Tuesday, 17 December 2024

भारत का अभ्युदय एक प्रचंड आध्यात्मिक शक्ति से होगा --- .

 भारत का अभ्युदय एक प्रचंड आध्यात्मिक शक्ति से होगा ---

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भारत में एक ब्रह्म शक्ति का जागरण हो रहा है जो समस्त विश्व का रूपांतरण कर देगी|
इसके जागरण कि स्पष्ट अनुभूतियाँ मुझे हो रही हैं| मैं यह नहीं कह सकता कि यह कार्य कब तक पूर्ण पूर्ण होगा| पर यह कार्य धीरे धीरे आरम्भ हो चुका है|
दिव्या चेतना युक्त, दैवीय गुणों से संपन्न महापुरुषों का अवतरण भारत में हो रहा है| उनके प्रभाव से पूरा परिदृश्य बदल जायेगा| ध्यान में यह अनुभूत किया जा सकता है|
यदि समर्थ हुआ तो इस विषय पर कभी लिखूँगा| भविष्य का विज्ञान भी चेतना का विज्ञान होगा| अब समय आ गया है उसके जागृत होने का|
भारत की भूमिका इसमें अग्रणी होगी|
अब तक के विज्ञान का लक्ष्य भौतिक प्रगति थी| भौतिक पदार्थ ऊर्जा की ही घनीभूत अभिव्यक्ति हैं| ऊर्जा भी चेतना की ही अभिव्यक्ति है|
आगे का विज्ञान चेतना का विज्ञान होगा जिसमें ऊर्जा और भौतिक पदार्थ पर मन का और मन पर चेतना का नियंत्रण होगा|
यह विज्ञान भारत के मनीषियों द्वारा फलीभूत होगा जिसमें भारत का आध्यात्म और भारत की आध्यात्मिक शक्ति विश्व का रूपान्तरण करेगी|
वर्तमान पर हावी असत्य और अन्धकार की शक्तियों का पराभव आध्यात्मिक बल द्वारा ही होगा|
ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
१७ दिसंबर २०१४

भक्ति का दिखावा, भक्ति का अहंकार, और साधना का समर्पण ---

 भक्ति का दिखावा, भक्ति का अहंकार, और साधना का समर्पण ......

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किसी भी साधक के लिए सबसे बड़ी बाधा है .... भक्ति का दिखावा और भक्ति का अहंकार |
कई लोग सिर्फ दिखावे के लिए या अपने आप को प्रतिष्ठित कराने के लिए ही भक्ति का दिखावा करते हैं | वे लोग अन्य किसी को नहीं बल्कि अपने आप को ही ठग रहे हैं | जहाँ तक हो सके अपनी साधना को गोपनीय रखें |
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भक्त या साधक होने का अहंकार सबसे बड़ा अहंकार है | इसके दुष्परिणाम भी सबसे अधिक हैं |
इससे बचने का एक ही उपाय है ..... अपनी भक्ति और साधना का फल तुरंत भगवान को अर्पित कर दो, अपने पास बचाकार कुछ भी ना रखो, सब कुछ भगवान को अर्पित कर दो | अपने आप को भी परमात्मा को अर्पित कर दो | कर्ता भाव से मुक्त हो जाओ | हम भगवान के एक उपकरण या खिलौने के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं हैं |
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आप कोई साधना नहीं करते हैं, आपके गुरु महाराज या स्वयं भगवान ही आपके माध्यम से साधना कर रहे हैं ..... यह भाव रखने पर कहीं कोई त्रुटी भी होगी तो उसका शोधन गुरु महाराज या भगवान स्वयं कर देंगे | कर्ता भगवान को बनाइये, स्वयं को नहीं |
प्रभु के प्रेम के अतिरिक्त अन्य कोई भी कामना न रखें | उनके प्रेम पर तो आपका जन्मसिद्ध अधिकार है | अन्य कुछ भी आपका नहीं है |
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ॐ गुरु ॐ | गुरु ॐ | गुरु ॐ || १७ दिसंबर २०१५

