Wednesday, 25 December 2024

कहने को तो बहुत सारी बातें हैं, लेकिन काम की बात एक ही है >>>

कहने को तो बहुत सारी बातें हैं, लेकिन काम की बात एक ही है >>>
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रात्री को सोने से पूर्व बिस्तर पर ही सीधे बैठकर कम से कम आधे या एक घंटे तक परमात्मा का ध्यान या जप करें, और निश्चिन्त होकर जगन्माता की गोद में ऐसे सो जायें जैसे एक छोटा बालक अपनी माँ की गोद में सोता है। प्रातःकाल उठते ही थोड़ा जल पीएँ और लघुशंकादि से निवृत होकर फिर आधे या एक घंटे तक जैसा ऊपर बताया है वैसे ही परमात्मा का ध्यान या जप करें। पूरे दिन परमात्मा की स्मृति अपने चित्त में बनाए रखें। यदि भूल जाएँ तो याद आते ही फिर उस स्मृति को अपनी चेतना में स्थापित करें। एक बात याद रखें कि हम जो कुछ भी कर रहे हैं वह परमात्मा की प्रसन्नता के लिए ही कर रहे हैं। ऐसा कोई काम न करें जो भगवान को प्रिय न हो। धीरे धीरे परमात्मा स्वयं ही हमारे माध्यम से कार्य करना आरम्भ कर देंगे। यह बात मैं समय समय पर लिखता रहता हूँ, और लिखता ही रहूँगा। कोई करे या न करे यह उसकी समस्या है।
सभी को मंगलमय शुभ कामनायें।
कृपा शंकर
२५ दिसंबर २०२४
रात्री को सोने से पूर्व बिस्तर पर ही सीधे बैठकर कम से कम आधे या एक घंटे तक परमात्मा का ध्यान या जप करें, और निश्चिन्त होकर जगन्माता की गोद में ऐसे सो जायें जैसे एक छोटा बालक अपनी माँ की गोद में सोता है। प्रातःकाल उठते ही थोड़ा जल पीएँ और लघुशंकादि से निवृत होकर फिर आधे या एक घंटे तक जैसा ऊपर बताया है वैसे ही परमात्मा का ध्यान या जप करें। पूरे दिन परमात्मा की स्मृति अपने चित्त में बनाए रखें। यदि भूल जाएँ तो याद आते ही फिर उस स्मृति को अपनी चेतना में स्थापित करें। एक बात याद रखें कि हम जो कुछ भी कर रहे हैं वह परमात्मा की प्रसन्नता के लिए ही कर रहे हैं। ऐसा कोई काम न करें जो भगवान को प्रिय न हो। धीरे धीरे परमात्मा स्वयं ही हमारे माध्यम से कार्य करना आरम्भ कर देंगे। यह बात मैं समय समय पर लिखता रहता हूँ, और लिखता ही रहूँगा। कोई करे या न करे यह उसकी समस्या है।
सभी को मंगलमय शुभ कामनायें।
कृपा शंकर
२५ दिसंबर २०२४

जहाँ भगवान से अनन्य प्रेम है, वहाँ अंधकार नहीं हो सकता। वे स्वयं ज्योतिर्मय हैं ---

 भगवान के सर्वव्यापी ज्योतिर्मय रूप के ध्यान से असत्य और अज्ञान का सारा अंधकार नष्ट हो जाता है। जहाँ भगवान से अनन्य प्रेम है, वहाँ अंधकार नहीं हो सकता। वे स्वयं ज्योतिर्मय हैं।

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रात्री को सोने से पूर्व बिस्तर पर ही सीधे बैठकर कम से कम आधे या एक घंटे तक परमात्मा का ध्यान या जप करें, और निश्चिन्त होकर जगन्माता की गोद में ऐसे सो जाएँ जैसे एक छोटा बालक अपनी माँ की गोद में सोता है। प्रातःकाल उठते ही थोड़ा जल पीएँ और लघुशंकादि से निवृत होकर फिर आधे या एक घंटे तक जैसा ऊपर बताया है वैसे ही परमात्मा का ध्यान या जप करें। पूरे दिन परमात्मा की स्मृति अपने चित्त में बनाए रखें। यदि भूल जाएँ तो याद आते ही फिर उस स्मृति को अपनी चेतना में स्थापित करें। एक बात याद रखें कि हम जो कुछ भी कर रहे हैं, वह स्वयं परमात्मा ही अनुग्रह कर के हमारे माध्यम से कर रहे हैं। ऐसा कोई काम न करें जो भगवान को प्रिय न हो। धीरे धीरे भगवान स्वयं ही हमारे माध्यम से कार्य करना आरम्भ कर देंगे।
कृपा शंकर
२५ दिसंबर २०२३

