Sunday, 22 December 2024

प्रश्न (१). क्रिसमस २५ दिसंबर को ही क्यों मनाते हैं? प्रश्न (२). २५ दिसंबर को 'बड़ा दिन' क्यों बोलते हैं? प्रश्न (३). छुट्टी रविबार के दिन ही क्यों होती है?

उपरोक्त तीनों प्रश्नों के उत्तर एक ही हैं| रोमन सम्राट कोन्स्टेंटाइन द ग्रेट (२७ फरवरी २७२ - २२ मई ३३७) ने ही यह तय किया था कि जीसस क्राइस्ट का जन्म २५ दिसंबर को ही मनाया जाये| उसी के समय से २५ दिसंबर को बड़ा दिन मनाते हैं, और उसी के आदेश से रविबार की छुट्टी आरंभ हुई|
(भारत में अंग्रेज़ी राज्य से पहिले महीने में सिर्फ एक दिन अमावस्या की छुट्टी होती थी| अंग्रेजों ने इसे बदल कर सप्ताह में एक दिन, यानि महीने में चार छुट्टियाँ आरंभ कर दीं|)
.
कोन्स्टेंटिनोपल (कुस्तुंतुनिया) (वर्तमान इस्तांबूल) नगर उसी ने बसाया था जहाँ का सैंट सोफिया (हागिया सोफिया) केथेड्रल, पूरे विश्व के ईसाइयों की वेटिकन के बाद दूसरी सबसे बड़ी गद्दी थी|
.
अपने व्यक्तिगत जीवन में और अपने विचारों से वह सूर्य का उपासक था, ईसाई नहीं| ईसाई मत का उपयोग उसने एक सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था (Socio-political system) के रूप में अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए किया| उस के समय से ही ईसाई मत सबसे अधिक फैलने लगा|
.
दो हज़ार वर्ष पूर्व उन दिनों पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में शीतकालीन अयनांत (Winter Solstice) २४ दिसंबर को होता था| आजकल २१ दिसंबर को होता है| इस दिन सूर्य सीधा पृथ्वी की मकर रेखा पर होता है, और उत्तरी गोलार्ध में सबसे अधिक छोटा दिन होता है| आजकल २२ दिसंबर से दिन बड़े होने शुरू हो जाते हैं, उन दिनों २५ दिसंबर से होते थे| अतः उस समय के रोमन सम्राट कोन्स्टेंटाइन द ग्रेट ने यह आदेश दिया कि २५ दिसंबर को ही जीसस क्राइस्ट का जन्म दिन और बड़ा दिन मनाया जाये| चूंकि वह सूर्य का उपासक था, अतः उसने रविबार को ही छुट्टी मनाने की परंपरा शुरू कर दी|
.
सन २००३ में Dan Brown की लिखी एक पुस्तक "The Da Vinci Code" बाज़ार में आई थी जिसने विश्व के करोड़ों ईसाईयों की आस्था को हिला दिया था| भारत में यह पुस्तक प्रतिबंधित थी, फिर भी चोरी-चोरी किसी फर्जी प्रकाशक द्वारा छप कर बड़े नगरों के फुटपाथों पर खूब बिकी| उस के अनुसार रोमन सम्राट कोन्स्टेंटाइन द ग्रेट जब मर रहा था और असहाय था तब पादरियों ने बलात् उसका बपतीस्मा कर के उसे ईसाई बना दिया था, अन्यथा वह बुत-परस्त Pagan था|
.
सभी आस्थावानों को शुभ कामनायें !!
23 दिसंबर 2020

