Saturday, 14 September 2024

जीवन में हम एक-दूसरे के रूप में स्वयं से ही मिलते रहते हैं ---

 >>> जीवन में हम एक-दूसरे के रूप में स्वयं से ही मिलते रहते हैं। हम सब में जो व्यक्त है, वही परमात्मा है।  हम उन के साथ एक हैं।

>>> परमात्मा का ध्यान और उससे प्राप्त आनंद सर्वोच्च सत्संग है।

>>> सूक्ष्म देह में मेरुदंडस्थ सुषुम्ना नाड़ी ही पूजा की वेदी और मंडप है, जहाँ भगवान वासुदेव स्वयं बिराजमान हैं।
>>> सहस्त्रार-चक्र में दिखाई दे रही ज्योति "विष्णुपद" है। इसका ध्यान -- गुरु-चरणों का ध्यान है। इसमें स्थिति -- श्रीगुरुचरणों में आश्रय है।
>>> कुंडलिनी महाशक्ति का सहस्त्रार और ब्रह्मरंध्र से भी ऊपर उठकर अनंत महाकाश से परे परमशिव से स्थायी मिलन जीवनमुक्ति और मोक्ष है। यही अपने सच्चिदानंद रूप में स्थित हो जाना है।
>>> जब यह दृढ़ अनुभूति हो जाये कि मैं यह भौतिक शरीर नहीं, एक शाश्वत आत्मा हूँ, उसी समय हमारा स्वयं का पिंडदान हो जाता है। मूलाधारस्थ कुंडलिनी "पिंड" है। गुरु-प्रदत्त विधि से बार-बार कुंडलिनी महाशक्ति को मूलाधार-चक्र से उठाकर सहस्त्रार में भगवान विष्णु के चरण-कमलों (विष्णुपद) में अर्पित करना यथार्थ "पिंडदान" है। इसे श्रद्धा के साथ करना स्वयं का श्राद्ध है।
>>> अपने सच्चिदानंद रूप में स्थित हो जाना मोक्ष है। परब्रह्म ही जीव और जगत् के सभी रूपों में व्यक्त है। वही जीवरूप में भोक्ता है और वही जगत रूप में भोग्य।
>>> आत्मा शाश्वत है। जीवात्मा अपने संचित व प्रारब्ध कर्मफलों को भोगने के लिए बार-बार पुनर्जन्म लेती है। मनुष्य जीवन का लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति है। जब तक ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती तब तक संचित और प्रारब्ध कर्मफलों से कोई मुक्ति नहीं है। ये सनातन नियम हैं जो इस सृष्टि को चला रहे हैं। यह हमारा सनातन धर्म है।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१४ सितंबर २०२३

Thursday, 12 September 2024

बांग्लादेश और बंगाल की समस्या का एकमात्र स्थायी समाधान ----- कूटनीतिक और सैनिक हस्तक्षेप द्वारा बांग्लादेश का विभाजन भारत को करना ही होगा। अन्य कोई समाधान नहीं है --

बांग्लादेश का उत्तरी भाग हिंदुओं को, और दक्षिणी भाग मुसलमानों को मिले। जितना भयंकर नरसंहार हिन्दुओं का हुआ है, और जितना भयंकर पाशविक अत्याचार हिन्दू महिलाओं पर हुआ है, उसके पश्चात किसी भी तरह का भाईचारा उन नरपिशाचों के साथ संभव नहीं है। बांग्लादेश का विभाजन ही एकमात्र विकल्प है, जो शीघ्रातिशीघ्र कर देना चाहिए। यह भारत की सुरक्षा के लिए भी आवश्यक है।

