Wednesday, 31 August 2022

वृद्धावस्था -- जीवन की एक कटु वास्तविकता ---

 वृद्धावस्था --- जीवन की एक कटु वास्तविकता ---

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सत्य ही ब्रह्म (परमात्मा) है और ब्रह्म ही सत्य है| जगत के मिथ्यात्व का बोध सबको वृद्धावस्था में होता है, तब तक बहुत अधिक देर हो चुकी होती है। बुढ़ापे में कुछ भी नया कर्म नहीं होता। बुढ़ापा कैसा हो, इसका अभ्यास जवानी से ही करना पड़ता है। मेरे अनेक मित्र कहते थे कि बुढ़ापे में जब हाथ-पैर काम नहीं करेंगे, तब राम-राम करेंगे। वे सब हाय-हाय करते-करते मर गए, उनको राम का नाम याद ही नहीं आया। बुढ़ापे में कोई नहीं सुधर सकता। उस समय जैसी उसकी मनोदशा होती है वैसी ही उसका अगला जन्म होता है। कहते हैं कि यमराज के भैंसे के गले की घंटी बड़ी कर्कश होती है। उसकी ध्वनि सुनते ही मनुष्य को अपने जीवन की हर अच्छी-बुरी घटना याद आ जाती है। फिर उसे पछताने का समय भी नहीं मिलता।
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निश्चयपूर्वक भगवद्भजन रूपी अवलम्बन के कारण ही हम शास्त्रानुमोदित लक्ष्य पर आगे बढ़ पाते हैं, अन्यथा नहीं। जैसे जैसे भौतिक शरीर की आयु बढ़ती जाती है, वैसे वैसे ही हमारे पूर्व जन्मों व इस जन्म के कुछ आंतरिक कुसंस्कार जागृत होकर हमें स्वयं से दूर ले जाकर अपने अनुसार चलने को विवश करना चाहते हैं। उनसे हमें वास्तविक संघर्ष करना पड़ता है।
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हमारी अंतर्रात्मा हमें स्वयं में यानि ईश्वर में स्थित करना चाहती है, लेकिन कुछ गलत सुप्त नर्कगामी संस्कार जागृत हो कर हमें विपरीत दिशा में चलने के लिए बाध्य करने लगते हैं। हमारे मानस पटल पर हमारे समक्ष आसपास के लोगों के विचार भी दिखायी देने लगते हैं, और यह भी पता चल जाता है कि कौन कौन लोग हमारी मृत्यु की बड़ी आतुरता से प्रतीक्षा कर रहे हैं। लेकिन हम असहाय होते हैं, कुछ भी नहीं कर पाते।
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गुरु प्रदत्त साधना ही हमें ऊर्ध्वगामी सन्मार्ग पर ले जा सकती है। कूटस्थ ब्रह्म का निरंतर चैतन्य ही ऊर्ध्वगामी सन्मार्ग है जो हमें परमात्मा की ओर ले जाता है। अपनी चेतना को प्रयासपूर्वक सदा आज्ञाचक्र से ऊपर ही रखो, और भगवान का स्मरण करते रहो। गीता में भगवान स्पष्ट आश्वासन देते हैं --
"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥९:३०॥"
"क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥९:३१॥"
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अतः चिंता की कोई बात नहीं है। भगवान हमारे साथ हैं। भगवान भी तभी हमारे साथ हैं, जब हम उन्हें अपना परमप्रेम प्रदान करते हैं। गीता, रामचरितमानस आदि ग्रन्थों का स्वाध्याय करते रहो। भगवान का खूब भजन करो। कल्याण होगा। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ अगस्त २०२२

