Tuesday, 31 December 2024

एक बड़े से बड़ा ब्रह्मज्ञान --

 एक बड़े से बड़ा ब्रह्मज्ञान -- कृष्ण यजुर्वेद में श्वेताश्वतर उपनिषद के छठे अध्याय के पंद्रहवें -- इस महाचिन्मय हंसवती ऋक मंत्र में है। इस की एक विधि है जिसका संधान गुरु प्रदत्त विधि से उन्हीं के आदेशानुसार करना पड़ता है। "हंस" शब्द का अर्थ परमात्मा के लिए व्यवहृत हुआ है। परमात्मा को अपना स्वरूप जानने पर ही जीव -- मृत्यु का अतिक्रम कर पाता है। इसका अन्य कोई उपाय नहीं है।

"एको हंसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्निः सलिले संनिविष्टः।
तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥" (श्वेताश्वतरोपनिषद्-६/१५)
इस सम्पूर्ण विश्व के अन्तर में 'एक' 'हंसस्वरूपी आत्मसत्ता' है एवं 'वह' अग्निस्वरूप' है जो जल की अतल गहराई में स्थित है। 'उसका' ज्ञान प्राप्त करके व्यक्ति मृत्यु की पकड़ से परे चला जाता है तथा इस महद्-गति के लिए दूसरा कोई मार्ग नहीं है। (अस्य भुवनस्य मध्ये एकः हंसः। सः एव सलिले संनिविष्टः अग्निः। तम् एव विदित्वा मृत्युम् अत्येति अयनाय अन्यः पन्थाः न विद्यते॥)
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यह ब्रह्मविद्या का सार है। लेकिन यह व्यावहारिक रूप से स्वयं पर अवतृत होता है हरिःकृपा से ही। मुझे इसका ज्ञान पिछले ४५ वरसों से था, लेकिन इसकी प्रत्यक्ष अनुभूतियाँ अभी होनी आरंभ हुई हैं। पीछे की अनुभूतियाँ अब भूतकाल की हो गयी हैं, जिनका कोई महत्व नहीं रहा है। वर्तमान ही परमात्मा है। अब तो स्थिति स्पष्ट है। इससे जुड़ी अन्य ब्रह्म विद्याएँ भी स्पष्ट हो रही हैं।
अब तो सब कुछ सत्यनिष्ठा से किए गये स्वयं के समर्पण पर निर्भर है। जितना गहरा और अधिक समर्पण होगा उतनी ही अधिक परमात्मा की अभिव्यक्ति भी निज जीवन में होगी।
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भगवती की भी असीम कृपा है। जीवन में जो भी होगा वह शुभ ही शुभ होगा। अब परमात्मा दूर नहीं है, उन्हीं के हृदय में मैं, और मेरे हृदय में उनका निवास है।
सभी के हृदयों में उन का प्राकट्य हो। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२८ दिसंबर २०२४

भगवान ही अद्वैत और द्वैत, बंधन और मुक्ति, सत् और असत्, ज्ञान और अज्ञान, व इनसे परे की अनुभूति करने वाले हैं, हम नहीं ---

भगवान से हमारी पृथकता का बोध मुख्यतः हमारे लोभ व अहंकार के कारण है, जिनसे पूरी तरह मुक्त होकर, शरणागति व समर्पण के द्वारा सर्वप्रथम हम भगवान को प्राप्त करें। भगवत्-प्राप्ति ही ज्ञान है, यही कर्म है, और यही संन्यास है। कल कृष्ण यजुर्वेद के श्वेताश्वर उपनिषद के जिस महा चिन्मय "हंसवती ऋक मंत्र" की चर्चा की थी, वह हमें मुक्ति का मार्ग दिखाता है। गुरुकृपा कहो या हरिः कृपा कहो, से ही इसका रहस्य मुझे समझ में आया था। साधना के लिए संस्कृत भाषा में इसका उच्चारण "हं सः" है, बंगला भाषा में "होंग सौ" और अङ्ग्रेज़ी में "Hong-Sau" है। साधना के लिए संस्कृत भाषा का ही प्रयोग करेंगे। गुरु की आज्ञा से मैं इसका उच्चारण "हं सः" ही करता हूँ।