एक काल्पनिक चरित्र ---

जीसस क्राइस्ट (ईसा मसीह) मेरी दृष्टि में एक काल्पनिक चरित्र हैं। उनका न तो कभी जन्म हुआ और न कभी कोई मृत्यु हुई। वे हुये ही नहीं, उनके बारे में प्रचलित सारे किस्से-कहानियाँ झूठे हैं। चर्च/ईसाईयत -- पश्चिमी साम्राज्यवाद की अग्रिम सेना थी। इसका उपयोग पश्चिम ने अपने साम्राज्य के विस्तार और प्रभूत्व के लिए किया। पहले चर्च के पादरी पहुँच कर भोले-भाले लोगों को विश्वास में लेते हैं, फिर उनका बलात् मतांतरण, और न मानने वालों का सामूहिक नर-संहार करते हैं। इस तरह वे अपना साम्राज्य स्थापित करते हैं।
.
एक समय था जब मैं जीसस क्राइस्ट का प्रशंसक और प्रेमी था। उनकी प्रशंसा में मैंने अनेक लेख भी लिखे हैं। देश-विदेश के अनेक चर्चों में भी अनेक बार गया हूँ, उनकी प्रार्थना सभाएँ और प्रवचन भी सुने हैं। कनाडा में अनेक पादरी मेरे मित्र थे। इटालियन और अमेरिकन ईसाई मित्रों के साथ क्रिसमस पर केरोल (ईसाई भजन) भी गाये हैं। लेकिन जैसे जैसे परिपक्वता और समझ बढ़ती गई, पाया कि जोशुआ (जीसस) का सारा किस्सा गढ़ा हुआ है। यूरोप और अमेरिका के प्रबुद्ध ईसाई ईसाईत छोड़ रहे हैं। पादरी लोग कह रहे हैं कि ऐतिहासिक जीसस नहीं भी हुआ हो तो क्या, वे हमारे हृदय में तो हैं।
.
पश्चिम में जो हिन्दू संत गए, उनका उद्देश्य ईसाईयों के मध्य सनातन हिन्दू धर्म का प्रचार-प्रसार करना था। अतः उन्हें अपनी विवशता में जीसस को ईशपुत्र कहना ही पड़ा। वास्तव में ख्रीस्त पन्थ एक भीषण फरेब है। कई निष्ठावान हिन्दू भी भावनात्मक स्तर पर जीसस के भक्त बने हुये हैं, अतः अपनों की मर्यादा का ध्यान रखना पड़ता है।
.
मैंने old व चारों new testaments का अध्ययन किया है। उनके अधिकांश प्रवचन -- प्रलाप मात्र दिखते हैं। गिरी-प्रवचन (Sermon on the mount) हिंदुओं की नकल है। कुटिल पादरी, भारत सहित अन्य गैर यूरोपीय देशों में चर्च का धंधा चला रहे हैं। बडी विकट स्थिति है।
.
मुझे ईश्वर से एक प्रेरणा/आदेश मिला हुआ है कि अब से जीवन का हरेक कार्य ईश्वर-प्रदत्त विवेक के प्रकाश में ही करना है। जीवन में जो भी पीड़ाएँ सहीं, कष्ट पाये, उनका कारण -- लोभ और अहंकारवश किये हुए विचार, सोच और आचरण था। विचारों पर नियंत्रण पाने में बहुत अधिक सफल रहा हूँ। अतः अब कोई लोभ या अहंकार नहीं कर सकता। जो सत्य है उसे ही सत्य कहूँगा। सत्य ही ईश्वर है। भगवान सत्यनारायण हैं।
.
यीशु के जन्म का कोई प्रमाण कभी भी नहीं मिला। अब पश्चिमी जगत के कुछ इतिहासकार भी यह दावा कर रहे हैं कि जीसस क्राइस्ट नाम का कोई व्यक्ति कभी हुआ ही नहीं था। उनके अनुसार सैंट पॉल द्वारा रचित वे एक काल्पनिक चरित्र हैं। २५ दिसंबर का दिन रोमन सम्राट कोंस्टेंटाइन द ग्रेट ने ही क्रिसमस का दिन तय किया था, क्योंकि वह सूर्य उपासक था, और उस जमाने में २५ दिसंबर को बड़ा दिन होता था; आजकल २२ दिसंबर को होता है। रविवार की छुट्टियाँ भी उसी ने तय की थीं। अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए उसने ईसाईयत का भी खूब विस्तार किया।
.
कई तरह की बातें लिखी गई हैं, जिनसे मुझे अब कोई मतलब नहीं है। मेरे आदर्श भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण हैं। मैं मूर्तिपूजा को भी मानता हूँ और वेदान्त-दर्शन को भी। सारा मार्गदर्शन मुझे श्रीमद्भगवत गीता और उपनिषदों से मिलता है। मुझ निमित्तमात्र को अपना उपकरण बनाकर भगवान ही सब कुछ कर रहे हैं। समस्त सृष्टिरूप में मैं उनको नमन करता हूँ (वे स्वयं ही सबके माध्यम से स्वयं को ही नमन कर रहे हैं)।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२३ दिसंबर २०२२
.
पुनश्च: --- भारत का सबसे अधिक अहित जीसस के मतावलंबियों ने किया है। भारत में उनके अनुयायियों ने करोड़ों हिंदुओं की हत्या की। भारत की शिक्षा-व्यवस्था और कृषि-व्यवस्था का उन्होनें समूल नाश कर दिया। मेक्समूलर जैसे वेतनभोगी पादरियों द्वारा उन्होंने हिन्दू धर्म-ग्रंथों को प्रक्षिप्त करवाया। गोवा में हजारों हिन्दू ब्राह्मणों की हत्याएँ कीं और हजारों हिन्दू महिलाओं और बच्चों को उन्होंने जीवित जला दिया। गोवा में एक हाथकतरा-खंब है। गोवा के पुर्तगाली ईसाई शासक हिंदुओं को पकड़ कर लाते, और खंबा पकड़ने को कहते। फिर उसे जीसस क्राइस्ट में विश्वास करने और ईसाई बनने को कहते। यदि वह ईसाई नहीं बनता तो उसके हाथ काट देते। वह खंबा अभी भी है।
.
उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, और ऑस्ट्रेलिया महाद्वीपों के करोड़ों मूल निवासियों की हत्याएँ कर वहाँ उन्होंने यूरोपीय मूल के लोगों को बसा दिया। मानव जाति के इतिहास में उन्होंने सर्वाधिक नृशंस और भयावह अत्याचार किए हैं।
यूरोप में भी उन्होंने कम अत्याचार नहीं किए। करोड़ों महिलाओं को डायन घोषित कर उनकी हत्या बड़ी क्रूरता से की, जिन्हें देखकर लगता है कि यह एक अधर्म है।
.
अपने स्वयं के धर्म का ही पालन और उसमें निधन ही भगवान का आदेश है। भगवान कहते हैं --
"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३:३५॥"
अर्थात् -- सम्यक् प्रकार से अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म का पालन श्रेयष्कर है; स्वधर्म में मरण कल्याणकारक है (किन्तु) परधर्म भय को देने वाला है॥"

