Monday, 24 January 2022

ध्यान साधना क्या है? ---

 ध्यान साधना क्या है? ---

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अपने आप को सम्पूर्ण हृदय से, बिना किसी शर्त, और बिना किसी माँग के, भगवान के हाथों में सौंप देना ही ध्यान साधना है। यही उपासना है; और यही एकमात्र निष्काम कर्म है। किसी भी कामना की पूर्ति हमें कभी तृप्त नहीं करती। कामनाओं से मुक्ति ही तृप्ति है। परमात्मा में स्थित होकर ही हम तृप्त हो सकते हैं।
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मार्ग में आने वाली बाधाओं से घबराएँ नहीं। भगवान के आश्वासन हैं --
(१) "मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
अर्थात् - "मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे॥"
(२) "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणम् व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥"
अर्थात् - समस्त धर्मों (सभी सिद्धांतों, नियमों व हर तरह के साधन विधानों का) परित्याग कर और एकमात्र मेरी शरण में आजा; मैं तुम्हें समस्त पापों और दोषों से मुक्त कर दूंगा --- शोक मत कर।
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एक आध्यात्मिक रहस्य ---
"जो लोग भगवान से कुछ माँगते हैं, उन्हें वे वही चीज़ देते हैं जो वे माँगते हैं। परन्तु जो अपने आप को दे देते हैं, और कुछ भी नहीं माँगते, भगवान उन्हें अपना सब कुछ दे देते हैं।"
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न केवल कर्ताभाव, कर्मफल आदि, बल्कि कर्म, और साक्षीभाव या दृष्टाभाव तक भगवान को समर्पित कर दो। साध्य भी वे ही हैं, साधक भी वे ही हैं और साधना भी वे ही है। यहाँ तक कि दृष्य, दृष्टी और दृष्टा भी वे ही हैं।
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शांतिपाठ ---
"ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥"
"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥"
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० जनवरी २०२२

पूर्व जन्मों के अच्छे संस्कार जागृत हो कर हृदय में भक्ति जागृत कर देते हैं ---

 भगवान की कृपा हो तो हमारे पूर्व जन्मों के अच्छे संस्कार जागृत हो कर हृदय में भक्ति जागृत कर देते हैं। अन्यथा अपनी बुराइयों और कमियों से इस मायावी संसार के पाशों से ही हम सदा बंधे ही रहते हैं। आध्यात्मिक मार्ग पर बिना वीतराग (राग-द्वेष से मुक्त) हुए प्रगति नहीं होती। फिर भय और क्रोध से भी मुक्त होना पड़ता है। तभी हम स्थितप्रज्ञ हो सकते हैं। जो स्थितप्रज्ञ है, वही मुनि या सन्यासी है। भगवान कहते हैं --

"दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥२:५६॥"
अर्थात् -- दुख में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता सुख में जिसकी स्पृहा निवृत्त हो गयी है, जिसके मन से राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं; स्थितप्रज्ञ मुनि वही कहलाता है॥
आचार्य शंकर के अनुसार आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आघिदैविक इन तीनों प्रकार के दुःखों के प्राप्त होने से भी जिसका मन उद्विग्न अर्थात् क्षुभित नहीं होता उसे अनुद्विग्नमना कहते हैं। सुखों की प्राप्ति में जिसकी स्पृहा, तृष्णा नष्ट हो गयी है, अर्थात् ईंधन डालने से जैसे अग्नि बढ़ती है, वैसे ही सुख के साथ साथ जिसकी लालसा नहीं बढ़ती, वह विगतस्पृह कहलाता है। आसक्ति, भय और क्रोध जिसके नष्ट हो गये हैं, वह वीतरागभयक्रोध कहलाता है। ऐसे गुणोंसे युक्त जब कोई हो जाता है तब वह स्थितधी यानी स्थितप्रज्ञ और मुनि या संन्यासी कहला सकता है।
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भगवान श्रीकृष्ण तो हमें -- निर्द्वन्द्व, नित्यसत्त्वस्थ, निर्योगक्षेम, आत्मवान् और निस्त्रैगुण्य होने का आदेश देते हैं --
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥२:४५॥"
अर्थात् -- हे अर्जुन वेदों का विषय तीन गुणों से सम्बन्धित (संसार से) है। तुम त्रिगुणातीत, निर्द्वन्द्व, नित्य सत्त्व (शुद्धता) में स्थित, योगक्षेम से रहित, और आत्मवान् बनो॥
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अंततः अनात्मा सम्बन्धी सभी विषयों से उपरति होना आवश्यक है। भगवान से हमारा प्रेम इतना अधिक हो जाये कि अन्य सब विषयों से अनुराग समाप्त हो जाये। जब राग ही नहीं रहेगा तो द्वेष भी नहीं रहेगा, और आत्मानुसंधान भी सम्पन्न हो जाएगा। श्रुति भगवती के आदेशानुसार बुद्धिमान् ब्राह्मण को चाहिये कि परमात्मा को जानने के लिए उसी में बुद्धि को लगाये, अन्य नाना प्रकार के व्यर्थ शब्दों की ओर ध्यान न दे।
"तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः।
नानुध्यायाद् बहूब्छब्दान्वाची विग्लापन हि तदिति॥ बृहद., ४/४/२९॥"
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पहले मैं सहस्त्रारचक्र में भगवान के चरण-कमलों का ध्यान करता था। लेकिन अब तो भावों में साकार रूप से उनके नयन-कमल ही मेरे समक्ष रहते हैं। उनके नयन इतने सुंदर हैं कि सृष्टि का सारा सौंदर्य भी उनके समक्ष कुछ नहीं है। अब तो भगवान के नयनों के अतिरिक्त अन्य कुछ भी देखने की कोई अभिलाषा नहीं है। उनके नयन मेरे नयनों में बस गए हैं। उन्हें देखते देखते ही यह जीवन बीत जाये। और कुछ भी नहीं चाहिए। उनके नयन-कमल सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है। मैं उनके नयनपथ में हूँ, और वे मेरे नयनपथ में हैं। अन्य सब मिथ्या है। अंत में यह कहना चाहता हूँ कि जैसे एक रोगी के लिए कुपथ्य होता है, वैसे ही एक आध्यात्मिक साधक के लिए अनात्म विषय होते हैं।
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इससे आगे और लिखने की सामर्थ्य मुझ अकिंचन में नहीं है। हे प्रभु, आपकी जय हो। इस विषय पर और चर्चा नहीं करना चाहता।
ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
२१ जनवरी २०२२
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पुनश्च: ---- हमारे शास्त्रों में तीन प्रकार के दुःख माने गए हैं— आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आघिदैविक। लेकिन मैं तो भगवान से पृथकता को ही वास्तविक दुःख मानता हूँ। वेदों में "ख" यानि आकाश-तत्व को ब्रह्म यानि परमात्मा माना गया है। "ॐ खं ब्रह्म" (यजुर्वेद: ४०/१७)॥ भगवान से दूरी ही दुःख है, और भगवान से समीपता ही सुख है।
(१) आध्यात्मिक दुःख के अंतर्गत तरह तरह के रोग व्याधियाँ आदि शारीरिक, और क्रोध लोभ आदि मानसिक दुःख आते हैं। (२) आधिभौतिक दुःख वह है जो पशु,पक्षी साँप, मच्छर, विषाणुओं आदि के द्वारा पहुँचता है। (३) आधिदैविक दुःख वह है जो देवताओं अर्थात् प्राकृतिक शक्तियों के कारण पहुँचता है, जेसे -- आँधी, वर्षा, वज्रपात, शीत, ताप इत्यादि।
रामचरितमानस के अनुसार दरिद्रता सबसे बड़ा दुख है --
"नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं॥"
-जगत्‌ में दरिद्रता के समान दुःख नहीं है तथा संतों के मिलने के समान जगत्‌ में सुख नहीं है।

आध्यात्मिक रूप से हमारा सबसे बड़ा शत्रु -- हमारी स्वयं की अधोगामी निम्न प्रकृति है ---

आध्यात्मिक रूप से हमारा सबसे बड़ा शत्रु -- हमारी स्वयं की अधोगामी निम्न प्रकृति है। यह अधोगामी निम्न प्रकृति ही हमारी सभी बुराइयों की जड़ है, जो हमारे अहंकार को प्रबल कर हमें परमात्मा से दूर करती है। यह गीता के १४वें अध्याय "गुण-त्रय-विभाग योग" का सार है। इसका स्वाध्याय बार-बार तब तक करना चाहिए जब तक यह पूरी तरह समझ में नहीं आ जाये।

