आज से चार वर्ष पूर्व १४ सितंबर २०२० को इस क्षेत्र के प्रसिद्ध नेत्र शल्य चिकित्सक, रा.स्व.से.संघ के सीकर विभाग के संघ चालक, सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता, और समाज में अति लोकप्रिय, मेरे बड़े भाई साहब डॉ. दया शंकर बावलिया जी सायं लगभग ८ बजे जयपुर के E.H.C.C. हॉस्पिटल में जहाँ उनका उपचार चल रहा था, अपनी नश्वर देह को त्याग कर एक अज्ञात अनंत यात्रा पर चले गये। आज के दिन यानि १५ सितंबर २०२० को उनकी देह का अंतिम संस्कार झुंझुनूं के बिबाणी धाम श्मशान गृह में कोविड-१९ के कारण तत्कालीन सरकारी नियमानुसार कर दिया गया था। भगवान अर्यमा की कृपा से निश्चित रूप से उन्हें सद्गति प्राप्त हुई है। आज उनकी पुण्य तिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा हूँ।
Monday, 16 September 2024
बड़े भाई साहब स्व. डॉ. दया शंकर बावलिया जी की वार्षिक पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि ---
भगवान ने कभी भी मुझे अंधकार में नहीं रखा ---
आध्यात्मिक साधना में कई बार ऐसे दुरूह प्रश्न हमारे समक्ष आते हैं जिनका कोई उत्तर नहीं होता। उनका उत्तर ढूँढने में समय नष्ट नहीं करना चाहिये। कोई भी उलझन हो तो प्रत्यक्ष परमात्मा से पूछें, न कि किसी अन्य से। आज तक किसी भी आध्यात्मिक विषय पर भगवान से जो कुछ भी मैनें पूछा है, उसका उत्तर मुझे निश्चित रूप से मिला है। भगवान ने कभी भी मुझे अंधकार में नहीं रखा। लेकिन उत्तर सिर्फ आध्यात्मिक विषयों के ही मिले हैं, किसी लौकिक विषय पर नहीं।
अपने दिन का आरंभ और समापन, परमात्मा के गहनतम ध्यान से करें, और हर समय परमात्मा का स्मरण करते रहें :---
जहाँ तक भगवान के ध्यान का प्रश्न है, इस विषय पर मैं किसी से भी किसी भी तरह का कोई समझौता नहीं कर सकता। यही मेरा जीवन है, और मेरा समय नष्ट करने वालों को मैं विष (Poison) की तरह इसी क्षण से दूर कर रहा हूँ। तमाशवीन और केवल जिज्ञासु लोगों के लिए भी मेरे पास जरा सा भी समय नहीं है।







पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म क्या हैं? ---
सर्वप्रथम भगवान हमारा आत्म-समर्पण सचेतन रूप से बिना किसी शर्त के पूर्ण रूप से स्वीकार करें, और स्वयं को हमारे में सचेतन पूर्ण रूप से व्यक्त करें। बाकी की बातें जैसे धर्म-अधर्म और पाप-पुण्य --- ये सब गौण, महत्वहीन व छलावा मात्र हैं। इस छलावे में अब और नहीं आ सकते। वे कब तक छिपेंगे ?? प्रकट तो उनको होना ही पड़ेगा। आज नहीं तो कल। लेकिन अब और अधिक प्रतीक्षा नहीं कर सकते। हमें उनकी आवश्यकता अभी और इसी समय है।
Saturday, 14 September 2024
भूमा ही सुख है, अल्प में सुख नहीं है ---
अन्तःकरण पर कभी कभी हमारा कोई अधिकार नहीं रहता। कूटस्थ में सर्वव्यापी पुरुषोत्तम की चेतना में सब कुछ खो जाता है। सांस लेते हैं तो सारी सृष्टि हमारे साथ सांस लेती है। ध्यान करते हैं तब सारी सृष्टि हमारे साथ ध्यान करती है। कोई भी या कुछ भी हमारे से पृथक नहीं रहता। क्या इसे ही 'अपरोक्षानुभूति' कहते है?
जीवन में हम एक-दूसरे के रूप में स्वयं से ही मिलते रहते हैं ---
>>> जीवन में हम एक-दूसरे के रूप में स्वयं से ही मिलते रहते हैं। हम सब में जो व्यक्त है, वही परमात्मा है। हम उन के साथ एक हैं।
>>> परमात्मा का ध्यान और उससे प्राप्त आनंद सर्वोच्च सत्संग है।