एक बार राजाभोज की रानी और पंडित माघ की पत्नी दोनों खड़ी-खड़ी बातें कर रही थीं| राजा भोज ने उनके समीप जाकर उनकी बातें सुनने के लिए अपने कान लगा दिए| यह देख माघ की पत्नी सहसा बोलीं -- "आओ मूर्ख!"| राजा भोज तत्काल वहाँ से चले गए| वे जानना चाहते थे कि उन्होंने क्या मूर्खता की है| अगले दिन राजसभा में पंडित माघ पधारे तो राजा भोज ने "आओ मूर्ख" कह कर उनका स्वागत किया| वहाँ उपस्थित किसी भी विद्वान में प्रतिवाद करने का साहस नहीं था| यह सुनते ही पंडित माघ बोले ---
Sunday, 29 December 2024
मूर्ख कौन है? ---
"खादन्न गच्छामि, हसन्न जल्पे, गतं न शोचामि, कृतं न मन्ये |
द्वाभ्यां तृतीयो न भवामि राजन् , किं कारणं भोज! भवामि मूर्ख: ||"
अर्थात् मैं खाता हुआ नहीं चलता, हँसता हुआ नहीं बोलता, बीती बात की चिंता नहीं करता, और जहाँ दो व्यक्ति बात करते हों, उनके बीच में नहीं जाता| फिर मुझे मूर्ख कहने का क्या कारण है?
(O, King! I never eat while standing or walking, speak while laughing, never repent for what is gone in the past, never boast about my achievements, never interfere in other's talk, so how can you say I am a fool?)
राजा ने अपनी मूर्खता का रहस्य समझ लिया| वे तत्काल कह उठे -- "आओ विद्वान!"
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केवल शिक्षण या अध्ययन से विद्वत्ता नहीं आती| विद्वत्ता आती है-- नैतिक मूल्यों को आत्मगत करने से| लगभग सभी समारोहों में आजकल हम लोग खड़े होकर भोजन करते हैं, यह हमारी मूर्खता ही है|
२९ दिसंबर २०२०
यूक्रेन-रूस युद्ध और अमेरिका --
भारत की टीवी समाचार मीडिया चूंकि लगभग अमेरिका द्वारा नियंत्रित है, इसलिए अधिकांश समाचार अमेरिका द्वारा निर्देशित होते हैं। सही समाचार बड़ी कठिनता से प्राप्त हो रहे हैं। इस समय एक बहुत बड़ी कूटनीतिक हलचल हो रही है। रूस, यूक्रेन, अमेरिका और ब्रिटेन -- भारत को युद्ध-विराम के लिए मध्यस्थ बनाना चाहते हैं। यह भारत की एक कूटनीतिक विजय की संभावना है, या कुछ और?
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वास्तव में यह युद्ध अमेरिका (USA) और ब्रिटेन द्वारा रूस के विरुद्ध चल रहा है। यूक्रेन तो मात्र एक मोहरा है। इसका उद्देश्य रूस को नष्ट करना है। जो मर रहे हैं, वे यूक्रेनी हैं, अमेरिकी नहीं। अमेरिका अब अपने आदमियों को नहीं मरा सकता, क्योंकि उसे अपने जनमानस के नाराज होने का भय है। ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति अब इतनी अच्छी नहीं है कि वह इस युद्ध को जारी रख सके। अमेरिका की भी आर्थिक स्थिति खराब होती जा रही है, क्योंकि विश्व के अनेक देशों ने डॉलर का उपयोग करना बंद कर दिया है। अमेरिका की आर्थिक शक्ति के पीछे डॉलर की विनिमय दर है। विश्व के अधिकांश देश यदि डॉलर का उपयोग करना बंद कर दें तो अमेरिका एक आर्थिक शक्ति नहीं रहेगा, और उसकी दादागिरी समाप्त हो जाएगी। अमेरिका में २०२४ में राष्ट्रपति चुनाव होने जा रहे हैं, जिसके लिए