मकर संक्रांति की क्या शुभ कामना दूँ? मेरी हरेक साँस में संक्रांति है ---
Sunday, 15 January 2023
मकर संक्रांति की क्या शुभ कामना दूँ? मेरी हरेक साँस में संक्रांति है ---
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मैं साँस लेता हूँ तो वह मकर-संक्रांति है। साँस छोड़ता हूँ तो वह कर्क-संक्रांति है।
उत्तरायण और दक्षिणायण -- अब कहीं बाहर नहीं, मेरे इस शरीर में ही हरेक साँस के साथ घटित हो रहे हैं। मेरा सहस्त्रारचक्र -- उत्तर दिशा है; मूलाधारचक्र -- दक्षिण दिशा है; भ्रूमध्य -- पूर्व दिशा है; और आज्ञाचक्र -- पश्चिम दिशा है। सुषुम्ना की ब्रह्मनाड़ी मेरा परिक्रमा पथ है।
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जब साँस लेता हूँ तब घनीभूत-प्राण (कुंडलिनी) मूलाधारचक्र से उठकर सब चक्रों को भेदते हुए, सहस्त्रारचक्र में आ जाते हैं, यह मकर संक्रांति है। जब साँस छोड़ता हूँ तब ये घनीभूत-प्राण (कुंडलिनी) उसी मार्ग से बापस मूलाधार-चक्र में चले जाते हैं। यह कर्क संक्रांति है। मैं इन का साक्षीमात्र हूँ। इन का रहस्य परम गोपनीय हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ जनवरी २०२३
मकर-संक्रांति - उर्ध्वगति का उत्सव और आत्मसूर्य की ओर प्रयाण है ---
मकर-संक्रांति - उर्ध्वगति का उत्सव और आत्मसूर्य की ओर प्रयाण है; निरंतर सर्वव्यापी कूटस्थ-चैतन्य में रहें, जिसमें स्थिति ही ब्राह्मी-स्थिति है जिसका उपदेश भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में दिया है ---
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भ्रूमध्य में परमात्मा की अनंतता का ध्यान करें। स्वयं को सीमित न करें। जो कुछ भी हमें सीमित करता है, उसका उसी क्षण त्याग कर दें। बिना तनाव के भ्रूमध्य में दृष्टी स्थिर कर, पूर्णखेचरी या अर्धखेचरी मुद्रा में, प्रणव की ध्वनि को सुनते हुए, उसी में लिपटी हुई सर्वव्यापी ज्योतिर्मय अंतर्रात्मा का गुरु महाराज के आदेशानुसार नित्य नियमित ध्यान करते रहें। शिवकृपा से विद्युत् की चमक के समान देदीप्यमान ब्रह्मज्योति एक न एक दिन ध्यान में प्रकट होगी। उस ब्रह्मज्योति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने के बाद उसी की चेतना में निरंतर रहने की साधना करें। यह ब्रह्मज्योति अविनाशी है, इसका कभी नाश नहीं होता। लघुत्तम जीव से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है, पर इस ज्योतिर्मय-ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता। यही कूटस्थ है, और इसकी चेतना ही कूटस्थ-चैतन्य है जिसमें स्थिति ही योगमार्ग की उन्नत साधनाओं का आरंभ है। साधनाएँ गोपनीय हैं जिनकी चर्चा उन साधकों से ही हो सकती है, जिनका जीवन पूर्णतः परमात्मा को समर्पित है।
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परमात्मा की कृपा से आगे के सब द्वार खुल जायेंगे। कहीं पर भी कोई अंधकार नहीं रहेगा। भगवान हमारे से सिर्फ हमारा प्रेम माँगते हैं जो हम तभी दे सकेंगे जब हमारे में सत्यनिष्ठा होगी, अन्यथा नहीं।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१४ जनवरी २०२३
हिन्दू समाज इस समय बिल्कुल भी सोया हुआ या असंगठित नहीं है ---
