Monday, 28 February 2022

🌹शिवरात्रि की अनंत शुभ कामनाएँ ---

 

🌹शिवरात्रि की अनंत शुभ कामनाएँ ---
"ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च।
मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च॥"
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जीवन का मूल उद्देश्य है -- शिवत्व की प्राप्ति। शिवत्व को कैसे प्राप्त करें? इस का उत्तर है -- कूटस्थ में ओंकार रूप में परमशिव का ध्यान। यह किसी कामना की पूर्ती के लिए नहीं, बल्कि कामनाओं के नाश के लिए है। आते जाते हर साँस के साथ उनका चिंतन-मनन और समर्पण -- उनकी परम कृपा की प्राप्ति करा कर आगे का मार्ग प्रशस्त कराता है। जब मनुष्य की ऊर्ध्व चेतना जागृत होती है, तब उसे स्पष्ट ज्ञान हो जाता है कि संसार की सबसे बड़ी उपलब्धि है -- कामना और इच्छा की समाप्ति।
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जीवन में अंधकारमय प्रतिकूल झंझावात आते ही रहते हैं, जिनसे हमें विचलित नहीं होना चाहिए। इनसे तो हमारी प्रखर चेतना ही जागृत होती है, व अंतर का सौंदर्य और भी अधिक निखर कर बाहर आता है। किसी भी परिस्थिति में अपनी नियमित आध्यात्मिक उपासना न छोड़ें। बड़ी कठिनाई से हमें भगवान की भक्ति का यह अवसर मिला है। कहीं ऐसा न हो कि हमारी ही उपेक्षा से भगवान को पाने की हमारी अभीप्सा ही समाप्त हो जाए। कभी भी विचलित न हों। हम सब सच्चिदानंद परमात्मा परमशिव की ही अभिव्यक्तियाँ हैं।
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श्रुति भगवती कहती है -- ‘शिवो भूत्वा शिवं यजेत्’ यानि शिव बनकर शिव की उपासना करो। जिन्होने वेदान्त को निज जीवन में अनुभूत किया है वे तो इस तथ्य को समझ सकते हैं, पर जिन्होने गीता का गहन स्वाध्याय किया है वे भी अंततः इसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे। तत्व रूप में शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। गीता के भगवान वासुदेव ही वेदान्त के ब्रह्म हैं। वे ही परमशिव हैं।
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"शिव" का अर्थ शिवपुराण के अनुसार -- जिन से जगत की रचना, पालन और नाश होता है, जो इस सारे जगत के कण कण में संव्याप्त है, वे शिव हैं। जो समस्त प्राणधारियों की हृदय-गुहा में निवास करते हैं, जो सर्वव्यापी और सबके भीतर रम रहे हैं, वे ही शिव हैं।
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हारिये ना हिम्मत, बिसारिये न हरि नाम। सब को शुभ कामनाएँ और नमन।
ॐ नमः शिवाय॥ ॐ नमः शिवाय॥ ॐ नमः शिवाय॥ ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
झूञ्झुणु (राजस्थान)
१ मार्च २०२२

