Monday, 28 February 2022

जब भी समय मिले तब कूटस्थ सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम का ध्यान करें ---

 जब भी समय मिले तब कूटस्थ सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम का ध्यान करें| गीता में जिस ब्राह्मी स्थिति की बात कही गई है, निश्चय पूर्वक प्रयास करते हुए आध्यात्म की उस परावस्था में रहें| सारा जगत ही ब्रह्ममय है| हमारे हृदय में इतनी पवित्रता हो जिसे देखकर श्वेत कमल भी शरमा जाए| किसी भी परिस्थिति में परमात्मा के अपने इष्ट स्वरूप की उपासना न छोड़ें| पता नहीं कितने जन्मों में किए हुए पुण्य कर्मों के फलस्वरूप हमें भक्ति का यह अवसर मिला है| कहीं ऐसा न हो कि हमारी ही उपेक्षा से परमात्मा को पाने की हमारी अभीप्सा ही समाप्त हो जाए| जीवन में अंधकारमय प्रतिकूल झंझावात आते ही रहते हैं जिनसे हमें विचलित नहीं होना चाहिए| इनसे तो हमारी प्रखर चेतना ही जागृत होती है व अंतर का सौंदर्य और भी अधिक निखर कर बाहर आता है|

आप सब परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्तियाँ हैं| आप सब को नमन !!
कृपा शंकर
१ मार्च २०२१

Sunday, 27 February 2022

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ---

आज प्रातः गीता के अठारहवें अध्याय के सत्रहवें श्लोक पर स्वाध्याय और चर्चा कर रहा था, पर उस से अभी तक मन नहीं भरा है, इसलिए दुबारा उस की चर्चा कर रहा हूँ| वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण का यह एक बहुत बड़ा संदेश है ---

"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते| हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते||१८:१७||
अर्थात् जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है||
इस विषय पर स्वनामधन्य अनेक महान आचार्यों ने बड़ी विद्वतापूर्ण टीकायें की हैं| इसका स्वाध्याय और मनन कर सभी को इसे अपने निज आचरण में लाना चाहिए| इस पर मैंने विचार किया तो पाया कि मुझ अकिंचन के वश की यह बात नहीं है| पर जब भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कुछ कह रहे हैं तब इसे गंभीरता से लेना ही पड़ेगा|
मुझे कुछ भी आता-जाता नहीं है, इस लिए हे प्रभु, मैं स्वयं को ही पूर्ण रूपेण आपको समर्पित करता हूँ| सिर्फ आप ही मेरे हैं, और मैं आपका हूँ| बुद्धि तो मुझमें है ही नहीं| मेरी यह अति अल्प और सीमित बुद्धि आपको ही बापस करता हूँ| मुझे यह भी नहीं चाहिए| साथ-साथ यह मन, चित्त और अहंकार भी आपको ही बापस कर रहा हूँ| मुझे आपके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं चाहिए| ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ फरवरी २०२०

निरंतर अभ्यास, और वैराग्य, दोनों ही साधना-मार्ग पर आवश्यक हैं ---

 निरंतर अभ्यास, और वैराग्य, दोनों ही साधना-मार्ग पर आवश्यक हैं| इनके बिना मन पर नियंत्रण नहीं होता| मनुष्य की संकल्प-शक्ति से बहुत अधिक शक्तिशाली तो किसी भी मनुष्य के चारों ओर का वातावरण होता है| यदि वातावरण नकारात्मक हो तो सारे संकल्प धरे के धरे रह जाते हैं|