बारह ज्योतिर्लिंगों की पैदल यात्रा ---

हमारे यहाँ के एक शिवभक्त नवयुवक श्री सुभाष नायक ने कुछ माह पूर्व अकेले ही पैदल तीर्थयात्रा कर के सभी १२ ज्योतिर्लिंगों के दर्शन और आराधना का संकल्प कर प्रस्थान किया था। कल सायंकाल वह युवक अपने संकल्प को साकार कर लगभग साढ़े नौ हजार किलोमीटर की पैदल तीर्थयात्रा कर के सकुशल बापस लौट आया। उसका भव्य स्वागत हुआ। स्वागतकर्ताओं में मुझे भी सम्मिलित होने का सौभाग्य मिला। उसके संदेश और चित्र नित्य मिल जाते थे। मार्ग में श्रद्धालु हिंदुओं का पूर्ण सहयोग उसे मिला। नित्य उसके भोजन और विश्राम की व्यवस्था अपने आप ही हो जाती थी। जैसा कि उसने बताया जब वह वनों और सुनसान स्थानों से अग्रसर होता तब उसकी रक्षा और साथ देने के लिए कुछ नंदी (बैल) अपने आप ही पता नहीं कहीं से आ जाते और उसका साथ देते।
.
झुंझुनूं (राजस्थान) से केदारनाथ, केदारनाथ से वाराणसी, वाराणसी से झारखंड में वैद्यनाथ, वहाँ से सीधे रामेश्वरम, रामेश्वरम से फिर बाकी बचे नौओं ज्योतिर्लिंगों की पैदल तीर्थयात्रा करते हुए अंतिम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ में उसने अपने संकल्प को पूर्ण किया। वहाँ उसके परिवारजन और मित्रगण भी पहुँच गए। सोमनाथ से अहमदाबाद होते हुए गृहनगर झुंझुनूं तक उसने बस में यात्रा की।
.
इस शिवभक्त नवयुवक का अभिनंदन, बधाई और मंगलमय शुभ कामनायें।
कृपा शंकर
२२ दिसंबर २०२२

