Sunday, 2 January 2022

भारत में विदेशी स्वामित्व वाली सभी टीवी-चैनलें और समाचार-पत्र बंद हों ---

भारत में विदेशी स्वामित्व वाली सभी टीवी-चैनलें और समाचार-पत्र बंद हों| भारत की अधिकाँश टीवी समाचार चैनलें और अंग्रेजी के समाचार पत्र विदेशी स्वामित्व के हैं जिनका उद्देश्य ही अपने विदेशी स्वामियों के भारत विरोधी उद्देश्यों को पूरा करना है| ये हमारे दिमाग में एक धीमा जहर डालने का कार्य कर रहे हैं| हमारी सारी प्रेस विदेशियों के हाथों बिकी हुई है|

जब हम कोई बगीचा लगाते हैं तो उसमें कंकर पत्थर नहीं डालते| हमारा मन भी एक बगीचा है जिस में हमने अपने विचारों, चिंतन और भावनाओं के सुन्दर वृक्ष लगा रखे हैं| इस बगीचे में अतिथि के रूप में हम परमात्मा को आमंत्रित कर रहे हैं, अतः इसे साफ़ सुथरा रखना हमारा परम दायित्व है| फेसबुक और इन्टरनेट का भी नब्ब प्रतिशत तो दुरुपयोग ही हो रहा है| कोई दस प्रतिशत लोग ही इसका सदुपयोग कर रहे हैं| इसमें छाई अश्लीलता और कामुकता से बचें|
यदि आप एक आध्यात्मिक साधक हैं और अपने मस्तिष्क को स्वस्थ रखना चाहते हैं तो टीवी पर समाचार चैनलों के जहरीले व्याख्यान सुनने और अंग्रेजी के अखबार पढने तो बंद ही कर दीजिये| कुछ दिनों में आप पायेंगे कि आपको बहुत शांति मिल रही है| धन्यवाद|
कृपा शंकर
२ जनवरी २०२०

मेरा स्वास्थ्य अधिक अच्छा नहीं रहता है ---

मेरा स्वास्थ्य इतना अच्छा नहीं रहता है कि मैं सोशियल मीडिया पर पूछे जाने वाले हर प्रश्न का उत्तर दे सकूँ| मैं अपनी अधिकांश मेल देख भी नहीं पाता| मेरे दो बार हृदयाघात हुआ है और एंजिओप्लास्टी भी हो चुकी है| इन दिनों आर्थिक रूप से भी बहुत ही अधिक हानि हुई है| डॉक्टरों ने तनाव- मुक्त जीवन जीने का निर्देश दे रखा है इसलिए तनाव-मुक्त जीवन जी रहा हूँ| भक्ति मेरा स्वभाव है इसलिए कोई असंतोष या शिकायत नहीं है| जीवन जैसा भी है, भगवान को समर्पित है|

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चैतन्य में कूट कूट कर भक्ति और राष्ट्रवाद भरा पड़ा है, इसलिए स्वभाववश आध्यात्म और राष्ट्रवाद पर कुछ न कुछ लिखता रहता हूँ| कब तक लिखता रहूँगा इसकी भी कोई गारंटी नहीं है| भौतिक आयु ७२ वर्ष की हो चुकी है|
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भारत के भविष्य के बारे में मैं आश्वस्त हूँ| भारत माँ अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर बैठेगी| असत्य और अंधकार की शक्तियाँ पराभूत होंगी व धर्म की पुनर्स्थापना होगी| हो सकता है यह मेरे जीवन काल में ही हो जाये| यही देखना चाहता हूँ|
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आप सब को नमन| भारत माता की जय| सत्य सनातन धर्म की जय|
ॐ तत्सत् | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२ जनवरी २०२०

