Sunday, 5 December 2021

हम सदा सही दिशा में गतिशील रहते हुए असत्य के अंधकार से ऊपर रहें ---

हम सदा सही दिशा में गतिशील रहते हुए असत्य के अंधकार से ऊपर रहें ---
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हम निज जीवन से तो असत्य का अंधकार दूर कर सकते हैं, लेकिन पूरी सृष्टि से नहीं। यह सृष्टि, प्रकाश और अन्धकार के द्वैत का ही एक खेल है। सही दिशा में चलते हुए हमारा कार्य परमात्मा के प्रकाश का विस्तार करना ही है। हम निज जीवन से अंधकार दूर करेंगे तो आसपास का अंधकार भी दूर होगा। अपनी चेतना में हम परमात्मा के प्रकाश (ब्रह्मज्योति) और उन की ध्वनि (अनाहत नाद) के प्रति सदा सजग रहें। किसी भी तरह की हीन भावना न लायें। हमारी सही दिशा हमारा कूटस्थ है। कूटस्थ-चैतन्य यानि ब्राह्मी-स्थिति में सदा प्रयासपूर्वक रहें। उसकी चेतना कभी विस्मृत न हो। कूटस्थ चैतन्य ही हमें परमशिव का बोध करा सकता है। गीता में भगवान कहते हैं --
"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति।।२:७२॥"
अर्थात् - हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है॥
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परमात्मा के प्रकाश का विस्तार करना ही मेरा कर्मयोग है। परमात्मा ही मेरी दिशा और मेरा जीवन हैं। ॐ तत्सत् !! जय गुरु !! ॐ गुरु !!
कृपा शंकर

१ दिसंबर २०२१ 

गुरु चरणों में मिला आश्रय बना रहे ---

गुरु चरणों में मिला आश्रय बना रहे ---
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इस देह रूपी विमान के चालक स्वयं परमात्मा हैं, और यह विमान भी वे स्वयं ही हैं। उनसे पृथकता का बोध उनकी माया है। वे ही गुरु रूप ब्रह्म हैं। अपने ज्योतिर्मय चरण-कमलों के दर्शन वे मुझे सहस्त्रार-चक्र में देते हैं, और सदा ब्रह्मरंध्र पर ही ध्यान लगवाते हैं। इस देह से बाहर परमशिव की अनुभूतियाँ उन्हीं की कृपा से होती हैं। अच्छा-बुरा जो कुछ भी मैं हूँ, वह उनकी कृपा का ही फल है। वे ही परमशिव हैं, और वे ही वासुदेव भगवान नारायण हैं। उनकी कृपा ही मेरा अस्तित्व है। उनकी कृपा से ही मैं यह सब लिख पा रहा हूँ।
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मुझे और कुछ भी नहीं लिखना है, उन्हीं की इच्छा पूर्ण हो, और उन्हीं का अस्तित्व बना रहे। उनकी कृपा भी सभी प्राणियों पर बनी रहे। मुझे सदा अपने चरणों की सेवा में ही लगाए रखें। सभी प्राणियों में व सारी सृष्टि में वे ही व्याप्त हैं। उनके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं है। वे ही सर्वस्व हैं। हरिः ॐ तत्सत्॥
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"ॐ वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्क: प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
कृपा शंकर

१ दिसंबर २०२१ 

अपने हृदय को पूछिये और हृदय जो भी कहता है वह कीजिये ---

अपने हृदय को पूछिये और हृदय जो भी कहता है वह कीजिये। हृदय कभी झूठ नहीं बोल सकता क्योंकि हृदय में भगवान का निवास है।

भगवान की भक्ति के लिए इधर-उधर भागदौड़ करने से कोई लाभ नहीं है। सब गुरुओं के गुरु भगवान श्रीकृष्ण हैं, उनसे बड़ा कोई गुरु नहीं है। हृदय में उनका ध्यान कीजिये और नित्य गीता पाठ कीजिये। गीता पाठ में यदि कठिनाई आती है तो नित्य नियमित रामचरितमानस का पाठ कीजिये। यदि वह भी नहीं होता है तो नित्य नियमित रूप से हनुमान चालीसा या द्वादशाक्षरी भागवत मंत्र का जप तो कर ही सकते हैं। वह भी नहीं होता तो निरंतर रामनाम का जप कीजिये। उससे अधिक सरल और प्रभावी साधन कोई दूसरा नहीं है।
सभी को शुभ कामनाएँ और नमन!
३० नोवेंबर २०२१