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जब भी जीवन में परमात्मा की एक थोड़ी सी भी झलक मिले, उसी समय विरक्त हो जाना चाहिए| हमारे चारों ओर का वातावरण यदि नकारात्मक है तो हम किसी भी तरह की आध्यात्मिक प्रगति नहीं कर पाते| समाज में घर-परिवार के सदस्यों का प्रभाव नकारात्मक ही होता है, वे नहीं चाहते कि हमारी आध्यात्मिक प्रगति हो| हम उन के मोहजाल में फँस कर वहीं के वहीं रह जाते हैं|
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अब रही कर्तव्य की बात| किसी बड़े कर्तव्य की पूर्ति के लिए यदि उस से छोटे कर्तव्य की उपेक्षा कर दी जाये तो कोई पाप नहीं होता| हमारा सब से बड़ा कर्तव्य है -- परमात्मा की प्राप्ति| परमात्मा की प्राप्ति के लिए यदि घर-परिवार को त्याग भी दिया जाये तो इसमें कोई पाप नहीं है|
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यदि इस जन्म में हम विरक्त नहीं हो पाते हैं, तो कोई ग्लानि मत करें| अगले जन्म में भगवान हमें वैराग्यवान होने के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान करेंगे| वृद्धावस्था में कोई भजन-बंदगी नहीं हो सकती| युवावस्था ही आध्यात्मिक साधना के अनुकूल होती है|
ॐ तत्सत् !!
२७ फरवरी २०२१

Saturday, 26 February 2022

"रघुपति राघव राजाराम। पतित पावन सीताराम॥" ---

 पंडित लक्ष्मणाचार्य जी ने अपने ग्रंथ "श्री नमः रामनायनम" में एक भजन लिखा था जो इस प्रकार था ---

"रघुपति राघव राजाराम। पतित पावन सीताराम।।
सुंदर विग्रह मेघाश्याम। गंगा तुलसी शालीग्राम।।
भद्रगिरीश्वर सीताराम। भक्त-जनप्रिय सीताराम।।
जानकीरमणा सीताराम। जय जय राघव सीताराम।।"
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उपरोक्त भजन को पूर्व बेरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधीजी ने बदल कर यह रूप दे दिया --
"रघुपति राघव राजाराम। पतित पावन सीताराम।।
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम। सब को सन्मति दे भगवान।।"
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सन १९४८ में एक फिल्म आयी थी - "श्री राम भक्त हनुमान"| उस फिल्म में भी इस भजन का मूल स्वरुप उपलब्ध है| ये पंक्तियाँ सिर्फ सत्य का बोध कराने के लिए हैं| सत्य के पुजारी गांधीजी का मैं पूर्ण सम्मान करता हूँ| यहाँ वे चूक गए और एक असत्य को सत्य बना दिया|
२६ फरवरी २०२१

हरिः, मैं तेरा निरंतर हूँ, और निरंतर तेरा ही रहूँगा| ---

हरिः, मैं तेरा निरंतर हूँ, और निरंतर तेरा ही रहूँगा| तुम्हें पाने की क्षमता इस समय मुझ में नहीं है तो कोई बात नहीं; एक न एक दिन तुम्हारी कृपा से वह भी अवश्य ही होगी| तुम भी मुझ से दूर अब नहीं रह सकते| तुम्हें पाने की पात्रता मुझ में तुम्हें अविलंब विकसित करनी ही होगी|

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ब्रह्मतेज -- कोई अवधारणा मात्र नहीं, एक सत्य है जिसको मैं इस समय भी प्रत्यक्ष अनुभूत कर रहा हूँ| पर उसे धारण करने की क्षमता इस समय मुझ में नहीं है| हो सकता है उसके लिए मुझे और जन्म लेने पड़ें| यह वैसे ही है जैसे एक चौबीस वोल्ट के बल्ब में ग्यारह हज़ार वोल्ट की विद्युत जोड़ दी जाये| उस ब्रह्मतेज को इस देह में अवतरित करने का अभी प्रयास करूंगा तो यह देह उसी समय नष्ट हो जायेगी| इस देह में इतनी सामर्थ्य नहीं है कि उसके तेज को सहन कर सके|
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इसकी पात्रता के लिए मनसा-वाचा-कर्मणा अखंड ब्रह्मचर्य, सात्विक तपस्वी विरक्त जीवन, व गुरुओं और परमात्मा का आशीर्वाद चाहिए| मैं आध्यात्मिक मार्ग पर बहुत देरी से आया| उस से पूर्व, कुछ पूर्वजन्म के संस्कारों के कारण म्लेच्छ लोगों, म्लेच्छ वातावरण, व म्लेच्छ देशों में भी रहना और भ्रमण करना पड़ा| जीवन में जो शुचिता रहनी चाहिए थी, वह नहीं थी| लेकिन परमात्मा की कृपा मुझ अकिंचन पर है, और उनसे आश्वासन भी प्राप्त है कि आत्म-तत्व में मेरी प्रतिष्ठा निश्चित रूप से एक न एक दिन अवश्य होगी|
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सच्चिदानंद तो मिलेंगे ही, आज नहीं तो कल या उसके पश्चात ही सही| मैं आनंदित हूँ| और कुछ भी नहीं चाहिए| उनकी चेतना अन्तःकरण में बनी रहे|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ फरवरी २०२१