प्रधान मंत्री जी से भविष्य की हमारी अपेक्षाएँ ---

 प्रधान मंत्री जी से भविष्य की हमारी अपेक्षाएँ ---

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माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी को भगवान लंबी आयु, अच्छा स्वास्थ्य, पूर्ण कार्यकुशलता, पूर्ण विवेक, लगन और उत्साह प्रदान करें| वे अब तक के सबसे अच्छे प्रधानमंत्री हैं| उन्हीं से कुछ अपेक्षाएँ हैं|
मैंने मेरे जीवन काल में कभी सोचा भी नहीं था कि कश्मीर से धारा ३७० और ३५A हटेगी भी क्या? पिछले पाँच सौ वर्षों में मेरे पूर्वजों की पता नहीं कितनी पीढ़ियाँ राममंदिर की आशा लिए-लिए दिवंगत हो गईं| मैं भाग्यशाली हूँ कि मेरे जीवन काल में यह आशा पूरी हुई है| अब उनसे निम्न अपेक्षाएँ हैं ---
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(१) समान नागरिक संहिता लागू हो| हिन्दू कोड बिल समाप्त हो| हिंदुओं के विरुद्ध हो रहा सब तरह का पक्षपात समाप्त हो| एक देश, एक कानून हो|
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(२) जनसंख्या नियंत्रण कानून बड़ी कठोरता से सबके लिए समान रूप से लागू हो|
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(३) विदेशी घुसपैठियों की पहिचान कर उन्हें देश से बाहर निकाला जाये|
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(४) पाक अधिकृत कश्मीर को बापस लिया जाये| चीन ने भारत की जो भूमि दबा रखी है, वह बापस ली जाये और तिब्बत को चीन से छीनकर उसे एक सार्वभौमिक स्वतंत्र देश बनाया जाये| कैलाश-मानसरोवर, भारत के अधिकार में हों|
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निकट भविष्य में भारत में अनेक क्रांतिकारी घटनायें होंगी जिनकी अभी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है| पिछले सौ-सवासौ वर्षों में अनेक क्रांतिकारी घटनाएँ हुई हैं, जिन की किसी ने कल्पना भी नहीं की थी, जिन्होने विश्व में बहुत बड़े बदलाव किए है| उनमें मुख्य ये हैं ---
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(१) सुदूर पूर्व में सन १९०५ में जापान द्वारा रूस को पराजित करना ---
एक युद्ध में जापान ने त्सूशीमा जलडमरूमध्य में रूस की सारी नौसेना को डुबो दिया, और रूस से मंचूरिया और सुदूर पूर्व का बहुत बड़ा भाग छीन लिया था| यह एक बहुत बड़ी घटना थी, जिससे प्रेरणा लेकर भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांतिकारियों के संघर्ष आरंभ हुए, और रूस में बोल्शेविक क्रांति की नींव पड़ी| भारत में क्रांतिकारियों का आत्म-विश्वास जगा कि जब एक जापान जैसा छोटा सा देश रूस को हरा सकता है तो भारत से भी अंग्रेजों को हराया जा सकता है| रूस की बोल्शेविक क्रान्ति एक धोखा थी| मूलतः वह एक नेतृत्वविहीन सैनिक विद्रोह था जो वोल्गा नदी में खड़े औरोरा नाम के युद्धपोत से आरंभ हुआ| जापान द्वारा पराजित होने, व प्रथम विश्वयुद्ध में हुई दुर्गति के कारण रूस की सेना में असंतोष था| उनके पास न तो अच्छे अस्त्र-शस्त्र थे, न अच्छे गर्म वस्त्र, और न अच्छा भोजन| जो विद्रोही बहुमत में थे वे बोल्शेविक कहलाए, और जो अल्पमत में वफ़ादार थे वे मेन्शेविक कहलाए| लेनिन तो ब्रिटेन में निर्वासित जीवन जी रहा था| जर्मनी आदि पश्चिमी देशों की सहायता से वह रूस में आया और इस विद्रोह को सर्वहारा की साम्यवादी/मार्क्सवादी क्रांति में बदल दिया| न तो लेनिन या स्टालिन को, और न ही चीन में माओ को मार्क्सवाद से कोई मतलब था| इन का लक्ष्य सिर्फ सत्ता प्राप्त करना था| मार्क्सवाद तो जनता को मूर्ख बनाने का एक अस्त्र था|
