Monday, 24 October 2022

ब्रह्मज्ञान और सनकादिक ऋषि ---

 ब्रह्मज्ञान और सनकादिक ऋषि ---

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जब भी ब्रह्मज्ञान की बात होती है तो सबसे पहले स्वतः ही भगवान सनतकुमार को नमन होता है। वे ब्रह्मविद्या के प्रथम आचार्य माने जाते हैं। उन्हीं की कृपा से हम सब को ब्रह्मज्ञान प्राप्त हुआ है। हर युग में और हर कालखंड में वे भक्तों के समक्ष प्रकट हुए हैं। उन्होने ब्रह्मज्ञान सर्वप्रथम देवर्षि नारद को दिया था जो स्वयं भक्ति के आचार्य हैं।
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ब्रह्मा जी का प्राकट्य जल में कमल के पुष्प पर हुआ था। उन्होने उस पुष्प के डंठल से नीचे उतर कर अपना मूल जानना चाहा। कुछ समझ में नहीं आया तो बापस कमल पर आकर बैठ गए। तभी उन्हें "तपस तपस" शब्द सुनाई दिया, जिसे सुनकर वे समाधिस्थ हो गए और सौ वर्ष तक तपस्यारत रहे।
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तत्पश्चात भगवान विष्णु से उन्हें सृष्टि रचना की प्रेरणा मिली। ब्रह्मा जी ने सबसे पहिले नित्यविरक्त नित्यसिद्ध चार मानस पुत्रों -- सनक, सनंदन, सनातन और सनतकुमार की रचना की। ये चारों भाई -- भगवान विष्णु के प्रथम अवतार माने जाते हैं। ये चारों भी तपस्या में ही लीन हो गए, और सर्वदा पाँच वर्ष की आयु के ही रहे। हजारों वर्ष व्यतीत हो गए, ये न तो कभी जवान हुये और न कभी बूढ़े हुए। पूरे ब्रह्मांड में ये भ्रमण करते हैं, और जहाँ भी इनकी कृपा होती है, वहीं प्रकट हो जाते हैं। इस पृथ्वी पर तो भगवान सनतकुमार की विशेष कृपा रही है।
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दक्षिण भारत के तमिलनाडु में कुछ लोगों की मान्यता है कि भगवान शिव के षंमुखी दूसरे पुत्र कार्तिकेय, जिन्हें स्कन्द, कुमार और आरमुगम् आदि भी कहा जाता है, वे भगवान सनतकुमार के ही मानस रूप हैं। पार्वती जी ने सनतकुमार जैसा ही पुत्र चाहा था। वे ही देवताओं के सेनापति बने थे। उनके पास वेलायुध नाम का एक अमोघ अस्त्र भी था।
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वेदों के ज्ञान के बारे में तो एक दूसरी ही कथा प्रचलित है कि वेदों का ज्ञान ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम अपने ज्येष्ठ मानसपुत्र अथर्व ऋषि को दिया, अथर्व ने सत्यवाह को, सत्यवाह ने अंगिरस को, अंगिरस ने अंगिरा को, और अंगिरा ने लोमश आदि ऋषियों को दिया। इस तरह वेदों का ज्ञान फैला।
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बात भगवान सनतकुमार की चल रही थी, भटक कर दूर चले गए। भगवान सनतकुमार को नमन। हमारे में इतनी पात्रता विकसित हो कि भगवान के इन अवतारों का प्रत्यक्ष दर्शन कर सकें। ॐ नमो भगवते सनतकुमाराय !!
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२० अक्तूबर २०२२

हमारी माता कौन हैं?