अनन्य द्वेषयोग ---

भगवान इतने दयालु हैं कि अपने से अनन्य-द्वेष करने वाले को भी वे वही गति प्रदान करते हैं जो अनन्य-प्रेम करने वाले को देते हैं| एक अनन्य-द्वेषयोग भी होता है, जहाँ द्वेष करने वाला दिन-रात केवल भगवान का ही चिंतन करता है, चाहे वह गाली देकर या दुर्भावना से ही करता हो| इसलिए भगवान को दिन-रात गाली देने और बुरा बोलने वाले भी अंततः भगवान को ही प्राप्त होते हैं| यही सनातन धर्म की महानता है| यहाँ किसी को नर्क की भयावह अग्नि में अनंत काल तक तड़पाया नहीं जाता|
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अतः हे लिबरल सेकुलर दुराचारी वामपंथियो, तुम लोग, शिशुपाल की तरह दिन-रात हमारे भगवान को गाली देते रहो, लेकिन तुम्हारा उद्धार हमारे भगवान ही करेंगे|
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भगवान श्रीराम ने जब ताड़का को देखा तो देखते ही अस्त्रप्रहार कर उसका वध कर दिया क्योंकि वह आततायी थी| उन्होंने तो उससे बात भी नहीं की, और यह भी नहीं सोचा कि वह महिला थी| उस जमाने में महिला-आयोग नहीं था| भगवान श्रीराम तो हमारे परमादर्श हैं| इस सन्दर्भ में रामचरितमानस की चौपाई बहुत गम्भीर है --
"चले जात मुनि दीन्हि देखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई॥
एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा॥"
भावार्थ -- मार्ग में चले जाते हुए मुनि ने ताड़का को दिखलाया। शब्द सुनते ही वह क्रोध करके दौड़ी। राम ने एक ही बाण से उसके प्राण हर लिए और दीन जानकर उसको निजपद (अपना दिव्य स्वरूप) दिया। भगवान् ने उसका वध तो किया है, पर साथ में उसको दीन जान कर उस पर कृपा भी की है, और उसको अपना परम पद भी दिया है| अन्दर से हृदय में गहन प्रेम, लेकिन बाहर से अपराधी को ज्ञान कराने के लिये दंड देना--- यही तो विशेषता है हमारे भगवान की|
जब तक ऐसा ही प्रेम हमारे हृदय में अपने शत्रु के प्रति न आये, तब तक हम भगवान् राम का अनुकरण करने का दम्भ नहीं भर सकते|
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भगवान श्रीकृष्ण ने अनेक असुरों का वध किया, लेकिन उनके मन में कभी किसी के प्रति क्रोध या घृणा जागृत नहीं हुई| पूतना को मारा तो पूतना का उद्धार हो गया, शिशुपाल को मारा तो शिशुपाल का उद्धार हो गया| महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ पर सारथी के रूप में जब वे बैठते थे तो उनकी छवि बड़ी मनमोहक और मंत्रमुग्ध करने वाली होती थी| जो भी उनकी ओर देखता वह स्तब्ध हो जाता था| इतने में अर्जुन उनके प्राण ले लेता; और उन सब की सदगति ही होती| भगवान श्रीकृष्ण ने तो यहाँ तक कहा है कि --
"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते| हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते||१८:१७||"
अर्थात् जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है||
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भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण ने जितने भी दुष्ट असुरों का बध किया, उन सब की सदगति हुई| वे सारे के सारे असुर, भगवान से द्वेष रखते थे| भगवान की दृष्टि में शबरी तथा ताड़का में कोई भेद नहीं, क्योंकि दोनों को उन्होंने वही परमपद दिया है| हां, देने के तरीके में भेद है, लेकिन वह भेद क्षणिक है, कुछ क्षणों बाद दोनों को वही एक पद मिल जाता है|
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किसी भी मज़हब या रिलीजन में शैतान या आसुरी वृत्ति वाले लोगों को भगवान की प्राप्ति नहीं होती, मिलता है तो उन्हें केवल जहन्नुम| लेकिन सनातन धर्म भगवान से द्वेष करने वालों को जहन्नुम नहीं, भगवान की प्राप्ति कराता है| इसी को कहते हैं द्वेषयोग, यानी परमात्मा से अनन्य द्वेष करके उनके साथ संयोग प्राप्त करना|
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शुकदेव जी ने भागवत में कहा है --
"उक्तं पुरस्तादेतत्ते चैद्यः सिद्धिं यथा गतः, द्विषन्नपि हृषीकेशं किमुताधोक्षजप्रियाः|"
अर्थात् हे परीक्षित, मैं आपको पहले ही बता चुका कि किस प्रकार शिशुपाल व कंस आदि भगवान् श्री कृष्ण से द्वेष करके भी सिद्धि को प्राप्त हो गये, फिर व्रज की गोपियों का तो कहना ही क्या!!
आप सब के हृदय में परमात्मा के प्रति प्रेम जागृत हो| सब का कल्याण हो|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ मार्च २०२१