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(२) सल्तनत-ए-उस्मानिया (Ottoman Empire) का पतन ---
तुर्की की उस्मानिया सल्तनत उस समय विश्व का छः शताब्दियों से सबसे बड़ा साम्राज्य था जिसके आधीन पूरा पूर्वी योरोप, पूरा अरब, मिश्र, फिलिस्तीन, उत्तरी अफ्रीका और पश्चिमी एशिया था| उसके आधीन दर्रा-दानियल और बास्फोरस जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण स्थान थे, जो उस क्षेत्र के वाणिज्य पर पूर्ण नियंत्रण रखते थे| उस सल्तनत का विखंडन और वहाँ के खलीफ़ा महमूद (छठे) का भागकर इटली में शरण लेना --- एक अति महत्वपूर्ण घटना थी, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी| निर्वासित जीवन जी रहे उसी के बेटे अंतिम खलीफ़ा अब्दुल मजीद, जो फ्रांस में शरण लिए हुए था, को बापस तुर्की का खलीफ़ा बनाने के लिए गांधी जी ने भारत में खिलाफत आंदोलन आरंभ किया, जिसकी परिणिती पाकिस्तान के निर्माण और केरल में मोपला विद्रोह के रूप में हुई, जिनमें लाखों निरपराध हिंदुओं की हत्या हुई| खलीफा अब्दुल मजीद की बेटी की शादी हैदराबाद के आख़िरी निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान सिद्दीक़ी के साथ हुई थी|
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(३) द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी की पराजय और तत्कालीन परिस्थितियों से विवश होकर अंग्रेजों का भारत छोड़ना ---
ये दोनों घटनायें भी ऐसी थीं जिनकी कल्पना किसी ने भी नहीं की थी|
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(४) भारत का विभाजन ---
सन १९३० तक किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि भारत का विभाजन होगा| सन १९३० में प्रयागराज में मुस्लिम लीग का एक अधिवेशन हुआ, जहाँ अल्लामा इक़बाल ने ही पाकिस्तान का विचार रखा था| हक़ीक़त में वे ही पाकिस्तान के जनक थे क्योंकि पाकिस्तान उन्हीं के दिमाग की उपज थी| वहीं उन्होने कहा था कि -- "हो जाये अगर शाहे खुरासां का इशारा, सिजदा न करूँ हिन्द की नापाक़ जमीं पर|" यानि अगर तुर्की के खलीफा का संकेत भी हो जाये तो मैं हिंदुस्तान की अपवित्र भूमि पर नमाज़ भी नहीं पढ़ूँ|
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(५) सोवियत संघ का बिखराव ---
कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी विश्व का सबसे अधिक शक्तिशाली देश सोवियत संघ बिखर जाएगा| उस पूरे घटनाक्रम का मुझे ज्ञान है|
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(६) फिर और भी अनेक घटनायें हुई हैं जिनकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी, जैसे विएतनाम में अमेरिका की पराजय, जर्मनी का एकीकरण, बांग्लादेश का निर्माण, युगोस्लाविया का विखंडन आदि|
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आज भी कोई विश्वास करने को तैयार नहीं है कि कभी भारत से अंग्रेज़ी व्यवस्था समाप्त होगी| समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता, यह परिवर्तन प्रकृति का नियम है|
आने वाले निकट भविष्य में बहुत अधिक परिवर्तन होंगे, और भारत अखंड और विश्वगुरु होगा|
भारत माता की जय | वंदे मातरम् !!
कृपा शंकर
२ जनवरी २०२१

