत्र उत्तर आम्नाय श्रीमठ ही लिखा मिलता है।
लेकिन वर्तमान में ज्यादा पढ़े-लिखे स्वंयम्भू शंकराचार्य और उनके धनपशु गालीबाज चेले सत्ता के धृतराष्ट्रों के साथ मिल कर जोशीमठ का नाम ज्योतिर्मठ कर इतिहास, सँस्कृति, परम्परा और कैलास मानसरोवर पर दावों के पुख्ता प्रमाणों को दफ़्न करने की साजिश करें तो हम जैसे क़लमकार क्या कर सकते हैं? सच बोलने और लिखने पर जेल होती है यह तो हम भोग कर आये हैं। और भोगने को तैयार बैठे हैं क्योंकि सत्य ही नारायण हैं। सारी दुनियां मेरे विरुद्ध हो तो भी अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड नायक श्रीमन नारायण से बड़ी ताकत नहीं है।
शंकराचार्य महाराज द्वारा श्री बद्रिकाश्रम की पुनर्प्रतिष्ठा और इसका मठ योशी में स्थापित करने के बाद योशी उत्तर भारत जोशीमठ क्षेत्रान्तर्गत नेपाल, तक्षशिला, गांधार तक के राजाओं का प्रमुख तीर्थ स्थल होगया। सभी राजे महाराजे यहां आकर शंकराचार्य और उनके 20 पीढ़ी तक के शिष्यों से आशीर्वाद ग्रहण करते रहे ये सारे शिष्य पारगामी थे इनमें से किसी की भी मृत्यु नहीं हुई। सोचिए जहाँ ऐसे दिव्य तपस्वी होंगे उस स्थान की कितनी अधिक कीर्ति होगी।
लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि सातवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में इस क्षेत्र में महाविनाशकारी भूकम्प, भूस्खलन और हूणों के बिनाशकारी लूट व आक्रमण हुए होंगे जिससे इस क्षेत्र में श्री बद्रीनारायण/उत्तर आम्नाय श्रीमठ की आचार्य परम्परा खंडित हुई होगी।

आठवीं शताब्दी में एक अभिनव शंकराचार्य हुए जो इस निर्जन में आये।(कुछ विद्वानों का मानना है कि ये वही अभिनव हैं जो आदि शंकराचार्य के समय अभिनव गुप्त के नाम से जाने जाते थे ये शंकराचार्य के घोर विरोधी बौद्ध थे जो शंकराचार्य को मारने के लिए मांत्रिक अभिचार कर रहे थे) उस समय बताया जाता है कि शंकराचार्य द्वारा स्थापित मन्दिरों के श्रीयंत्र के नजदीक जो भी जाता वह मृत्यु को प्राप्त हो जाता था। यह अस्वाभाविक या काल्पनिक भी नहीं है। क्योंकि साधना युक्त श्रीयंत्रों से गामा किरणें निकलने लगती हैं यदि उसी स्तर का साधक न हुआ तो इन किरणों से सामान्य आदमी की हड्डियां गल जाने का खतरा रहता है, जबकि दिव्य योगी इनका प्रयोग ब्रह्माण्ड के दर्शन के लिए करता है। अगर श्रीयंत्र की पूजा खंडित हो गयी तो माता की योगिनियाँ क्रुद्ध हो जाती हैं और इंसानों की बलि लेने लगती है। यही कारण है कि आज के दौर में गृहस्थ लोग श्री यंत्र की स्थापना व श्री विद्या की उपासना से बचते हैं।

अभिनव शंकराचार्य जन्म जन्मांतर से तांत्रिक थे।
उंन्होने उत्तराखण्ड में आते ही सबसे पहले इन डरावने हो चुके श्री मन्दिरों में जाकर श्री यंत्रों को उलट कर दफ़्न कर दिया और उनके ऊपर सामान्य देवी की मूर्ति स्थापित कर दी, जिससे इन आदमखोर मन्दिरों से लोगों का भय खत्म हुआ। पर इसी कृत्य से देवभूमि में उस श्री विद्या परम्परा का अंत हुआ जिससे साधक मृत्यु पर विजय प्राप्त कर अमरत्व को प्राप्त करते थे।
इसी छटवीं से सातवीं शताब्दी के बीच इस मठ की रक्षा के लिए यहां कत्यूरी राजा को दायित्व सौंपा गया। जिसने अपनी राजधानी जोशीमठ बनाया। ये राजा लोग कार्तिकेय के उपासक थे इसलिए कत्यूरी कहलाये। बाद में इन्होंने यहाँ नृ सिंह की स्थापना की। कुछ इतिहासकारों के अनुसार कश्मीर के शासक ललितादित्य ने यहां हूण आक्रांताओं से रक्षा के लिए नरसिंह मन्दिर की स्थापना की।

