आज वयोवृद्ध माननीय श्री रवि कुमार जी से बहुत अच्छा सत्संग हुआ| आप हिन्दुत्व के एक अंतर्राष्ट्रीय चिंतक, प्रखर तपस्वी विद्वान और लेखक हैं| मूल रूप से आप तमिलनाडु से हैं पर आपका हिन्दी का ज्ञान अनुपम है| भारत से बाहर के 40 देशों में जा कर वहाँ रहने वाले हिंदुओं को संगठित करने हेतु पूरे विश्व में 1500 के लगभग इकाइयाँ खोलने में आपका बहुत बड़ा योगदान है| आप रा.स्व.संघ के पूर्णकालिक प्रचारक हैं जिन का कार्य विदेशों में "हिन्दू स्वयंसेवक संघ" के नाम से प्रवासी भारतीय हिंदुओं को संगठित करना था| वर्तमान में आप संघ के प्रखर विचारकों में से एक हैं जिनका कार्य देश के प्रबुद्ध लोगों से मिलकर उन्हें संगठित करना है| .
Tuesday, 10 December 2024
"हिन्दू स्वयंसेवक संघ" के प्रमुख माननीय श्री रविकुमार जी से भेंट ---
दूसरा सत्संग अरविंदाश्रम के श्री चंद्रप्रकाश जी खेतान से हुआ जो अब तो पूर्णतः अति उच्च कोटि के एक आध्यात्मिक साधक हैं, पर कभी अर्थशास्त्री के रूप में कनाडा सरकार के आर्थिक सलाहकार रह चुके हैं|
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प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक श्री हनुमान प्रसाद जी से भी प्रकृति के प्रदूषण आदि विषयों पर आज अच्छी चर्चा हुईं|
कृपा शंकर
10 दिसंबर 2019
हमारा अन्नदाता कौन है?
कृषि एक व्यवसाय है जो कृषक का धर्म है, कोई समाजसेवा नहीं| कृषक खेती कर के अन्न का उत्पादन करता है, अपने स्वयं का और अपने परिवार का पेट भरने के लिए| अतिरिक्त अन्न को बेचकर वह अपनी अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करता है|
जिस काम के बदले में हमें धन मिलता है, वह व्यापार है, समाजसेवा नहीं| यह किसान-अन्नदाता, किसान-अन्नदाता का ढकोसला अब समाप्त होना चाहिए| किसान -- भगवान है क्या? अगर किसान पेट भरता है तो पिछले आठ-नौ महीनों से कोविड-१९ महामारी के काल में सरकार गरीबों को मुफ्त में राशन क्यों बाँट रही है? अन्नदाता यदि किसान है तो वह स्वयं अन्न क्यों नहीं बाँट रहा?
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यदि किसान भगवान है तो जुलाहे, बुनकर और दर्जी भी भगवान हैं| ये अपना धर्म नहीं निभाते तो हम क्या नंगे घूमते? जिसने बर्तन बनाए वह भी भगवान है, अन्यथा हम खाना किस में बनाते और खाते? जिसने बिजली बनाई, सड़कें बनाईं, और अन्य सब कुछ बनाया, वे सब भी फिर भगवान ही हैं| जिसने दवाइयाँ बनाईं, कागज, कलम आदि बनाए, वे भी भगवान हैं| मेडिकल, शिक्षा, सफाई आदि से जुड़े सभी व्यवसायों के लोग भी भगवान ही हैं, सिर्फ किसान ही क्यों? सृष्टि में हर कार्य का अपना-अपना महत्व है| जब धरती पर खेती-बाडी़ नहीं होती थी तब भी लोग जीवित थे|
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सृष्टि का पेट भगवान भरता है जिसने यह सृष्टि बनाई है| मेरे लिए तो मेरी अन्नदाता, माँ भगवती अन्नपूर्णा है| वे ही इस सृष्टि का पालन-पोषण कर रही हैं| जगन्माता के सब रूप उन्हीं के हैं| मैं तो उन्हीं का भिक्षान्न खाता हूँ|
"भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी||"
सार की बात :--- हम सभी का अन्नदाता स्वयं परमात्मा है, जिस ने इस सृष्टि की रचना की है और सभी प्राणियों का पालन-पोषण कर रहा है|
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पुनश्च: --- तैत्तिरीयोपनिषद् में अन्न को ब्रह्म बताया गया है ---
"सः अन्नं ब्रह्म इति व्यजानात् हि |"
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१० दिसंबर २०२०
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पुनश्च: ---
1― बीज खरीदने के लिए सब्सिडी।
2― कृषि उपकरण खरीदने के लिए सब्सिडी।
3― यूरिया (खाद) खरीदने के लिए सब्सिडी।
5― पशुधन खरीदने पर सब्सिडी।
6― खेती पर लगने वाले अन्य खर्च के लिए सब्सिडी युक्त कर्ज।
7― किसान क्रेडिट कार्ड से कर्ज।
8― जैविक खेती करने पर सब्सिडी।
9― खेत में डिग्गी बनाने हेतू सब्सिडी।
10― फसल प्रदर्शन हेतू सब्सिडी।
11― फसल का बीमा।
12― सिंचाई पाईप लाईन हेतू सब्सिडी।
13― स्वचालित कृषि पद्धति अपनाने वाले किसानों को सब्सिडी।
14― जैव उर्वरक खरीदने पर सब्सिडी।
15― नई तरह की खेती करने वालो को फ्री प्रशिक्षण।
16― कृषि विषय पर पढ़ने वाले बच्चों को अनुदान।
17― सोलर एनर्जी के लिए सब्सिडी।
18― बागवानी के लिए सब्सिडी।
19― पंप चलाने हेतु डीजल में सब्सिडी।
20― खेतो में बिजली उपयोग पर सब्सिडी।
इसके अलावा
21― सूखा आए तो मुआवजा।
22― बाढ़ आए तो मुआवजा।
23― टिड्डी-कीट जैसे आपदा पर मुआवजा।
24― सरकार बदलते ही सभी तरह के कर्ज माफी।
25― सरकार ने किसानों को आत्मनिर्भर व सशक्त बनाने के लिए अनेकों और तरह की योजनाएं बनाई है, जिसमें डेयरी उत्पाद मत्स्य पालन बागवानी फल व सब्जी पर भी अनेकों प्रकार की सब्सिडी दे रही है।
और इसके अलावा
26― इन्हीं से 20 रुपए किलो गेहूं खरीद कर 2 रुपए किलो में इन्हें दिया जा रहा है।
27― पक्के मकान बनाने के लिए 3 लाख रुपए तक सब्सिडी दी जा रही है।
28― शौचालय निर्माण फ्री में किया जा रहा है।
29― घर पर गंदा पानी की निकासी के लिए होद फ्री में बनवाई जा रही है।
30― साफ पीने का पानी फ्री में दिया जा रहा है।
31― बच्चों को पढ़ने खेलने व अन्य तरह के प्रशिक्षण फ्री में करवाए जा रहे हैं।
32― साल के 6000 रुपए खाते में फ्री में आ रहे हैं।
33― तरह-तरह की पेंशन वगैरा आ रही है।
34― मनरेगा में बिना कार्य किए रुपए दिए जा रहे हैं।
अगर उसके बावजूद भी इस देश के किसानों को सरकार से अपना हक नहीं मिल रहा तो शायद कभी नहीं मिलेगा।
एक निगाह उन मजदूरों, छोटे रेहड़ी वालों, छोटे व्यवसायियों दुकानदार, वकीलों, डॉक्टर, ड्राइवर, सुरक्षा बल, pvt नौकरी वाले, पढ़े-लिखे बेरोजगारों, कचरा बीन कर पेट पालने वालों पर डालो।
रोज नई नई समस्या से जूझते हैं, रोज रोज मरते हैं परन्तु कभी भीड इकट्ठा कर क़ानून को बंधक नही बनाया ।
जिनके मन में नन्दलाल बसे, तिन और को नाम लियो न लियो ---
"जिनके मन में नन्दलाल बसे, तिन और को नाम लियो न लियो।
जिसने बृंदावन धाम कियो, तिन औनहु धाम कियो न कियो।" 





