Tuesday, 27 August 2024

बांग्लादेश और बंगाल की समस्या का एकमात्र स्थायी समाधान :---

इसके लिए बहुत बड़ा राजनीतिक, कूटनीतिक और सैनिक साहस चाहिए जो हमारे सौभाग्य से हमारी वर्तमान केंद्र सरकार में है। हमें बहुत बड़ा कदम उठाना पड़ेगा। बंगाल और बांग्लादेश दोनों का नीचे बताए हुये अनुसार विभाजन करना पड़ेगा।
(1) सर्वप्रथम बंगाल का विभाजन दो भागों में करना होगा उत्तरी बंगाल और दक्षिणी बंगाल।
बंगाल के दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, कूचबिहार, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, और मालदा --- इन छह जिलों को बंगाल से पृथक कर एक केंद्र शासित राज्य बनाना होगा।
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बाकी तेरह जिले -- मुर्शिदाबाद, वीरभूम, पुरुलिया, बांकुड़ा, बर्धमान, नादिया, हुगली, हावड़ा, पश्चिमी मिदिनापुर, पूर्वी मिदिनापुर, उत्तर चौबीस परगना, दक्षिण चौबीस परगना, और कोलकाता -- इन सब को मिलाकर वर्तमान बंगाल राज्य हो।
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(2) बांग्लादेश के रंगपुर और राजशाही -- इन दो जिलों का सीमावर्ती भूभाग अधिग्रहण कर इनमें बांग्लादेश के हिंदुओं को बसाया जाये। इस भूभाग को बंगाल के केंद्र शासित राज्य में मिला दिया जाये। इससे भारत की सामरिक स्थिति भी बहुत अधिक मजबूत हो जाएगी। चिकननेक का क्षेत्र बहुत मजबूत हो जाएगा और आसाम से आना-जाना भी बहुत अधिक आसान हो जाएगा।
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(3) बहुत दृढ़ राजनीतिक निर्णय लेकर सारे रोहिंगिया और अवैध रूप से आए बांग्लादेशियों को पकड़ पकड़ कर भारत से बाहर निकाल दिया जाये।
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बांग्लादेश और बंगाल की समस्या यही स्थायी समाधान मेरे दिमाग में आता है। अन्य कोई समाधान नहीं है। ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
८ अगस्त २०२४

भगवती बाला त्रिपुर सुंदरी को नमन --

 भगवती बाला सुंदरी की साधना भगवती के बाल रूप की मोक्षदायिनी साधना है।

यह तंत्र की दस महाविद्याओं में से एक, अति अति गोपनीय साधना है जिसका ज्ञान दण्डी-सन्यासियों और नाथ संप्रदाय के सिद्ध योगियों से ही प्राप्त हो सकता है। वे भी किसी की पात्रता देखकर सुपात्र को ही यह विद्या प्रदान करते हैं। यह एक दुधारी तलवार है जिससे शत्रु का संहार भी हो सकता है, और स्वयं का सिर भी काटा जा सकता है।
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इसे ही "श्रीविद्या" भी कहते हैं। सृष्टि का कोई भी वैभव, और मोक्ष इनकी साधना से प्राप्त हो सकता है। यदि आप ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर सकते, और सदाचारी नहीं हैं तो इसे भूल जाएँ। यह साधना फिर आपके लिए नहीं है। यह साधना दिखने में ही सौम्य है, लेकिन वास्तव में बहुत ही अधिक उग्र है।
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इनका वर्णन श्रीब्रह्मांडपुराण के उत्तर खंड में भगवान विष्णु के अवतार श्रीहयग्रीव और अगस्त्य ऋषि के मध्य संवाद के रूप में है। भगवती श्रीललिता महात्रिपुरसुंदरी की साधना का क्रम होता है। पहले उनकी साधना बाल रूप में एक नौ वर्ष की कन्या के रूप में होती है, फिर षोड़सी के रूप में, फिर माता के रूप में। जिस तरह एक शिशु अपनी माता की गोद में सोता है, वैसे ही एक साधक इनकी गोद में ही शरणागत होकर सोता है, उठता भी इन्हीं की गोद में है, और सारे कार्य भी इन्हीं की शरणागत होकर करता है। ये हमारी माता हैं। हम इनकी शरणागत हैं।
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"सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोफळं बिभ्रतीं
सौम्या रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्पराम्बिकाम्॥"
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॥श्री ललितामहात्रिपुरसुन्दर्यै नमः

दूसरों से अपेक्षा और आशा -- जीवन में निराशा और दुःख को जन्म देती हैं। इनसे ऊपर कैसे उठें?