हमारी साँसें प्राणों से नियंत्रित होती हैं या प्राण साँसों से ---

हमारी साँसें प्राणों से नियंत्रित होती हैं या प्राण साँसों से नियंत्रित होते हैं इसका मुझे नहीं पता, लेकिन दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। साँसों पर ध्यान करने से ही प्राण-तत्व की अनुभूति होती है, और प्राण-तत्व ही हमें परमात्मा की अनुभूति कराता है।

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मन में बुरे विचार आते हैं, उस समय हमारी साँसे छोटी हो जाती है, और तेज चलने लगती हैं, यानि उनकी आवृति (frequency) बढ़ जाती है। जब हमारी साँसों की आवृति कम होती है, साँसें लंबी व धीमी गति से चलती हैं तभी मन में सदविचार आते हैं, और भक्ति यानि परमात्मा से परमप्रेम की भावना जागृत होती है।
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इस विषय पर पर्याप्त साहित्य भी उपलब्ध है और साधना पद्धतियाँ भी हैं। इस विषय पर उन्हीं लोगों से संवाद किया जा सकता है जिन्हें परमात्मा से परमप्रेम है। अन्य लोगों से चर्चा करना व्यर्थ है।
आत्मीय रूप से मेरा संपर्क और संबंध उन्हीं से है, जिनके हृदय में भगवान के प्रति भक्ति है। अन्यों से संबंध मेरा प्रारब्ध, विगत में यानि पूर्व जन्मों में किए गए कर्मों का फल है। अब तो हर साँस के साथ कर्म कट रहे हैं। जिनका कुछ भी अहित मनसा-वाचा-कर्मणा मेरे कारण हुआ है, वे मुझे क्षमा करें।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ दिसंबर २०२३

अनिर्वचनीय परमप्रेम ---

एक बात तो निश्चित है कि हम अपना कल्याण स्वयं नहीं कर सकते। यह हमारे सामर्थ्य के बाहर की बात है। पता नहीं कितने जन्मों से यह प्रयास चल रहा है। अब थक-हार कर अंततः भगवान के समक्ष समर्पण करना ही होगा। फिर यह समस्या भगवान की हो जाएगी कि हमारा कल्याण कैसे हो। गीता में भगवान कहते हैं --

"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
अर्थात् -- अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥
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यह एक ऐसा विषय है जिस पर लिखने के पश्चात अब मुझे इस जीवन में अन्य कुछ भी लिखने की आवश्यकता नहीं है। जो मुझे लिखना चाहिए था, वह सब कुछ लिखा जा चुका है। अब कुछ भी शेष नहीं बचा है। दो दिनों से इस अनिर्वचनीय परमप्रेम की अनुभूतियाँ हो रही हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण के एक वचन को पढ़/समझ कर मन प्रसन्नता से झूम उठा, और नृत्य करने लगा। अपरोक्षानुभूति -- शब्दातीत है, उसे लिखा नहीं जा सकता।
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भक्तिसूत्रों में देवर्षि नारद कहते हैं --
"अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम्॥५१॥" (प्रेम का स्वरूप अनिर्वचनीय है।)
"मूकास्वादनवत्॥५२॥" (गूँगे के स्वाद लेने की तरह।)
"प्रकाशते व्कापि पात्रे॥५३॥" (किसी बिरले योग्य पात्र [प्रेमी भक्त में] ऐसा प्रेम प्रकट भी होता है।)
"गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षणवर्धमानमविच्छिन्नं सूक्ष्मतरमनुभवरूपम्॥५४॥"
(यह प्रेम गुणरहित है, कामनारहित है, प्रतिक्षण बढ़ता रहता है, विच्छेदरहित है, सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर है और अनुभव रूप है।)
"तत्प्राप्य तदेवावलोकयति तदेव श्रृणोति तदेव भाषयति तदेव चिंतयति॥५५॥"
(उस प्रेम को पाकर प्रेमी उस प्रेम को ही देखता है, प्रेम को ही सुनता है, उस प्रेम का ही वर्णन करता है और उस प्रेम का ही चिंतन करता है।)
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गीता में इस विषय पर भगवान कहते हैं --
"भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥१८:५५॥"
अर्थात् - उस (परा) भक्ति के द्वारा मुझे वह तत्त्वत: जानता है कि मैं कितना (व्यापक) हूँ तथा मैं क्या हूँ। (इस प्रकार) तत्त्वत: जानने के पश्चात् तत्काल ही वह मुझ में प्रवेश कर जाता है, अर्थात् मत्स्वरूप बन जाता है॥
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एक बात तो निश्चित है कि हम अपना कल्याण स्वयं नहीं कर सकते। यह हमारे सामर्थ्य के बाहर की बात है। पता नहीं कितने जन्मों से यह प्रयास चल रहा है। अब थक-हार कर अंततः भगवान के समक्ष समर्पण करना ही होगा। फिर यह समस्या भगवान की हो जाएगी कि हमारा कल्याण कैसे हो। गीता में भगवान कहते हैं --