भगवान की भक्ति -- सबसे अधिक संक्रामक छूत का रोग है ---

 "भगवान की भक्ति" सबसे अधिक संक्रामक छूत का रोग है| इसका वायरस, कोरोना से भी अधिक संक्रामक और खतरनाक है| अन्य रोगों का उपचार तो है, लेकिन इसका कोई उपचार नहीं है| आज तक कोई ऐसा डॉक्टर नहीं जन्मा है जो इस संक्रामक रोग का उपचार कर सके| अतः ऐसी महफ़िलों में मत जाइये जहाँ भगवान के भक्त जाते हैं| उन से दूरी बनाकर रखें| आज तक मैं सब को यही उपदेश देता था कि भगवान की भक्ति करो, भक्ति करो, भक्ति करो आदि आदि| पर आज कह रहा हूँ कि भगवान से अधिक खतरनाक अन्य कोई नहीं है|

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भगवान सबसे पहिले तो किसी का दिल चुराते हैं, फिर उसका मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार सब कुछ इस तरह चुपचाप चुरा लेते हैं कि अगले को पता ही नहीं चलता| जब तक वह होश में आता है तब तक पाता है कि मुझका-मेरा कुछ भी नहीं बचा है, सब कुछ लुट चुका है|
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अतः सावधान रहें| दुनियाँ में खूब कमाओ, खूब खाओ, खूब मजे लो और खूब मौज-मस्ती करो| भगवान के चक्कर में पड़ गये तो खुद के पास कुछ भी नहीं बचेगा, सब कुछ भगवान का हो जाएगा| जिस किसी को भगवान की भक्ति की बीमारी लग जाती है, उसे सर्वत्र भगवान ही भगवान दिखाई देने लगते हैं, दुनियादारी के किसी काम का वह नहीं रहता| मैं खुद भुक्तभोगी हूँ इसलिए सबको सावधान कर रहा हूँ| अब तो मजबूर हूँ, भगवान, दिल और दिमाग सब पर छा गये हैं, दुनियाँ के किसी काम का नहीं रहा हूँ|
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आप सब ने मेरा यह आलेख बड़े प्रेम से मन लगाकर पढ़ा है, इसके लिए मैं आप सब का आभारी हूँ| भगवान आप सब का भला करे|
ॐ तत्सत्!! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय!! ॐ नमः शिवाय!! ॐ ॐ ॐ!! 🌹🙏🕉🙏🌹
कृपा शंकर
२ जनवरी २०२१