वे सब नरपिशाच जो बांग्लादेश में हिंदुओं का नरसंहार और हिन्दू महिलाओं व बच्चियों के साथ दुराचार कर रहे हैं, प्रकृति उन्हें कभी क्षमा नहीं करेगी। उनका सर्वनाश होगा। वहाँ की घटनाओं से पूरे विश्व का हिन्दू समाज और पूरा भारत क्षुब्ध और आहत है। जो इस घटना पर मौन और तटस्थ हैं वे भी दंड के भागी होंगे। .
बांग्लादेश और बंगाल की समस्या का एकमात्र स्थायी समाधान :---
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इसके लिए बहुत बड़ा राजनीतिक, कूटनीतिक और सैनिक साहस चाहिए जो हमारे सौभाग्य से हमारी वर्तमान केंद्र सरकार में है। हमें बहुत बड़ा कदम उठाना पड़ेगा। बंगाल और बांग्लादेश दोनों का नीचे बताए हुये अनुसार विभाजन करना पड़ेगा।
(1) सर्वप्रथम बंगाल का विभाजन दो भागों में करना होगा उत्तरी बंगाल और दक्षिणी बंगाल।
बंगाल के दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, कूचबिहार, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, और मालदा --- इन छह जिलों को बंगाल से पृथक कर एक केंद्र शासित राज्य बनाना होगा।
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बाकी तेरह जिले -- मुर्शिदाबाद, वीरभूम, पुरुलिया, बांकुड़ा, बर्धमान, नादिया, हुगली, हावड़ा, पश्चिमी मिदिनापुर, पूर्वी मिदिनापुर, उत्तर चौबीस परगना, दक्षिण चौबीस परगना, और कोलकाता -- इन सब को मिलाकर वर्तमान बंगाल राज्य हो।
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(2) बांग्लादेश के रंगपुर और राजशाही -- इन दो जिलों का सीमावर्ती भूभाग अधिग्रहण कर इनमें बांग्लादेश के हिंदुओं को बसाया जाये। इस भूभाग को बंगाल के केंद्र शासित राज्य में मिला दिया जाये। इससे भारत की सामरिक स्थिति भी बहुत अधिक मजबूत हो जाएगी। चिकननेक का क्षेत्र बहुत मजबूत हो जाएगा और आसाम से आना-जाना भी बहुत अधिक आसान हो जाएगा।
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(3) बहुत दृढ़ राजनीतिक निर्णय लेकर सारे रोहिंगिया और अवैध रूप से आए बांग्लादेशियों को पकड़ पकड़ कर भारत से बाहर निकाल दिया जाये।
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बांग्लादेश और बंगाल की समस्या यही स्थायी समाधान मेरे दिमाग में आता है। अन्य कोई समाधान नहीं है। ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
८ अगस्त २०२४

भक्त या साधक होने का भाव एक अहंकार है ---

 हम निमित्त मात्र ही हो सकते हैं, कर्ता और भोक्ता केवल परमात्मा हैं।

गीता में भगवान कहते है --
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व, जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव, निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥११:३३॥"
भावार्थ -- इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो॥ (बायें हाथसे भी बाण चलानेका अभ्यास होनेके कारण अर्जुन सव्यसाची कहलाता है।)
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मेरे पाठकों में सब प्रबुद्ध विद्वान मनीषी हैं जो वेदान्त-दर्शन और भक्ति को अच्छी तरह समझते हैं। अतः मुझे कुछ और कहने की आवश्यकता नहीं है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ अगस्त २०२४
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(१) भगवान का स्मरण हर समय कैसे करें? (२) समभाव में स्थिति कैसे हो?

 उपरोक्त प्रश्न सबसे अधिक कठिन प्रश्न हैं। समत्व में स्थिति तो श्रीमद्भगवद्गीता का सार है। भगवान वासुदेव को नमन करता हुआ मैं अकिंचन अपनी अत्यल्प बुद्धि से इस विषय में प्रवेश करता हूँ। भगवान वासुदेव मेरे चैतन्य में, मेरे हृदय में सर्वदा स्थित रहें।