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भगवान इतने दयालु हैं कि अपने से अनन्य-द्वेष करने वाले को भी वे वही गति प्रदान करते हैं जो अनन्य-प्रेम करने वाले को देते हैं| एक अनन्य-द्वेषयोग भी होता है, जहाँ द्वेष करने वाला दिन-रात केवल भगवान का ही चिंतन करता है, चाहे वह गाली देकर या दुर्भावना से ही करता हो| इसलिए भगवान को दिन-रात गाली देने और बुरा बोलने वाले भी अंततः भगवान को ही प्राप्त होते हैं| यही सनातन धर्म की महानता है| यहाँ किसी को नर्क की भयावह अग्नि में अनंत काल तक तड़पाया नहीं जाता|
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अतः हे लिबरल सेकुलर दुराचारी वामपंथियो, तुम लोग, शिशुपाल की तरह दिन-रात हमारे भगवान को गाली देते रहो, लेकिन तुम्हारा उद्धार हमारे भगवान ही करेंगे|
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भगवान श्रीराम ने जब ताड़का को देखा तो देखते ही अस्त्रप्रहार कर उसका वध कर दिया क्योंकि वह आततायी थी| उन्होंने तो उससे बात भी नहीं की, और यह भी नहीं सोचा कि वह महिला थी| उस जमाने में महिला-आयोग नहीं था| भगवान श्रीराम तो हमारे परमादर्श हैं| इस सन्दर्भ में रामचरितमानस की चौपाई बहुत गम्भीर है --
"चले जात मुनि दीन्हि देखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई॥
एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा॥"
भावार्थ -- मार्ग में चले जाते हुए मुनि ने ताड़का को दिखलाया। शब्द सुनते ही वह क्रोध करके दौड़ी। राम ने एक ही बाण से उसके प्राण हर लिए और दीन जानकर उसको निजपद (अपना दिव्य स्वरूप) दिया। भगवान् ने उसका वध तो किया है, पर साथ में उसको दीन जान कर उस पर कृपा भी की है, और उसको अपना परम पद भी दिया है| अन्दर से हृदय में गहन प्रेम, लेकिन बाहर से अपराधी को ज्ञान कराने के लिये दंड देना--- यही तो विशेषता है हमारे भगवान की|
जब तक ऐसा ही प्रेम हमारे हृदय में अपने शत्रु के प्रति न आये, तब तक हम भगवान् राम का अनुकरण करने का दम्भ नहीं भर सकते|
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भगवान श्रीकृष्ण ने अनेक असुरों का वध किया, लेकिन उनके मन में कभी किसी के प्रति क्रोध या घृणा जागृत नहीं हुई| पूतना को मारा तो पूतना का उद्धार हो गया, शिशुपाल को मारा तो शिशुपाल का उद्धार हो गया| महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ पर सारथी के रूप में जब वे बैठते थे तो उनकी छवि बड़ी मनमोहक और मंत्रमुग्ध करने वाली होती थी| जो भी उनकी ओर देखता वह स्तब्ध हो जाता था| इतने में अर्जुन उनके प्राण ले लेता; और उन सब की सदगति ही होती| भगवान श्रीकृष्ण ने तो यहाँ तक कहा है कि --
"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते| हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते||१८:१७||"
अर्थात् जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है||
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भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण ने जितने भी दुष्ट असुरों का बध किया, उन सब की सदगति हुई| वे सारे के सारे असुर, भगवान से द्वेष रखते थे| भगवान की दृष्टि में शबरी तथा ताड़का में कोई भेद नहीं, क्योंकि दोनों को उन्होंने वही परमपद दिया है| हां, देने के तरीके में भेद है, लेकिन वह भेद क्षणिक है, कुछ क्षणों बाद दोनों को वही एक पद मिल जाता है|
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किसी भी मज़हब या रिलीजन में शैतान या आसुरी वृत्ति वाले लोगों को भगवान की प्राप्ति नहीं होती, मिलता है तो उन्हें केवल जहन्नुम| लेकिन सनातन धर्म भगवान से द्वेष करने वालों को जहन्नुम नहीं, भगवान की प्राप्ति कराता है| इसी को कहते हैं द्वेषयोग, यानी परमात्मा से अनन्य द्वेष करके उनके साथ संयोग प्राप्त करना|
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शुकदेव जी ने भागवत में कहा है --
"उक्तं पुरस्तादेतत्ते चैद्यः सिद्धिं यथा गतः, द्विषन्नपि हृषीकेशं किमुताधोक्षजप्रियाः|"
अर्थात् हे परीक्षित, मैं आपको पहले ही बता चुका कि किस प्रकार शिशुपाल व कंस आदि भगवान् श्री कृष्ण से द्वेष करके भी सिद्धि को प्राप्त हो गये, फिर व्रज की गोपियों का तो कहना ही क्या!!
आप सब के हृदय में परमात्मा के प्रति प्रेम जागृत हो| सब का कल्याण हो|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ मार्च २०२१