निर्विकल्प समाधि ---

 निर्विकल्प समाधि ---

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एक अनुभूति है जो हरिःकृपा से ही होती है। बिना इसको अनुभूत किए इसके बारे में सिर्फ अनुमान ही लगा सकते हैं। यह कोई पुरुषार्थ से प्राप्त होने वाली उपलब्धि नहीं, बल्कि हरिःकृपा से ही प्राप्त होने वाली एक अनुभूति है। यह अनुभूति "अनन्य भक्ति" की ही अगली अवस्था है, जहाँ स्वयं का कोई पृथक अस्तित्व नहीं रहता। विकल्प -- अनेकता में होता है, एकता में नहीं। परमात्मा में पूर्ण समर्पण को ही -- निर्विकल्प कहते हैं। निर्विकल्प में कोई अन्य नहीं होता। समभाव से परमात्मा में पूर्ण रूप से समर्पित अधिष्ठान -- निर्विकल्प समाधि है। पृथकता के बोध की समाप्ति का होना -- निर्विकल्प में प्रतिष्ठित होना है। निर्विकल्प समाधि में ही हम कह सकते है -- "शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि", क्योंकि तब कल्याणकारी ब्रह्म से अन्य कोई नहीं है। परमात्मा की अनंतता, व उससे भी परे की अनुभूति, और पूर्ण समर्पण -- निर्विकल्प समाधि है। इस देह का त्याग निर्विकल्प समाधि में सुषुम्ना मार्ग से ब्रह्मरंध्र के द्वार से, परमात्मा की अनंतता से भी परे जाकर परमशिव के चरणों में हो। अब इस संसार से मन भर गया है, यहाँ और रहने की इच्छा नहीं है। जितने दिन भी भगवती इस संसार में रखेगी, भगवद्भक्ति का अवलंबन ही एकमात्र आधार है। .
विकल्प -- अनेकता में होता है, एकता में नहीं। परमात्मा में पूर्ण समर्पण को ही -- निर्विकल्प कहते हैं। निर्विकल्प में कोई अन्य नहीं होता। सम भाव से परमात्मा में पूर्ण रूप से समर्पित अधिष्ठान -- निर्विकल्प समाधि है। पृथकता के बोध की समाप्ति का होना -- निर्विकल्प में प्रतिष्ठित होना है।
निर्विकल्प समाधि में ही हम कह सकते है -- "शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि", क्योंकि तब कल्याणकारी ब्रह्म से अन्य कोई नहीं है। कृपा शंकर
२८ अगस्त २०२२

"भव सागर" एक मानसिक सृष्टि है, भौतिक नहीं ----

 "भव सागर" एक मानसिक सृष्टि है, भौतिक नहीं

कुछ वर्षों पहले तक मैं गुरु महाराज से प्रार्थना करता था -- "गुरु रूप ब्रह्म, उतारो पार भवसागर के।" एक दिन पाया कि भवसागर तो कभी का पार हो गया। कब हुआ? कुछ पता ही नहीं चला। मन से बाहर भवसागर का कोई अस्तित्व नहीं है। हम जिस दिन अपना मन भगवान को अर्पित कर देते हैं और भगवान के अलावा कुछ भी और नहीं सोचते, उसी दिन भवसागर पार हो जाता है। रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में भगवान राम ने भवसागर को पार करने की विधि बताई है --
"नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो॥
करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा॥"
अर्थात् - यह मनुष्य का शरीर भवसागर (से तारने) के लिए बेड़ा (जहाज) है। मेरी कृपा ही अनुकूल वायु है। सद्गुरु इस मजबूत जहाज के कर्णधार (खेने वाले) हैं। इस प्रकार दुर्लभ (कठिनता से मिलने वाले) साधन सुलभ होकर (भगवत्कृपा से सहज ही) उसे प्राप्त हो गए हैं॥
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हमारी नौका (हमारी देह और अन्तःकरण) जिस पर हम यह लोकयात्रा कर रहे हैं, का कर्णधार (Helmsman) जब हम अपने सद्गुरु रूपी ब्रह्म को बना देते हैं (यानि समर्पित कर देते हैं), तब वायु की अनुकूलता (परमात्मा की कृपा) तुरंत हो जाती है। जितना गहरा हमारा समर्पण होता है, उतनी ही गति नौका की बढ़ जाती है, और सारे छिद्र भी करूणावश परमात्मा द्वारा ही भर दिए जाते हैं।
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कभी कभी कुछ काल के लिए हम अटक जाते हैं, पर अति सूक्ष्म रूप से गुरु महाराज बलात् धक्का मार कर फिर आगे कर देते हैं। धन्य हैं ऐसे सद्गगुरु जो अपने शिष्यों को कभी भटकने या अटकने नहीं देते, और निरंतर चलायमान रखते हैं। अपेक्षित सारा ज्ञान और उपदेश भी वे किसी ना किसी माध्यम से दे ही देते हैं। अतः भवसागर पार करने की चिंता छोड़ दो और -- ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः यानि ब्रह्मज्ञ होकर केवल ब्रह्म में ही स्थित होने का निरंतर प्रयास करो। यही साधना है, और यही उपासना है। अपनी नौका के कर्ण (Helm) के साथ साथ अपना हाथ भी उनके ही हाथों में सौंप दो, और उन्हें ही संचालन (Steer) करने दो। वे इस नौका के स्वामी ही नहीं, बल्कि नौका भी वे स्वयं ही हैं। इस विमान के चालक ही नहीं, विमान भी वे स्वयं ही हैं।
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ॐ तत्सत् ! ॐ शिव ॐ शिव ॐ शिव ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ अगस्त २०२२