अब जिसने भी इस मंदिर की स्थापना की हो लेकिन इतना तो तय है कि यह मन्दिर उत्तराखण्ड में उस नारसिंही शक्ति का पुनराभिमुखीकरण है जो हिरण्यकशिपु का वध कर भगवान नारायण के पास आकर नरसिंह शिला के रूप में श्री बद्रिकाश्रम में अवस्थित हुई!
यही कारण है कि जोशीमठ का नृसिंह आज भी पूरे उत्तराखण्ड वासियों के ईस्ट देवता है। चाहे कुमायूं हो या गढ़वाल जब नौखण्डी नरसिंह की पूजा की जाती है तो सारे नरसिंह का स्थान जोशीमठ ही बतलाया जाता है। इस दृष्टि से भी जोशीमठ के नरसिंह और जोशीमठ के बारे में वयवहार करना हर उत्तराखण्डवासी और देश के हर नृसिंह भक्त वैष्णव का कर्तव्य है।
लेकिन जोशीमठ की वर्तमान आपदा के पीछे कारण है क्या पहले ये जान लीजिए-

जोशीमठ जिस दिव्य पर्वत पर स्थित है, उसके बारे में अभी तक कोई प्रकाश नहीं डाला गया और न धर्म ग्रंथों से इसके संदर्भ संग्रहित कर प्रकाशित किए गए हैं। यहां इस पर्वत पर पृथक से प्रकाश डालना या इसकी महिमा का वर्णन करना विषयान्तर हो जाएगा, इसलिए सिर्फ इतना संकेत काफी है कि भगवान शंकर के अवतार शंकराचार्य ने इस विष्णुपदी-धौली के संगम विष्णु प्रयाग से प्रारम्भ गौरसों-औली पर्वत शिखर जिसके सम्मुख ब्रह्म यजनगिरी और पार्श्व में देवांगन सप्तकुण्ड हैं सम्मुख सप्तश्रृंग कालजयी कागभुशुण्डि के साथ देवताओं का नन्दन वन है उसकी अनन्त ऊर्जा और दैवीय महिमा अवर्णनीय है। कल्प के आरम्भ में महा प्रलय के समय मनु ने अपनी नाव का लंगर इसी स्थान पर डाला था। इससे आप स्थान के महत्व और पवित्रता का अनुमान लगा सकते हैं।

यह पर्वत ही अपने आप में देवता है। इस पर्वत के गोद में है शंकराचार्य तपस्थली और नरसिंह मन्दिर।
गौरसों इसकी शिखा है और औली मस्तक!
अब जरा देखिए आज जोशीमठ तीर्थ का हाल क्या है। नरसिंह मन्दिर के ऊपर भारी बस्ती बस गयी है। होटलों का मलमूत्र गन्दगी सब मन्दिर के ऊपर है। उसके ऊपर सैन्य छावनियाँ हैं। वहाँ दारू की सरकारी कैंटीन। सरकारी ठेकों की और कच्ची की तो बात ही क्या करनी। मुर्गे, सूअर पलने कटने, बकरा ईद में नालियों को खून से रक्त रंजित करना दूधाधारी नरसिंह की बस्ती में आम बात है।

जिन भवनों पर श्री बद्रीनाथ के आवास थे उनमें आज क्रिश्चियनों के चर्च हैं। कहीं सिक्खों के गुरुद्वारे हैं। व्यापार के आवरण में जेहादी रक्तबीजों को कथित दलितों के यहां किराए के कमरे मिलते हैं। बदले में अक्सर जेहादी मकान मालिक की बीबी से गहरा इश्क करते हैं। आदमी काम पर गया और ये घर पर काम करते हैं। स्थिति यह हो जाती है कि लगभग शतप्रतिशत मामलों में इश्क बीबी से और निकाह बेटी से होता है। बाद में दामाद बन कर जमीन भी इनके कब्जे में चले जाती है। एक परिवार नहीं बल्कि पाँच सालों में एक नई बस्ती उभर आती है।

जो जेहादियों का निवाला होने से बच जाते हैं उनको मिशनरी निवाला बना देती है। ईसाई-कसाईयों को आरक्षण की खैरात और SCST एक्ट की सुरक्षा है। आप कुछ बोलोगे सीधा जेल जाओगे।
आम सवर्ण चुप रहने को विवश है। सूरज अस्त पहाड़ मस्त को साकार होते हुए आप यहां देख सकते हैं। मेरे जोशीमठ के अनुभव अच्छे नहीं हैं। मैं गवाहों के साथ घटनाओं का वर्णन कर सकता हूँ। पीकर लड़ना और गाली देना इन लोगों की जीवनचर्या का अंग है।

इसके अलावा यात्रा काल में होटल खड़े करना और पैसा कमाना। एक लैट्रिन खड़ी कर दो यात्री को बरामदे में सुलाने का 5 हजार वसूल लो ये पाप नहीं है। लैट्रिन जाने को तो व्यक्ति देगा उसकी मजबूरी है लेकिन उसकी आत्मा क्या बोलेगी वो धरती फाड़ कर सुनाई देता है। यही हाल भोजन और अन्य सुविधाओं का है। जब अनर्थ का पैसा आता है तो वह व्यक्ति के सिर चढ़ कर बोलता है।जो सभ्यता, शालीनता, दया, धर्म सबका हरण कर लेता है। ऐसे में मन्दिर दुकान और तीर्थ लूट का अड्डा बन जाता है। ऐसे लोगों के प्रति कोई सहानुभूति करे भी तो कैसे?