 यह प्रश्न बार-बार मन में उठता है। अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि ये सब फालतू बातें हैं। ऐसी फालतू बातें दिमाग में आनी ही नहीं चाहिये। मन को परमात्मा में लगाकर रखो, और अन्य कुछ भी चिंतन मत करो। परमात्मा के भी अनेक रूप हैं, उनमें से किसका चिंतन करें? इसका उत्तर है कि जो भी रूप हमारा प्रियतम है उसी का चिंतन करो। मैं अब मेरे प्रियतम रूप का ही चिंतन करूंगा। यही सुखी रहने का मार्ग है। भगवान कहते हैं ---

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"मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥१२:२॥"
अर्थात् -- मुझमें मन को एकाग्र करके नित्ययुक्त हुए जो भक्तजन परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे, मेरे मत से, युक्ततम हैं अर्थात् श्रेष्ठ हैं॥
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"ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥१२:३॥"
अर्थात् -- परन्तु जो भक्त अक्षर ,अनिर्देश्य, अव्यक्त, सर्वगत, अचिन्त्य, कूटस्थ, अचल और ध्रुव की उपासना करते हैं॥
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"संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥१२:४॥"
अर्थात् -- इन्द्रिय समुदाय को सम्यक् प्रकार से नियमित करके, सर्वत्र समभाव वाले, भूतमात्र के हित में रत वे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं॥
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आज की उलझन समाप्त हो गई है। विश्व में घट रही कुछ घटनाएँ मन को व्यथित करती हैं। लेकिन भगवान के न्याय और उनकी व्यवस्था में मेरी आस्था है। मेरी व्यथा का कारण ही मन का भटकाव है। अब और मन नहीं भटके।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० अगस्त २०२४

(पुनःप्रस्तुत) जब धर्म और राष्ट्र का अस्तित्व खतरे में हो तब व्यक्तिगत मोक्ष की कामना पाप है ---

 मेरा यह स्पष्ट मत है कि जब धर्म और राष्ट्र का अस्तित्व खतरे में हो तब किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत मोक्ष की कामना पाप है| वर्त्तमान में जो स्थिति है उसमें अपने धर्म और अपने राष्ट्र भारतवर्ष का अस्तिव खतरे में है| भारतवर्ष और सनातन धर्म पर निरंतर मर्मान्तक प्रहार हो रहे हैं| ऐसी भयावह स्थिति पहले कभी भी नहीं थी| हम जो भी आध्यात्मिक साधना करें, उसमें धर्म व राष्ट्र की रक्षा का संकल्प अवश्य करें| जीवन में ईश्वर को अवतरित करें| हमारे अस्तित्व में परमात्मा होंगे तो उनकी शक्ति से धर्म व राष्ट्र की रक्षा अवश्य होगी| जब धर्म नहीं रहेगा तो राष्ट्र भी नहीं रहेगा, और राष्ट्र नहीं रहेगा तो धर्म भी नहीं बचेगा|

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अपना जीवन यानि अपना सम्पूर्ण अस्तित्व परमात्मा को समर्पित करें, उन्हें जीवन में अवतरित करें, उन्हें कर्ता बनाएँ और अपने माध्यम से उन्हें कार्य करने दें| यही सबसे बड़ी सेवा है जो हम धर्म और राष्ट्र की कर सकते हैं| फिर परमात्मा ही हमारे माध्यम से कार्य करेंगे| हम तो उन के उपकरण मात्र बनें, यही हमारा धर्म है|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१२ अगस्त २०१३
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पुनश्च: --- समर्थ गुरु रामदास जैसे सिद्ध महापुरुषों की जीवनी और उपदेशों का यदि हम स्वाध्याय करें तो एक अति महत्वपूर्ण बात समझ में आती है कि हमारे द्वारा किये जाने वाले सारे संकल्प -- सामूहिक लक्ष्य की प्राप्ति यानि संस्कारों, संस्कृति, धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिये ही हों, न कि व्यक्तिगत स्वार्थ के लिये।

अपनी असीम अनंतता में सच्चिदानंद परमशिव की आराधना ---

आज पवित्र श्रावण मास का चौथा सोमवार है। पूरे श्रावण मास का व्रत कर रखा है। दिन में मध्याह्न में सिर्फ एक बार अल्प मात्रा में भोजन, और प्रातः-सायं थोड़ा थोड़ा देसी नस्ल की गौमाता का दूध ग्रहण करता हूँ। हर समय संकल्प तो करता हूँ कि सारे समय भगवान शिव के ध्यान में रहूँ, लेकिन कोई भी संकल्प कभी पूर्ण नहीं होता। हर संकल्प के साथ एक विकल्प भी तत्क्षण जन्म ले लेता है। कुछ भी साधना नहीं होती। अतः सब कुछ भगवान शिव के ऊपर ही छोड़ दिया है कि अपनी साधना स्वयं ही करो, मेरे वश में कुछ भी नहीं है।