मेरा कोई कर्तव्य नहीं है, मैं जीवनमुक्त और कृतकृत्य हूँ ---

 मेरा कोई कर्तव्य नहीं है, मैं जीवनमुक्त और कृतकृत्य हूँ ---

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जिन बंधनों से मैं बंधा हुआ हूँ, वे शीघ्र ही टूटने वाले और अस्थायी हैं। इस समय तो अस्थायी रूप से मैं इस हाड-मांस के शरीर से जुड़ा हुआ हूँ। लेकिन यह अधिक समय तक चलने वाली बात नहीं है। भगवान ने दो विपरीत दृष्टिकोणों से अपने इस संसार की अत्यंत कटु से कटु वास्तविकताओं को प्रत्यक्ष रूप से दिखाया है, जिन्हें मैं अभी भी देख रहा हूँ। मनुष्य जिनकी कल्पना ही कर सकता है, वैसे अति अति दुर्लभ अलौकिक अनुभव मुझे प्राप्त हुए हैं। जीवन के इतने गहन और कटु अनुभवों के पश्चात अंततः मैं इस निर्णय पर पहुंचा हूँ कि --
"जो व्यक्ति परमात्मा को पूर्णतः समर्पित हो जाता है, उसका कोई लौकिक कर्तव्य बाकी नहीं रहता, वह कृतकृत्य और मुक्त है।"
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परमात्मा को पूरी तरह समर्पित हो जाना हमारा सर्वोपरी कर्तव्य है। ऐसे व्यक्ति का अस्तित्व ही पूरी मनुष्यता के लिए एक वरदान है। वह पृथ्वी पर चलता-फिरता देवता है। जहाँ भी उसके चरण पड़ते हैं, वह भूमि धन्य और सनाथ हो जाती है।
अपनी बात के समर्थन में मैं गीता में भगवान श्रीकृष्ण को उद्धृत करता हूँ ---
"यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥३:१७॥"
"नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥३:१८॥"
अर्थात् - "परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमने वाला आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं रहता॥"
"इस जगत् में उस पुरुष का कृत और अकृत से कोई प्रयोजन नहीं है और न वह किसी वस्तु के लिये भूतमात्र पर आश्रित होता है॥"
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ऐसे व्यक्ति का अस्तित्व ही हमारे लिए एक वरदान है। रामचरितमानस के सुंदरकांड में हनुमान जी - सीता जी को कहते हैं --
"बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥
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कृतकृत्य और कृतार्थ -- इन दो शब्दों में सूक्ष्म भेद है। हम कृतकृत्य और कृतार्थ -- दोनों ही एक साथ हो सकते हैं। जो अपना विलय (समर्पण) परमात्मा में कर देते हैं, और परमात्मा में ही निरंतर रमण करते हैं, वे आत्माराम हो जाते हैं --
"यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति स्तब्धो भवति आत्मारामो भवति।"
यह नारद भक्ति सूत्र के प्रथम अध्याय का छठा सूत्र है, जो भक्त की तीन अवस्थाओं के बारे में बताता है। उस परम प्रेम रूपी परमात्मा को पाकर भक्त प्रेमी पहिले तो मत्त हो जाता है, फिर स्तब्ध हो जाता है और अंत में आत्माराम हो जाता है, यानि आत्मा में रमण करने लगता है। शाण्डिल्य सूत्रों में भी इस बात का अनुमोदन किया गया है। जो भी व्यक्ति अपनी आत्मा में रमण करता है उसके लिये "मैं" शब्द का कोई अस्तित्व नहीं होता।
उसके योगक्षेम की चिंता - गीता के अनुसार स्वयं भगवान करते हैं --
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
अर्थात् - अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥
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जिन लोगों में रजोगुण प्रधान होता है, वे सिर्फ कर्मयोग को ही समझ सकते हैं। आजकल के कर्मयोगी दूसरों को अज्ञानी और मूर्ख समझते हैं। भक्ति और ज्ञान को समझना उनके वश की बात नहीं है, फिर भी वे स्वयं को महाज्ञानी समझते हैं।
भक्तियोग और ज्ञानयोग को समझ पाना सतोगुण से ही संभव है।
तमोगुण प्रधान व्यक्ति को तो सिर्फ मारकाट या "जैसे को तैसा" की बात ही समझ में आ सकती है, उससे अधिक कुछ नहीं।
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परमात्मा को मैं उनकी समग्रता में नमन करता हूँ। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३० अगस्त २०२२