Saturday, 1 January 2022

हमारी भक्ति अनन्य-अव्यभिचारिणी और अनपायनी हो ---

 हमारी भक्ति अनन्य-अव्यभिचारिणी और अनपायनी हो ---

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मैंने एक बार लिखा था कि हमारे भगवान बड़े ईर्ष्यालु प्रेमी हैं, वे हमारा शत-प्रतिशत प्यार माँगते हैं| जरा सी भी कमी हो तो विमुख हो जाते हैं| और प्यार भी वे ऐसा माँगते हैं जिसमें निरंतर वृद्धि होती रहे| जैसे एक छोटे बच्चे को मनाते हैं, वैसे ही उन्हें भी मनाना पड़ता है| अब एक ऐसे विषय पर लिखने को मुझे बैठा दिया है जिस की पात्रता मुझ में बिलकुल भी नहीं है| फिर भी अपनी सीमित और अति-अति-अति-अल्प बुद्धि से कुछ न कुछ तो लिखूँगा ही, इज्ज़त का सवाल है| अपयश, यश और सारी महिमा उन्हीं की है|
"दीनदयाल सुनी जबतें, तब तें हिय में कुछ ऐसी बसी है|
तेरो कहाय के जाऊँ कहाँ मैं, तेरे हित की पट खैंचि कसी है||
तेरोइ एक भरोसो मलूक को, तेरे समान न दूजो जसी है|
ए हो मुरारि पुकारि कहौं अब मेरी हँसी नहीं तेरी हँसी है||"
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इस लेख में जो गीता के श्लोक दिये हैं, उन का स्वाध्याय तो पाठक को स्वयं ही करना होगा| भगवान ने मुझे समझने की योग्यता तो दी है पर समझाने की नहीं| समझ भी भगवान की कृपा से ही आती है| उतना ही लिख पाऊँगा जितना लिखने की प्रेरणा मिल रही है|
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सबसे पहिले गीता की बात करते हैं, फिर मानस की करेंगे| गीता में भगवान कहते हैं .....
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी|
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि||१३:११||"
अनन्य का अर्थ है .... जहाँ अन्य कोई नहीं है, जहाँ हमारे में और प्रत्यगात्मा में कोई भेद नहीं है| भगवान कहते हैं .....
"ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च|
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च||१४:२७||
अर्थात् मैं अमृत, अव्यय, ब्रह्म, शाश्वत धर्म, और ऐकान्तिक अर्थात् पारमार्थिक सुख की प्रतिष्ठा हूँ||
इसी भाव में स्थित होकर उनका ध्यान करना चाहिए| हम यह नश्वर देह नहीं, शाश्वत आत्मा हैं| उनमें समर्पित होने पर पृथक आत्मा का बोध भी नहीं रहता, वे ही वे रह जाते हैं और कर्ता भाव विलुप्त हो कर उपास्य, उपासना और उपासक वे स्वयं ही हो जाते हैं| ध्यान करते करते उपास्य के गुण उपासक में भी आ ही जाते हैं|
भक्ति में व्यभिचार वह है जहाँ भगवान के अलावा अन्य किसी से भी प्यार हो जाता है| भगवान हमारा शत-प्रतिशत प्यार माँगते हैं| हम जरा से भी इधर-उधर हो जाएँ तो वे चले जाते हैं| इसे समझना थोड़ा कठिन है| हम हर विषय में, हर वस्तु में भगवान की ही भावना करें, और उसे भगवान की तरह ही प्यार करें| सारा जगत ब्रह्ममय हो| ब्रह्म से पृथक कुछ भी न हो| यह अव्यभिचारिणी भक्ति है|
भगवान कहते हैं.....
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते|
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः||७:१९||"
इस स्थिति को हम ब्राह्मी स्थिति भी कह सकते हैं, जिसके बारे में भगवान कहते हैं .....
"विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः|
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति||२:७१||"
"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति|
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति||२:७२||"
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अब बात करेंगे "अनपायनी" भक्ति की| भक्ति अनपायनी हो, इसका अर्थ है कि उसमें "अपाय" न हो| अपाय का अर्थ .... कम होते होते नाश होना भी होता है, और श्वास भी होता है| हमारी भक्ति में निरंतर वृद्धि हो, कभी भी कोई कमी न हो| भगवान् के चरणों में हमारी भक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाये, कभी घटे नहीं|
"बार बार बर मागउं हरषि देहु श्रीरंग| पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग||"
प्रेम ऐसा होना चाहिए जो हर क्षण बढ़े, उसमें भी कोई कमी न आने पाये| यह अनपायिनी भक्ति है| यह भक्ति हर सांस के साथ बढ़ती है| यह परमप्रेम है जिसे ही भक्ति-सूत्रों में देवर्षि नारद ने "भक्ति" कहा है| भक्ति में हमें ..... धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष .... की भी कामना नहीं होनी चाहिए| हमें भगवान का सिर्फ और सिर्फ प्रेम चाहिए, अन्य कुछ भी नहीं| उनके प्रेम के अलावा कुछ भी कामना होने पर पतन प्रारम्भ हो जाता है|
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम|
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम||
अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरवान|
जनम–जनम रति रामपद यह वरदान न आन||
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यह अनन्य-अव्यभिचारिणी-अनपायनी भक्ति .... अनंत चैतन्य का द्वार है| वह भक्ति जागृत होती है परमप्रेम और गुरुकृपा सेे| भगवान के प्रति परमप्रेम जागृत होते ही मेरुदंड उन्नत हो जाता है, दृष्टिपथ स्वतः ही भ्रूमध्य पथगामी हो जाता है, व चेतना उत्तरा-सुषुम्ना (आज्ञाचक्र व सहस्त्रार के मध्य) में स्थिर हो जाती है| मेरुदंड में सुषुम्ना जागृत हो जाती है और वहाँ संचारित हो रहा प्राण-प्रवाह अनुभूत होने लगता है| कूटस्थ में ज्योतिर्मय ब्रह्म और अनाहत नाद भी अनुभूत होने लगते हैं|
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गुरु रूप में हे भगवान वासुदेव, आप की कृपा सदैव बनी रहे| मुझ अकिंचन के लाखों दोष व नगण्य गुण ..... सब आप को समर्पित हैं| आप से मेरी कहीं पर भी कोई पृथकता नहीं है| मेरा सर्वस्व आपका है, और मेरे सर्वस्व आप ही हैं| कभी कोई पृथकता का बोध न हो| आप ही मेरे योग-क्षेम हो| आपका यह वाक्य मुझे बहुत अधिक शक्ति देता है जिसमें आपने अनन्य भाव से उपासना करने को कहा है .....
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते|
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्||९:२२||"
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अनन्यभाव से युक्त होकर आपकी मैं आत्मरूप से निरन्तर निष्काम उपासना कर सकूँ| इतनी शक्ति अवश्य देना| मेरा सर्वस्व आपको समर्पित है|
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ जनवरी २०२०