भगवान की आराधना हम चाहे उनके मातृ-रूप की करें या पितृ-रूप की, साधना में सफलता -- भक्ति से ही मिलती है। बिना भक्ति के एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। हर तरह के संकटों से रक्षा भी हमारी भक्ति ही करती है। श्रद्धा और विश्वास का जन्म भी भक्ति से ही होता है, व ज्ञान और वैराग्य की प्राप्ति भी भक्ति से ही होती है।

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अतः बिना किसी संकोच के मैं यह कह सकता हूँ कि भगवान की भक्ति ही हमारी माता है। जगन्माता के सारे रूप भक्ति की ही विभिन्न आयामों में अभिव्यक्तियाँ हैं।

असली स्वतन्त्रता दिवस की बधाई, शुभ कामनाएँ, और अभिनंदन ---

 असली स्वतन्त्रता दिवस की बधाई, शुभ कामनाएँ, और अभिनंदन ---

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भारत का वास्तविक स्वतंत्रता दिवस तो आज है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने २१ अक्तूबर १९४३ को 'आजाद हिन्द फौज' के सर्वोच्च सेनापति के नाते सिंगापुर में स्वतन्त्र भारत की प्रथम सरकार बनायी थी जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुरिया और आयरलैंड सहित ११ देशों ने मान्यता प्रदान की थी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप समूह इस अस्थायी सरकार को दे दिये थे। सुभाष बोस उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया। अंडमान का नया नाम शहीद द्वीप तथा निकोबार का स्वराज्य द्वीप रखा गया। ३० दिसंबर १९४३ को पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना मैदान में पर स्वतन्त्र भारत का ध्वज भी फहरा दिया गया था।
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एक षडयंत्र द्वारा उन्हें देश से भगा दिया गया। आज़ाद हिन्द फौज के १६ हजार से अधिक सैनिक देश की स्वतन्त्रता के लिए लड़ते हुए मरे थे, जिन्हें मरणोपरांत सम्मान नहीं मिला। आजाद हिन्द के फौज के जीवित बचे सैनिकों को सेना में बापस नहीं लिया गया, और उन्हें वेतन और सेवानिवृति का कोई लाभ भी नहीं मिला।
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१५ अगस्त १९४७ तो भारत का विभाजन दिवस था, जिसमें लगभग ३० लाख लोगों की हत्या हुई, हजारों महिलाओं का बलात्कार हुआ, हजारों बच्चों और महिलाओं का अपहरण हुआ, और करोड़ों लोग विस्थापित हुए। इतनी कम अवधि में इतना भयानक नर-संहार विश्व के इतिहास में अन्यत्र कहीं भी नहीं हुआ। इस दिन लाशों से भरी हुई कई रेलगाडियाँ विभाजित भारत यानि पाकिस्तान से आयीं जिन पर खून से लिखा था -- "Gift to India from Pakistan."
१९७६ में छपी पुस्तक Freedom at midnight में उनके चित्र दिये दिये हुए थे। वह कलंक का दिन भारत का स्वतन्त्रता दिवस नहीं हो सकता। यह कैसा स्वतन्त्रता दिवस था जिसमें भारत माता की दोनों भुजाएँ और आधा सिर काट दिया गया।
जवाहर लाल नेहरू जी तो भारत का अंग्रेजों द्वारा कूटनीति से बनाया गया दूसरा प्रधानमंत्री था। जब ये प्रधानमंत्री बने तब इनको शपथ लॉर्ड माउंटबेटन ने दिलाई थी। जो शपथ इन्होंने ली वह पता नहीं भारत के प्रति वफादारी की थी या ब्रिटेन के प्रति।
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तेरा गौरव अमर रहे माँ हम दिन चार रहें न रहें| भारत माता की जय !
वन्दे मातरं ! जय हिन्द !
कृपा शंकर
२१ अक्तूबर २०२२