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हमारे जीवन के अंतिम काल यानि मृत्यु के समय की भावना ही पुनर्जन्म का कारण होती है, इसलिए गीता में भगवान श्रीकृष्ण हमें हर समय भगवान का स्मरण करते हुए साथ-साथ शास्त्राज्ञानुसार स्वधर्मरूप युद्ध भी करने का आदेश देते हैं। भगवान कहते हैं कि इस प्रकार मुझ वासुदेव में जिसके मन-बुद्धि अर्पित हैं, वे उनके ही यथाचिन्तित स्वरूप को ही प्राप्त होंगे; इसमें संशय नहीं है --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् -- इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
Therefore meditate always on Me, and fight; if thy mind and thy reason be fixed on Me, to Me shalt thou surely come.
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भगवान ने यह नहीं कहा कि दिन में दो-ढाई घंटे मेरा स्मरण करना और बाकी समय संसार का काम करना। भगवान ने कहा है कि जो व्यक्ति समभाव को प्राप्त है, वह हर समय मुझे उपलब्ध है --
"जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥६:७॥"
अर्थात् -- शीत-उष्ण, सुख-दु:ख तथा मान-अपमान में जो प्रशान्त रहता है, ऐसे जितात्मा पुरुष के लिये परमात्मा सम्यक् प्रकार से स्थित है, अर्थात्, आत्मरूप से विद्यमान है॥
The Self of him who is self-controlled, and has attained peace is equally unmoved by heat or cold, pleasure or pain, honour or dishonour.
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आचार्य शंकर अपने भाष्य में कहते हैं -- जिस ने मन-इन्द्रिय आदि के संघातरूप इस शरीर को अपने वश में कर लिया है, और जो प्रशान्त है, जिसका अन्तःकरण सदा प्रसन्न रहता है, उस को भली प्रकार से सर्वत्र परमात्मा प्राप्त है; अर्थात् वह साक्षात् आत्मभाव से विद्यमान है। वह सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख एवं मान और अपमान में यानी पूजा और तिरस्कार में भी (सम हो जाता है)॥
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उपरोक्त स्थिति को प्राप्त करने के लिए हमें तप करना होगा, यानि साधना करनी होगी। हमें शरीर, मन और बुद्धि के द्वन्द्वों से ऊपर उठ कर अद्वय होना होगा। भगवान कहते हैं --
"इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः॥५:१९॥"
अर्थात् -- जिनका अन्तःकरण समता में स्थित है, उन्होंने इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार को जीत लिया है; ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिये वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।
Even in this world they conquer their earth-life whose minds, fixed on the Supreme, remain always balanced; for the Supreme has neither blemish nor bias.
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परमात्मा से भिन्न स्वयं को समझना अज्ञान है। भगवान से भिन्न विषयों का चिंतन भी हमारे दुःखों का कारण है। गीता में भगवान कहते हैं --
"ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥२:६२॥"
"क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥२:६३॥"
अर्थात् - विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उसमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से इच्छा और इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है॥
क्रोध से उत्पन्न होता है मोह और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति के भ्रमित होने पर बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश होने से वह मनुष्य नष्ट हो जाता है॥
When a man dwells on the objects of sense, he creates an attraction for them; attraction develops into desire, and desire breeds anger.
Anger induces delusion; delusion, loss of memory; through loss of memory, reason is shattered; and loss of reason leads to destruction.
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संसार की वस्तुओं में दोष नहीं है, दोष तो उनके चिंतन में है। मनुष्य जीवन भर अपनी इच्छाओं के पीछे भागता रहता है। इच्छाओं की पूर्ति का सारा श्रेय मनुष्य स्वयं लेता है, और जब इच्छा की पूर्ति नहीं होती तब दोष भगवान को देने लगता है। कामनाएँ कभी पूर्ण नहीं होतीं।
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अपने दिन का आरंभ भगवान के ध्यान से करें। इस तरह से उठें जैसे जगन्माता की गोद में से सो कर उठ रहे हैं। प्रातः उठते ही लघुशंका आदि से निवृत होकर एक कंबल के आसन पर कमर सीधी रखते हुए पूर्व दिशा की ओर मुंह कर के बैठ जाएँ। आपको हठयोग के जितने भी प्राणायाम आते हैं, थोड़ी देर वे सब प्राणायाम करें। फिर अपनी गुरुपरंपरानुसार भगवान का गहनतम ध्यान करें।
रात्रि को सोने से पहिले भगवान का गहनतम ध्यान अपनी गुरुपरंपरानुसार कर के सोएँ। इस भाव से निश्चिंत होकर सोएँ जैसे जगन्माता की गोद में सो रहे हैं।
पूरे दिन भगवान को अपनी स्मृति में रखे। यह भाव रखें कि भगवान ही आपके माध्यम से सारा कार्य कर रहे हैं। जब भूल जाएँ तब याद आते ही भगवान का स्मरण फिर से करना आरंभ कर दें। गीता के निम्न ५ श्लोकों को एक बार समझ लें --
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥६:२४॥"
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥६:२५॥"
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥६:२६॥"
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥६:२९॥
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥ श्रीमते रामचंद्राय नमः॥
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१२ सितंबर २०२३