अब चिंतन-धारा (विचार-धारा) में बहुत बड़े परिवर्तन हो गये हैं ---

 अब चिंतन-धारा (विचार-धारा) में बहुत बड़े परिवर्तन हो गये हैं ---

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(१) पहले स्वयं को व्यक्त करने की एक आकांक्षा थी, जिसकी पूर्ति के लिए परमात्मा ने फेसबुक आदि सोशियल मीडिया प्रदान कीं, जिन से मन अब पूरी तरह भर गया है| अब स्वयं को परमात्मा की अनंतता में व उस से भी परे व्यक्त होने की एक अति तीब्र अभीप्सा गहनतर होती जा रही है| सारी आध्यात्मिक साधनाओं का एकमात्र उद्देश्य ही स्वयं में परमात्मा को, व परमात्मा में स्वयं को व्यक्त करना है|
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(२) यह सृष्टि परमात्मा की है, मेरी नहीं| मेरा एकमात्र संबंध भी परमात्मा से ही रह गया है| उन के अतिरिक्त अब न तो कोई सुनने वाला है और न कोई रक्षा करने वाला| अतः अब कोई भी निंदा-स्तुति, आलोचना-प्रशंसा, शिकायत-अनुशंसा, --- परमात्मा से ही करेंगे, किसी अन्य से नहीं|
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(३) मृत्यु का अब कोई भय नहीं रहा है| मृत्यु मुझ से यह शरीर ही छीन सकती है और कुछ नहीं| मैं यह शरीर नहीं, एक शाश्वत आत्मा हूँ, जिसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता| इस शरीर की मृत्यु के पश्चात न तो किसी स्वर्ग की कामना है, और न ही किसी नर्क का भय| मेरी गति अति सूक्ष्म जगत के उन्हीं हिरण्यमय लोकों में होगी, जहाँ मेरे पूर्व जन्मों के गुरु, परमात्मा के साथ एक हैं| मैं उन से पृथक नहीं रह सकता|
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(४) मैं एक नित्य-मुक्त शाश्वत आत्मा हूँ जिस की इस शरीर से मुक्त होने के पश्चात किसी भी तरह की कोई दुर्गति नहीं होगी, क्योंकि पूर्वजन्मों के गुरु मेरी रक्षा कर रहे हैं| मैं उन्हीं के साथ परमात्मा के हृदय में हूँ, और वहीं रहूँगा|
जब यह शरीर शांत हो जाये तब किसी भी तरह के कर्मकांड इस देह के लिए करने की आवश्यकता मेरे परिजनों को नहीं है| इस को भस्म कर के किसी पवित्र नदी में प्रवाहित कर दें ताकि कोई प्रदूषण न हों, और कुछ भी नहीं| पता नहीं अब तक कितने शरीरों में जन्म और मृत्यु हुई है| यह चक्र, प्रकृति का एक नियम है| मैं यह भी नहीं चाहता कि कोई मुझे याद करे| याद ही करना है तो परमात्मा को करें|
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(५) परमात्मा की आरोग्यकारी उपस्थिती सभी प्राणियों की देह, मन व आत्मा में प्रकट हो| सभी का कल्याण हो, और सभी सुखी रहें|
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गीता में अर्जुन द्वारा की गई यह स्तुति मेरे जीवन का अटूट अंग है ---
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च |
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ||११:३९||
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व |
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ||११:४०||"
भावार्थ जो मैं समझता हूँ :---
आप ही यम (मूलाधार चक्र), वरुण (स्वाधिष्ठान चक्र), अग्नि (मणिपुर चक्र), वायु (अनाहत चक्र), शशांक (विशुद्धिचक्र), प्रजापति (आज्ञाचक्र), और प्रपितामह (सहस्त्रार चक्र) हैं| आपको हजारों बार नमस्कार है| पुनश्च: आपको "क्रिया" (क्रियायोग के अभ्यास और आवृतियों) के द्वारा अनेकों बार नमस्कार (मैं नहीं, आप ही हैं, यानि कर्ता मैं नहीं आप ही हैं) हो|
(यह अतिशय श्रद्धा, भक्ति और अभीप्सा का भाव है)
आप को आगे से और पीछे से (इन साँसों से जो दोनों नासिका छिद्रों से प्रवाहित हो रहे हैं) भी नमस्कार है (ये साँसें आप ही हो, ये साँसें मैं नहीं, आप ही ले रहे हो)| सर्वत्र स्थित हुए आप को सब दिशाओं में (सर्वव्यापकता में) नमस्कार है| आप अनन्तवीर्य (अनंत सामर्थ्यशाली) और अमित विक्रम (अपार पराक्रम वाले) हैं, जो सारे जगत में, और सारे जगत को व्याप्त किये हुए सर्वरूप हैं| आपसे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है|
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यह मैं और मेरा होने का भाव मिथ्या है| जो भी हैं, वह आप ही हैं| जो मैं हूँ वह भी आप ही हैं| हे प्रभु , आप को बारंबार नमन है !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
६ दिसंबर २०२०

