Monday, 2 December 2024

मैं कौन हूँ? ---


यह सृष्टि परमात्मा की है, जिनका मैं शाश्वत आत्मा एक निमित्तमात्र उपकरण हूँ।

मेरा स्वधर्म क्या है, और उसे कैसे निभाना है, इसका मुझे पता है। इस जीवन के अंतकाल तक और उसके पश्चात भी मैं सदा सकारात्मक रूप से परमात्मा की चेतना में रहता हुआ उनके प्रकाश में वृद्धि ही करूँगा। इससे अधिक जो कुछ भी करना है वह मेरे प्रभु स्वयं करेंगे।
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मेरे प्रभु कोई व्यक्ति नहीं, यह अनंत विराट पूर्णता है जो स्वयं यह सृष्टि बन गए हैं। मुझे घेरे हुये मेरे हर ओर वे ही हैं। वे ही इन नासिकाओं से ली जा रही सांसें, इन आँखों की ज्योति, और इस हृदय की धडकन हैं। वे ही रक्त बनकर इस देह में बह रहे हैं। वे ही मेरे प्राण और मेरी चेतना हैं। मैं उनका एक संकल्प मात्र हूँ; सम्पूर्ण अस्तित्व वे ही हैं। .
जब परमात्मा को पाने की अभीप्सा और भक्ति जागृत हो जाये तब एकांत की निःस्तब्धता में भगवान से प्रार्थना कीजिये, निश्चित रूप से उत्तर मिलेगा। आपकी क्षमता और पात्रता के अनुसार भगवान मार्गदर्शन अवश्य करेंगे। यह स्वयं भगवान का आश्वासन है गीता में। अपनी श्रद्धा और विश्वास को बनाए रखें।
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ दिसंबर २०२२

परमात्मा की दिव्य चेतना में स्थित होने के लिए ---

 परमात्मा की दिव्य चेतना में स्थित होने के लिए ---

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प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में इस तरह उठो जैसे जगन्माता की गोद में सोया हुआ एक शिशु उठ रहा है। उठते ही भ्रूमध्य में सर्वव्यापी कूटस्थ ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करते हुये अपनी चेतना को सम्पूर्ण ब्रह्मांड में फैला दो, और संकल्प करो कि -- "मैं सर्वव्यापी, अनंत, विराट, और प्रेममय परमात्मा के साथ एक हूँ। मैं हर तरह से स्वस्थ और सम्पन्न हूँ। जो वे (परमात्मा) हैं, वो ही मैं हूँ।"
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थोड़ा उष:पान करो और शंकादि से निवृत होकर पुनश्च: एक घंटे के लिए ध्यान के आसन पर बैठ जाओ, और कूटस्थ सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम का ध्यान करो। पूरे दिन परमात्मा को अपने ध्यान में रखो। रात्री को सोने से पूर्व -- परमात्मा का पुनश्च: ध्यान करो और बड़ी शान से जगन्माता की गोद में इस तरह सो जाओ जैसे एक शिशु अपनी माँ की गोद में सोता है।
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कुछ ही दिनों की श्रद्धा, विश्वास और सत्यनिष्ठा से की गई साधना के उपरांत आप पर भगवान की कृपा होगी, जिस से आप स्वयं को परमात्मा के साथ एक पाएंगे। आपके जीवन में आनंद ही आनंद और मंगल ही मंगल होगा।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ दिसंबर २०२२

भविष्य के लिए मेरा क्या दृष्टिकोण है? ---

 (प्रश्न) : भविष्य के लिए मेरा क्या दृष्टिकोण है?

(उत्तर) : कुछ विशेष नहीं, क्योंकि मैं वर्तमान में जीवित हूँ।
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सम्पूर्ण विश्व में लोगों की रुचि सत्य-सनातन-धर्म में बढ़ती जा रही है। सनातन धर्म का जो स्वरूप भारतवर्ष में प्रचलित है, उसे हिन्दुत्व कहते हैं। निकट भविष्य में सनातन धर्म का वैश्वीकरण हो जाएगा। मनुष्य की (कु) बुद्धि ने जितनी विचारधाराएँ और मतवाद खड़े किए हैं, वे सब ध्वस्त हो जाएँगे। मनुष्य की विचारधारा यही चिंतन करेगी की धर्म और अधर्म क्या है।
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विश्व की जनसंख्या में भी कमी आएगी और मानव धर्म (सनातन) स्थापित होगा।
मुझे प्रेरणा यही मिल रही ही कि अब से समस्त जीवन भगवान को समर्पित कर दूँ। किसी तरह की पृथकता का बोध न रहे। अब से मेरी कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं है। सारा अवशिष्ट जीवन परमात्मा के ध्यान में कट जाएगा।
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सभी को मंगलमय शुभ कामनाएं। सभी का कल्याण हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ दिसंबर २०२३

