Friday, 6 May 2022

भारत तो भगवान की कृपा से ही बचा हुआ है ----

 पाकिस्तान और चीन ने भारत में गृहयुद्ध आरंभ करवाने के यथासंभव अधिकाधिक प्रयास किए हैं, लेकिन वे सफल नहीं हो पाये। भारत का सबसे अधिक अहित तो ब्रिटेन ने किया है। भारत की शिक्षा-व्यवस्था, कृषि-पद्धति, और संस्कृति को नष्ट कर भारत को आर्थिक रूप से पूरी तरह लूट कर विपन्न बनाने और भारत का विभाजन करने का दोषी ब्रिटेन है।

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अफ्रीका से अमानवीय रूप से अफ्रीकी लोगों के अपहरण और उन्हें गुलाम बनाकर बेचने का कार्य भी अंग्रेजों ने किया है। उत्तरी और दक्षिणी अमेरिकी महाद्वीपों, ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप, और न्यूज़ीलेंड के करोड़ों मूल निवासियों की हत्या कर के यूरोपीय लोगों को वहाँ बसाने का काम भी अंग्रेजों ने किया है। इसमें उन्हें पुर्तगाल और स्पेन का पूरा सहयोग मिला।
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भारत में भी सभी भारतीयों की हत्या कर के सिर्फ अंग्रेजों को ही यहाँ बसाने की योजना अंग्रेजों की थी। बंगाल में अकाल की स्थिति पैदा कर करोड़ों भारतीयो की हत्या की। इससे पूर्व उन्होने एक अंग्रेज़ जनरल James George Smith Neill की नियुक्ति सन १८५७ई. में भारत में इसी कार्य के लिए की थी। इस अंग्रेज़ जनरल नील ने पूर्वी भारत में लगभग एक करोड़ से अधिक भारतीयों की हत्या बड़ी क्रूरता से करवाई , सैंकड़ों गांवों को जला दिया और बहुत अधिक अत्याचार किया। कानपुर के आसपास के सभी निरीह ब्राह्मणों की इसने बड़ी निर्ममता से हत्या करवा दी थी और अङ्ग्रेज़ी फौज में नौकरी करने वाले अनगिनत भारतीय सिपाहियों को भी इसने मरवा दिया। इसमें उसके साथी Henry Havelock जैसे अनेक अंग्रेज़ सैनिक अधिकारी भी शामिल थे। कानपुर के पास बिठूर में तो मनुष्यों के साथ साथ वहाँ के पशु-पक्षियों की भी हत्या कर दी गई। कोई कुत्ते-बिल्ली जैसे प्राणी भी वहाँ जीवित नहीं बचे थे।
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भारत तो भगवान की कृपा से ही बचा हुआ है। भारत के विभाजन और भारत को निर्बल रखने की योजना में ब्रिटेन के साथ-साथ अमेरिका और अन्य पश्चिमी शक्तियाँ भी थीं। हमें अमेरिका से भी बहुत अधिक कूटनीति द्वारा सतर्क रहना चाहिए। अमेरिका में अभी भी इतनी सामर्थ्य है कि वह भारत में गृहयुद्ध करवा कर भारत को बहुत अधिक हानि पहुंचा सकता है।
कृपा शंकर
५ मई २०२२
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प्रख्यात विद्वान माननीय श्री अरुण कुमार उपाध्याय जी इस लेख पर टिप्पणी :--
"अंग्रेजों ने १८० करोड़ की हत्या की तथा ४५० खरब डॉलर की लूट की। केवल युद्ध में ३५० लाख मारे गये। तीन महाद्वीपों की तीन पीढ़ियों का क्रूर नरसंहार किया। उनके आने के पहले दोनों अमेरिका तथा आस्ट्रेलिया में मूल निवासियों की संख्या वर्तमान जनसंख्या से अधिक थी, क्योंकि बहुत क्षेत्र वीरान हो गये जो अब तक बस नहीं सके हैं। अभी भी युद्ध व्यवसाय से आय के लिए प्रति वर्ष करोड़ लोगों की हत्या कर रहे हैं। प्रत्यक्ष आक्रमण द्वारा ही वियतनाम, कोरिया तथा ईराक में २ करोड़ से अधिक लोगों की हत्या हुई जबकि किसी देश ने अमेरिका पर आक्रमण नहीं किया था।"
Britain robbed India of $45 trillion & Thence 1.8 billion Indians died from deprivation | MR Online
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चरणों की धूल में करूँ स्नान ---