वर्तमान में चल रहा सर्दियों का मौसम, आध्यात्मिक साधना के लिए बहुत अनुकूल है ---

वर्तमान में चल रहा सर्दियों का मौसम, आध्यात्मिक साधना के लिए बहुत अनुकूल है। न तो पंखे या कूलर की आवाज़, और न कोई शोरगुल है। प्रकृति भी बड़ी शांत है। ऐसे में अपने भौतिक और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें, और भगवान ने जो २४ घंटों का समय दिया है, उसका १० प्रतिशत भाग तो बापस भगवान को बापस दें। सारा मार्गदर्शन - गीता आदि ग्रन्थों में है, जिनका स्वाध्याय करें। भगवान से प्रेम होगा तो वे स्वयं सारा मार्गदर्शन और सहायता करेंगे। इस मार्ग में कोई short cut नहीं है। सारी प्रगति और सफलता -- भगवान के अनुग्रह पर निर्भर है। . दो-तीन बातों का ध्यान रखें| एक तो आपकी कमर नहीं झुके और सदा सीधी रहे| इसके लिए नियमित व्यायाम करने होंगे| साँस दोनों नासिकाओं से ही चलती रहे, इसका ध्यान रखें| हठयोग सिखाने वाले कई क्रियाओं को सिखाते हैं, जिनसे दोनों नाक खुली रहती हैं| आवश्यक हो तो मेडिकल सहायता लें| सात्विक भोजन लें, हर परिस्थिति में कुसंग का त्याग करें, और सद्साहित्य का स्वाध्याय और अच्छे सात्विक लोगों का ही संग करें| अपने आसपास के वातावरण को सात्विक बनाए रखें|

.
मेरे नवरत्न तो भगवान स्वयं हैं। मैं न तो कोई अंगूठी पहनता हूँ, न कोई नवरत्न का कड़ा, या न कोई कंठीमाला। मेरे एकमात्र रत्न भगवान स्वयं हैं, जो निरंतर मेरे हृदय में रहते हैं। एक क्षण के लिए भी वे इधर-उधर नहीं होते। वे ही मेरी शोभा हैं। मेरा हृदय कूटस्थ सूर्यमंडल है, न कि यह भौतिक हृदय। कूटस्थ चैतन्य ही मेरा जीवन है। उस से च्युत होना ही मृत्यु है। भगवान की विस्मृति नर्क है, और उन की स्मृति ही स्वर्ग है। साधना का और साधक होने का भ्रम मिथ्या है।
आप सब को शुभ कामनाएँ और नमन !! कृपा शंकर
२२ दिसंबर २०२०