"भूमा" तत्व का ध्यान और सिद्धि -- जीवन की संपूर्णता है ---

 "भूमा" तत्व का ध्यान और सिद्धि -- जीवन की संपूर्णता है ---

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"यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति भूमानं भगवो विजिज्ञास इति॥ (छान्दोग्योपनिषद (७/२३/१)
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भूमा-तत्व का ध्यान ही जीवन में परमात्मा को व्यक्त करने का मार्ग है। जो सब तरह के भेदों और सीमाओं से परे है, वह है भूमा तत्व। यह सृष्टि की और हमारे जीवन की संपूर्णता है। जो भूमा है, वह सनातन, बृहत्तम, विभु, सर्वसमर्थ, नित्यतृप्त ब्रह्म है। जो भूमा है, वही सुख है, वही अमृत और सत्य है, "भूमा" में ही सुख है, अल्पता में नहीं। पूर्ण भक्ति से समर्पित होकर परमात्मा की अनंतता और विराटता पर ध्यान करते करते "भूमा" की अनुभूति होती है।
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ब्रह्मविद्या के प्रथम आचार्य भगवान सनत्कुमार से उनके प्रिय शिष्य देवर्षि नारद ने पूछा -- "सुखं भगवो विजिज्ञास इति"। जिसका उत्तर भगवान् श्री सनत्कुमार जी का प्रसिद्ध वाक्य है -- "यो वै भूमा तत् सुखं नाल्पे सुखमस्ति"। भूमा में यानि व्यापकता, विराटता में सुख है, अल्पता में नहीं । जो भूमा है, व्यापक है, वह सुख है। कम में सुख नहीं है। भूमा का अर्थ है -- सर्व, विराट, विशाल, अनंत, विभु, और सनातन।
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दूसरे शब्दों में "भूमा" -- साधना की लगभग पूर्णता है। मनुष्य का शरीर एक सीमा के भीतर एक भूमि है। इस सीमित शरीर का जब विराट् से सम्बन्ध हो जाता है, तब यह भूमा है। आत्म-साक्षात्कार के पश्चात जो अनुभूति होती है, वह भूमा है। भूमा एक अनंत विराटता की अनुभूति का विषय है, बुद्धि का नहीं। इसकी अनुभूति उन्हें ही होती है जो परमात्मा की अनंत विराटता पर ध्यान करते हैं।
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महाकवि जयशंकर प्रसाद ने अपने कालजयी महाकाव्य "कामायनी" में भूमा शब्द का प्रयोग किया है --
"तपस्वी, क्यों हो इतने क्लांत? वेदना का यह कैसा वेग?
आह! तुम कितने अधिक हताश, बताओ यह कैसा उद्वेग?
जिसे तुम समझे हो अभिशाप, जगत की ज्वालाओं का मूल।
ईश का वह रहस्य वरदान, कभी मत इसको जाओ भूल।
विषमता की पीडा से व्यक्त, हो रहा स्पंदित विश्व महान।
यही दुख-सुख विकास का सत्य, यही भूमा का मधुमय दान।
(कामायनी)
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२१ अक्तूबर २०२२