 चरणों की धूल में करूँ स्नान

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जीवन धन्य हो गया, चरणों की धूल में स्नान जो कर लिया। इसका पता ही नहीं था। आज ही पता चला कि ये तो साक्षात् भगवान विष्णु के चरण-कमल हैं, जिनकी धूल में मैं स्नान कर रहा हूँ। अब कहीं किसी तीर्थ में जाने की आवश्यकता नहीं है। सारे तीर्थ यहीं आ गए हैं। उनके चरणों की धूल में निरंतर स्नान, और उनके चरणों के संचलन की निरंतर आ रही ध्वनि को सुनना ही मेरी एकमात्र उपासना हो गई है।
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इसका रहस्य अनावृत करूँ, उससे पूर्व विषय बदलकर एक दूसरी बात कहना चाहता हूँ, तभी मेरी बात समझ में आएगी। हम यह शरीर नहीं, एक शाश्वत आत्मा हैं। हम स्वयं को यह देह मानते हैं, यही सब पापों का मूल है। यह शरीर इस लोकयात्रा के लिए मिला हुआ एक वाहन है। जैसे हम एक मोटर-साइकिल या मोटर-कार की देखभाल करते हैं, वैसे ही इस शरीर की देखभाल करना हमारा धर्म है। जब हम यह शरीर ही नहीं हैं तब इस शरीर से जुड़े संबंधी भी हमारे संबंधी नहीं हैं। हमारा एकमात्र संबंध परमात्मा से है, जो शाश्वत है। जैसे एक रंगमंच पर अभिनय करते हैं वैसे ही सबसे अपने अपने सम्बन्धों का अभिनय करते रहो। लेकिन वास्तविकता तो यही है कि भगवान ही हमारे एकमात्र संबंधी हैं। इस संसार में सभी का जन्म अपने पूर्वजन्मों के कर्मफलों को भुगतने, और नये कर्मों की सृष्टि करने के लिए होता है। प्रकृति के तीनों गुण ही इस सृष्टि को चला रहे हैं। त्रिगुणातीत होना ही मुक्ति और मोक्ष है।
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भ्रूमध्य में दृष्टि स्थिर कर कूटस्थ में भगवान का चिंतन, मनन और ध्यान करते-करते समय के साथ शनैः शनैः सहस्त्रार में प्रणव की ध्वनि में लिपटी हुई, विद्युत् की चमक के समान देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होती है। वह कूटस्थ ब्रहमज्योति जिसे ज्योतिर्मय ब्रह्म भी कह सकते हैं, भगवान विष्णु के चरण कमल हैं। अपनी अपनी श्रद्धानुसार वे ही गुरु महाराज के चरण-कमल हैं, वे ही भगवती के पद्म-पद हैं। उन ज्योतिर्मय ब्रह्म का आलोक - भगवान के चरणों की धूल है।
उस आलोक का निरंतर विस्तार ही हमारी साधना है। उस में स्थायी स्थिति ब्राह्मी-स्थिति या कूटस्थ-चैतन्य है। उस में परमप्रेममय स्थिति -- चरणों की धूल में स्नान है।
आज अचानक ही वह ब्रह्म-ज्योति प्रकट हुई और उसकी आभा में मैं तन्मय हो गया। अदृश्य रूप से गुरु महाराज ने बताया कि यही चरणों की धूल है जिसमें तुम स्नान कर रहे हो।
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इसकी फल-श्रुति मैं नहीं लिख सकता, क्योंकि वह छोटे मुंह बड़ी बात हो जाएगी।
और कुछ भी कहने में असमर्थ हूँ। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
५ मई २०२२

भगवान की भक्ति अनन्य भाव से करें ---

 गीता के इन श्लोकों का थोड़ा चिंतन कीजिए तब समझ में आयेगा कि "अनन्य" का अर्थ क्या है। गहराई में जाने के लिए वेदान्त के दृष्टिकोण से विचार कीजिए ---