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पिछले कुछ समय में मेरे अनेक प्रियजन, असमय काल-कवलित हुये हैं| तीन माह पूर्व मेरे अतिप्रिय बड़े भाई साहब भी अचानक ही चले गए थे| जीवन का कोई भरोसा नहीं है| पता नहीं कौन सी साँस अंतिम हो| अतः हर समय भगवान का स्मरण करते रहना चाहिए|
मेरे बाल्यकाल और युवावस्था के मित्रों में से सिर्फ एक ही मित्र जीवित बचा है| वह भी रुग्ण चल रहा है| रामचरितमानस की ये पंक्तियाँ ही सांत्वना देती हैं ---
"सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेहुँ मुनिनाथ |
हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ||"
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गीता में भगवान कहते हैं :--
"जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य| तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि||२:२७||"
अर्थात् जन्मने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है; इसलिए जो अटल है अपरिहार्य - है उसके विषय में तुमको शोक नहीं करना चाहिये||
"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि |
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ||२:२२||"
जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही देही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है||
जीवात्मा सदा निर्विकार ही रहती है|
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कवि नाथुराम शास्त्री "नम्र" की लिखी यह प्रसिद्ध कविता आज याद आ रही है ---
"क्षणभंगुर - जीवन की कलिका,
कल प्रात को जाने खिली न खिली |
मलयाचल की शुचि शीतल मन्द,
सुगन्ध समीर मिली न मिली || 