गीता में अर्जुन द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति जो मेरे जीवन का अटूट भाग है ---

गीता में अर्जुन द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति जो मेरे जीवन का अटूट भाग है ---
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"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च |
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ||११:३९||
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व |
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ||११:४०||"
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भावार्थ जैसा मैं समझता हूँ :---
आप ही यम (मूलाधार चक्र), वरुण (स्वाधिष्ठान चक्र), अग्नि (मणिपुर चक्र), वायु (अनाहत चक्र), शशांक (विशुद्धि चक्र), प्रजापति (आज्ञा चक्र), और प्रपितामह (सहस्त्रार चक्र) हैं| आपको हजारों बार नमस्कार है|
पुनश्च: आपको "क्रिया" (क्रियायोग के अभ्यास और आवृतियों) के द्वारा अनेकों बार नमस्कार (मैं नहीं, आप ही हैं, यानि कर्ता मैं नहीं आप ही हैं) हो|
(यह अतिशय श्रद्धा, भक्ति और अभीप्सा का भाव है)
आप को आगे से और पीछे से (इन साँसों से जो दोनों नासिका छिद्रों से प्रवाहित हो रहे हैं) भी नमस्कार है (ये साँसें आप ही हो, ये साँसें मैं नहीं, आप ही ले रहे हो)| सर्वत्र स्थित हुए आप को सब दिशाओं में (सर्वव्यापकता में) नमस्कार है| आप अनन्तवीर्य (अनंत सामर्थ्यशाली) और अमित विक्रम (अपार पराक्रम वाले) हैं, जो सारे जगत में, और सारे जगत को व्याप्त किये हुए सर्वरूप हैं| आपसे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है|
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यह मैं और मेरा होने का भाव मिथ्या है| जो भी हैं, वह आप ही हैं| जो मैं हूँ वह भी आप ही हैं| हे प्रभु , आप को बारंबार नमन है !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
६ दिसंबर २०२०

Saturday, 4 December 2021

आसन्न परिस्थितियाँ बड़ी विकट हैं, देश एक बहुत बड़े संकट से निकल रहा है ---

आसन्न परिस्थितियाँ बड़ी विकट हैं, देश एक बहुत बड़े संकट से निकल रहा है --- (Dated 5 December 2020)

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भारत एक ज्वालामुखी पर बैठा है जो कभी भी फट सकता है| मैं जो लिख रहा हूँ वह कोई नकारात्मक बात नहीं, एक आपत्काल की पूर्व सूचना है| आगे आने वाले सात-आठ महीने हमारे लिए अच्छे नहीं हैं| अपनी स्वयं की व भारत की रक्षा के लिए भगवान से प्रार्थना करें|
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शाहीनबाग का धरना और दिल्ली के दंगे, भारत को तोड़ने के लिए थे जो भगवान की कृपा से सफल नहीं हुए| फिर जैविक अस्त्र कोरोना वायरस के चीन द्वारा किए गए प्रयोग ने देश का बुरा हाल कर दिया| लद्दाख में चीन सफल नहीं हुआ, अन्यथा उसकी योजना बड़ी भयंकर थीे| अब पाकिस्तान के साथ मिल कर वह भारत पर कभी भी आक्रमण कर सकता है|
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पहले चीन, पाकिस्तान व भारत के भीतर/बाहर की कुछ भारतद्रोही शक्तियाँ भारत में अराजकता फैलायेंगी| दिल्ली में किसान आंदोलन के नाम से चल रहा आंदोलन, भारत को दंगों व गृह-युद्ध की आग में झौंकने की तैयारी है| दुर्भाग्य से हमारे लोगों के व्यक्तिगत हित, राष्ट्रहित से बड़े हो गए हैं| पाकिस्तान में सैंकड़ों आतंकवादी भारत पर आक्रमण के लिए तैयार बैठे हैं| हजारों आतंकी वहाँ तैयार किए जा रहे हैं|
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कोरोना महामारी -- चीन द्वारा जैविक युद्ध का एक प्रयोग था| अब उस से भी अति भयंकर जीवाणू चीन ने बना लिए हैं, जिनका प्रयोग वह भारत के विरुद्ध कर सकता है|
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पूरी तरह सचेत रहिए और अपने संसाधनों को बचा कर रखें| अपना खर्चा कम करें, स्वस्थ रहें व अपनी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाएँ| किसी भी तरह के आपत्काल के लिए तैयार रहें| देश की रक्षा के लिए हो सकता है हमें हर आपत्कालीन उपाय युद्ध-स्तर पर करने पड़ें|
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अब मैं हर तरह के आध्यात्मिक लेख लिखना कुछ समय के लिए बंद कर रहा हूँ| राष्ट्र की रक्षा अधिक महत्वपूर्ण है| आने वाली विकट परिस्थितियों का सामना करने को हम तैयार रहें| भारत माता की जय|
५ दिसंबर २०२०