हिन्दू समाज इस समय बिल्कुल भी सोया हुआ या असंगठित नहीं है। विश्व का सबसे अधिक जागृत समाज है। सिर्फ धर्म-शिक्षा का अभाव है, जिससे हिंदुओं को पहले तो अंग्रेजों व पूर्तगालियों ने, फिर काँग्रेस सरकार ने वंचित किया। अभी भी गुरुकुलों की शिक्षा को मान्यता प्राप्त नहीं है, जब कि मदरसों व कॉन्वेंटों की शिक्षा को है। भारत का संविधान हिंदुओं को अपने धर्म की शिक्षा का अधिकार सरकारी मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं में नहीं देता, क्योंकि हमारा संविधान यथार्थ में बुहुविधान है, न कि संविधान (समान कानून और नीति-नियम)।
जब समान नागरिक संहिता लागू हो जाएगी तब हिन्दू समाज विश्व का हर दृष्टिकोण से सर्वश्रेष्ठ समाज होगा।
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अपराजेय हिन्दू समाज कभी पराजित हुआ तो अपनी सद्गुण-विकृति के कारण ही हुआ, न कि किसी अन्य कारण से। हम पानीपत का तीसरा युद्ध भी हारे तो अपनी सद्गुण-विकृति से हारे, न कि किसी अन्य कारण से। मेरा अब भी मानना है कि पानीपत के तीसरे युद्ध में यदि मराठा सेना जीतती तो भारत में अंग्रेजी राज्य कभी भी स्थापित नहीं हो सकता था। अंग्रेजों ने भारत की सत्ता मराठों को छल-कपट से हराकर ही उनसे छीनी थी, न कि धर्मयुद्ध से हराकर।
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भारत कभी भी पराधीन नहीं हुआ। भारत की पराधीनता का सारा इतिहास झूठा है। विदेशी शासकों ने भारत के कुछ शासकों के साथ मिलकर ही उनके सहयोग से भारत पर राज्य किया। (महान इतिहासकार प्रो.डॉ.रामेश्वर मिश्र पंकज, और प्रो.डॉ.कुसुमलता केडिया ने इसे अपने ऐतिहासिक ग्रंथों में सिद्ध किया है)
भारत अपने द्वीगुणित परम वैभव को प्राप्त होगा।
वंदे मातरं।
१५ जनवरी २०२३
Wednesday, 16 November 2022
अज्ञान ग्रंथियों का भेदन :---
अज्ञान ग्रंथियों का भेदन :---
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योग साधना में ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि और रूद्रग्रंथि -- इन तीन अज्ञान ग्रंथियों को भेदना पड़ता है। जिसने इन तीन ग्रंथियों का भेदन कर लिया, वह त्रिभंगमुरारी है। भगवान श्रीकृष्ण की हाथ में बांसुरी बजाते हुए, दाहिने पैर पर भार डालकर बायाँ पैर आगे टिका कर, देह को तीन स्थानों से मोड़ कर खड़े होने की जो मुद्रा है वह त्रिभंग मुद्रा है। ऐसी मुद्रा में भगवान जैसे खड़े हैं, उन्हें "बाँके बिहारी" कहते हैं।
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भिद्यते हृदयग्रंथिश्छिद्यन्ते सर्वसंशया।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥ (मुन्डकोपनिषद : २/२/८)
विष्णु ग्रंथि का भेदन होने से सब संशय दूर हो जाते हैं। दुर्गापूजा में असुर वध के माध्यम से उसी हृदय ग्रंथि भेद की क्रिया को ही रूपक द्वारा प्रदर्शित किया गया है। इसी प्रकार रूद्रग्रंथि और ब्रह्मग्रन्थी भेदन की महिमा शास्त्रों में भरी पडी है।
इन तीन ग्रंथियों का भेदन जो मूलाधार, अनाहत और आज्ञाचक्र में स्थित हैं, अत्यंत दुष्कर कार्य है, इससे पशुवृत्ति पर नियंत्रण होता है। ज्ञानसंकलिनी तंत्र के अनुसार ऐसा साधक ऊर्ध्वरेता बनता है।
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यह विधि बहुत अधिक सरल है लेकिन इसको गुरु द्वारा शिष्य को अपने सामने बैठाकर अपनी स्वयं की ही वाणी से सिखाई जाती हैं। गुरु की शक्ति ही काम करती है।
आप सब के ह्रदय में स्थित भगवान वासुदेव को नमन !!
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ नवंबर २०२२
सत्य-सनातन-धर्म का एक लघु और संक्षिप्त परिचय ---