Tuesday, 10 September 2024

भगवान को पाने की कामना ही भगवान की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधक है ---

मेरी बात आपको बुरी लग सकती है, लेकिन सत्य है। भगवान तो मिले हुए हैं, वे ही सारा अस्तित्व हैं, वे कहीं दूर नहीं हैं, फिर किसको पाने की कामना कर रहे हो? यह कामना ही सबसे बड़ा धोखा है। वे निकटतम से भी अधिक निकट और प्रियतम से भी अधिक प्रिय हैं।

हर समय हम साँस लेते हैं। जिस वायु को हम ग्रहण कर रहे हैं, वह वायु भी परमात्मा है। जो साँसें ले रहा है और छोड़ रहा है, वह भी परमात्मा है। प्यास परमात्मा को ही लगती है। हमारे कुछ होने का भ्रम सबसे बड़ा धोखा है। प्यास लगने पर जो जल हम पीते हैं वह जल भी परमात्मा है और पीने वाला भी परमात्मा है। भूख किसको लगती है? परमात्मा को। जो भोजन है वह परमात्मा है, और उसे ग्रहण करने वाला भी परमात्मा है। जो हमारे इस देह का, और समस्त सृष्टि का संचालन कर रहा है, वह परमात्मा ही है। जो कुछ भी खुली व बंद आँखों से हमें दिखाई दे रहा है, वह सब परमात्मा है। विष्णु-सहस्त्रनाम का आरंभ ही कहता है -
"ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥१॥"
जिसका यज्ञ और आहुतियों के समय आवाहन किया जाता है उसे वषट्कार कहते हैं। भूतभव्यभवत्प्रभुः का अर्थ भूत, वर्तमान और भविष्य का स्वामी होता है। सब जीवों के निर्माता को भूतकृत् कहते हैं, और सभी जीवों के पालनकर्ता को भूतभृत्। आगे कुछ बचा ही नहीं है। "ॐ विश्वं विष्णु: ॐ ॐ ॐ" --- बस इतना ही पर्याप्त है पुरुषोत्तम के गहरे ध्यान में जाने के लिए।
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नित्य प्रातः उठते ही भगवान मुझे पकड़ लेते हैं। उनकी पकड़ से छूटना असंभव है। भगवान से नहीं लड़ सकता, इसलिए उनको आत्म-समर्पण कर रहा हूँ। अपनी लड़ाई वे स्वयं लड़ें।
लोग कहते हैं कि भगवान हमारे हृदय में हैं। लेकिन हमारा हृदय कहाँ है? भगवान की ज्योति ही मेरा हृदय है। जहां जहां भी भगवान की ज्योति दिखाई देती हैं, वहीं मेरा हृदय है। कभी कभी वह ज्योति सर्वत्र होती है, तो मैं भी सर्वत्र हूँ। वह ज्योति ही भगवान के चरण-कमल है, जिनमें ही मेरा आश्रय है।
अन्य कुछ भी इस समय चर्चा का विषय नहीं है। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ सितंबर २०२४