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जो मैं कहने जा रहा हूँ, उससे पूर्व एक निवेदन है। हमारे जो लौकिक शत्रु हैं, वे अपनी सारी प्रेरणा अपनी पुस्तक से लेते हैं, तो हम अपनी प्रेरणा अपनी पुस्तक से क्यों नहीं ले सकते? रामायण और महाभारत (भगवद्गीता भी महाभारत का ही भाग है) हमारी पुस्तकें हैं। इनमें सारा आध्यात्मिक ज्ञान है। हमें अनिवार्य रूप से इनका स्वाध्याय कर अपनी सारी प्रेरणा इन्हीं से लेनी चाहिये। अपनी पुस्तकों यानि धर्मग्रंथों का तो हम स्वाध्याय करते नहीं हैं, और बातें धर्म-निरपेक्ष मार्क्सवादियों की सी करते हैं, तो हमारे विचारों का विखंडन होगा ही। हम अपने स्वभाव के विरुद्ध जा रहे हैं। अधर्मियों ने हमारे शास्त्रों में जो भाग प्रक्षिप्त किये हैं, उन प्रक्षिप्तताओं के बिना उनका स्वाध्याय हमें करना चाहिए।
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हमारा समाज वर्ण-आश्रम विहीन हो गया है, यह भी हमारे भ्रमित होने का एक कारण है। वर्णों का निर्माण भगवान ने किया था, न कि मनुष्य ने। जाति व्यवस्था भी आवश्यक है, इसी ने हमारे समाज की रक्षा की है। जातिवाद खराब है, लेकिन जाति-व्यवस्था स्वभाविक है।
हम सौ हाथ से कमाएँ तो हज़ार हाथ से बाँटें। मैं योग और उत्तर-मीमांसा यानि वेदान्त की बातें करता हूँ, लेकिन बैठा गृहस्थ में हूँ। यह गलत है। बहुत पहिले ही मुझे विरक्त हो जाना चाहिए था। लेकिन इसका साहस नहीं जुटा पाया। परमप्रेम (भक्ति) और समर्पण -- मेरा स्वभाव होने के कारण मेरा स्वधर्म है। अतः चर्चा मैं वह ही करूंगा जो मेरा स्वधर्म है। मेरे लिए वेदान्त एक अनुभूति है, न कि कोई विषय।
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सच्चिदानंद भगवान शिव की अनुभूति ---
मुझे यह सब लिखने की आंतरिक अनुमति है इसीलिए लिख रहा हूँ। जिन बातों की अनुमति नहीं है वह नहीं लिखूंगा। आज दिन में कुछ देर विश्राम किया, फिर आँखें बंद कर के बैठा ही था कि बंद आँखों के अंधकार के पीछे एक हल्की सी ज्योति के दर्शन हुए। फिर बहुत तेजी से वह ज्योति सारे ब्रह्मांड, सारी सृष्ट में फैल गयी। सारी सृष्टि में वह प्रखर ज्योति, और उस प्रखर ज्योति में ही सारी सृष्टि थी। उस ज्योतिपुञ्ज और उसके साथ उत्पन्न हुये नाद के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं था। उसका केंद्र सर्वत्र था लेकिन परिधि कहीं भी नहीं। मेरी देह भी कहीं नहीं थी। वह भी उस ज्योति में ही विलीन हो गयी थी। इस अनुभूति को मैं परमशिव या ज्योतिर्मय-ब्रह्म की अनुभूति कहता हूँ। यही मेरी स्वभाविक साधना है, यही मेरा स्वभाविक ध्यान है, और यही मेरा सच्चिदानंद है। अन्य जो लौकिक साधनाएं हैं उनकी चर्चा नहीं करूंगा, क्योंकि उनकी चर्चा की अनुमति नहीं है।
एक बार (प्रथम और अंतिम बार) देखने का प्रयास किया कि कौन किसका ध्यान कर रहा है, तो अनुभूति हुई कि शांभवी मुद्रा में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अपना ध्यान कर रहे हैं। फिर कभी साहस नहीं हुआ, यह अनुभूत करने का।
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गीता में भगवान कहते हैं --
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
भावार्थ - सर्वात्म भाव से जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब को मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
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"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥"
भावार्थ -- बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि अंतर्रात्म और सर्वात्म रूप "यह सब वासुदेव है", ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है; ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है॥
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"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५:१॥"
भावार्थ -- श्री भगवान् ने कहा -- (ज्ञानी पुरुष इस संसार वृक्ष को) ऊर्ध्वमूल और अध:शाखा वाला अश्वत्थ और अव्यय कहते हैं; जिसके पर्ण छन्द अर्थात् वेद हैं, ऐसे (संसार वृक्ष) को जो जानता है, वह वेदवित् है॥
(यह ज्ञान हरिःकृपाजन्य अनुभूति से ही प्राप्त होता है, बुद्धि से नहीं)
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"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
भावार्थ -- सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो॥
(यह गीता का चरम श्लोक है।, इसका ज्ञान भी हरिःकृपा से ही होता है)
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और कुछ भी इस समय यहाँ पर लिखने योग्य नहीं है। आप सब में मैं भगवान परमशिव को नमन करता हूँ। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१२ अगस्त २०२४