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इस साधना को ही हिन्दी में "अजपा-जप" और "हंसः योग" कहते हैं। यह भगवत्-प्राप्ति का मार्ग है। आप कितना भी जप करते हों, कितनी भी भक्ति करते हों, लेकिन अंततः इस मार्ग पर आना ही पड़ेगा।
रामचरितमानस के उत्तर कांड में इसका वर्णन इस प्रकार से है ---
"सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥
आत्म अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥
भावार्थ -- 'सोऽहमस्मि' (वह ब्रह्म मैं हूँ) यह जो अखंड (तैलधारावत कभी न टूटने वाली) वृत्ति है, वही (उस ज्ञानदीपक की) परम प्रचंड दीपशिखा (लौ) है। (इस प्रकार) जब आत्मानुभव के सुख का सुंदर प्रकाश फैलता है, तब संसार के मूल भेद रूपी भ्रम का नाश हो जाता है॥
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इसे हंसानुसंधान भी कहते हैं। ब्रह्म-ज्योति के दर्शन भी इसी से होते हैं, और नादानुसंधान भी इसी से समझ में आता है। इसकी महिमा अनंत है। यह सारी राजयोग की साधनाओं का मूल है। निष्ठावान साधकों को इसे सिखाने की व्यवस्था स्वयं भगवान करते हैं। इस लेख को मैं लंबा नहीं करना चाहता इसलिए यहीं विराम दे रहा हूँ। साधना के विषय में फिर कभी चर्चा करेंगे। मुझे इसी जीवन में एक-दो नहीं, सैंकड़ों साधक मिले हैं जो यह साधना करते हैं। लाखों साधक इसकी साधना नित्य करते हैं। जिसमें भी ब्रह्म-जिज्ञासा या वेदान्त-वासना है, वह इस मार्ग पर निश्चित ही आयेगा। आगे से ब्रह्म विद्या की ही चर्चा करेंगे।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२९ दिसंबर २०२४

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ---

भगवान को जो जैसे भजते हैं, भगवान उन पर वैसा ही अनुग्रह करते हैं। भगवान को जो तत्त्व रूप से जान लेता है, वह कभी भी कर्मों से नहीं बँधता। वह कर्मफलों से मुक्त, और भगवान का ही एक दूसरा रूप है। अब प्रश्न यह उठता है -- क्या हमारे कर्म -- कामना और संकल्प से मुक्त हो सकते हैं? क्या हम फल की आसक्ति का त्याग कर सकते हैं? यदि हाँ तो कैसे?