"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
अर्थात् -- अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥
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यह एक ऐसा विषय है जिस पर लिखने के पश्चात अब मुझे इस जीवन में अन्य कुछ भी लिखने की आवश्यकता नहीं है। जो मुझे लिखना चाहिए था, वह सब कुछ लिखा जा चुका है। अब कुछ भी शेष नहीं बचा है। दो दिनों से इस अनिर्वचनीय परमप्रेम की अनुभूतियाँ हो रही हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण के एक वचन को पढ़/समझ कर मन प्रसन्नता से झूम उठा, और नृत्य करने लगा। अपरोक्षानुभूति -- शब्दातीत है, उसे लिखा नहीं जा सकता।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
१७ दिसंबर २०२३

Sunday, 15 December 2024

“तत् त्वं असि" ---

 “तत् त्वं असि" ---

(प्रश्न) क्या मैं वह जानता हूँ जिसे जानने से जो अज्ञात है, वह ज्ञात हो जाता है?
(उत्तर) नहीं। लेकिन उसे जानना मेरा धर्म है।
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एक दिन ध्यान में गुरु महाराज आए। उनका चेहरा भुवन-भास्कर की तरह देदीप्यमान था, आँखें बड़ी तेजस्वी, और देह घनीभूत प्रकाशमय थी। कुछ क्षणों तक उन्होने बड़े ध्यान से मेरी ओर देखा और दो वाक्यों में एक उपदेश देकर अपनी घनीभूत प्रकाशमय देह को परमात्मा के प्रकाश में विलीन कर दिया।
उनका आदेश था कि -- "जो मैं हूँ, तुम भी वही बनो", "सिर्फ मेरे शब्दों को ही समझने से कोई लाभ नहीं होगा।"
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एक बात और बिना कहे ही वे मुझे समझा गए कि मेरे बाहरी आचरण का, और मेरे शब्दों का उनके लिए कोई महत्व नहीं है। महत्व सिर्फ मेरे विचारों, भावों और संकल्पों की दृढ़ता का है। बाहरी आचरण तो उन्हीं का अनुसरण करेगा।
उनके कहने का एक और तात्पर्य था कि शास्त्रों के वचनों, यानि उनके शब्दों के अर्थ मात्र को समझने से कोई लाभ नहीं है। उनकी अभिव्यक्ति, उनका प्राकट्य निज जीवन में करना होगा।
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चेतना या अस्तित्व ही सब कुछ है। इसलिए मैं वही चेतना हूँ = "सोहं"॥
खोज कौन, और किसकी कर रहा है? -- हमारे माध्यम से परमात्मा स्वयं अपनी ही खोज कर रहे हैं। हम वही हैं, जिसकी खोज हम स्वयं कर रहे हैं। साधक और साध्य एक हैं।
मधुमक्खियाँ अनेक पुष्पों से पराग एकत्र कर के मधु बनाती हैं। क्या मधु का एक कण यह बता सकता है कि वह किस पुष्प से संग्रहित है?
उसी तरह विशुद्ध चेतना से एकाकार होते ही हमारी व्यक्तिगत पहिचान समाप्त हो जाती है। महासागर में मिलने के पश्चात जल की एक बूंद अपनी पहिचान खो देती है। परमात्मा की चेतना से ही यह सारा चराचर जगत बना है। उस चेतना में समर्पित होते ही हमारी भी पृथकता समाप्त हो जाती है, और हम परमात्मा के साथ एक हो जाते हैं।
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महादेव महादेव महादेव !! शिवोहं शिवोहं अहंब्रह्मास्मि !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१६ दिसंबर २०२२