Thursday, 24 February 2022

भगवान को भूलना ब्रह्महत्या का पाप है ---

 भगवान को भूलना ब्रह्महत्या का पाप है ---

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ब्रह्महत्या को सबसे बड़ा पाप माना गया है| ब्रह्महत्या के दो अर्थ हैं -- एक तो अपने अन्तस्थ परमात्मा को विस्मृत कर देना, और दूसरा है किसी ब्रह्मनिष्ठ महात्मा की ह्त्या कर देना| श्रुति भगवती कहती है कि अपने आत्मस्वरूप को विस्मृत कर देना, उसका हनन यानि ह्त्या है| हमारे कूटस्थ ह्रदय में सच्चिदानन्द ब्रह्म यानि स्वयं परमात्मा बैठे हुए हैं| उनको भूलना, उनकी हत्या करना है|
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हम संसार की हर वस्तु की ओर ध्यान देते हैं लेकिन परमात्मा की ओर नहीं| हम कहते हैं कि हमारा यह कर्तव्य बाकी है और वह कर्तव्य बाकी है पर सबसे बड़े कर्तव्य को भूल जाते हैं कि हमें ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना है| जो लोग कहते हैं कि हमारा समय अभी तक नहीं आया है, उनका समय कभी आयेगा भी नहीं|
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सांसारिक उपलब्धियों को ही हम अपनी महत्वाकांक्षा, लक्ष्य और दायित्व बना लेते हैं| पारिवारिक, सामाजिक व सामुदायिक सेवा कार्य हमें करने चाहियें क्योंकि इनसे पुण्य मिलता है, पर इनसे आत्म-साक्षात्कार नहीं होता|
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आजकल गुरु बनने और गुरु बनाने का भी खूब प्रचलन हो रहा है| गुरु पद पर हर कोई आसीन नहीं हो सकता| एक ब्रह्मनिष्ठ, श्रौत्रीय और परमात्मा को उपलब्ध हुआ महात्मा ही गुरु हो सकता है, जिसे अपने गुरु द्वारा अधिकार मिला हुआ हो|
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हमारे माता पिता परमात्मा के अवतार हैं, उनका पूर्ण सम्मान होना चाहिए| प्रातः और सायं विधिवत साधना, और निरंतर प्रभु का स्मरण करें| गीता के कम से कम पाँच श्लोकों का नित्य पाठ करें| कुसंग का सर्वदा त्याग करें| सब प्रकार के नशे का त्याग, और सात्विक भोजन करें| जो इतना ही कर लेंगे, उन्हें भगवान की प्राप्ति हो जाएगी|
सभी को शुभ कामनाएँ और नमन! ॐ तत्सत्!
कृपा शंकर
२५ फरवरी २०२१