प्रार्थना/साधना/उपासना/आराधना/भक्ति कौन, किसके लिए, और क्या कर रहा है?

 प्रातःकाल हमारे माध्यम से भगवान स्वयं ही उठ रहे हैं। रात्री में शयन भी वे ही कर रहे थे। उठते ही वे स्वयं ही अपनी आराधना स्वयं कर रहे हैं। वे अपनी समष्टि (जो वास्तव में वे स्वयं हैं) के कल्याण के लिए स्वयं से स्वयं ही प्रार्थना कर रहे हैं। सारे संकल्प और विकल्प भी उन्हीं के हैं जो स्वयं वे ही कर रहे हैं।

शत्रु का संहार भी वे ही कर रहे हैं। उस समय भी उनके मन में कोई क्रोध और घृणा नहीं है। सिर्फ प्रेम और करुणा है।
इन पैरों से वे ही चल रहे हैं, इन हाथों से वे ही काम कर रहे हैं, इन आँखों से वे ही देख रहे है, इन कानों से वे ही सुन रहे हैं, इन नासिकाओं से वे ही साँस ले रहे हैं, वे स्वयं ही अपना सारा कार्य स्वयं ही संपादित कर रहे हैं। अपना ध्यान भी वे स्वयं ही कर रहे हैं।
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सम्पूर्ण अस्तित्व वे स्वयं हैं। मेरा कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, मेरे माध्यम से वे स्वयं ही व्यक्त हो रहे हैं। अपना नमन भी वे स्वयं ही कर रहे हैं। उनकी जय हो।
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"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥"
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ अगस्त २०२४

परमशिव के अतिरिक्त मेरा अन्य कोई आश्रय नहीं है ---

एक बहुत भयानक तमोगुण नामक असुर मेरे अवचेतन मन में छिपा हुआ बैठा है। वह असुर अमर है, उसे कोई नहीं मार सकता।वही मेरे सब दुःखों का कारण है। उससे मुक्ति केवल भगवान परमशिव ही दिला सकते हैं। भगवान मुझे तीनों गुणों से मुक्त कर निस्त्रेगुण्य (त्रिगुणातीत), वीतराग, और स्थितप्रज्ञ बनायें। स्थितप्रज्ञता के लिए त्रिगुणातीत और वीतराग होना आवश्यक है। मेरी प्रज्ञा परमात्मा में स्थित रहे। परमात्मा के हृदय में ही मेरा स्थायी निवास हो। यही मेरी अभीप्सा है। परमशिव के अतिरिक्त मेरा अन्य कोई आश्रय नहीं है। परमात्मा के कृपा सिंधु में अति गहरी डुबकी लगाने का समय आ गया है। अनमोल मोती मिल रहे हैं, अन्यथा पछताना पड़ेगा। भक्त या साधक होने का भाव एक अहंकार है। हम निमित्त मात्र ही हो सकते हैं, कर्ता और भोक्ता केवल परमात्मा हैं।

गीता में भगवान कहते है --
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व, जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव, निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥११:३३॥"
भावार्थ -- इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो॥ (बायें हाथसे भी बाण चलानेका अभ्यास होनेके कारण अर्जुन सव्यसाची कहलाता है।)
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मेरे पाठकों में सब प्रबुद्ध विद्वान मनीषी हैं जो वेदान्त-दर्शन और भक्ति को अच्छी तरह समझते हैं। अतः मुझे कुछ और कहने की आवश्यकता नहीं है।