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इसका उत्तर भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के एक मंत्र में दिया है। वह मंत्र सम्पूर्ण वेदान्त दर्शन का सार है। उस मंत्र का भाव यदि जीवन में उतर जाये तो हमें ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। उस प्रसिद्ध मंत्र को हमने भोजन-मंत्र बना दिया है। न तो हम इसका अर्थ जानते हैं और न जानने का प्रयास करते हैं। भोजन से पूर्व उसको बोल देना एक औपचारिकता मात्र बन गई है।
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आज प्रातः उठते ही मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने जलते हुए कोयलों से भरी हुई एक परात मेरे सिर पर रख दी है। उस अत्यंत पीड़ादायक दाहक अग्नि को मैंने अपने सामने रखा और स्वयं उसमें बैठ कर भस्म हो रहा हूँ। मैं स्वयं ही स्वयं को भस्म कर रहा हूँ, जो पीड़ादायक नहीं, बल्कि सच्चिदानंद की अनुभूति है।
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यहाँ भस्म करने वाला पुरोहित भी ब्रह्म है, जो भस्म हो रहा है वह शाकल्य हवि भी ब्रह्म है, जिसमें भस्म हो रहा है वह अग्नि भी ब्रह्म है, वह श्रुवा, सारी आहुतियाँ व सारे मंत्र भी ब्रह्म हैं, और यज्ञ के जिस देवता को ये आहुतियाँ दी जा रही हैं, वह देवता भी ब्रह्म है। अंततः सार रूप में यह शाश्वत सर्वव्यापी आत्मा ही ब्रह्म है।
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इस मंत्र में सम्पूर्ण वेदान्त का सार है, जिसे भगवान की महती अनुकंपा से ही समझा जा सकता है। चाहें तो आप भी इसे समझ सकते हैं, थोड़ा प्रयास कीजिये। भगवान की विशेष कृपा आप पर निश्चित रूप से होगी। यज्ञ के देवता जिन्हें आहुति दी जा रही है, अग्नि, शाकल्य, और यज्ञकर्ता -- ये सभी ब्रह्म हैं। हमारा प्रत्येक कर्म एक यज्ञ है, इसलिये अज्ञान से उत्पन्न आत्मविषयक संशय को ज्ञानरूपी खड़ग से काटकर भगवान को अर्पित कर दीजिये।
गीता का वह महा चिन्मय शाश्वत मंत्र है --
"ॐ ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥४:२४॥"
अर्थात् -- अर्पण (अर्थात् अर्पण करने का साधन श्रुवा) ब्रह्म है और हवि (शाकल्य अथवा हवन करने योग्य द्रव्य) भी ब्रह्म है; ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा जो हवन किया गया है, वह भी ब्रह्म ही है। इस प्रकार ब्रह्मरूप कर्म में समाधिस्थ पुरुष का गन्तव्य भी ब्रह्म ही है​॥
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जीवन का हर पल एक यज्ञ है, और हमारी हर साँस एक आहुति है। भगवान ने यहाँ ज्ञान-यज्ञ की श्रेष्ठता को प्रतिपादित किया है। भगवान कहते हैं कि "सारी सृष्टि को अपने आत्मरूप में, और आत्मरूप को सम्पूर्ण सृष्टि में देखें।"
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यहाँ भगवान ने अनायास ही अपना एक बहुत बड़ा रहस्य अनावृत कर दिया है। यह भगवान को पाने का राजमार्ग है। भगवान कहते हैं कि जैसे प्रज्जवलित अग्नि -- ईन्धन को भस्मसात् कर देती है, वैसे ही, हे अर्जुन ! यह ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्मसात् कर देती है॥
भगवान में हमारी पूर्ण श्रद्धा हो। श्रद्धावान व्यक्ति को ही भगवान मिलते है। अज्ञानी, श्रद्धारहित और संशययुक्त पुरुष नष्ट हो जाते हैं।
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जिसका सम्पूर्ण कर्मों से सम्बन्ध-विच्छेद हो गया है और ज्ञान के द्वारा जिसके सम्पूर्ण संशयोंका नाश हो गया है, ऐसे स्वरूप-परायण मनुष्यको कर्म नहीं बाँधते। कर्मयोग के बारे में बहुत अधिक भ्रांतियाँ हैं। आगे से जब भी समय मिलेगा तब ब्रह्मज्ञान के साथ साथ कर्मयोग पर भी चर्चा करेंगे।
आप सब में भगवान वासुदेव को नमन !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३० दिसंबर २०२४

"निशाचर-रात्रि" (ग्रेगोरियन आंग्ल नववर्ष) की अभी से शुभ कामनाएँ ---

मेरी तो प्रतिदिन होली, और प्रतिरात्री दीपावली होती है। लेकिन निशाचर-रात्री प्रायः शुभ नहीं होती, बच कर रहें। इस रात्रि को निशाचर लोग मदिरापान, अभक्ष्य भोजन, फूहड़ नाच गाना, और अमर्यादित आचरण करते हैं। "निशा" रात को कहते हैं, और "चर" का अर्थ होता है चलना-फिरना या खाना। जो लोग रात को अभक्ष्य आहार लेते हैं, या रात को अनावश्यक घूम-फिर कर आवारागर्दी करते हैं, वे निशाचर हैं। रात्रि को या तो पुलिस ही गश्त लगाती है, या चोर-डाकू व तामसिक लोग ही घूमते-फिरते हैं। जिस रात भगवान का भजन नहीं होता, वह राक्षस-रात्रि है, और जिस रात भगवान का भजन हो जाए वह देव-रात्रि है।