आज २२ दिसंबर का बड़ा दिन, एक उत्सव मनाने का पर्व है ---

 आज २२ दिसंबर का बड़ा दिन, एक उत्सव मनाने का पर्व है ---

.
पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध यानि भूमध्य रेखा के उत्तर में, बीता हुआ कल यानि २१ दिसंबर इस वर्ष का सबसे छोटा दिन और सबसे बड़ी रात थी। आज से धीरे धीरे दिन बड़े होने आरंभ हो जाएँगे जो २१ जून २०२२ तक होंगे। इसलिए आज बड़ा दिन है। आज सूर्य मकर रेखा पर लम्बवत चमक रहा है, और अब उत्तरगामी हो जाएगा।
.
दो हज़ार वर्ष पहिले २४ दिसंबर की रात सबसे बड़ी होती थी, इसलिए उस रात को रोमन सम्राट कोंस्टेन्टाइन द ग्रेट के आदेश से ईसाई भजन (Carol) गाकर क्रिसमस मनाई जाने लगी। २५ दिसंबर से दिन बड़े होने आरंभ होते थे इसलिए सूर्योपासक रोमन सम्राट कोंस्टेन्टाइन द ग्रेट के आदेश से इसे ईसा मसीह का जन्मदिन घोषित किया गया।
.
उसी सूर्योपासक सम्राट के आदेश से रविबार के दिन को छुट्टी का दिन मनाया जाता है। इस सम्राट ने जो स्वयं ईसाई नहीं, बल्कि एक सूर्योपासक था, ने बाइबल का न्यू टेस्टामेंट संपादित करवाया, और ईसाई मत का उपयोग अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए किया। कोन्स्टेंटिनोपल (वर्तमान इस्तांबूल) उसी का बसाया नगर है।
.
अब पश्चिमी जगत में ईसा मसीह के अस्तित्व को अनेक लोग काल्पनिक मानने लगे हैं। उनका मत है कि यह पादरी सेंट पॉल और रोमन सम्राट कोंस्टेन्टाइन द ग्रेट के दिमाग की उपज है। वास्तविकता क्या है, मुझे पता नहीं। यदि ईसा मसीह का अस्तित्व सचमुच था तो वे भगवान श्रीकृष्ण के ही भक्त थे, और मैं उनको नमन करता हूँ। उनकी मूल शिक्षाएं लुप्त हो गई हैं और वर्तमान चर्चवाद (ईसाईयत) का उनसे कोई संबंध नहीं है।
.
भारत का सबसे अधिक अहित उनके मतावलंबियों ने किया है। भारत में उनके अनुयायियों ने करोड़ों हिंदुओं की हत्या की। भारत की शिक्षा-व्यवस्था और कृषि-व्यवस्था का उन्होनें समूल नाश कर दिया। मेक्समूलर जैसे वेतनभोगी पादरियों द्वारा उन्होंने हिन्दू धर्म-ग्रंथों को प्रक्षिप्त करवाया। गोवा में हजारों हिन्दू ब्राह्मणों की हत्याएँ कीं और हजारों हिन्दू महिलाओं और बच्चों को उन्होंने जीवित जला दिया।
.
उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, और ऑस्ट्रेलिया महाद्वीपों के करोड़ों मूल निवासियों की हत्याएँ कर वहाँ उन्होंने यूरोपीय मूल के लोगों को बसा दिया। मानव जाति के इतिहास में उन्होंने सर्वाधिक नृशंस और भयावह अत्याचार किए हैं।
यूरोप में भी उन्होंने कम अत्याचार नहीं किए। करोड़ों महिलाओं को डायन घोषित कर उनकी हत्या बड़ी क्रूरता से की, जिन्हें देखकर लगता है कि यह एक अधर्म है। अपने स्वयं के धर्म का ही पालन और उसमें निधन ही भगवान का आदेश है। भगवान कहते हैं --
"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३:३५॥"
अर्थात् -- सम्यक् प्रकार से अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म का पालन श्रेयष्कर है; स्वधर्म में मरण कल्याणकारक है (किन्तु) परधर्म भय को देने वाला है॥"
.
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ दिसंबर २०२१