चुनावी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। रिपब्लिकन पार्टी की ओर से डोनाल्ड ट्रंप ने भी अपनी दावेदारी का ऐलान कर दिया है। अमेरिका को इस युद्ध से बहुत अधिक नुकसान हो रहा है, क्योंकि सारे अस्त्र-शस्त्र तो अमेरिका ही दे रहा है। यूक्रेन की आर्थिक सहायता भी उसे करनी पड़ रही है। अमेरिका के हथियार अब बिकने कम हो गए हैं, क्योंकि अन्य भी अनेक देश अब हथियार बना कर बेचने लगे हैं। विश्व का पूरा ड्रग माफिया, और नाजी शक्तियाँ अमेरिका नियंत्रित है। वे बड़े क्रूर हत्यारे हैं। इस युद्ध की शुरुआत भी क्रूर ड्रग माफिया और नाजी शक्तियों द्वारा कराई गई थी। इस विषय पर पहले लिख चुका हूँ।
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वास्तविकता यह है कि अमेरिका स्वयं इस युद्ध में बर्बाद हो रहा है। रूस को बाध्य कर उसने यह युद्ध तो आरंभ करवा दिया, लेकिन इस से बाहर कैसे निकला जाए, यह उसे समझ में नहीं आ रहा है। वह भारत को लपेटे में लेना चाहता है। देखिए अब आगे क्या होता है।
कृपा शंकर
२९-१२-२०२२
(1) समर्पण और शरणागति में क्या अंतर है? (2) मेरे द्वारा सबसे बड़ी सेवा क्या हो सकती है ?
(प्रश्न) : --- समर्पण और शरणागति में क्या अंतर है?
(उत्तर) : -- शरणागति में कर्ताभाव और पृथकता का बोध रहता है, जब कि समर्पण में न तो कर्ताभाव रहता है, और न ही पृथकता का बोध। शरणागति एक कर्म है, जब कि समर्पण उसका फल है। समर्पण -- ब्रह्मज्ञान होता है। समर्पित व्यक्ति ब्रह्मज्ञ होता है, उसकी चेतना में परमात्मा से कोई भेद नहीं होता। धर्म और अधर्म दोनों से ऊपर उठकर, परमात्मा की चेतना में स्थिति -- यानि परमात्मा से अन्य कुछ भी नहीं है, -- समर्पण कहलाता है। यह आत्मज्ञान है। यह आत्मज्ञान ही मोक्ष (केवल्य) यानि परम कल्याण है। समर्पण -- अनुभूति का विषय है, बुद्धि-विलास का नहीं।
बिना किसी पूर्वाग्रह के परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण हो। यह समर्पण सिर्फ बातों से या संकल्प से नहीं होगा। इसके लिए भक्तिपूर्वक दीर्घकाल तक गहन साधना करनी होती है। परमात्मा को वे ही समर्पित हो सकते हैं, जिन पर परमात्मा की विशेष कृपा हो।
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(प्रश्न) :-- मेरे द्वारा सबसे बड़ी सेवा क्या हो सकती है ?
(उत्तर) :-- प्रकृति ने अपने नियमानुसार जहाँ भी मुझे रखा है, उससे मुझे कोई शिकायत नहीं है। पूर्वजन्मों के कर्मानुसार मेरा यह जीवन निर्मित हुआ। भविष्य की कोई कामना नहीं है। हृदय में यह गहनतम और अति अति प्रबल अभीप्सा अवश्य है कि यदि पुनर्जन्म हो तो मैं इस योग्य तो हो सकूँ कि भगवान को पूर्णरूपेण समर्पित होकर, उनकी अनन्य-अव्यभिचारिणी-भक्ति सभी के हृदयों में जागृत कर सकूँ। भगवान की पूर्ण अभिव्यक्ति मुझ में हो। किसी भी कामना का जन्म न हो।
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। विवक्तदेशसेवित्वरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
कृपा शंकर
२९ दिसंबर २०२३
Friday, 27 December 2024
सुखी कौन ? .....
सुखी कौन ? .....