हम परमात्मा को अपने ऊर्ध्वस्थ मूल (कूटस्थ) में ढूंढें ---

 हम परमात्मा को अपने ऊर्ध्वस्थ मूल (कूटस्थ) में ढूंढें ---

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हम प्रत्यक्ष परमात्मा की उपासना करें, न कि उनकी अभिव्यक्तियों या प्रतीकों की| भगवान गीता में कहते हैं ---.
"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् | छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ||१५:१||"
श्री भगवान् ने कहा -- (ज्ञानी पुरुष इस संसार वृक्ष को) ऊर्ध्वमूल और अध:शाखा वाला अश्वत्थ और अव्यय कहते हैं; जिसके पर्ण छन्द अर्थात् वेद हैं, ऐसे (संसार वृक्ष) को जो जानता है, वह वेदवित् है||
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यह श्लोक हमें कठोपनिषद् में वर्णित अश्वत्थ वृक्ष का स्मरण कराता है| कठोपनिषद में यमराज ने ब्रह्म की उपमा पीपल के उस वृक्ष से की है, जो इस ब्रह्माण्ड के मध्य उलटा लटका हुआ है, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं, और शाखाएँ नीचे की ओर लटकी हुई हैं| यह सृष्टि का सनातन वृक्ष है जो विशुद्ध, अविनाशी और निर्विकल्प ब्रह्म का ही रूप है|
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कठोपनिषद् के द्वितीय अध्याय की तृतीय वल्ली का प्रथम मन्त्र कहता है ---
"ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाखः एषोऽश्वत्थः सनातनः | तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते |
तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन || एतद् वै तत् ||१||"
अर्थात् ऊपर की ओर मूलवाला और नीचे की ओर शाखावाला यह सनातन अश्वत्थ वृक्ष है| वह ही विशुद्ध तत्व है वह (ही) ब्रह्म है| समस्त लोक उसके आश्रित हैं, कोई भी उसका उल्लघंन नही कर सकता| यही तो वह है (जिसे तुम जानना चाहते हो)|
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अश्वत्थ शब्द में श्व का अर्थ आगामी कल है, त्थ का अर्थ है स्थित रहने वाला| अतः अश्वत्थ का अर्थ होगा --- वह जो कल अर्थात् अगले क्षण पूर्ववत् स्थित नहीं रहने वाला है| अश्वत्थ शब्द से इस सम्पूर्ण अनित्य और परिवर्तनशील दृश्यमान जगत् की ओर संकेत किया गया है| इस श्लोक में कहा गया है कि इस अश्वत्थ का मूल ऊर्ध्व में अर्थात् ऊपर है|
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इस संसार वृक्ष का मूल ऊर्ध्व कहा गया है जो सच्चिदानन्द ब्रह्म है| वृक्ष को आधार तथा पोषण अपने ही मूल से ही प्राप्त होता है| इसी प्रकार हमें भी हमारा भरण-पोषण सच्चिदानंद ब्रह्म से ही प्राप्त होता है| हमें हमारे ऊर्ध्वमूल को पाने का ही निरंतर प्रयास करना चाहिए, यही हमारा सर्वोपरी कर्तव्य है| यही सबसे बड़ी सेवा है जो हम दूसरों के लिए कर सकते हैं| जो इस जीवन वृक्ष के रहस्य को समझ लेता है वही वेदवित है|
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हमारा ऊर्ध्वमूल कूटस्थ है| ध्यान साधना द्वारा कूटस्थ में ही हमें परमात्मा का अनुसंधान करना होगा| इसकी विधि उपनिषदों में व गीता में दी हुई है,पर कोई समझाने वाला सिद्ध आचार्य चाहिए जो श्रौत्रीय और ब्रह्मनिष्ठ भी हो| जिस दिन हमारे में पात्रता होगी उस दिन भगवान स्वयं ही आचार्य गुरु के रूप में आ जायेंगे| अतः हर कार्य, हर सोच परमात्मा की कृपा हेतु ही करनी चाहिए|
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परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति आप सब निजात्मगण को नमन !
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! श्रीगुरवे नमः ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ फरवरी २०२१
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पुनश्च: :--- शिवनेत्र होकर भ्रूमध्य में सर्वव्यापी पारब्रह्म परमात्मा का ध्यान करते-करते वहाँ एक ब्रह्मज्योति का प्राकट्य होता है| जब वह ज्योति प्रकट होती है तब उसके साथ-साथ अनाहत नाद का श्रवण भी होने लगता है| उस अनंत सर्वव्यापी विराट ज्योतिर्मय अक्षर ब्रह्म को ही योग साधना में कूटस्थ ब्रह्म कहते हैं| उस सर्वव्यापी कूटस्थ का ध्यान ही प्रत्यक्ष परमात्मा का ध्यान है|