मेरे उपास्य देव भगवान परमशिव की एक अनुभूति ---

 मेरे उपास्य देव भगवान परमशिव की एक अनुभूति ---

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परमशिव का अर्थ है परम-कल्याणकारी। परमशिव एक अद्वैतानुभूति है जो गुरुकृपा या शिवकृपा से उन सभी साधकों को होती है जो शिव की ज्योतिर्मय विराट अनंतता का ध्यान करते हैं। यह बुद्धि से परे का विषय है। जिनका कभी जन्म ही नहीं हुआ, उनकी कभी मृत्यु भी नहीं हो सकती। उन मृत्युंजयी परमशिव के साथ गहरे ध्यान में कोई भी साधक स्वयं भी परमशिव ही हो जाता है। इस देह रूपी वाहन का जन्म और मृत्यु हो सकती है, लेकिन परमशिव चेतना की नहीं।
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परमशिव शब्द का प्रयोग भाष्यकार भगवान आचार्य शंकर ने अपने "सौन्दर्य लहरी" नामक ग्रंथ में किया है। तत्पश्चात कश्मीर शैव दर्शन के आचार्यों, विशेष कर उनकी एक शाखा "प्रत्यभिज्ञा" के आचार्यों ने इसका प्रयोग किया है। वेदांती महात्माओं के सत्संग में भी हमें यह शब्द बहुत सुनने को मिलेगा। मुझे इसकी अनुभूति सिद्ध महात्माओं के सत्संग और स्वयं भगवान परमशिव की कृपा से हुई है।
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हमें परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति हो, इस पर ही पूरा ध्यान देना चाहिए। जितनी देर हम स्वाध्याय करते हैं, उससे सात-आठ गुणा अधिक समय तक हमें परमात्मा का ध्यान करना चाहिए। जब हमारे प्राणों की गहनतम चेतना (जिसे तंत्र में कुण्डलिनी महाशक्ति कहते हैं) सुषुम्ना मार्ग के सभी चक्रों का भेदन करती हुई सहस्त्रारचक्र का भी भेदन कर ब्रह्मरंध्र से भी बहुत ऊपर परमात्मा की अनंतता में विचरण करने लगती है। तब हमें विस्तार की अनुभूतियाँ होती हैं। सूक्ष्म जगत में एक ज्योतिर्मय चक्र और भी है, जिस से भी पार जाना पड़ता है। वहाँ एक पंचकोणीय श्वेत नक्षत्र के दर्शन होते हैं। वहाँ आलोक ही आलोक है। कहीं कोई अंधकार नहीं है। वह पंचकोणीय श्वेत नक्षत्र पंचमुखी महादेव है। जब उनके दर्शन होने लगें तब स्वयं को उनमें समर्पित कर दो। फिर इधर-उधर कहीं भी मुड़कर मत देखो। पीछे की तरफ तो भूल से भी मत देखो। पीछे की ओर महाकाल, यानि निश्चित मृत्यु है। उस नक्षत्र का भी भेदन करने पर जो अनुभूति होती है, वह परमशिव है। कुंडलिनी महाशक्ति वहीं परमशिव से मिलती हैं। वहीं मुक्ति और मोक्ष है, वहीं कैवल्य है।
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जो परमशिव हैं वे ही सदाशिव हैं जो सदा कल्याणकारी और नित्य मंगलमय हैं।
वे ही रुद्र हैं। ‘रु’ का अर्थ है -- दुःख, तथा ‘द्र’ का अर्थ है -- द्रवित करना या हटाना। दुःख को हरने वाला रूद्र है।
दुःख का भी शाब्दिक अर्थ है --- 'दुः' यानि दूरी, 'ख' यानि आकाश तत्व रूपी परमात्मा। परमात्मा से दूरी ही दुःख है और समीपता ही सुख है।
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उन परमशिव का भौतिक स्वरूप ही शिवलिंग है, जिसमें सब का लीन यानि विलय हो जाता है, जिस में सब समाहित है। पहले मुझे अनेक शिवलिंगों की अनुभूतियाँ होती थीं। अब तो एक ही शिवलिंग दिखाई देता है -- मूलाधार चक्र पर। ऊपर ही ऊपर अनंत से परे तो स्वयं भगवान परमशिव हैं।
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परमशिव ही ऊर्ध्वमूल है, जिसके बारे में भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है --
"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५:१॥
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥१५:२॥"
"ततः पदं तत्परिमार्गितव्य यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥१५:४॥"
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥१५:५॥"
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ अक्तूबर २०२२

हम ज्योतिर्मय ब्रह्म के साथ एक हों ---

 हम ज्योतिर्मय ब्रह्म के साथ एक हों ---

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भगवान सब तरह के धर्म-अधर्म, सिद्धान्त और नियमों से परे हैं। उनकी प्रेरणा और कृपा से मैं भी स्वयं को सब तरह की साधनाओं, उपासनाओं, धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, और कर्तव्यों से मुक्त कर रहा हूँ। वे निरंतर मेरे दृष्टि-पथ में हैं। वे मुझसे पृथक अब नहीं हो सकते। मेरा एकमात्र धर्म -- परमात्मा से परमप्रेम और उनको पूर्ण समर्पण है। यही मेरा स्वधर्म है।
“ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥"
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कूटस्थ ज्योतिर्मय ब्रह्म का आलोक ही बाहर के तिमिर का नाश कर सकता है। हम अपने सर्वव्यापी शिवरूप में स्थित हो कर ही समष्टि की वास्तविक सेवा कर सकते हैं। हम सामान्य मनुष्य नहीं, परमात्मा की अमृतमय अभिव्यक्ति हैं। भगवान कहीं आसमान से नहीं उतरने वाले, अपने स्वयं के अन्तर में ही उन्हें जागृत करना होगा। ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ अक्टूबर २०२२

स्वयं प्रकाशमय होकर ही हम अंधकार को दूर कर सकते हैं ---

 