भगवान का ध्यान कैसे करें? (अति अति महत्वपूर्ण लेख)

इस प्रश्न का उत्तर बड़ा कठिन है। श्रुति भगवती तो किन्हीं श्रौत्रीय ब्रह्मनिष्ठ आचार्य की शरण में जाने को कहती हैं। श्रौत्रीय ब्रह्मनिष्ठ आचार्य की शरण तो लेनी ही होगी। उसके बिना काम नहीं चलेगा। श्रुति-भगवती जो कहती है, वही प्रमाण है, जिसके विरुद्ध कुछ भी कहने का किसी को भी अधिकार नहीं है।

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हठयोग का ज्ञान भी उतना ही आवश्यक है जितना राजयोग का। हठयोग के उपलब्ध मूल ग्रंथ तीन हैं। बाकी सब उन्हीं का विस्तार है। हठयोग के तीनों ग्रंथ बाजार में धार्मिक पुस्तकों की हर बड़ी दुकान में मिल जाएँगे। वे है -- "घेरण्ड-संहिता", "शिव-संहिता", और "हठयोग-प्रदीपिका"।
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योगसाधना का ज्ञान वैदिक है, जिसका आरंभ कृष्ण-यजुर्वेद से होता है। कृष्ण-यजुर्वेद का "श्वेताश्वतरोपनिषद" योग-साधना का आरंभिक मूल ग्रंथ है। इस उपनिषद के छओं अध्यायों में जगत के मूल कारण, ॐकार-साधना, परमात्मतत्त्व से साक्षात्कार, ध्यानयोग, योग-साधना, जगत की उत्पत्ति, संचालन और विलय का कारण, विद्या-अविद्या, जीव की नाना योनियों से मुक्ति के उपाय, ज्ञानयोग और परमात्मा की सर्वव्यापकता का वर्णन किया गया है। यह भी हर घर में रखने योग्य ग्रंथ है।
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महर्षि पातंजलि का "योगदर्शन" राजयोग का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है। स्वामी ओमानन्द तीर्थ ने इस पर "पातंजलयोगप्रदीप" नाम से जो भाष्य लिखा है वह सबसे अधिक प्रसिद्ध और लोकप्रिय हुआ है। इसे गीताप्रेस गोरखपुर ने छापा है व उनकी सभी दुकानों पर उपलब्ध है। इसे पढ़ने की अनुशंसा मैं सभी से करता हूँ। यदि आप नहीं समझ सकें तो इसमें मेरा कोई दोष नहीं होगा। लेकिन घर में रखने योग्य ग्रंथ अवश्य है।
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वैसे तो सारे ही उपनिषद -- योग और ब्रह्मज्ञान के ग्रंथ हैं, लेकिन श्रीमद्भगवद्गीता सारे उपनिषदों का सार है। श्रीमद्भगवद्गीता -- योग शास्त्रों का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है। इसे भी समझाने वाला कोई आचार्य चाहिये। अनेक स्वनामधन्य आचार्यों ने इस पर भाष्य लिखे हैं। आप अपनी रुचि के अनुसार इसके कम से कम दो भाष्य स्वाध्याय के लिए अपने पास रखिए।
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योगमार्ग में सबसे पहली दीक्षा "हंसः योग" (अजपा-जप) की दी जाती है। रामचरितमानस में इसके बारे में लिखा है --
"सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥
आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥"
भावार्थ - 'सोऽहमस्मि' (वह ब्रह्म मैं हूँ) यह जो अखंड (तैलधारावत कभी न टूटने वाली) वृत्ति है, वही (उस ज्ञानदीपक की) परम प्रचंड दीपशिखा (लौ) है। (इस प्रकार) जब आत्मानुभव के सुख का सुंदर प्रकाश फैलता है, तब संसार के मूल भेद रूपी भ्रम का नाश हो जाता है॥