"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते|
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥९:३०॥"
"क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥९:३१॥"
अर्थात् - अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥
अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है, तो उसको साधु ही मानना चाहिये| कारण कि उसने निश्चय बहुत अच्छी तरह कर लिया है|
अर्थात् हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है| तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता॥
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हारिये ना हिम्मत, बिसारिये न हरिः नाम। जब भी समय मिले, कूटस्थ सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम का ध्यान करें। आध्यात्म की परावस्था में रहें। सारा जगत ही ब्रह्ममय है। किसी भी परिस्थिति में परमात्मा की उपासना न छोड़ें। पता नहीं कितने जन्मों में किए हुए पुण्य कर्मों के फलस्वरूप हमें भक्ति का यह अवसर मिला है। कहीं ऐसा न हो कि हमारी उपेक्षा से परमात्मा को पाने कीअभीप्सा ही समाप्त हो जाए। भगवान की भक्ति अनन्य भाव से करें। केवल भगवान ही हैं। कोई उनसे अन्य नहीं है।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
६ मई २०२२

आदि शंकराचार्य जयंती पर सभी का अभिनंदन ---

 आदि शंकराचार्य जयंती पर सभी का अभिनंदन ---

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आज स्वनामधान्य भाष्यकार भगवान आचार्य शंकर (आदिशंकराचार्य) की जयंती है। उनके बारे में सामान्य जन में यह धारणा है कि उन्होंने सिर्फ अद्वैतवाद या अद्वैत वेदांत को प्रतिपादित किया। लेकिन यह सही नहीं है। अद्वैतवाद के प्रतिपादक तो उनके परम गुरु ऋषि आचार्य गौड़पाद थे, जिन्होनें 'माण्डुक्यकारिका' ग्रन्थ की रचना की थी। आचार्य गौड़पाद ने माण्डुक्योपनिषद पर आधारित अपने ग्रन्थ मांडूक्यकारिका में जिन तत्वों का निरूपण किया, उन्हीं का आचार्य शंकर ने विस्तृत रूप दिया। अपने परम गुरु को श्रद्धा निवेदित करने हेतु आचार्य शंकर ने सबसे पहिले माण्डुक्यकारिका पर भाष्य लिखा। आचार्य शंकर -- अद्वैतवादी से अधिक एक भक्त थे। उन्होंने भक्ति को अधिक महत्व दिया। वे स्वयं श्रीविद्या के उपासक थे, और भगवान के सभी रूपों के सबसे अधिक स्तोत्रों की रचना उन्होने की। वे एक महानतम प्रतिभा थे जिसने कभी इस पृथ्वी पर विचरण किया। अपने 'विवेक चूडामणि' ग्रन्थ में वे कहते हैं -- "भक्ति प्रसिद्धा भव मोक्षनाय नात्र ततो साधनमस्ति किंचित्।" साधना का आरम्भ भी भक्ति से होता है और उसका चरम उत्कर्ष भी भक्ति में ही होता है"। उनके अनुसार भक्ति और ज्ञान -- दोनों एक ही हैं।
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आचार्य शंकर के गुरु आचार्य गोविन्दपाद थे जिन्होंने ८५ श्लोकों के ग्रन्थ 'अद्वैतानुभूति' की रचना की। उनकी और भगवान पातंजलि की गुफाएँ पास पास ओंकारेश्वर के निकट नर्मदा तट पर घने वन में हैं। वहाँ आसपास और भी गुफाएँ हैं, जहाँ अनेक सिद्ध संत तपस्यारत हैं। पूरा क्षेत्र तपोभूमि है। सत्ययुग में मान्धाता ने यहीं पर शिवजी के लिए इतनी घनघोर तपस्या की थी कि शिवजी को ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होना पड़ा जो ओंकारेश्वर कहलाता है।