जब भी समय मिले तब कूटस्थ सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम का ध्यान करें ---

 जब भी समय मिले तब कूटस्थ सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम का ध्यान करें| गीता में जिस ब्राह्मी स्थिति की बात कही गई है, निश्चय पूर्वक प्रयास करते हुए आध्यात्म की उस परावस्था में रहें| सारा जगत ही ब्रह्ममय है| हमारे हृदय में इतनी पवित्रता हो जिसे देखकर श्वेत कमल भी शरमा जाए| किसी भी परिस्थिति में परमात्मा के अपने इष्ट स्वरूप की उपासना न छोड़ें| पता नहीं कितने जन्मों में किए हुए पुण्य कर्मों के फलस्वरूप हमें भक्ति का यह अवसर मिला है| कहीं ऐसा न हो कि हमारी ही उपेक्षा से परमात्मा को पाने की हमारी अभीप्सा ही समाप्त हो जाए| जीवन में अंधकारमय प्रतिकूल झंझावात आते ही रहते हैं जिनसे हमें विचलित नहीं होना चाहिए| इनसे तो हमारी प्रखर चेतना ही जागृत होती है व अंतर का सौंदर्य और भी अधिक निखर कर बाहर आता है|

आप सब परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्तियाँ हैं| आप सब को नमन !!
कृपा शंकर
१ मार्च २०२१

Sunday, 27 February 2022

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ---

आज प्रातः गीता के अठारहवें अध्याय के सत्रहवें श्लोक पर स्वाध्याय और चर्चा कर रहा था, पर उस से अभी तक मन नहीं भरा है, इसलिए दुबारा उस की चर्चा कर रहा हूँ| वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण का यह एक बहुत बड़ा संदेश है ---

"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते| हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते||१८:१७||
अर्थात् जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है||
इस विषय पर स्वनामधन्य अनेक महान आचार्यों ने बड़ी विद्वतापूर्ण टीकायें की हैं| इसका स्वाध्याय और मनन कर सभी को इसे अपने निज आचरण में लाना चाहिए| इस पर मैंने विचार किया तो पाया कि मुझ अकिंचन के वश की यह बात नहीं है| पर जब भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कुछ कह रहे हैं तब इसे गंभीरता से लेना ही पड़ेगा|
मुझे कुछ भी आता-जाता नहीं है, इस लिए हे प्रभु, मैं स्वयं को ही पूर्ण रूपेण आपको समर्पित करता हूँ| सिर्फ आप ही मेरे हैं, और मैं आपका हूँ| बुद्धि तो मुझमें है ही नहीं| मेरी यह अति अल्प और सीमित बुद्धि आपको ही बापस करता हूँ| मुझे यह भी नहीं चाहिए| साथ-साथ यह मन, चित्त और अहंकार भी आपको ही बापस कर रहा हूँ| मुझे आपके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं चाहिए| ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ फरवरी २०२०

निरंतर अभ्यास, और वैराग्य, दोनों ही साधना-मार्ग पर आवश्यक हैं ---

 निरंतर अभ्यास, और वैराग्य, दोनों ही साधना-मार्ग पर आवश्यक हैं| इनके बिना मन पर नियंत्रण नहीं होता| मनुष्य की संकल्प-शक्ति से बहुत अधिक शक्तिशाली तो किसी भी मनुष्य के चारों ओर का वातावरण होता है| यदि वातावरण नकारात्मक हो तो सारे संकल्प धरे के धरे रह जाते हैं|

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जब भी जीवन में परमात्मा की एक थोड़ी सी भी झलक मिले, उसी समय विरक्त हो जाना चाहिए| हमारे चारों ओर का वातावरण यदि नकारात्मक है तो हम किसी भी तरह की आध्यात्मिक प्रगति नहीं कर पाते| समाज में घर-परिवार के सदस्यों का प्रभाव नकारात्मक ही होता है, वे नहीं चाहते कि हमारी आध्यात्मिक प्रगति हो| हम उन के मोहजाल में फँस कर वहीं के वहीं रह जाते हैं|
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अब रही कर्तव्य की बात| किसी बड़े कर्तव्य की पूर्ति के लिए यदि उस से छोटे कर्तव्य की उपेक्षा कर दी जाये तो कोई पाप नहीं होता| हमारा सब से बड़ा कर्तव्य है -- परमात्मा की प्राप्ति| परमात्मा की प्राप्ति के लिए यदि घर-परिवार को त्याग भी दिया जाये तो इसमें कोई पाप नहीं है|
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यदि इस जन्म में हम विरक्त नहीं हो पाते हैं, तो कोई ग्लानि मत करें| अगले जन्म में भगवान हमें वैराग्यवान होने के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान करेंगे| वृद्धावस्था में कोई भजन-बंदगी नहीं हो सकती| युवावस्था ही आध्यात्मिक साधना के अनुकूल होती है|
ॐ तत्सत् !!
२७ फरवरी २०२१