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जो प्रभु से सब के कल्याण की प्रार्थना करता है, जो सब को सुखी और निरामय देखना चाहता है, सिर्फ वही सुखी है| प्रभु की सब संतानें यदि सुखी हों तभी हम सुखी हो सकते हैं, अन्यथा नहीं|
सुखी होना एक मानसिक अवस्था है, कोई उपलब्धि नहीं| सुखी होना एक यात्रा है, गंतव्य नहीं| सुखी होना वर्तमान में है, भविष्य में नहीं| सुखी होना एक निर्णय है, परिस्थिती नहीं| सुखी होना स्वयं में स्थित होना है, दिखावे में नहीं|
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संसार को हम स्वयं को बदल कर और स्वयं के दृढ़ संकल्प से ही बदल सकते हैं, अन्यथा नहीं| किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखें और स्वयं का सर्वश्रेष्ठ करें|
सब से बड़ा कार्य जो कोई मेरी दृष्टी में कर सकता है वह है कि हम निरंतर प्रभु को प्रेम करें और उन्हीं को समर्पित होने की निरंतर साधना करें| इससे सब का कल्याण होगा|
सभी को शुभ कामनाएँ और सप्रेम नमन ! ॐ ॐ ॐ ||
२७ दिसंबर २०१५
फेसबुक और उससे प्राप्त संतुष्टि ....
फेसबुक और उससे प्राप्त संतुष्टि ....
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मैं फेसबुक पर जिस उद्देश्य से आया था उस उद्देश्य को प्राप्त करने में पूर्ण रूप से सफल रहा हूँ और मुझे इस मंच से पूर्ण संतुष्टि है| मेरे अंतस में एक सुप्त कामना थी स्वयं को व्यक्त करने की, जो पूर्णरूपेण सफल रही है| इसके अतिरिक्त फेसबुक पर मुझे देश-विदेश के बड़े अद्भुत और ऐसे ऐसे आश्चर्यजनक मित्र मिले हैं जिनकी मैं अन्यथा कल्पना भी नहीं कर सकता था|
यह तो तब है जब कि मैं किसी भी तरह की chatting नहीं करता| फेसबुक को भी अब कम समय दे रहा हूँ और अन्य किसी भी social site पर नहीं हूँ| whatsapp आदि पर जाने की भी कोई कामना नहीं है|
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मैं अपने सभी मित्रों को नमन करता हुआ किसी का नाम विशेष तो नहीं लूँगा पर संकेत अवश्य करूंगा| मुझे मेरी रूचि के देश-विदेश के अनेक आध्यात्मिक मित्र मिले जिनसे बहुत अधिक प्रेरणा मिली है| अनेक शास्त्रज्ञ विद्वानों से परिचय और घनिष्ठता हुई जिनसे अन्यथा मिलना संभव ही नहीं था| उनसे विचार विमर्श और चर्चा कर के पूर्ण संतुष्टि मिली| मुझे उनसे बहुत अधिक बौद्धिक और मानसिक सहायता भी मिली जिसे मैं उपलब्धि मानता हूँ| बौद्धिक धरातल पर कई शंकाएं थीं वे भी दूर हुईं|
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सबसे बड़ी सफलता तो यह मिली कि फेसबुक मेरे लिए अब एक सत्संग का माध्यम बन गया है| बड़ा अच्छा सत्संग हो रहा है|
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आप सब में हृदयस्थ प्रभु को प्रणाम | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
२७ दिसंबर २०१५
'कर्मन की गति न्यारी' ---
'कर्मन की गति न्यारी' ---
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मनुष्य देह में ग्यारह छिद्र हैं जिनसे जीवात्मा का मृत्यु के समय शरीर से निकास होता है --- दो आँख, दो कान, दो नाक, एक पायु, एक उपस्थ, एक नाभि, एक मुख और एक मूर्धा|
यह मूर्धा वाला मार्ग अति सूक्ष्म है और पुण्यात्माओं के लिए ही है| इसमें जीवात्मा ब्रह्मरंध्र से निकलती है और उसकी सदगति होती है|
नर्कगामी जीव पायु यानि गुदामार्ग से बाहर निकलता है| उसकी बड़ी दुर्गति होती है|