गीता जयंती पर सारी सृष्टि को मंगलमय शुभ कामनाएं ----

 गीता जयंती पर सारी सृष्टि को मंगलमय शुभ कामनाएं ---

.
गीता में भगवान ने सिर्फ तीन विषयों -- कर्म, भक्ति और ज्ञान -- पर ही उपदेश देते हुए सम्पूर्ण सत्य-सनातन-धर्म को इन में समाहित कर लिया है। धर्म के किसी भी पक्ष को उन्होंने नहीं छोड़ा है। हम कर्मफलों पर आश्रित न रहकर अपने कर्तव्य-कर्म करते रहें, यह उनकी शिक्षाओं का सार है। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि कौन योगी है और कौन सन्यासी है।
.
भगवान कहते हैं कि हमें अपने सारे संकल्प भगवान को समर्पित कर देने चाहियें। एकमात्र कर्ता वे स्वयं हैं, हम पूर्ण रूप से उनको समर्पित हों। कर्ता भाव से हम मुक्त हों। इन्द्रियों के भोगों तथा कर्मों व संकल्पों को त्यागते ही हम योगारूढ़ हो जाते हैं। हम स्वयं ही अपने मित्र हैं, और स्वयं ही अपने शत्रु हैं। जिसने अपने आप पर विजय प्राप्त कर ली है, उसे परमात्मा नित्य-प्राप्त हैं। हम ज्ञान-विज्ञान से तृप्त, जितेंद्रिय और विकार रहित (कूटस्थ) हों। हमारा मन निरंतर भगवान में लगा रहे। भूख और नींद पर हमारा नियंत्रण हो। हम निःस्पृह होकर अपने स्वरूप में स्थित रहें व तत्व से कभी विचलित न हों।
.
अपने मन को आत्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करें। यह बड़ी से बड़ी साधना है। यह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँ जहाँ विचरण करता है, वहाँ वहाँ से हटाकर इसको एक परमात्मा में ही लगायें। विक्षेप का कारण रजोगुण है। हम सर्वत्र यानि सभी प्राणियों में अपने स्वरूप को देखें, और सभी प्राणियों को अपने स्वरूप में देखें।
भगवान कहते हैं --
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् -- जो सबमें मुझे देखता है, और सब को मुझ में देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता, और वह भी मेरे लिये अदृश्य नहीं होता।
.
जब हम भगवान को सर्वत्र, और सभी में भगवान को देखते हैं, तो भगवान कभी अदृश्य यानि परोक्ष नहीं होते। यहाँ दृष्टा कौन हैं? दृष्टा, दृश्य और दृष्टि -- सभी भगवान स्वयं हैं। हम कूटस्थ-चैतन्य यानि ब्राह्मी-स्थिति में निरंतर रहें। यह श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से भगवान का संदेश है।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर बावलिया (मुद्गल)
झुंझुनूं (राजस्थान)
२२ दिसंबर २०२३

जीसस क्राइस्ट एक काल्पनिक चरित्र थे ----

अपने जीवन भर की साधना और स्वाध्याय के उपरांत मैं इस निर्णय पर पहुंचा हूँ कि जीसस क्राइस्ट एक काल्पनिक चरित्र थे। उनका कभी जन्म नहीं हुआ। सैंट पॉल नाम के एक पादरी के मन की वे एक कल्पना मात्र थे।
.
पूरे विश्व के प्रबुद्ध ईसाई विद्वान यह बात मान चुके हैं। सम्पूर्ण प्रबुद्ध यूरोप यह घोषित कर चुका है कि जीसस नाम का कोई व्यक्ति कभी पैदा ही नहीं हुआ था। मृत सागर (Dead Sea) में जो ‘Dead Sea Scrolls’ मिले हैं उनसे यह सिद्ध हुआ है। सैंट पॉल ने स्थानीय किंवदंतियों को संकलित किया और उसे बाइबिल का रूप दे दिया।
.
जो हिन्दू महात्मा यूरोप में सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए गए, उन्हें परिस्थितिवश जीसस क्राइस्ट का महिमा मंडन करना पड़ा। यह एक परिकल्पना और अनुभूति मात्र हैं। मैंने भारत में और भारत से बाहर क्रिसमस अनेक बार मनाया है। इटालियन और अमेरिकी ईसाई भक्तों के साथ Carols (ईसाई भजन) भी गाये हैं। जीसस क्राइस्ट पर ध्यान भी किया है। जीसस पर अनेक मनीषियों ने ध्यान किया है अतः मनोमय जगत में उनका अस्तित्व हो गया है, जो हमारा ही है।
.
मैं दो बार वेनिस गया हूँ और कई बार इटली गया हूँ। यूरोप व अमेरिका के अनेक देशों का भ्रमण किया है। वहाँ के अनेक चर्चों में भी गया हूँ। वहाँ उपस्थिती नगण्य होती है। चर्च ने अपना पूरा ज़ोर भारत में धर्मांतरण पर लगा रखा है।
.
भारतीय प्रशासनिक सेवा से सेवानिवृत मेरे एक विदान परम मित्र थे जिनका कुछ माह पूर्व ही देहांत हुआ है। उन्होने हिन्दू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपना लिया था। उनकी तर्क शक्ति और विद्वता बड़ी प्रबल थी। कालांतर में उन्हे ईसाई मत से बड़ी निराशा मिली, और वे बापस हिन्दू हो गए।
उन्होने सारे पादरियों को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती भी दी थी, लेकिन किसी ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। उन्होने मुझे यह पूरी बात समझाई थी, और काफी साहित्य भी उपलब्ध करवाया था।
कृपा शंकर

२२ दिसंबर २०२३