Saturday, 26 February 2022

"रघुपति राघव राजाराम। पतित पावन सीताराम॥" ---

 पंडित लक्ष्मणाचार्य जी ने अपने ग्रंथ "श्री नमः रामनायनम" में एक भजन लिखा था जो इस प्रकार था ---

"रघुपति राघव राजाराम। पतित पावन सीताराम।।
सुंदर विग्रह मेघाश्याम। गंगा तुलसी शालीग्राम।।
भद्रगिरीश्वर सीताराम। भक्त-जनप्रिय सीताराम।।
जानकीरमणा सीताराम। जय जय राघव सीताराम।।"
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उपरोक्त भजन को पूर्व बेरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधीजी ने बदल कर यह रूप दे दिया --
"रघुपति राघव राजाराम। पतित पावन सीताराम।।
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम। सब को सन्मति दे भगवान।।"
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सन १९४८ में एक फिल्म आयी थी - "श्री राम भक्त हनुमान"| उस फिल्म में भी इस भजन का मूल स्वरुप उपलब्ध है| ये पंक्तियाँ सिर्फ सत्य का बोध कराने के लिए हैं| सत्य के पुजारी गांधीजी का मैं पूर्ण सम्मान करता हूँ| यहाँ वे चूक गए और एक असत्य को सत्य बना दिया|
२६ फरवरी २०२१

हरिः, मैं तेरा निरंतर हूँ, और निरंतर तेरा ही रहूँगा| ---

हरिः, मैं तेरा निरंतर हूँ, और निरंतर तेरा ही रहूँगा| तुम्हें पाने की क्षमता इस समय मुझ में नहीं है तो कोई बात नहीं; एक न एक दिन तुम्हारी कृपा से वह भी अवश्य ही होगी| तुम भी मुझ से दूर अब नहीं रह सकते| तुम्हें पाने की पात्रता मुझ में तुम्हें अविलंब विकसित करनी ही होगी|

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ब्रह्मतेज -- कोई अवधारणा मात्र नहीं, एक सत्य है जिसको मैं इस समय भी प्रत्यक्ष अनुभूत कर रहा हूँ| पर उसे धारण करने की क्षमता इस समय मुझ में नहीं है| हो सकता है उसके लिए मुझे और जन्म लेने पड़ें| यह वैसे ही है जैसे एक चौबीस वोल्ट के बल्ब में ग्यारह हज़ार वोल्ट की विद्युत जोड़ दी जाये| उस ब्रह्मतेज को इस देह में अवतरित करने का अभी प्रयास करूंगा तो यह देह उसी समय नष्ट हो जायेगी| इस देह में इतनी सामर्थ्य नहीं है कि उसके तेज को सहन कर सके|
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इसकी पात्रता के लिए मनसा-वाचा-कर्मणा अखंड ब्रह्मचर्य, सात्विक तपस्वी विरक्त जीवन, व गुरुओं और परमात्मा का आशीर्वाद चाहिए| मैं आध्यात्मिक मार्ग पर बहुत देरी से आया| उस से पूर्व, कुछ पूर्वजन्म के संस्कारों के कारण म्लेच्छ लोगों, म्लेच्छ वातावरण, व म्लेच्छ देशों में भी रहना और भ्रमण करना पड़ा| जीवन में जो शुचिता रहनी चाहिए थी, वह नहीं थी| लेकिन परमात्मा की कृपा मुझ अकिंचन पर है, और उनसे आश्वासन भी प्राप्त है कि आत्म-तत्व में मेरी प्रतिष्ठा निश्चित रूप से एक न एक दिन अवश्य होगी|
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सच्चिदानंद तो मिलेंगे ही, आज नहीं तो कल या उसके पश्चात ही सही| मैं आनंदित हूँ| और कुछ भी नहीं चाहिए| उनकी चेतना अन्तःकरण में बनी रहे|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ फरवरी २०२१