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महाभारत में धर्म और अधर्म को बहुत अच्छी तरह से समझाया गया है। रामायण और महाभारत जैसे ग्रन्थों के स्वाध्याय से धर्म और अधर्म की समझ बहुत गहरी और स्पष्ट हो जाती है।
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कृपा शंकर
१५ नवंबर २०२२
हम भगवान से कुछ माँगते हैं तो वह तो मिलता ही है, उसका उल्टा भी मिलता है --




कृपा शंकर
१६ नवंबर २०२२। धन माँगोगे तो निर्धनता भी मिलेगी, स्वर्ग माँगोगे तो नर्क भी मिलेगा, यश, प्रसिद्धि, और कीर्ति माँगोगे तो अपयश, निंदा और अपकीर्ति भी मिलेगी। यह प्रकृति का नियम और एक अनुभूत सत्य है। 

कृपा शंकर
१६ नवंबर २०२२
पंचमुखी महादेव ---







देवाधिदेव भगवान शिव के श्रीचरणों में नमन करते हुए मैं इस लेख को लिखने का दुःसाहस कर रहा हूँ। परमशिव मुझे आशीर्वाद दें और मेरी सहायता करें।
पंचमुखी महादेव का प्रतीकात्मक विग्रह मुझे बहुत अधिक आकर्षित करता है, लेकिन मुझमें इतनी बौद्धिक क्षमता नहीं है कि मैं उन्हें समझ सकूँ। जितना शिवपुराण में लिखा है, उससे अधिक मुझे नहीं पता। लेकिन कुछ तो अनुभूतियाँ हैं, और कुछ अनुमान; उन्हीं पर आधारित यह लेख है। आपको अच्छा लगे तो ठीक हैं, अन्यथा गल्प (गप्प) समझ कर उपेक्षा कर देना।
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भगवान शिव वैसे नहीं हैं, जैसे हम उन्हें फिल्मों में, टीवी सीरियलों में, और पुस्तकों में देखते हैं। वे एक तत्व हैं, जिनकी अनुभूति हमें आनंद, अनंतता की अनुभूति और प्रकाश रूप में होती है। वैसे वे हमारी धारणा और कल्पना के अनुसार किसी भी रूप में हमें दर्शन दे सकते हैं।
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हमें ध्यान में अनंत विस्तृत ज्योति, प्रणव की ध्वनि और एक श्वेत पंचमुखी नक्षत्र के दर्शन का अनुभव जब भी होता है, वह बड़े आनंद का विषय होता है। विराट अनंतता और विस्तार की अनुभूति को ही मैं 'शिव' कहता हूँ, जिसका अर्थ है कल्याणकारी।
उस अनंतता से भी परे दिखाई दे रहे श्वेत प्रकाश और नक्षत्र को मैं 'परमशिव' कहता हूँ, जिसका अर्थ है -- परम कल्याणकारी।
शंकर का अर्थ है -- शमनकारी और आनंददायक।
शंभू का अर्थ है -- मंगलदायक।
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भगवान शिव के ऊर्ध्वमुख का नाम 'ईशान' है जो आकाश तत्व है।
पूर्वमुख का नाम 'तत्पुरुष' है, जो वायु तत्व है।
दक्षिणी मुख का नाम 'अघोर' है जो अग्नितत्व है।
उत्तरी मुख का नाम 'वामदेव' है, जो जल तत्व है।
पश्चिमी मुख को 'सद्योजात' कहा जाता है, जो पृथ्वी तत्व है।
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भगवान शिव पंचभूतों (पंचतत्वों) के अधिपति हैं इसलिए ये 'भूतनाथ' कहलाते हैं।
भगवान शिव काल (समय) के प्रवर्तक और नियंत्रक होने के कारण 'महाकाल' कहलाते है।

काल के पाँच अंग -- तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण हैं।




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ॐ नमः शंभवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च॥ ॐ तत्सत् !! ॐ नमःशिवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ नवंबर २०२२
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Note : -- यह लेख अच्छा लगे तो इस पर मनन करें, अन्यथा इसे गल्प समझकर उपेक्षा कर दें। आपको धन्यवाद !!
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