इस शंकराचार्य और नरसिंह पर्वत का औली मस्तक है लेकिन औली स्कीइंग ही नहीं सितारा होटलों से अय्यासी का अड्डा बना है सरकार को तीर्थों से और तीर्थ यात्रियों से चिढ़ है टूरिस्टों और अय्याशियों से नहीं। इसलिए टूरिस्ट स्पॉट गौरसों और औली का टूरिज्म इस दिव्य पिरामिडीय पर्वत के मस्तक पर कलंक है। जिसको सरकार मिटाने के लिए नहीं बल्कि बढाने के लिए तैयार है। यह पूरा ही पर्वत श्रीयंत्र के आकार का है जो दिव्य शक्तियों का केंद्र है पर वर्तमान समय में फौजियों के बूटों से रौंदा जा रहा है। क्या इस श्री पर्वत को फौजियों के बूटों से मुक्त किया जा सकता है? क्या इस श्री पर्वत को अय्यासी के होटलों और टूरिस्टों से मुक्त किया जा सकता है?

क्या शंकराचार्य की इस पवित्र तपस्थली में मां अन्नपूर्णा के प्रसाद के रूप में यात्रियों को भोजन और निःशुल्क आश्रय/आवास दिया जा सकता है?
ये केवल सवाल नहीं हैं बल्कि पुण्य के मार्ग हैं। इन सवालों का उत्तर है नहीं। जब शंकराचार्य के नाम पर बने आश्रम होटलों को मात दे रहे तो औरों से आप क्या अपेक्षा कर सकते हैं?
आदमी भले ही अभी मर जाए लेकिन उसकी वृत्ति अधर्म छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। आप कह रहे हैं जोशीमठ में कुदरत का कहर है। मैं कह रहा हूँ यह जोशीमठ में असुरों का कहर है। भगवान की गलती कहाँ है?
अभी जो हुआ यह विनाश काले विपरीत बुद्धि के अलावा कुछ नहीं है।

पहले तो सरकार को देवभूमि के पारिस्थितिकीय तंत्र को छेड़ना नहीं चाहिए था। हम लोग पहले बुग्यालों में जाते तो ऊंची आवाज में बात तक नहीं करते कहते थे ऐड़ी आन्छरी लग जायेगी। दरअसल हिमालय में दिव्य तपस्वी अदृश्य रूप में तप करते रहते हैं उनके तप में बाधा न पहुंचे वे क्रुद्ध न हों इसलिए चुप रहने के लिए दिव्य शक्ति की योगनियों ऐड़ी आन्छरी का भय दिखाया जाता था। लेकिन आज तो इन नाजुक पर्वतों पर हलीकेप्टर उड़ाये जा रहे हैं, तब विकास होना है या महा विनाश आप खुद तय जर लें!
इस महा विनाश का वर्तमान में कारण बनी है तपोबन से अनीमठ के बीच बन रही जल विद्युत परियोजना की टर्नल।
सुना है आज से बीस पच्चीस साल पहले जब इस टर्नल का काम शुरू हुआ तो कुछ किलोमीटर अंदर जाकर अचानक खुदाई कर रही टर्नल की खुदाई में धरती के अंदर का विशाल जल भण्डार फुट गया। पानी इतना अधिक निकला कि मजदूर मुश्किल से जान बचा कर बड़ी मुश्किल से बाहर आये यह पानी महीनों क्या सालों तक बन्द नहीं हुआ। नतीजतन आठ-दस साल तक काम बंद रहा। NTPC ने बहुत पैसा खर्च कर दिया था इसलिए कुछ साल पूर्व NTPC ने फिर काम शुरू किया। बताया जाता है कि टर्नल में वर्षों पूर्व फंसी मशीन को टर्नल से बाहर निकालने में कम्पनी फेल हो गयी तो कम्पनी ने बगल से दूसरी टर्नल खोद डाली। इधर तकनीक में परिवर्तन हुआ। अब रेलवे सुरंगों की तरह एक तरफ से सुरंग खुदती है तो पीछे से साथ साथ RCC से चारों तरफ टर्नल की पैकिंग भी पूरी होती है। अब चाहे पानी निकले या पत्थर मिट्टी गिरे, इंजीनियरिंग ने इतनी प्रगति की है कि यह सब पैक हो जाता है।
यही पैकिंग जोशीमठ के विनाश की इबारत लिख गयी।
....जारी है (संकलित लेख)