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आचार्य शंकर एक बार शिष्यों के साथ कहीं जा रहे थे कि मार्ग में उन्होंने देखा कि एक वृद्ध विद्वान पंडित जी अपने शिष्यों को पाणिनि के व्याकरण के कठिन सूत्र समझा रहे थे। उन्हें देख आचार्य शंकर की भक्ति जाग उठी और उन वैयाकरण जी को भक्ति का उपदेश देने के लिए 'गोबिंद स्तोत्र' की रचना की और सुनाना आरम्भ कर दिया। यह स्तोत्र 'द्वादश मांजरिक' स्तोत्र कहलाता है। अन्य भी बहुत सारी इतनी सुन्दर उनकी भक्ति की रचनाएँ हैं जो भाव विभोर कर देती हैं। अद्वैत वेदांत तो उन्हें गुरु परम्परा से मिला था। आचार्य शंकर ने दत्तात्रेय की परम्परा में चले आ रहे संन्यास को ही एक नया रूप और नई व्यवस्था दी। उनकी परम्परा के अनेक संतों से मेरा सत्संग हुआ है जिसे मैं जीवन की एक अति उच्च उपलब्धि मानता हूँ।
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सिद्ध योगियों ने अपनी दिव्य दृष्टी से देखा था कि आचार्य गोबिन्दपाद ही अपने पूर्व जन्म में भगवान पतंजलि थे। ये अनंतदेव यानि शेषनाग के अवतार थे। इसलिए इनके महाभाष्य का दूसरा नाम फणीभाष्य भी है। कलियुगी प्राणियों पर करुणा कर के भगवान अनंतदेव शेषनाग ने इस कलिकाल में तीन बार पृथ्वी पर अवतार लिया। पहले अवतार थे भगवान पतंजलि, दूसरे आचार्य गोबिन्दपाद, और तीसरे अवतार थे वैद्यराज चरक। इस बात की पुष्टि सौलहवीं शताब्दी में महायोगी विज्ञानभिक्षु ने की है।
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आचार्य शंकर बाल्यावस्था में गुरु की खोज में सुदूर केरल के एक गाँव से पैदल चलते चलते आचार्य गोबिन्दपाद के आकषर्ण से आकर्षित होकर ओंकारेश्वर के पास के वन की एक गुफा तक चले आये। आचार्य शंकर गुफा के द्वार पर खड़े होकर स्तुति करने लगे कि हे भगवन, आप ही अनंतदेव (शेषनाग) थे, अनन्तर आप ही इस धरा पर भगवान् पतंजलि के रूप में अवतरित हुए थे, और अब आप भगवान् गोबिन्दपाद के रूप में अवतरित हुए हैं। आप मुझ पर कृपा करें। आचार्य गोबिन्दपाद ने संतुष्ट होकर पूछा --- कौन हो तुम? इस प्रश्न के उत्तर में आचार्य शंकर ने दस श्लोकों में परमात्मा अर्थात परम मैं का क्या स्वरुप है यह सुनाया। अद्वैतवाद की परम तात्विक व्याख्या बालक शंकर के मुख से सुनकर आचार्य गोबिन्दपाद ने शंकर को परमहंस संन्यास धर्म में दीक्षित किया। इस अद्वैतवाद के सिद्धांत की पहिचान आचार्य शंकर के परम गुरु ऋषि आचार्य गौड़पाद ने अपने अमर ग्रन्थ "मान्डुक्यकारिका" से कराई थी। यह अद्वैतवाद का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक ग्रन्थ है। अपने परम गुरु को श्रद्धा निवेदित करने हेतु आचार्य शंकर ने सवसे पहिले मांडूक्यकारिका पर ही भाष्य लिखा था। आचार्य गौड़पाद भी श्रीविद्या के उपासक थे।
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धन्यवाद। शिवोहम् शिवोहम् अहम् ब्रह्मास्मि॥
ॐ तत्सत् ॥
६ मई २०२२
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पुनश्च :--- आचार्य शंकर का जन्म का वर्ष ईसा के ५०८ वर्ष पूर्व वैशाख शुक्ल पंचमी को हुआ था। उनका देहावसान ईसा के ४७४ वर्ष पूर्व हुआ। पश्चिमी विद्वान् उनका जन्म ईसा के ७८८ वर्ष बाद होना बताते हैं जो गलत है। आचार्य शंकर को नमन !!