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मुझे यह लिखते हुए बड़ा अफसोस भी होता है कि मेरी दृष्टि में ऐसे बहुत से लोग हैं, जिनका अगला जन्म मनुष्य योनि में नहीं, बल्कि पशु आदि नीच योनियों में होगा। लेकिन मैं उन्हें सचेत नहीं कर सकता, क्योंकि इस विषय पर कुछ बोलते ही वे मेरे शत्रु बन जाएँगे, जिनकी संख्या नहीं बढ़ाना चाहता।
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ॐ तत्सत् ! ॐ ब्रह्मणे नमः ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ जनवरी २०२२

आध्यात्मिक दृष्टि से हमारा शत्रु व मित्र कौन है? सत्य-मुक्ति का उपाय क्या है? ---

 आध्यात्मिक दृष्टि से हमारा शत्रु व मित्र कौन है? सत्य-मुक्ति का उपाय क्या है?

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(इधर-उधर की झूठी और बनावटी बातें करना अधर्म है। जब सत्य का पता है तो सत्य ही कहना चाहिए। हरिःकृपा से जिस सत्य का मुझे बोध है, वही लिख रहा हूँ।)
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(१) आध्यात्मिक दृष्टिकोण से हमारे से पृथक अन्य कोई है ही नहीं। हमारी उच्च प्रकृति जो हमें परमात्मा की ओर आकर्षित कर रही है, वह ही हमारी एकमात्र मित्र है। और जो निम्न प्रकृति हमें परमात्मा से दूर ले जा रही है, हमारी एकमात्र शत्रु है।
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(२) इस सृष्टि में कर्ता - हमारे तीनों गुण (सतोगुण, रजोगुण व तमोगुण) हैं। उन्हीं से बंधे हुये हम कठपुतली की तरह नृत्य कर रहे हैं। परमात्मा की कृपा से त्रिगुणातीत (निस्त्रेगुण्य) होना ही मुक्ति का एकमात्र ज्ञात उपाय है। कोई कर्मकांड हमें मुक्त नहीं कर सकता।
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(३) जहाँ तक मैं समझता हूँ, त्रिगुणातीत होने के लिए अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति ही एकमात्र साधन है, बाकी परमात्मा की कृपा है। अनन्य का अर्थ है कि मेरे सिवाय कोई भी अन्य नहीं है। व्यभिचार का अर्थ है - किसी अन्य से भी प्रेम। अव्यभिचारिणी भक्ति का अर्थ है -- सिर्फ परमात्मा से ही प्रेम होना। कोई भी किसी भी मार्ग की साधना/उपासना हो, बिना भक्ति के वह सफल नहीं हो सकती। कितने भी प्राणायाम करो, कितना भी ध्यान करो, बिना भक्ति के वहाँ कोई सिद्धि नहीं हो सकती। बिना भक्ति के कोई भी ज्ञान या वैराग्य सिद्ध नहीं हो सकता। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कम से कम दो बार अव्यभिचारिणी भक्ति का उल्लेख किया है --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
"मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥१४:२६॥"
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥१४:२७॥"
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हमारा एकमात्र शत्रु - हमारी स्वयं की अधोगामी निम्न प्रकृति है, अन्य कोई हमारा शत्रु नहीं है। इब्राहिमी मज़हबों (Abrahamic Religions) ने इसे 'शैतान' का नाम दिया है। यह शैतान कहीं बाहर नहीं, हमारी स्वयं की ही निम्न प्रकृति है, जिस पर विजय प्राप्त करने का उपदेश गीता के १४ वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण हमें देते हैं।
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हम ब्रह्म यानि परमात्मा के साथ सदा अभेद का चिंतन करें। इसी से हम अपने परम शत्रु - हमारी निम्न प्रकृति पर विजय प्राप्त कर पायेंगे। किसी श्रौत्रीय/ब्रहमनिष्ठ महात्मा से मार्गदर्शन लें। आप सब को शुभ कामनाएँ और नमन!!
ॐ तत्सत् ! ॐ ब्रह्मणे नमः ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
२२ जनवरी २०२२
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पुनश्च -- भागवत पुराण, भक्ति सूत्र, रामचरितमानस, विष्णु पुराण, पद्म पुराण -- आदि आगम ग्रन्थों में भक्ति की महिमा भरी पड़ी है। लेख का विस्तार न हो, इस भय से उनका उल्लेख यहाँ नहीं किया है।