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३१ दिसंबर की रात को विश्व के अधिकांश लोग निशाचर बन जाते हैं, और आंग्ल नववर्ष का आगमन बहुत अधिक तामसिक होता है। उस समय भगवान का भजन-कीर्तन, या ध्यान करें। लगभग १०-१२ वर्षों पूर्व एक बार इस रात्रि को श्मशान भूमि में एक विरक्त महात्मा के साथ भगवान के ध्यान, कीर्तन आदि में मनाया था। अब कहीं जाने का साहस नहीं है।
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३१ दिसंबर की मध्य रात्रि से ईसाई ग्रेगोरियन कलेंडर के अनुसार नववर्ष आरंभ हो जाएगा। मेरी व्यक्तिगत मान्यताएँ चाहे कुछ भी हों, मैं इस नववर्ष की उपेक्षा नहीं कर सकता, क्योंकि सारे विश्व में -- पूर्व साम्यवादी देशों, व मुस्लिम देशों आदि में भी इसी दिन की मध्य रात्रि से ही नववर्ष मनाया जाता है।
अपनी निजी मान्यताओं के कारण मैं तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन भगवती दुर्गा की उपासना के साथ घट-स्थापना और उपवास कर के भक्तिभाव से भारतीय नववर्ष मनाता हूँ।
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मंगलमय शुभ कामनाएँ। ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
३० दिसंबर २०२४

भगवान की दृष्टि में हम वह ही हैं जो हम अपने मन में चिंतन करते हैं ---

 भगवान की दृष्टि में हम वह ही हैं जो हम अपने मन में चिंतन करते हैं ---

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साधु सावधान !! निरंतर वासनात्मक विषयों के चिंतन से हम भगवान की दृष्टि में तो गिरते ही हैं, संसार की दृष्टि में भी मिथ्याचारी दंभी बन जाते हैं। एक बहुत बड़े खतरे की ओर आपका ध्यान खींचना चाहता हूँ। यह वास्तव में एक बड़ा भयावह खतरा है, अतः इसे बड़े ध्यान से पढ़ें।
भगवान कहते हैं --
"कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥३:६॥"
अर्थात् - जो मूढ बुद्धि पुरुष कर्मेन्द्रियों का निग्रह कर इन्द्रियों के भोगों का मन से स्मरण (चिन्तन) करता रहता है वह मिथ्याचारी (दम्भी) कहा जाता है॥
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यदि कोई साधक भक्त अपनी सम्पूर्ण इंद्रियों को हठपूर्वक रोककर मन ही मन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता है, तो भगवान की दृष्टि में वह साधक मूढ़, पाखंडी, और मिथ्याचारी है। शरीर से अनैतिक और अपराध पूर्ण कर्म करने की अपेक्षा मन से उनका चिन्तन करते रहना अधिक हानिकारक है। मन जिस विचार को एक बार पकड़ लेता है, उसे बार बार दोहराता है। एक ही विचार के निरन्तर चिन्तन से मन में उसका दृढ़ वासनात्मक संस्कार और स्वभाव बन जाता है। फिर वैसा ही उसका कर्म हो जाता है। जो व्यक्ति बाह्य रूप से नैतिक और आदर्शवादी होने का प्रदर्शन करते हुये मन में निम्न स्तर की वृत्तियों में रहता है, भगवान की दृष्टि में वह ढोंगी है।
भगवान कहते हैं --
"यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥३:७॥"
अर्थात् -- परन्तु हे अर्जुन जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ कर्मेंन्द्रियों से कर्मयोग का आचरण करता है वह श्रेष्ठ है॥
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और अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है। भगवान ने आप सब को विवेक दिया है। अपने विवेक के प्रकाश में सब काम कीजिये।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ
कृपा शंकर
३१ दिसंबर २०२४