सर्वव्यापी ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान ही हमारा स्वभाविक जीवन है ---

सर्वव्यापी ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान ही हमारा स्वभाविक जीवन है। यही श्रीमद्भगवद्गीता में बताई हुई ब्राह्मी-स्थिति, और कूटस्थ-चैतन्य है। यही हरेक उत्सव -- दीवाली, होली, क्रिसमस, नववर्ष, और अन्य सब कुछ है। पूरी सृष्टि इसमें समाहित, और यह पूरी सृष्टि में व्याप्त है। हम यह भौतिक देह नहीं, सर्वव्यापी ज्योतिर्मय ब्रह्म के साथ एक हैं। हर समय उस की चेतना में रहें। इस ज्योति में से प्रणव यानि अक्षर-ब्रह्म की एक मधुर ध्वनि निःसृत हो रही है। इस ज्योति और अक्षर में स्वयं का विलय कर दें। उस अक्षर-ब्रह्म का मानसिक जप करते रहें। बीच-बीच में कभी कभी आँखें खोलकर इस भौतिक शरीर को भी देख कर मानसिक रूप से कह दें कि मैं यह शरीर नहीं, प्रत्यक्ष ब्रह्म हूँ। यह शरीर तो इस लोकयात्रा के लिए मिला हुआ एक वाहन मात्र है।

शांभवी-मुद्रा में बैठें -- नीचे ऊनी और रेशमी आसन, पद्मासन या सिद्धासन, उन्नत मेरुदण्ड, शिवनेत्र यानि दृष्टिपथ भ्रूमध्य में स्थिर, खेचरी या अर्ध-खेचरी, और चेतना ब्रह्ममय। भूमि पर नहीं बैठ सकते हो तो कोई बात नहीं, एक ऊनी कंबल बिछाकर उस पर एक बिना हत्थे की कुर्सी रख लो और कुर्सी पर बैठ जाओ। नितंबों के नीचे एक गद्दी लगा लो जिससे कमर सीधी रखने में आसानी हो। बैठने से पूर्व, और बीच बीच में हठयोग की महामुद्रा, त्रिबंध और प्राणायाम आदि भी करें। नासिका से सांस लेने में कठिनाई हो तो उसके उपचार की विधियाँ भी हठयोग में हैं। फिर भी कोई कठिनाई है तो अपने डॉक्टर से सलाह लें। ध्यान के उपरांत हठयोग की योनिमुद्रा आदि का भी अभ्यास करें। ग्रन्थों का स्वाध्याय तो करना ही होगा, कुसंग का त्याग, और सत्संग भी करना होगा।
हमारा एकमात्र लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति है, जिसके लिए भक्ति, हठयोग, राजयोग और तंत्र आदि सभी का सहारा लेना होगा। कोई संशय है तो बड़ी विनम्रता से किसी ब्रहमनिष्ठ सिद्ध महात्मा आचार्य से मार्गदर्शन प्राप्त करें।
मैं उपलब्ध नहीं हूँ। मंगलमय शुभ कामना और नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२५ दिसंबर २०२३

(प्रश्न) : मन में आ रहे फालतू और भटकाने वाले विचारों से ध्यान हटा कर भगवान में मन कैसे लगाएँ?

 (प्रश्न) : मन में आ रहे फालतू और भटकाने वाले विचारों से ध्यान हटा कर भगवान में मन कैसे लगाएँ?