परमात्मा की खोज अब और प्रतीक्षा नहीं कर सकती ---

 ॐ श्री गुरुभ्यो नमः !! जीवन में सब कुछ प्रतीक्षा कर सकता है, लेकिन परमात्मा की खोज अब और प्रतीक्षा नहीं कर सकती ---

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हमारा प्रथम, अंतिम, और एकमात्र लक्ष्य है - "भगवत्-प्राप्ति", जिसके लिए पूरी तरह मुझे आवश्यक है --
(१) गीता में बताई हुई "ब्राह्मी-स्थिति" या "कूटस्थ-चैतन्य" या "क्रिया की परावस्था" में रहने का नित्य निरंतर अभ्यास।
(२) अपनी गुरु-परंपरानुसार नित्य नियमित - साधना/उपासना, जिसकी अवधि दिन में कम से कम कुल मिलाकर तीन घंटे की तो होनी ही चाहिए। उससे कम में काम नहीं चलेगा। अधिकतम की तो कोई सीमा नहीं है। फिर भी जो सेवानिवृत हैं, उन्हें अपने साधनाकाल की अवधि को बढ़ाकर दिन में कम से कम आठ घंटे तक तो ले ही आना चाहिए। इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। मुझे छोड़कर मेरे अनेक मित्र हैं जो नित्य नियमित आठ-नौ घंटे भगवान का ध्यान करते हैं, और चैतन्य की एक अति उच्च अवस्था में रहते हैं। मैं ही सबसे अधिक पिछड़ा हुआ हूँ। मुझे भी अब "प्रमाद" और "दीर्घसूत्रता" को त्याग कर, उनकी बराबरी करनी ही पड़ेगी। परमात्मा से भी ऐसी ही प्रेरणा मिल रही है। अतः सत्यनिष्ठा से प्रयास करेंगे। कर्ता तो स्वयं परमात्मा है, जिनका मैं निमित्त मात्र तो हूँ ही।
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ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ जनवरी २०२२

Sunday, 23 January 2022

स्वयं भगवान के शब्दों में, भगवान को कौन प्राप्त कर सकता है? :---

 स्वयं भगवान के शब्दों में, भगवान को कौन प्राप्त कर सकता है? :---

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जहाँ तक मेरी समझ है, भगवान वास्तव में एक छोटे से बच्चे की तरह बड़े ईर्ष्यालु प्रेमी हैं| उन का बाल-स्वभाव और बाल-हठ है| उन्हें एक छोटे से बालक की तरह मनाना पड़ता है| वे चाहते हैं कि हम उन्हे अपना शत-प्रतिशत प्रेम दें, और इधर-उधर कहीं भी नहीं देखें| उन्हें हमारा ९९.९९% प्रेम भी पसंद नहीं है| उन्हें तो १००% + ही चाहिए| जहाँ भी हमारा ध्यान इधर-उधर किसी भी अन्य विषय में चला जाता है, वहीं वे रूठ कर चले जाते हैं| फिर अन्य सब ओर से मन को हटाकर उन में ही लगाना पड़ता है, तभी वे प्रसन्न होते हैं|
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पूरी तरह तो वे तभी प्रसन्न होते हैं, जब हम उन्हें मनाने के चक्कर में, स्वयं को भी भूलकर, उन्हीं में विलीन हो जाते हैं| वे हरिः (चोर) भी हैं| उनका शौक है अपने भक्तों के अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) की चोरी करना| साथ-साथ वे दुःख-तस्कर (दुःखों के चोर) भी हैं जो अपने भक्तों के दुःखों को चुपचाप इस तरह चुरा लेते हैं कि भक्त को पता ही नहीं चलता कि कब उसके सारे दुःख चोरी चले गए| इस तरह वे चोर-जार-शिखामणि यानि चोरों के सरदार हैं|
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उन्होने मुझे इतना छोटा सा हृदय दिया, और दुनियाँ भर के सारे दुःख-दर्द उसमें रखने को दे दिये| इस छोटे से हृदय में दुनियाँ भर के दुःख-दर्द नहीं समा सकते, इस लिए उनका सारा सामान (दुःख-दर्द) और यह हृदय भी उन्हीं को बापस दे दिया है|
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गीता में वे कहते हैं कि उन्हें "अनन्य-भक्ति" से ही प्राप्त किया जा सकता है| यह अनन्य-भक्ति, वेदान्त की पराकाष्ठा है| वे कहते हैं ---
"पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया| यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्||८:२२||"
अर्थात् हे पार्थ ! जिस (परमात्मा) के अन्तर्गत समस्त भूत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण (जगत्) व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त करने योग्य है||
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भगवान हम सब के इस शरीर रूपी पुर में शयन करते हैं, और सर्वत्र परिपूर्ण हैं, इसलिए भगवान का नाम पुरुष है| उन पुरुष से यह सारा संसार व्याप्त है, और उनके अतिरिक्त अन्य कुछ है भी नहीं| वे भगवान, अनन्य भक्ति से ही प्राप्य हैं|
उपासक का यह भाव रहता है कि मेरे से अन्य कोई है ही नहीं| मैं भगवान के साथ सर्वत्र व्याप्त और उनके साथ एक हूँ| इस आत्म-विषयक ज्ञान को ही स्वनामधन्य आचार्य शंकर ने 'अनन्य भक्ति' बताया है|
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भगवान से जब प्रेम ही हो गया है, तब उनके अतिरिक्त अन्य कुछ भी चिंतन उन की दृष्टि में व्यभिचार है| सब कुछ भुलाकर हम भगवान की ही अनन्य भक्ति करें, जिसे भगवान ने "अव्यभिचारिणी-भक्ति" बताया है ---
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी| विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि||१३:११||"
अर्थात् अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि||
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आज भगवान ने कुछ अधिक ही लिखवा दिया है| हे परमप्रेमी भगवन् , अब कुछ ऐसी सिद्धि दो कि सब कुछ भूल कर दिन-रात तुम्हारा ही भजन-चिंतन-ध्यान करता रहूँ, और तुम्हारे में विलीन होकर तुम्हारे साथ एक होकर, तुम्हारा प्रेम सब के हृदयों में जगा सकूँ| 🌹🙏🌹
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ॐ तत्सत् ! ॐ ब्रह्मणे नमः ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ जनवरी २०२१

