एक बड़े से बड़ा ब्रह्मज्ञान -- कृष्ण यजुर्वेद में श्वेताश्वतर उपनिषद के छठे अध्याय के पंद्रहवें -- इस महाचिन्मय हंसवती ऋक मंत्र में है। इस की एक विधि है जिसका संधान गुरु प्रदत्त विधि से उन्हीं के आदेशानुसार करना पड़ता है। "हंस" शब्द का अर्थ परमात्मा के लिए व्यवहृत हुआ है। परमात्मा को अपना स्वरूप जानने पर ही जीव -- मृत्यु का अतिक्रम कर पाता है। इसका अन्य कोई उपाय नहीं है।
Tuesday, 31 December 2024
एक बड़े से बड़ा ब्रह्मज्ञान --
भगवान ही अद्वैत और द्वैत, बंधन और मुक्ति, सत् और असत्, ज्ञान और अज्ञान, व इनसे परे की अनुभूति करने वाले हैं, हम नहीं ---
भगवान से हमारी पृथकता का बोध मुख्यतः हमारे लोभ व अहंकार के कारण है, जिनसे पूरी तरह मुक्त होकर, शरणागति व समर्पण के द्वारा सर्वप्रथम हम भगवान को प्राप्त करें। भगवत्-प्राप्ति ही ज्ञान है, यही कर्म है, और यही संन्यास है। कल कृष्ण यजुर्वेद के श्वेताश्वर उपनिषद के जिस महा चिन्मय "हंसवती ऋक मंत्र" की चर्चा की थी, वह हमें मुक्ति का मार्ग दिखाता है। गुरुकृपा कहो या हरिः कृपा कहो, से ही इसका रहस्य मुझे समझ में आया था। साधना के लिए संस्कृत भाषा में इसका उच्चारण "हं सः" है, बंगला भाषा में "होंग सौ" और अङ्ग्रेज़ी में "Hong-Sau" है। साधना के लिए संस्कृत भाषा का ही प्रयोग करेंगे। गुरु की आज्ञा से मैं इसका उच्चारण "हं सः" ही करता हूँ।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ---
भगवान को जो जैसे भजते हैं, भगवान उन पर वैसा ही अनुग्रह करते हैं। भगवान को जो तत्त्व रूप से जान लेता है, वह कभी भी कर्मों से नहीं बँधता। वह कर्मफलों से मुक्त, और भगवान का ही एक दूसरा रूप है। अब प्रश्न यह उठता है -- क्या हमारे कर्म -- कामना और संकल्प से मुक्त हो सकते हैं? क्या हम फल की आसक्ति का त्याग कर सकते हैं? यदि हाँ तो कैसे?
"निशाचर-रात्रि" (ग्रेगोरियन आंग्ल नववर्ष) की अभी से शुभ कामनाएँ ---
मेरी तो प्रतिदिन होली, और प्रतिरात्री दीपावली होती है। लेकिन निशाचर-रात्री प्रायः शुभ नहीं होती, बच कर रहें। इस रात्रि को निशाचर लोग मदिरापान, अभक्ष्य भोजन, फूहड़ नाच गाना, और अमर्यादित आचरण करते हैं। "निशा" रात को कहते हैं, और "चर" का अर्थ होता है चलना-फिरना या खाना। जो लोग रात को अभक्ष्य आहार लेते हैं, या रात को अनावश्यक घूम-फिर कर आवारागर्दी करते हैं, वे निशाचर हैं। रात्रि को या तो पुलिस ही गश्त लगाती है, या चोर-डाकू व तामसिक लोग ही घूमते-फिरते हैं। जिस रात भगवान का भजन नहीं होता, वह राक्षस-रात्रि है, और जिस रात भगवान का भजन हो जाए वह देव-रात्रि है।
भगवान की दृष्टि में हम वह ही हैं जो हम अपने मन में चिंतन करते हैं ---
भगवान की दृष्टि में हम वह ही हैं जो हम अपने मन में चिंतन करते हैं ---
हम चाहे कितने भी ग्रन्थ पढ़ लें, कितने भी प्रवचन और उपदेश सुन लें, इनसे सिर्फ प्रेरणा मिल सकती है, भगवान नहीं ---
हम चाहे कितने भी ग्रन्थ पढ़ लें, कितने भी प्रवचन और उपदेश सुन लें, इनसे सिर्फ प्रेरणा मिल सकती है, भगवान नहीं। भगवान से प्रेम और उनका गहनतम ध्यान, और उस की निरंतरता -- बस ये ही प्रभु तक पहुंचा सकते है।
प्रतिकूलताओं में अनुकूलता ---
भगवान की कृपा ही हमारी अनुकूलता है। हमें उनका स्मरण हो रहा है -- यह उनकी बहुत बड़ी कृपा है, अन्यथा किसी भी साधक के लिए साधना हेतु परिस्थितियाँ कभी भी अनुकूल नहीं होतीं। प्रतिकूलताओं में ही सारी आध्यात्मिक साधनाओं का आरंभ करना पड़ता है। मन में भरी हुई अति सूक्ष्म वासनाएँ -- सबसे बड़ी बाधाएँ हैं, जो कभी पकड़ में नहीं आतीं। ये सूक्ष्म वासनाएँ ही चित्त की वृत्तियाँ हैं।