हमारी समस्याएँ और उन का समाधान ---

 हमारी समस्याएँ और उन का समाधान ---

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स्वयं इस व्यक्ति की, राष्ट्र की, और विश्व की, सभी समस्याओं को मैं बहुत अच्छी तरह समझता हूँ| उनका समाधान क्या है? इसे भी अच्छी तरह जानता हूँ|
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आध्यात्मिक दृष्टि से इस सृष्टि की और हमारी सबसे बड़ी समस्या जो हर समस्याओं की मूल है, वह है --- हमारी परमात्मा से पृथकता|
उसका समाधान भी एक ही है| और वह है --- परमात्मा को समर्पण और आत्म-साक्षात्कार|
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इस दिशा में क्या करना चाहिए इसका उत्तर भी श्रीमद्भगवद्गीता, रामचरितमानस, और श्रीमद्भागवत् जैसे ग्रन्थों में बहुत अच्छी तरह दिया है| आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत किसी ब्रह्मनिष्ठ आचार्य महात्मा के सान्निध्य में रहकर उनसे मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिये|
जहाँ चाह वहाँ राह, जब जागो तभी सबेरा| ॐ तत्सत् !!
१ जनवरी २०२१

Thursday, 30 December 2021

"आत्म-ज्ञान" ही "मोक्ष" है ---

 "आत्म-ज्ञान" ही "मोक्ष" है ---

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भारत की सनातन हिन्दू परंपरा में मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ बताए गए हैं --- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष| पुरुषार्थ से तात्पर्य मनुष्य जीवन के लक्ष्य या उद्देश्य से है| इन्हें पुरुषार्थचतुष्टय भी कहते हैं| इनमें भी मोक्ष को परम पुरुषार्थ माना गया है| मोक्ष क्या है? यह प्रश्न मैंने अनेक मनीषियों से पूछा है, पर किसी के भी उत्तर से मुझे कभी संतुष्टि नहीं मिली| यथार्थ में संतुष्टि तो तभी मिलती है जब उत्तर स्वयं आत्मा से आता है| मैं तो यही मान बैठा था कि मोह का क्षय ही मोक्ष है| लेकिन मैं गलत था| जब तक पृथकता का बोध यानि द्वैत है, तब तक मोह का क्षय संभव नहीं है|
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१२ दिसंबर २०२० को दोपहर में मैं ध्यानमग्न था कि अचानक ही एक विचार बिजली की तरह अंतर्चेतना में कौंध गया, जिसने अंतर्चेतना में प्रकाश ही प्रकाश भर दिया| मुझे किसी ने मेरे अंतर में कहा कि ---
"जब दृष्टि, दृश्य और दृष्टा एक हो जाते हैं, कहीं कोई भेद नहीं रहता, --- वह एक विज्ञानमय सिद्धावस्था है| यह सिद्धावस्था ही मोक्ष है|"
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उसी समय गीता के दूसरे अध्याय का ७२वाँ श्लोक याद आया ---
"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति| स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति||२:७२||"
अर्थात् -- हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है| इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता| अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है||
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गीता में बताई हुई यह ब्राह्मी स्थिति ही मोक्ष है| यह ब्राह्मी यानी ब्रह्म में होने वाली स्थिति है| सब कर्मों का सन्यास कर के केवल ब्रह्मरूप से स्थित हो कर मनुष्य फिर कभी मोहित नहीं होता, यानि मोह को प्राप्त नहीं होता| अंतकाल में ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर मनुष्य ब्रह्म में लीन हो जाता है| यही मोक्ष है|
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इस ब्राह्मी स्थिति को ही योगिराज श्रीश्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय ने क्रिया की परावस्था कहा है| क्रियायोग साधकों के लिए क्रिया की परावस्था में स्थायी स्थिति ही मोक्ष है| इस मोक्षरूपी परम पुरुषार्थ में अभीप्सा न होने पर कोई भी मनुष्य न तो भक्ति कर सकता है, और न ही अन्य साधनों में प्रवृति कर सकता है|
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शुक्ल यजुर्वेद की काण्व शाखा के बृहदारण्यक उपनिषद के स्वाध्याय से यह विषय बहुत अच्छी तरह से समझ में आ सकता है| वहाँ ऋषि याज्ञवल्क्य के ब्रह्मज्ञान पर उपदेश ही उपदेश हैं जिनका स्वाध्याय जीवन में कम से कम एक बार तो करना ही चाहिए| याज्ञवल्क्य जी मैत्रेयी से कहते हैं ---
"आत्मा वा अरे द्रष्टव्य: श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य: |"
अर्थात् --- अरे यह आत्मा ही देखने (जानने) योग्य है, सुनने योग्य है, मनन करने योग्य है तथा निदिध्यासन (ध्यान) करने योग्य है||
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अथर्ववेद के माण्डूक्य उपनिषद में कहा गया है --- "अयमात्मा ब्रह्म" --- यानि "यह आत्मा ब्रह्म है"| ध्यान साधना के लिए यह महावाक्य है| यह आत्मज्ञान ही "मोक्ष" है|
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"ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्ण मुदच्यते| पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवा वशिष्यते|"
ॐ शांति: शांति: शांतिः ||
ॐ सहनाववतु सहनौभुनक्तु सहवीर्यंकरवावहै तेजस्वि नावधीतमस्तु माविद्विषावहै||
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः||
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हम सब इस परम पुरुषार्थ "मोक्ष" को प्राप्त हों| इसी शुभ कामना के साथ आप सब महात्माओं को सप्रेम सादर प्रणाम !! 🙏🕉🙏
कृपा शंकर बावलिया
झुंझुनूं (राजस्थान)
१३ दिसंबर २०२०