आनंदमय होना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है ---

 "यो वै भूमा तत् सुखं नाल्पे सुखमस्ति॥" -- यह वेदवाक्य मेरा आदर्श वाक्य है।

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आनंदमय होना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। आनंद और प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए ही मैं लिखता हूँ, अन्य कोई उद्देश्य नहीं है। जीवन की संपूर्णता व विराटता को त्याग कर लघुता को अपनाना मेरी बड़ी कष्टमय दुःखद विफलता थी, जिससे मैं मुक्त होने का प्रयास कर रहा हूँ। जिसे मैं ढूँढ़ रहा हूँ, वह तो 'मैं' स्वयं हूँ। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
६ मई २०२२

Sunday, 1 May 2022

मृत्यु के समय भी आप स्वयं को भगवान की गोद में ही पायेंगे ---

मृत्यु के समय भी आप स्वयं को भगवान की गोद में ही पायेंगे ---

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रात्रि को सोने से पूर्व भगवान का ध्यान निमित्त भाव से कर के इस तरह सो जाएँ जैसे एक छोटा बालक अपनी माँ की गोद में सो रहा है। अगले दिन प्रातःकाल उठेंगे, तब स्वयं को भगवान की गोद में ही पाएंगे। आप स्वयं को धन्य मानेंगे कि भगवान स्वयं ही आपको याद कर लेते हैं। यदि यही दिनचर्या बनी रहेगी तो मृत्यु के समय भी आप स्वयं को भगवान की गोद में ही पायेंगे।
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समष्टि की सबसे बड़ी सेवा है -- परमात्मा का निरंतर स्मरण !! रात्रि को सोने से पहिले और प्रातःकाल उठते ही परमात्मा का यथासंभव गहरे से गहरा ध्यान करें। परमात्मा एक प्रवाह हैं, जिन्हें स्वयं के माध्यम से प्रवाहित होने दें। वे एक रस हैं, जिन का रसास्वादन निरंतर करते रहें। अपने हृदय का पूर्ण प्रेम और स्वयं को भी उन्हें समर्पित कर दें। उनसे अन्य कोई है ही नहीं।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! 🌹🙏🕉🕉🕉🙏🌹
१ मई २०२२

(संशोधित/पुनर्प्रस्तुत). अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर अभिनंदन, बधाई और शुभ कामनाएँ ---

 (संशोधित/पुनर्प्रस्तुत).

अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर
अभिनंदन
,
बधाई
और शुभ कामनाएँ ---
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आज एक मई को विश्व श्रम-दिवस है जिसे मजदूर-दिवस भी कहते हैं। १ मई १८८६ को अमेरिका के लाखों मजदूरों ने काम का समय ८ घंटे से अधिक न रखे जाने की मांग की और हड़ताल पर चले गए। वहाँ की पुलिस ने मज़दूरों पर गोली चलाई और ७ मजदूर मर गए। तभी से पूरी दुनियाँ में काम की अवधि ८ घंटे हो गई और इस दिन को अंतर्राष्ट्रीय श्रम-दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
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१ मई १९२३ को मद्रास (अब चेन्नई) में "भारतीय मज़दूर किसान पार्टी" के नेता कॉमरेड सिंगरावेलू चेट्यार ने मद्रास हाईकोर्ट के सामने एक बड़ा प्रदर्शन किया था। उस दिन से भारत में भी मजदूरों की माँगें मान ली गईं और इस दिवस को मान्यता मिल गई।
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आध्यात्मिक उपासना की दृष्टि से हम सब भगवान के मजदूर बनें। जितनी मजदूरी करेंगे उतना ही पारिश्रमिक मिलेगा। यहाँ कोई बेईमानी और शोषण नहीं है। अतः पूरी ईमानदारी से मन लगाकर उनके लिए पूरा श्रम करें। हम २४ घंटों में से उन्हें ढाई घंटे भी नहीं दे पाते, यह बहुत आत्म-मंथन और चिंता की बात है।
"तुलसी विलंब न कीजिये, भजिये नाम सुजान।
जगत मजूरी देत है, क्यों राखें भगवान॥"
"तुलसी माया नाथ की, घट घट आन पड़ी।
किस किस को समझाइये, कुएँ भांग पड़ी॥"
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मैं जब नौकरी करता था, तब नित्य कम से कम आठ-दस घंटों तक काम करना पड़ता था तब जाकर वेतन मिलता था। फिर भी नित्य दो-तीन घंटे भगवान की मजदूरी के लिए निकाल ही लिया करता था। पर अब सेवा-निवृति के पश्चात प्रमाद और दीर्घसूत्रता जैसे विकार उत्पन्न हो रहे हैं, जिनसे विक्षेप हो रहा है। अतः इससे आत्म-ग्लानि होती है। अतः साधू, सावधान ! संभल जा, सामने नर्ककुंड की अग्नि है।
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कोई जमाना था, सभी पूर्व साम्यवादी देशों में १ मई की राष्ट्रीय छुट्टी होती थी। लोग एक-दूसरे को बधाई देते, खूब जमकर शराब पीते, मांसाहार करते, और खूब डांस करते थे। इस से अधिक उनके जीवन में कुछ था ही नहीं। यह उनके लिए ऊँची से ऊँची चीज़ थी। साम्यवाद के पतन के बाद तो मुझे कभी किसी पूर्व साम्यवादी देश में जाने का अवसर नहीं मिला। इसलिए पता नहीं वहाँ अब कैसा जीवन है। उससे पहिले, सोवियत संघ, रोमानिया, चीन, और उत्तरी कोरिया आदि देशों का खूब अनुभव है| पूर्व सोवियत संघ के रूस, यूक्रेन और लाटविया में खूब भ्रमण किया है, रूसी भाषा का भी बहुत अच्छा ज्ञान था।
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कुल मिलाकर मार्क्सवाद/साम्यवाद एक धोखा ही था। उस से किसी की अंतर्रात्मा को शांति नहीं मिली। मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, माओ, किम इल सुंग, फिडेल कास्त्रो, चे ग्वेवारा, आदि आदि किसी का भी जीवन देख लो, उनके जीवन में कुछ भी अनुकरणीय नहीं है। निजी जीवन में बहुत ही भ्रष्ट लोग थे ये।
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मार्क्सवाद वास्तव में विश्व को इंग्लैंड की देन है। अंग्रेज़ जाति विश्व की सबसे अधिक धूर्त जाति है। पूरे विश्व के सबसे अधिक खुराफ़ाती लोगों को इंग्लैंड अपने यहाँ शरण देकर रखता है। पूरे विश्व में खुराफात फैलाना ही उसकी नीति रही है। भारत के भी सारे अपराधी इंग्लैंड ही भागते हैं, और इंग्लैंड उनको शरण भी देता है। मार्क्स को जर्मनी ने निकाल दिया था। उसने अपना सारा साहित्य इंगलेंड में रह कर वहाँ की सरकार के खर्चे से लिखा। उसका पूरा साहित्य अंग्रेजों ने लिखवाया और अपने खर्चे से पूरे विश्व में बंटवाया, लेकिन खुद अपने देश इंग्लैंड में उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ने दिया। रूस को बर्बाद करने के लिए इंग्लैंड ने ही लेनिन को वहाँ भेजा, अन्यथा लेनिन तो इंग्लैंड में शरण लिए हुए एक भगौड़ा था। भारत में भी साम्यवाद इंग्लैंड से आया| एम.एन.रॉय नाम का एक अंग्रेजों का दलाल भारतीय ही मार्क्सवाद का सिद्धान्त इंग्लैंड से भारत लाया था। मार्क्सवाद के बारे में बात करना आसमान की ओर मुंह करके थूकने के बराबर है, जो खुद पर ही गिरेगा। मार्क्स एक शैतान का पुजारी, और खुद भी एक असुर शैतान था। विश्व में मार्क्सवाद विश्व को पिछड़ा हुआ रखने के लिए अंग्रेजों के शैतानी दिमाग की उपज है।
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अंत में अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस की पुनश्च मंगलमय शुभ कामनाएँ। भगवान में हम सब एक हैं। दुनियाँ के बहकावे में न आयें, और भगवान की उपासना करें। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१ मई २०२२