कलि काल कुठार लिए फिरता,
तन नम्र से चोट झिली न झिली |
कहले हरिनाम अरी रसना,
फिर अन्त समय में हिली न हिली || 





मुख सूख गया रोते रोते,
फिर अमृत ही बरसाया तो क्या |
जब भव सागर में डूब चुके,
तब नाविक को लाया तो क्या || 





युगलोचन बन्द हमारे हुए,
तब निष्ठुर तू मुस्काया तो क्या |
जब जीवन ही न रहा जग मे,
तब आकर दरश दिखाया तो क्या || 





बली जाऊँ सदा इन नैनन की,
बलिहारी छटा पे में होता रहूँ |
मुझे भूले न नाम तुम्हारा प्रभु,,
जागृत या स्वप्न में सोता रहूँ || 





हरे कृष्ण ही कृष्ण पुकारूँ सदा,
मुख आँसुओ से नित धोता रहूँ |
बृजराज तुम्हारे बियोग में मैं,
बस यूँ ही निरन्तर रोता रहूँ || 





शाम भयी पर श्याम न आये,
श्याम बिना क्यों शाम सुहाये |
व्याकुल मन हर शाम से पूछे,
शाम बता क्यों श्याम न आये || 





शाम ने श्याम का राज बताया,
शाम ने क्योंकर श्याम को पाया |
शाम ने श्याम के रंग में रंग कर,
अपने आप को श्याम बनाया || 





वह पायेगा क्या रस का चस्का,
नहीं कृष्ण से प्रीत लगायेगा जो |
हरे कृष्ण उसे समझेगा वही,
रसिको के समाज में जायेगा जो || 





ब्रज धूरी लपेट कलेवर में,
गुण नित्य किशोर के गायेगा जो |
हँसता हुआ श्याम मिलेगा उसे,
निज प्राणों की बाजी लगायेगा जो || 





मन में बसी बस चाह यही,
प्रिय नाम तुम्हारा उचारा करूँ |
बिठला के तुम्हें मन मन्दिर में,
मनमोहिनी रूप निहारा करूँ ||





भर के दृग पात्र में प्रेम का जल,
पद पंकज नाथ पखारा करूँ |
बन प्रेम पुजारी तुम्हारा प्रभो,
नित आरती भव्य उतारा करूँ || 





जिनके मन में नन्दलाल बसे,
तिन और को नाम लियो न लियो |
जिसने बृंदावन धाम कियो,
तिन औनहु धाम कियो न कियो ||" 





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आप अब को सादर सप्रेम नमन !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !! 