नाभि से निकलने वाला प्रेत बनता है|
भोजन लोलूप व्यक्ति मुँह से निकलता है, गंध प्रेमी नाक से, संगीत प्रेमी कान से,
और तपस्वी व्यक्ति आँख से निकलता है|
अंत समय में जहाँ जिसकी चेतना है वह उसी मार्ग से निकलता है और सब की अपनी अपनी गतियाँ हैं|
जो ब्राह्मण संकल्प कर के और दक्षिणा लेकर भी यज्ञादि अनुष्ठान विधिपूर्वक नहीं करते/कराते वे ब्रह्मराक्षस बनते हैं|
मद्य, मांस और परस्त्री का भोग करने वाला ब्राह्मण ब्रह्मपिशाच बनता है|
इस तरह कर्मों के अनुसार अनेक गतियाँ हैं| कर्मों का फल सभी को मिलता है, कोई इससे बच नहीं सकता|
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गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि अंतकाल में भ्रूमध्य में ओंकार का स्मरण करो, निज चेतना को कूटस्थ में रखो आदि| अनेक महात्मा कहते हैं मूर्धा में ओंकार का निरंतर जप करो| योगी लोग कहते हैं कि आज्ञाचक्र के प्रति सजग रहो और ब्रह्मरंध्र में ओंकार का जप करो| इन सब के पीछे कारण हैं|
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हमारा हर विचार एक कर्म है जो हमारे खाते में जुड़ जाता है| हम जो कुछ भी हैं, वह अपने प्रारब्ध कर्मों से हैं, और भविष्य में जो कुछ भी बनेंगे, वह अपने संचित कर्मों से बनेंगे| मृत्यु के समय मनुष्य के सारे कर्म उसके सामने आ जाते हैं, और उसके अगले जन्म की भूमिका बन जाती है| अंत समय में जैसी मति होती है वैसी ही गति होती है| कर्मों की गति बड़ी विचित्र होती है|
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सबसे बुद्धिमानी का कार्य है परमात्मा से परम प्रेम, निरंतर स्मरण का अभ्यास और ध्यान|
सूरदास जी का एक प्रसिद्ध भजन है ---
"ऊधौ, कर्मन की गति न्यारी।
सब नदियाँ जल भरि-भरि रहियाँ सागर केहि बिध खारी॥
उज्ज्वल पंख दिये बगुला को कोयल केहि गुन कारी॥
सुन्दर नयन मृगा को दीन्हे बन-बन फिरत उजारी॥
मूरख-मूरख राजे कीन्हे पंडित फिरत भिखारी॥
सूर श्याम मिलने की आसा छिन-छिन बीतत भारी॥"
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सभी को शुभ कामनाएँ | ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ दिसंबर २०२०
एक ही तड़प है मन में -- भगवान के निष्ठावान ज्ञानी भक्तों के दर्शन हों, परमात्मा में निजात्मा का विलय पूर्ण हो ---
एक ही तड़प है मन में -- भगवान के निष्ठावान ज्ञानी भक्तों के दर्शन हों। परमात्मा में निजात्मा का विलय पूर्ण हो।
ईशावास्योपनिषद के पश्चात केनोपनिषद के आरंभ में ही अटक गया हूँ। आगे बढ़ने का और मन ही नहीं करता। भगवान में ही स्थिति हो गयी है। भगवान की जो छवि मेरे समक्ष आई है, वह अति मनभावन है। उसी में समर्पित होकर यह सारा जीवन कट जाए। और कुछ भी नहीं चाहिए।
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कोई मोक्ष नहीं, कोई मुक्ति नहीं, कोई ज्ञान नहीं, कुछ भी नहीं चाहिए। अब शब्दों का कोई महत्व नहीं रहा है। भगवान सब शब्दों से परे अवर्णनीय हैं। कुछ भी अब और पढ़ने की इच्छा नहीं है। उनकी इस अवर्णनीय छवि में ही मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व विलीन हो जाए।
एक ही तड़प है मन में -- भगवान के निष्ठावान ज्ञानी भक्तों के दर्शन हों। परमात्मा में निजात्मा का विलय पूर्ण हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ दिसंबर २०२२
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