हमारा लक्ष्य आत्म-तत्व यानि परमात्मा की प्राप्ति है, न कि स्वर्ग आदि की कामना ---

हमारा लक्ष्य आत्म-तत्व यानि परमात्मा की प्राप्ति है, न कि कुछ अन्य आकर्षक सिद्धान्त, विभूति, या स्वर्ग आदि की कामना| सर्वप्रथम हम परमात्मा को प्राप्त करें, फिर उन की चेतना में रहते हुए, उन के उपकरण बन कर संसार के अन्य सारे कार्य करें| जब भी जीवन में परमात्मा को पाने की अभीप्सा जागृत हो, हमें उसी समय विरक्त होकर आत्मानुसंधान में लग जाना चाहिए| संसार में रहते हुए परमात्मा की खोज लगभग असंभव है| हमारे जैसे सामान्य मनुष्य, राजा जनक नहीं बन सकते|

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परमात्मा तो हमें सदा से ही प्राप्त है लेकिन माया के आवरण से हमें उनका बोध नहीं होता| जब हम उन की दिशा में अग्रसर होते हैं, तब माया का विक्षेप हमें भटका देता है| यह सृष्टि का खेल ऐसे ही चल रहा है, जैसे एक छायाचित्र चलता है| परमात्मा के अतिरिक्त अन्य आकर्षणों से मोहित हो कर जब हम संसार में सुख ढूंढते हैं तो हमें निराशा ही निराशा हाथ लगती है| सब तरह की निराशाओं से तंग आकर हम परमात्मा की ओर उन्मुख होते हैं| प्रेमपूर्वक जब हम परमात्मा से प्रार्थना करते हैं तब वे कल्याण का मार्ग दिखाते हैं|
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यहाँ मैं रामचरितमानस, श्रीमद्भगवद्गीता, और वेदान्त दर्शन से कुछ प्रामाणिक बातें लिखना चाहता था| पर उन्हें लिखने से कोई लाभ नहीं है, क्योंकि लंबे लेखों को फेसबुक पर कोई पढ़ता नहीं है| कोई असली मुमुक्षु होगा, तो उसे भगवान स्वयं मार्ग दिखाएंगे|
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आप सब को शुभ कामनाएँ और नमन !!
कृपा शंकर
२३ जनवरी २०२१