कृपा शंकर
१० दिसंबर २०२०
भगवत्-प्राप्ति" (आत्म-साक्षात्कार) ही हमारा एकमात्र शाश्वत स्वधर्म है ---
"भगवत्-प्राप्ति" (आत्म-साक्षात्कार) ही हमारा एकमात्र शाश्वत स्वधर्म है।"
इसके अतिरिक्त अन्य सब परधर्म हैं।"
गीता में भगवान हमें स्वधर्म में ही स्थित रहने, को कहते हैं ---
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३:३५॥"
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हमारे सब दुःखों, कष्टों, और पीड़ाओं का एकमात्र कारण स्वधर्म से विमुखता है। अन्य कोई कारण नहीं है।
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सत्य को समझने/जानने की जिज्ञासा और उसे निज जीवन में व्यक्त करने की अभीप्सा शाश्वत है। सत्य ही परमात्मा है। भगवान सत्य-नारायण हैं। हम उन के साथ एक हों, यही हमारा धर्म है। यह धर्म ही इस सृष्टि को चला रहा है। यह ही सनातन-धर्म है। भारत की विराट एकता का आधार भी यह धर्म है।
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इस धर्म की पुनः प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण हो, इसके लिए हमें ईश्वर की सूक्ष्म दैवीय शक्तियों को साधना द्वारा जागृत कर उनकी सहायता लेनी ही होगी। भगवान हमारी सहायता करेंगे। हम अपनी चेतना को परमात्मा की अनंत चेतना से जोड़ कर उनके साथ एक होकर ही समष्टि की सर्वश्रेष्ठ सेवा कर सकेंगे। तभी असत्य का अंधकार दूर होगा।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० दिसंबर २०२३
Saturday, 7 December 2024
सनातन-धर्म के अतिरिक्त, अन्य मतों में आध्यात्म नहीं है ---
सनातन-धर्म के अतिरिक्त, अन्य मतों में आध्यात्म नहीं है। पहले देवों और असुरों में आपस में युद्ध होते थे। कभी देवता प्रबल हो जाते थे, कभी असुर। यह सृष्टि अंधकार और प्रकाश से बनी है। सृष्टि को चलाने के लिए दोनों आवश्यक हैं। कभी अंधकार प्रबल हो जाता है, कभी प्रकाश।
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आप अपने विवेक से निर्णय कीजिये कि सत्य और असत्य क्या हैं। सत्य को जानने की प्रबल शाश्वत जिज्ञासा ही धर्म है। भगवान ही एकमात्र सत्य हैं।
ऐसे ही धर्म और अधर्म क्या है? इस पर भी विचार कीजिये। जो हमें भगवान का साक्षात्कार करवा दे, वही धर्म है। जो हमें भगवान से दूर ले जाये वह अधर्म है।
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जो अधर्म हैं, वे एक आसुरी शक्ति के द्वारा चलाये जा रहे हैं, भगवान के द्वारा नहीं। एक असुर है जो असत्य का संचालन कर रहा है। उस असुर का होना भी सृष्टि संचालन के लिए आवश्यक है, लेकिन उसकी प्रबलता न्यूनतम हो।
इस प्रश्न पर विचार कीजिये कि मैं कौन हूँ? उस वास्तविक "मैं" की खोज ही भगवान की खोज है।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
७ दिसंबर २०२३
असुरों का शिकार होने से बचें ---
असुरों का शिकार होने से बचें ---
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सूक्ष्म-जगत में एक आसुरी सत्ता है जो संसार में अपने शिकार ढूंढ़ती रहती है। इसके शिकार सबसे पहिले अहंकारी और आत्म-मुग्ध व्यक्ति होते हैं। ऐसे लोग बहुत शीघ्र स्वयं असुर बन जाते हैं और दूसरों को भी बहुत अधिक हानि पहुंचाते हैं। ऐसे लोगों का मैं नाम नहीं लूँगा क्योंकि इससे मुझे बहुत अधिक हानि हो सकती है, कोई लाभ नहीं। ऐसे लोगों का नाम लेना भी उनको निमंत्रित करना है।
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आत्म मुग्धता (नार्सिसिस्ट पर्सनैलिटी डिसऑर्डर) -- एक मनोरोग और बहुत घातक मानसिक भटकाव है जो हमारी आध्यात्मिक साधना को तुरंत उसी समय बिल्कुल समाप्त कर देता है। इतना ही नहीं यह हमारे से मिलने-जुलने वाले लोगों को एक बार तो प्रभावित करता है, लेकिन बाद में उन को भी बहुत अधिक हानि पहुंचाता है।
आत्म-मुग्ध व्यक्ति की पहिचान यह है कि वह प्रशंसा का बहुत अधिक भूखा होता है, और स्वयं की बहुत अधिक प्रशंसा करता है। उसके लिए दूसरे सब व्यक्ति महत्वहीन होते हैं, और वह स्वयं सब से अधिक महत्वपूर्ण होता है।
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हमारे मन की पाँच अवस्थाएँ होती हैं -- क्षिप्त (विचलित), मूढ़ (सुस्त), विक्षिप्त (आंशिक रूप से केंद्रित), एकाग्र (एक-केंद्रित), और निरुद्ध (पूरी तरह से नियंत्रित)।
जो क्षिप्त, मूढ़ और विक्षिप्त होते हैं, उनसे आसुरी सत्ता बहुत प्रसन्न रहती है, दैवीय सत्ता नहीं। ऐसे लोगों के लिए आध्यात्मिक साधनाएं वर्जित हैं। ऐसे लोग ध्यान साधना न करें। अन्यथा वे असुरों का शिकार हो जाएँगे।
आध्यात्मिक साधना उन्हीं के लिए होती है जो एकाग्र और निरुद्ध होते हैं। इसी लिए योग सूत्रों में यम-नियमों पर इतना ज़ोर दिया गया है।
विस्तारभय से मैं इस विषय पर अधिक नहीं लिखना चाहता। समझदार को एक संकेत ही बहुत है। इस विषय पर अनेक दार्शनिकों ने बहुत कुछ लिखा है। ढूँढने से ऐसा साहित्य भी खूब मिल जाएगा। अन्यथा किसी ब्रहमनिष्ठ संत-महात्मा से मार्ग-दर्शन प्राप्त करें।
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमः शिवाय !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
७ दिसंबर २०२३
मेरा अभ्युदय और निःश्रेयस ही सारी सृष्टि का अभ्युदय और निःश्रेयस है ---
धर्म और राष्ट्र के उत्थान हेतु प्रत्येक सच्चे भारतीय को परमात्मा पर ध्यान के द्वारा अपनी दीनता और हीनता का परित्याग कर अपने निज देवत्व को जागृत करना होगा। हम अपनी क्षुद्रात्मा पर परिछिन्न माया के आवरण को साधना द्वारा हटा कर संकल्प करें कि ध्यान-साधना में अनुभूत ज्योतिर्मय नाद-ब्रह्म रूपी सर्वव्यापी कूटस्थ सूर्य मैं ही हूँ, जिसका पूर्ण प्रकाश, ज्योतियों की ज्योति - ज्योतिषांज्योति है। मेरे ही संकल्प से सम्पूर्ण संसार का विस्तार हुआ है। जब मैं सांस लेता हूँ तो सारा ब्रह्मांड साँस लेता है, जब मैं साँस छोड़ता हूँ, तब सम्पूर्ण ब्रह्मांड साँस छोड़ता है। मेरा अभ्युदय और निःश्रेयस ही सारी सृष्टि का अभ्युदय और निःश्रेयस है। परमात्मा की अनंतता और उससे परे जो कुछ भी है, वह मैं ही हूँ, यह नश्वर देह नहीं। मेरे से परे कुछ भी नहीं है। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
७ दिसंबर २०२१
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