वर्तमान में चर्चा के लिए अब कोई विषय ही नहीं बचा है ---

 वर्तमान में चर्चा के लिए अब कोई विषय ही नहीं बचा है ---

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समयाभाव के कारण अब से मैं किसी भी तरह की आध्यात्मिक साधना या उपासना की कोई बात किसी से भी नहीं करना चाहता। चर्चा के लिए कोई आध्यात्मिक विषय बचा ही नहीं है। अच्छे उन्नत साधकों से कभी यदि सत्संग हुआ तो उनके साथ सामूहिक रूप से सर्वव्यापी अनंत कूटस्थ ब्रह्म परमशिव का ध्यान ही करूंगा।
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वास्तव में मैं कोई साधना नहीं करता। मुझे निमित्त बनाकर भगवती स्वयं ही प्राणतत्व के रूप में परमशिव की साधना कर रही हैं। उन्होने ही पञ्चप्राणों, कर्मेन्द्रियों, ज्ञानेन्द्रियों, उनकी तन्मात्राओं व आत्मा को जीवंत कर रखा है। जिस दिन वे परमशिव से संयुक्त हो जाएंगी, उस दिन यह जीवन मुक्त हो जाएगा। वे भगवती भी अनेक रूपों में आती हैं। उनकी जय हो।
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भगवान की परम कृपा के बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है। भगवान ही स्वयं को कभी मातृरूप में, कभी पितृरूप में अपनी अनुभूति कराते रहते हैं। कई संत-महात्माओं की भी परम कृपा मुझ अकिंचन पर है। कई ऐसी माताएँ भी कृपा कर के मेरे संपर्क में रहती हैं जिनकी भक्ति अनुपम है। उनकी कोई बराबरी नहीं कर सकता। मैं अपनी सम्पूर्ण चेतना और अपना सम्पूर्ण अस्तित्व भगवान को समर्पित करता हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ दिसंबर २०२३

Saturday, 30 November 2024

अपने आवरण को हटाइये, मैं प्रतीक्षारत हूँ ---

 हे भगवन, हे परमात्मा, हे पुरुषोत्तम, आपको नमन !! आप के कूटस्थ सूर्यमण्डल का आवरण बहुत अधिक ज्योतिर्मय है, जिसका भेदन करने में मैं असमर्थ हूँ। आपके स्वरूप का बोध मुझ अकिंचन को नहीं हो रहा है। आप अपना दर्शन भी दो। मेरी अंतर्दृष्टि आपके ज्योतिर्मय आवरण का भेदन करने में असमर्थ है। मेरा चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान इस समय कुछ भी काम नहीं आ रहा है। हे सत्यस्वरूप, अपने आवरण को हटाइये, मैं प्रतीक्षारत हूँ। ॐ ॐ ॐ !!

कृपा शंकर
१ दिसंबर २०२४

"ॐ नमस्तुभ्यं नमो मह्यं तुभ्यं मह्यं नमोनमः। अहं त्वं त्वमहं सर्वं जगदेतच्चराचरम्॥" ---

 "ॐ नमस्तुभ्यं नमो मह्यं तुभ्यं मह्यं नमोनमः। अहं त्वं त्वमहं सर्वं जगदेतच्चराचरम्॥"

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हे परमात्मा, हे प्रभु, हे ईश्वर, -- मैं किस को नमन करूँ? तुम को नमन करूँ, या स्वयं को नमन करूँ? जो तुम हो वही मैं हूँ, और जो मैं हूँ वह ही तुम हो। मैं तुम्हें भी और स्वयं को भी, दोनों को ही नमन करता हूँ। दोनों में कोई भेद नहीं है।
ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति और आत्म-साक्षात्कार का यही मार्ग परमात्मा ने मुझे दिखाया है। यही उच्चतम ब्रह्मविद्या है, यही भूमा-विद्या है, और यही वेदान्त की पराकाष्ठा है।
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उपरोक्त स्तुति बड़ी ही विलक्षण है। यह स्तुति स्कन्दपुराण के दूसरे खण्ड (वैष्णवखण्ड, पुरुषोत्तमजगन्नाथमाहात्म्य) के सताइसवें अध्याय के पंद्रहवें श्लोक से आरंभ होती है। ब्रह्माजी यहाँ भगवान विष्णु की स्तुति कर रहे हैं। विष्णु के साथ साथ स्वयं को भी नमन कर रहे हैं, और यह भी कह रहे है कि जो तुम हो, वही मैं हूँ; जो मैं हूँ, वही तुम हो। अतः दोनों को नमन।
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मुमुक्षुगण के साथ, भविष्य में चर्चा केवल ब्रह्मज्ञान, ब्रह्मविद्या और वेदान्त की ही करेंगे, नहीं तो परमशिव की ही उपासना करेंगे। जिनकी ब्रह्मविद्या और ब्रह्मज्ञान में रुचि है वे ही मेरे साथ रहें।
हे अपारपारभूताय ब्रह्मरूप आपको नमन॥ ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
३० नवंबर २०२४