अपने दम पर तो मैं एक साँस तक नहीं ले सकता, साधना या भक्ति तो बहुत दूर की बात है ---

अपने दम पर तो मैं एक साँस तक नहीं ले सकता, साधना या भक्ति तो बहुत दूर की बात है। यदि मैं यह दावा करता हूँ कि मैं कोई साधना या भक्ति कर रहा हूँ, तो मैं झूठ बोल रहा हूँ। भगवान अपनी भक्ति स्वयं करते हैं, मैं समर्पित होकर अधिक से अधिक एक निमित्त या साक्षी मात्र ही बन सकता हूँ, उससे अधिक कुछ भी नहीं। निराकार और साकार की बातें एक बुद्धि-विलास मात्र है, इस सृष्टि मैं कुछ भी निराकार नहीं है। सम्पूर्ण अस्तित्व स्वयं परमात्मा हैं। वे ही एकमात्र सत्य हैं। भगवान अपना बोध स्वयं कराते हैं, उन्हें जानना या पाना किसी के भी वश की बात नहीं है। . मेरी हर साँस मुझे भगवान से जोड़ती है। सम्पूर्ण ब्रह्मांड और भगवान स्वयं ये साँसें ले रहे हैं, मैं नहीं। मैं एक साक्षी/निमित्त मात्र हूँ। मनुष्य जीवन की इस उच्चतम उपलब्धि को अनायास ही मैंने प्राप्त किया है। यही मेरा स्वधर्म है, और यही सत्य-सनातन-धर्म है। मेरे चरित्र, आचरण और विचारों में पूर्ण पवित्रता हो। मेरा हर कार्य ईश्वर-प्रदत्त विवेक के प्रकाश में हो। समष्टि में मंगल ही मंगल और शुभ ही शुभ हो। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !! १६ दिसंबर २०२३

कई बातें हैं जो हृदय से बाहर नहीं आतीं ---

 कई बातें हैं जो हृदय से बाहर नहीं आतीं। वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण यहाँ बिराजमान हैं। उनके समक्ष मेरा कोई अस्तित्व नहीं है। उनके बारे में सोचते सोचते उनसे अन्य अब कुछ भी नहीं रहा है, मैं भी नहीं॥

अब से इस राष्ट्र में जो भी होगा, वह मंगलमय ही होगा। असत्य का अंधकार सदा के लिए दूर होगा, और सत्य की विजय होगी। ॐ ॐ ॐ !!
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"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥"
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"वसुदॆव सुतं दॆवं कंस चाणूर मर्दनम्।
दॆवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दॆ जगद्गुरुम्॥"
"वंशीविभूषित करान्नवनीरदाभात् , पीताम्बरादरूण बिम्बफला धरोष्ठात्।
पूर्णेंदु सुन्दर मुखादरविंदनेत्रात् , कृष्णात्परं किमपि तत्वमहं न जाने॥"
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"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने, प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:॥"
"नमो ब्रह्मण्य देवाय गो ब्राह्मण हिताय च, जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् । यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥"
"कस्तूरी तिलकम् ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम् ,
नासाग्रे वरमौक्तिकम् करतले, वेणु: करे कंकणम्।
सर्वांगे हरिचन्दनम् सुललितम्, कंठे च मुक्तावली,
गोपस्त्री परिवेष्टितो विजयते, गोपाल चूड़ामणि:॥"
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !! १६ दिसंबर २०२३