हमारे लिए हमारा धर्म और राष्ट्र प्रथम है, वासनाओं की पूर्ति नहीं ---

 हमारे लिए हमारा धर्म और राष्ट्र प्रथम है, वासनाओं की पूर्ति नहीं ---

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सनातन-धर्म और भारतीय-संस्कृति के उत्थान के लिए मुंबई के फिल्म उद्योग का जितनी शीघ्र नाश हो, उतना ही अच्छा है। जितनी शीघ्रता से बॉलीवुड और मुंबइया मनोरंजन उद्योग का पूर्ण पतन होगा, उतनी ही शीघ्र हमारी संस्कृति का पुनरोदय होगा। ये समाज में वासनाओं का ही विस्तार कर रहे हैं। वासनाओं का चिंतन हमारे विनाश का प्रमुख कारण है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं --
"ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥२:६२॥"
"क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥२:६३॥"
अर्थात् - "विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उसमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से इच्छा और इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है॥"
"क्रोध से उत्पन्न होता है मोह और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति के भ्रमित होने पर बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश होने से वह मनुष्य नष्ट हो जाता है॥"
ॐ तत्सत् !!
३० अगस्त २०२२

पिछले कई वर्षों से मुझसे कोई पूजा-पाठ नहीं होता ---

 पिछले कई वर्षों से मुझसे कोई पूजा-पाठ नहीं होता ---

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जब से अजपा-जप, ध्यान, और क्रिया साधनाओं का प्रादुर्भाव जीवन में हुआ है, तब से सारे बाहरी पूजा-पाठ छुट गये हैं। हमारे घर में एक बाणलिंग पर नित्य भगवान शिव का अभिषेक होता है वह मेरा पुत्र और मेरी धर्मपत्नी ही करती है। बाणलिंग के साथ साथ गोपनीय रूप से माँ नर्मदा की कृपा से प्राप्त और भी बहुत कुछ है जिसे हर किसी को बताया नहीं जा सकता।
मुझसे कोई पूजा-पाठ अब नहीं हो सकता। गीता और उपनिषदों का स्वाध्याय समय समय पर अवश्य करता रहता हूँ। इससे एक ऊर्जा प्राप्त होती है। वेदों को समझना मेरी बौद्धिक क्षमता से परे है। दर्शन शास्त्रों और ब्रह्मसूत्रों को समझने में मेरी रुचि नहीं है। ध्यान में आँखें बंद करते ही सामने कूटस्थ में भगवान वासुदेव स्वयं पद्मासन में शांभवी-मुद्रा में ध्यानस्थ बैठे हुए दिखाई देते हैं। सारी साधना वे ही करते हैं। मैं तो एक निमित्त मात्र हूँ। उन्हें निहारते-निहारते ही यह सारा जीवन व्यतीत हो जाएगा। आगे की समस्या मेरी नहीं भगवान की है। जो करना है, वह वे ही करेंगे, मैं नहीं।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३१ अगस्त २०२२

Monday, 29 August 2022

कृतकृत्य कौन है?

जो अपने सब कर्तव्यों को पूर्ण कर चुका है, और जिस का कोई भी कर्तव्य नहीं बचा है, उसे कृतकृत्य कहते हैं। कृतकृत्य कौन है? इसका उत्तर भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में बड़े स्पष्ट शब्दों में दिया है ---
"यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥३:१७॥"
"नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्िचदर्थव्यपाश्रयः॥३:१८॥"
अर्थात् -- "परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमने वाला आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं रहता॥"
"इस जगत् में उस पुरुष का कृत और अकृत से कोई प्रयोजन नहीं है और न वह किसी वस्तु के लिये भूतमात्र पर आश्रित होता है॥"
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जो व्यक्ति पूरी तरह परमात्मा को समर्पित हो चुका है, उस का अस्तित्व ही हमारे लिए एक वरदान है। वह निरंतर परमात्मा की चेतना में रहे तो उसका कोई लौकिक कर्तव्य नहीं रहता। ऐसा व्यक्ति ही "कृतकृत्य" कहला सकता है।
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रामचरितमानस के सुंदरकांड में हनुमान जी -- सीता जी को कहते हैं --
"बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥
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शब्दकोशों में कृतकृत्य और कृतार्थ शब्दों को पर्यायवाची बताया गया है, लेकिन ये पर्यायवाची नहीं हैं। दोनों के अर्थों में सूक्ष्म भेद है।
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हम कृतकृत्य और कृतार्थ -- दोनों ही एक साथ हो सकते हैं -- अपना विलय (समर्पण) परमात्मा में कर दें, और परमात्मा में ही निरंतर रमण करें। तब हमारे योगक्षेम की चिंता स्वयं भगवान करते हैं --
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
अर्थात् - अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥
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हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
२९ अगस्त २०२१