जन्म के साथ ही पूर्ण ज्ञान, पूर्ण भक्ति और पूर्ण वैराग्य हो ---

 जन्म के साथ ही पूर्ण ज्ञान, पूर्ण भक्ति और पूर्ण वैराग्य हो ---

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आध्यात्मिक सफलता के लिए ज्ञान, भक्ति और वैराग्य -- इन तीनों का होना बहुत आवश्यक है। इनमें से एक की भी कमी हो तो ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती। ज्ञान और भक्ति पर तो मैंने बहुत कुछ लिखा है, अब और लिखने की इच्छा नहीं है। जिस विषय पर इस समय लिखना चाहता हूँ, उसी पर लिख कर अपनी लेखनी को विराम देना चाहता हूँ।
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बिना प्रबल साहस के वैराग्य कभी सफल नहीं हो सकता। विरक्त होने के लिए दृढ़ इच्छा-शक्ति और अडिग साहस होना चाहिए। राग यानि मोह तो बिलकुल भी नहीं हो। हरेक व्यक्ति में कुछ न कुछ कमियाँ होती है, जिन्हें स्वीकार करने में संकोच नहीं करना चाहिए। मैं अपने अवगुण और गुण सभी को बहुत अच्छी तरह से समझता हूँ। अपनी सभी कमियों और अच्छाइयों का मुझे पता है, और उन्हें स्वीकार भी करता हूँ। इसी जन्म में ईश्वर और गुरु की कृपा से अपनी कमियों से मुक्ति भी पा लूँगा, इतना आत्म-विश्वास है।
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सन् १९८० से १९८५ ई. तक मुझे बहुत गहरा वैराग्य हुआ था, लेकिन निम्न तीन कारणों से वैराग्य पूर्णतः फलीभूत नहीं हो सका, और सफलता नहीं मिली ---
(१) जितना साहस चाहिए था, उतना साहस मैं नहीं जुटा सका।
(२) मोह से जितनी मुक्ति चाहिये थी, वह भी कभी नहीं मिली।
(३) जिह्वा के स्वाद और नींद पर कभी विजय न पा सका।
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संभवतः पूर्वजन्मों में उतने अच्छे कर्म नहीं किए, जितने करने चाहिये थे। इसी लिए ये कमियाँ रहीं। भगवान से प्रार्थना है कि यदि वे मुझे फिर कभी मनुष्य योनि में जन्म दें (जो बहुत दुर्लभ है) तो जन्म के साथ ही पूर्ण ज्ञान, पूर्ण भक्ति और पूर्ण वैराग्य हो। गुरुकृपा पूर्णत: फलीभूत हो।
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इस जन्म में भगवान की कृपा से मुझमें एक ही गुण था, जिससे मुझे सबसे अधिक लाभ हुआ। वह गुण था -- "अभीप्सा", यानि भगवान को पाने की एक अति अति प्रबल प्यास और तड़प। इसके अतिरिक्त अन्य कोई गुण मुझमें नहीं था। इस गुण का यह लाभ हुआ कि मैंने अनगिनत बहुत सारे ग्रन्थों का स्वाध्याय किया जिससे बौद्धिक स्तर पर किसी भी तरह की कोई शंका नहीं रही। ईश्वर की बहुत अधिक कृपा मुझ अकिंचन पर रही, जिस के कारण अनेक महान आत्माओं से सत्संग लाभ हुआ जो मनुष्य जीवन में अति दुर्लभ है।
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अब और कुछ लिखने को नहीं है। मैं अपने विचारों पर बहुत दृढ़ हूँ, जो बदल नहीं सकते। जैसे काली कंबल पर दूसरा कोई रंग नहीं चढ़ सकता वैसे ही मुझ पर भी कोई दूसरा रंग नहीं चढ़ सकता। मुझे सुधारने के लिए वीडियो आदि न भेजें, और न ही किन्हीं समूहों में सम्मिलत होने का आग्रह करें। मैं व्यक्तिगत रूप से हर किसी से नहीं मिलता। मैं उन्हीं से मिलता हूँ जिनके हृदय में भगवान को पाने की अभीप्सा यानि एक प्रबल प्यास और तड़प है।
मेरी परिचित और अपरिचित सभी महान आत्माओं को मैं नमन करता हूँ। मैं आप सब के साथ एक हूँ। आपमें और मुझमें कोई भेद नहीं है।
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ दिसंबर २०२३