💥स्वयं प्रकाशमय होकर ही हम अंधकार को दूर कर सकते हैं ---
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🙏हमें स्वयं को जीव से शिव बनना पड़ेगा, तभी हम समष्टि का कल्याण कर सकेंगे। शिवनेत्र होकर कमर को सीधी रखते हुये एक कंबल के आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह कर के बैठ जाइए। यदि बैठने में कठिनाई आ रही है तो नितंबों के नीचे एक गद्दी लगा लीजिये। फिर भी कठिनाई आ रही है तो भूमि पर कंबल बिछा कर उस पर एक बिना हत्थों की कुर्सी रख लीजिये और उस कुर्सी पर बैठ जाइए। कमर झुक गई है तो कोई लाभ नहीं होगा। कमर तो सीधी रखनी ही पड़ेगी। दोनों नासिकाओं से सांस चलनी चाहिए। अनुलोम-विलोम से दोनों नासिकाएँ खुल जाएँगी। हठयोग में अनेक क्रियाएँ हैं जिनसे नासिकाओं में अवरोध नहीं रहते। यदि फिर भी नाक से सांस लेने में कठिनाई आ रही है तो यह मेडिकल समस्या है। किसी अच्छे ENT सर्जन से अपना इलाज करवाएँ। यदि आप की कमर झुक गई है तो इस जन्म में आपको इसकी सिद्धि नहीं मिल सकती। यह साधना मत कीजिये। अगले जन्म में आप को पुनश्च अवसर मिलेगा। तब तक जपयोग कीजिये।
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शिवनेत्र होने का अर्थ है कि दृष्टिपथ भ्रूमध्य की ओर स्थिर रहे। सर्वव्यापी ज्योतिर्मय शिव का ध्यान कीजिये। यदि आप नए साधक हैं तो ब्रह्मज्योति के दर्शन में समय लगेगा; भ्रूमध्य में एक ब्रह्मज्योति की परिकल्पना कीजिये। उसके प्रकाश को सारे ब्रह्मांड में, सारी सृष्टि में फैला दीजिये। वह प्रकाश आप स्वयं हैं। जितनी भी आकाश-गंगाएँ, उनके नक्षत्र, ग्रह-उपग्रह आदि हैं, व जो कुछ भी सृष्ट हुआ है, वह आप स्वयं हैं। आप यह देह नहीं हैं। इस देह भाव से आपको मुक्त होना ही पड़ेगा। आपकी देह से सारा कार्य भगवान स्वयं संपादित कर रहे हैं। वे ही आपके पैरों से चल रहे हैं, वे ही आपकी आँखों से देख रहे हैं, वे ही आपके हृदय में धडक रहे हैं, और वे ही आपकी नासिकाओं से साँस ले रहे हैं।
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आप जहाँ भी जाते हैं, वहाँ भगवान स्वयं जाते हैं, जहाँ भी आपके पैर पड़ते हैं, वह भूमि पवित्र हो जाती है। जिस पर आपकी दृष्टि पड़ती है, वह निहाल हो जाता है। "शिवो भूत्वा शिवं यजेत" अर्थात शिव बनकर ही शिव की आराधना करें। आप स्वयं ज्योतिर्मय परमब्रह्म परमशिव हैं। सदा इसी भाव में रहो। जब भी समय मिले खूब अजपाजप कीजिये, ओंकार-श्रवण कीजिये, श्रीमद्भगवद्गीता और उपनिषदों का स्वाध्याय कीजिये। यदि आप रामभक्त हैं तो राममय होकर रहिए, कृष्णभक्त हैं तो कृष्णमय होकर रहिए। यदि आप द्विज हैं और गायत्री साधना करते हैं, तो गायत्री मंत्र के सविता देव की भर्गः ज्योति का खूब ध्यान कीजिये। लेकिन रहो सदा अपने शिवभाव में ही।
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यह ज्योतिर्मय शिवभाव ही आपके माध्यम से एक ब्रह्मतेज का प्राकट्य करेगा, जिससे समष्टि का कल्याण होगा। चारों ओर छाया तमस इसी ब्रहमतेज से दूर होगा। दीपावली की मंगलमय शुभ कामना और नमन !!
🌷🌹🥀🪷🌺🌸💐🙏🕉️🕉️🕉️🙏💐🌸🌺🪷🥀🌹🌷
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२४ अक्तूबर २०२२