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इस दीक्षा के पश्चात आचार्य द्वारा ओंकार-साधना, ध्यान, और सूक्ष्म-प्राणायामों की दीक्षा दी जाती है जिन से कुंडलिनी जागृत होती है। यह मार्ग छुरे की धार के समान तीक्ष्ण है। कृष्ण यजुर्वेद का कठोपनिषद इसे -- "क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति', बताता है, अतः श्रौत्रीय ब्रहमनिष्ठ आचार्य का मार्गदर्शन और संरक्षण अति अति आवश्यक है। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर बावलिया मुद्गल
झुंझुनूं (राजस्थान)
१० सितंबर २०२४
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पुनश्च: --- जो निज जीवन में योग मार्ग का अवलंबन करना चाहते हैं, उन्हें उपनिषदों व श्रीमद्भगवद्गीता का स्वाध्याय तो करना ही होगा। श्रीमद्भगवद्गीता सभी उपनिषदों का सार है। जीवन में किन्हीं ब्रह्मनिष्ठ और श्रौत्रीय (जिन्हें श्रुतियों यानि वेदों का ज्ञान हो) गुरु का लाभ होना आवश्यक है। जब तक गुरु नहीं मिले तब तक भगवान श्रीकृष्ण को या भगवान शिव को ही गुरु मानिए।
गुरुकृपा से मुझे तो गीता का शंकर भाष्य समझ में आ जाता है, लेकिन इसे समझना सभी के लिए संभव नहीं है। अन्य भी अनेक महान आचार्यों के लिखे हुए भाष्य हैं, जो हिन्दी भाषा में भी उपलब्ध है ---
आजकल चिन्मय मिशन के द्वारा प्रकाशित स्वामी चिन्मयानंद का भाष्य बहुत लोकप्रिय है। यह हिन्दी में भी उपलब्ध है।
परमहंस योगानन्द का लिखा भाष्य "God Talks With Arjuna - The Bhagavad Gita" भी पूरे विश्व में बहुत अधिक प्रसिद्ध है। यह दो खंडों में है।
उनके एक अमेरिकन शिष्य स्वामी क्रियानंद का लिखा भाष्य "The Essence of Bhagavadgita" नामक भाष्य भी पश्चिमी जगत में बहुत लोकप्रिय है। उपरोक्त दोनों हिंदी में भी उपलब्ध है।
पिछली शताब्दी में वाराणसी के स्वामी प्रणवानन्द जी ने "प्रणवगीता" नामक भाष्य छपवाया था जो अभी भी उपलब्ध है और बहुत लोकप्रिय है।
बिहार के महान बंगाली योगी श्रीमत् भूपेंद्रनाथ सान्याल महाशय का तीन खंडों में लिखा गीता भाष्य बहुत विस्तृत और शानदार है। हरेक घर में यह होना चाहिए।
लखनऊ के रामतीर्थ मिशन ने भी हिन्दी भाषा में गीता का एक बहुत शानदार भाष्य छपवाया था। पता नहीं वह अभी प्रकाशन में है या नहीं। यदि उपलब्ध है तो खरीद लेना चाहिए। बहुत अच्छा है।
पुराने जमाने के भी बहुत सारे भाष्य हैं जो मूल रूप से संस्कृत में है। उन के हिन्दी अनुवाद समझ में नहीं आते।
अभ्यास करते करते भगवान का ध्यान हमारा स्वभाव बन जाता है। इसका अभ्यास दीर्घ काल तक करना पड़ता है। हमारे कर्म अच्छे होंगे तो हमारे जीवन में निश्चित रूप से किन्हीं श्रौत्रीय (जिन्हें श्रुतियों यानि वेदों का ज्ञान हो) गुरु का पदार्पण होगा। तब तक भगवान श्रीकृष्ण को ही अपना गुरु मानिये।
जो तंत्रमार्ग की साधना करते हैं, वे भगवान शिव को अपना गुरु मानें।
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