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(उत्तर) : अपने चारों ओर की परिस्थितियों और वातावरण को हमें तुरंत बदलना पड़ेगा, अन्य कोई उपाय नहीं है। जो हम बनना चाहते हैं, उसी के अनुकूल परिस्थितियों और वातावरण का हमें निर्माण करना होगा, या वैसे ही वातावरण में जाकर रहना होगा। अच्छा साहित्य पढ़ें, अच्छे लोगों के साथ रहें, सात्विक भोजन लें और भोजन की मात्रा को कम करें।
नित्य नियमित ध्यान करें, और गीता का स्वाध्याय करें। श्रीमद्भगवद्गीता के अक्षरब्रह्मयोग (अध्याय ८) के स्वाध्याय और अभ्यास से बहुत लाभ होगा। बृहदारण्यकोपनिषद में याज्ञवल्क्य ऋषि ने गार्गी को भी इसका उपदेश दिया है।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२५ दिसंबर २०२३

Monday, 23 December 2024

भगवत्-प्राप्ति ही हमारा स्वधर्म, और सनातन धर्म का सार है ---

 भगवत्-प्राप्ति ही हमारा स्वधर्म, और सनातन धर्म का सार है। भारत को सबसे बड़ा खतरा अधर्मियों से है। आज के दिन भारत और सनातन धर्म की रक्षा के लिए अधिकाधिक साधना करें।

दूसरे दिनों में भी रात्री के सन्नाटे में जब घर के सब लोग सोए हुए हों तब चुपचाप शांति से भगवान का ध्यान/जप आदि करें। न तो किसी को बताएँ और न किसी से इस बारे में कोई चर्चा करें। निश्चित रूप से आपको परमात्मा की अनुभूति होगी। किसी भी तरह के वाद-विवाद आदि में न पड़ें। हमारा लक्ष्य वाद-विवाद नहीं, परमात्मा की प्राप्ति है। भगवान का ध्यान हमें चिन्ता मुक्त कर देता है| तत्पश्चात हम केवल निमित्त मात्र बन जाते हैं| हमारे माध्यम से भगवान ही सारे कार्य करते हैं।
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भारतवर्ष में मनुष्य देह में जन्म लेकर भी यदि कोई भगवान की भक्ति ना करे तो वह अभागा है| भगवान के प्रति परम प्रेम, समर्पण और समष्टि के कल्याण की अवधारणा सिर्फ भारत की ही देन है| सनातन धर्म का आधार भी यही है|
पहले निज जीवन में परमात्मा को व्यक्त करो, फिर जीवन के सारे कार्य श्रेष्ठतम ही होंगे| परमात्मा को पूर्ण ह्रदय से प्रेम करो, फिर सब कुछ प्राप्त हो जाएगा|
कृपा शंकर
२४ दिसंबर २०२१

भारत के लिए स्वतंत्र, सुरक्षित, सुचारु अंतर्राष्ट्रीय नौपरिवहन अति आवश्यक है ---

 भारत के लिए ये ५ जलडमरूमध्य स्वतंत्र और सुचारू अंतर्राष्ट्रीय नौपरिवहन के लिए अति आवश्यक हैं -- मलक्का, बाब-अल-मंडेब, होरमुज, बास्फोरस और जिब्राल्टर। स्वेज़ और पनामा नहरों का चालू रहना भी बहुत अधिक आवश्यक है।