हम चाहे कितने भी ग्रन्थ पढ़ लें, कितने भी प्रवचन और उपदेश सुन लें, इनसे सिर्फ प्रेरणा मिल सकती है, भगवान नहीं ---

हम चाहे कितने भी ग्रन्थ पढ़ लें, कितने भी प्रवचन और उपदेश सुन लें, इनसे सिर्फ प्रेरणा मिल सकती है, भगवान नहीं। भगवान से प्रेम और उनका गहनतम ध्यान, और उस की निरंतरता -- बस ये ही प्रभु तक पहुंचा सकते है।

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भारत का पुनरोदय अपने परम ज्योतिर्मय मूल स्वरूप में हो। भारत की प्राचीन 'शिक्षा' और 'कृषि' व्यवस्था पुनः स्थापित हो। सब तरह का विजातीय प्रभाव भारत से समाप्त हो। किसी भी तरह के असत्य का अंधकार भारत में न रहे। इसके लिए सूक्ष्म दैवीय शक्तियों का आवाहन, और परमशिव से निरंतर प्रार्थना करता हूँ।
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आज ३१ दिसंबर की निशाचर-निशा है। निशाचरों वाले काम न करें, और सब तरह की बुराइयों से बच कर रहें। आनंद हमारा स्वभाव है, जिसका स्त्रोत परमात्मा है। परमात्मा का स्मरण, चिंतन, मनन, निदिध्यासन, ध्यान और भजन करें। आप आनंद से भर जाएँगे। जो क्रियायोग साधना करते हैं वे रात्रि में यथासंभव अधिकाधिक समय तक भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण का ध्यान करें। जो भगवती श्रीविद्या के उपासक हैं, वे अधिकाधिक समय तक महात्रिपुरसुंदरी श्रीललिता की उपासना करें। अपने अपने इष्ट देवी-देवताओं की खूब उपासना करें। सब तरह की बुराइयों से रक्षा होगी, और आपका परम कल्याण होगा।
ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३१ दिसंबर २०२४

प्रतिकूलताओं में अनुकूलता ---

भगवान की कृपा ही हमारी अनुकूलता है। हमें उनका स्मरण हो रहा है -- यह उनकी बहुत बड़ी कृपा है, अन्यथा किसी भी साधक के लिए साधना हेतु परिस्थितियाँ कभी भी अनुकूल नहीं होतीं। प्रतिकूलताओं में ही सारी आध्यात्मिक साधनाओं का आरंभ करना पड़ता है। मन में भरी हुई अति सूक्ष्म वासनाएँ -- सबसे बड़ी बाधाएँ हैं, जो कभी पकड़ में नहीं आतीं। ये सूक्ष्म वासनाएँ ही चित्त की वृत्तियाँ हैं।

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हमारे चंचल प्राणों की चंचलता समाप्त होने पर हमारा मन भी शांत हो जाता है। मन के शांत होने पर परिस्थितियाँ भी अनुकूल हो जाती हैं। अन्यथा परिस्थितियाँ कभी भी अनुकूल नहीं होतीं।
प्राण स्वयं को स्थूल रूप से श्वास-प्रश्वास के रूप में व्यक्त करता है। इसीलिए हम ध्यान साधना का आरंभ साँसों पर ध्यान के द्वारा करते हैं। मंत्र जप भी प्राण शक्ति के द्वारा ही संभव हो सकता है। यथासंभव अधिकाधिक अभ्यास और वैराग्य के द्वारा भगवान का चिंतन निरंतर करते रहना चाहिए।
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पात्रतानुसार आगे का मार्ग-दर्शन स्वयं भगवान किसी न किसी रूप में करेंगे। यह उन का आश्वासन है। भगवान हमारा सिर्फ प्रेमभाव (भक्ति) ही देखते हैं। बिना प्रेम के हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३१ दिसंबर २०२३