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समुद्रों में जो मालवाहक जहाज चलते हैं, उनका एक अंतर्राष्ट्रीय नियम होता है कि वे जिस देश में पंजीकृत होते हैं, उसी देश का ध्वज उन पर फहराया जाता है, और वे चलते-फिरते उसी देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। किसी भी समुद्री मालवाहक जहाज पर आक्रमण उस देश पर आक्रमण माना जाता है जिस देश का ध्वज उस जहाज पर फहराया हुआ है। यदि भारत के ध्वज-वाहक किसी भी मालवाहक जहाज पर कहीं भी आक्रमण होता है तो वह भारत पर आक्रमण ही माना जायेगा। भारत के ध्वज-वाहक जहाजों की रक्षा के लिए ही भारतीय नौसेना के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित दो युद्धपोत हर समय अदन की खाड़ी में गश्त लगाते रहते हैं। वहाँ अब तक सबसे बड़ा खतरा सोमालिया के समुद्री डाकुओं से था, अब यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों से है। ये हूती विद्रोही शिया मुसलमान हैं, और उनका झगड़ा पिछले ५० वर्षों से वहाँ के सुन्नी मुसलमानों से चल रहा है। सोमालिया के समुद्री डाकू सब सुन्नी मुसलमान हैं, जिनका धंधा ही डकैती है। अभी दो दिन पहले ही भारत की आर्थिक सीमा (Exclusive Economic Zone) में भारत के ही एक Chemical Carrier (हजारों टन केमिकल रूपी माल के परिवाहक) जहाज पर आक्रमण एक बहुत ही गंभीर घटना है।
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आज से ६०-७० वर्षों पहले तक कोई जमाना था जब अदन (यमन की तत्कालीन राजधानी) के बाजार भारतीयों से भरे हुए थे। सारी बड़ी बड़ी दुकानें भारतीयों की थीं, और वहाँ का सारा व्यापार भारतीयों के हाथ में था। फिर एक दिन ऐसा आया जब वहाँ (इस्लामिक) क्रान्ति हुई और वहाँ के हिन्दू भारतीय व्यापारियों को अपना सब कुछ छोड़कर जो कपड़े वे पहिने हुये थे उन्हीं में प्राण बचाने के लिए भारत में भाग कर शरण लेनी पड़ी।
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जब हूती विद्रोहियों में और सऊदी अरब में युद्ध आरंभ हुआ था तब भारत सरकार वहाँ काम कर रहे सारे भारतियों को सुरक्षित रूप से बापस भारत ले आई थी। अब हूती विद्रोहियों ने बाब-अल-मंडेब से गुजर रहे सभी जहाजों पर आक्रमण आरंभ कर दिया है। यह विश्व-युद्ध की भूमिका है।
२४ दिसंबर २०२३

भगवान समृद्धि तभी और उसी को दे जिस में उसकी रक्षा करने का सामर्थ्य हो ---

 भगवान समृद्धि तभी और उसी को दे, जिस में उसकी रक्षा करने का सामर्थ्य हो। हम समृद्धि की प्रार्थना करने से पूर्व, उसकी रक्षा करने में समर्थ बनें। ऐसी समृद्धि का क्या लाभ, जिसे ठग-चोर-बदमाश लूट लें ?

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भारत पर जिन विदेशियों ने शासन किया, वे सब डाकू -- हत्यारे, चोर और बदमाश थे। जो स्थल मार्ग से डाकू आए वे तो हत्यारे थे ही, समुद्री मार्ग से आए डाकू और भी अधिक खतरनाक भयंकर हत्यारे थे। भारत में सबसे पहले जो अंग्रेज़ आये, वे सब समुद्री डाकू थे। वे सूरत के तट पर आए, कुछ स्थानीय लोगों को भर्ती किया, उनके साथ घोड़ों पर बैठकर दिल्ली आए, जहांगीर बादशाह से मिले, और भारत में व्यापार करने की अनुमति ली। भारत में बादशाहों को वे सोने के आभूषण, विदेशी शराब और यूरोप की गोरी त्वचा की सुंदर लड़कियां भेंट में देते थे, जिनसे बादशाह लोग उनसे बहुत खुश रहते थे।
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सबसे बड़ा समुद्री डाकू और हत्यारा तो पुर्तगाल का वास्कोडीगामा था। चर्च द्वारा यूरोप से पूर्वी भाग को लूटने का ठेका पुर्तगाल को और यूरोप से पश्चिमी भाग को लूटने का ठेका स्पेन को दिया हुआ था। क्रिस्टोफर कोलंबस नाम का हत्यारा डाकू इसी उद्देश्य के लिए अमेरिका भेजा गया था।
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महासागरों में डकैतियाँ, गुलामों का व्यापार और चर्च में बहुत गहरा और घनिष्ठ संबंध रहा है। पुर्तगाल, स्पेन और इंग्लैंड -- ये समुद्री डाकुओं के देश थे। इन का मुख्य धंधा ही समुद्रों में लूटपाट, डकैतियाँ डालना और गुलामों का व्यापार करना था। इन के बारे में प्रचूर साहित्य उपलब्ध है।

कभी समय मिला तो समुद्री डाकुओं के बारे में लिखूंगा। अब भी समुद्रों में डकैतियाँ कहाँ कहाँ होती हैं, यह भी बताऊंगा।
ॐ तत्सत् !!
२४ दिसंबर २०२३