हमारी उपासना तेलधारा की तरह अखंड हो ---

 हमारी उपासना तेलधारा की तरह अखंड हो ---

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भक्ति के बिना तो कोई उपासना हो ही नहीं सकती| भक्ति से ही ज्ञान और वैराग्य का प्राकट्य होता है| भक्ति सूत्रों के अनुसार हमारी भक्ति वैसी ही हो, जैसी बृज की गोपिकाओं की थी (यथा व्रजगोपिकानाम्)| मेरे लिए तो भक्ति के सबसे बड़े आदर्श --- श्रीहनुमान जी और श्रीराधा जी हैं| रामचरितमानस व भागवत जैसे ग्रंथ भक्ति की ही महिमा गाते हैं| शांडिल्य व नारद भक्ति-सूत्रों में भक्ति को बहुत अच्छी तरह से समझाया गया है| हमारी चेतना में भगवान की निरंतर उपस्थिती बनी रहे, और हमारा अन्तःकरण भगवान को समर्पित हो, यही उपासना का उद्देश्य है| भगवान हमारे से हमारा प्रेम ही माँगते हैं| प्रेम के अतिरिक्त हमारे पास है ही क्या? सब कुछ तो उन्हीं का दिया हुआ है| प्रकृति में कुछ भी निःशुल्क नहीं है| हर चीज की कीमत चुकानी पड़ती है| भगवान की प्राप्ति के लिए अपना परमप्रेम व अपना अन्तःकरण तो भगवान को समर्पित करना ही होगा| भगवान कहते हैं ---
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः||९:३४||"
""मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे||१८:६५||"
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज| अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः||१८:६६||"
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हमारी उपासना "तेलधारा" के समान अखंड होनी चाहिए| तेल को एक पात्र से जब दूसरे में डालते हैं तब उसकी धार अखंड रहती है, बीच बीच में टूटती नहीं है, वैसी ही हमारी उपासना होनी चाहिए| योग साधकों के लिए आज्ञाचक्र ही उन का आध्यात्मिक-हृदय होता है| आज्ञाचक्र के एकदम सामने भ्रूमध्य होता है, जहाँ गुरु की आज्ञा से ध्यान करते हैं| वहाँ ध्यान करते करते गुरुकृपा से एक न एक दिन एक दिव्य ज्योति के दर्शन होने लगते हैं और अनाहत नाद की ध्वनि सुनाई देने लगती है| वह दिव्य ज्योति ही कूटस्थ है, और उसमें निरंतर स्थिति कूटस्थ-चैतन्य है| भगवान कहते हैं ---
"ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते| सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्||१२:३||"
"संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः| ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः||१२:४||"
भावार्थ :-- जो भक्त अक्षर ,अनिर्देश्य, अव्यक्त, सर्वगत, अचिन्त्य, कूटस्थ, अचल और ध्रुव की उपासना करते हैं, इन्द्रिय समुदाय को सम्यक् प्रकार से नियमित करके, सर्वत्र समभाव वाले, भूतमात्र के हित में रत वे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं||
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आचार्य शंकर ने अपने भाष्य में 'उपासना' को 'तैलधारा' के समान बताया है| उपासना का शाब्दिक अर्थ है --- समीप बैठना| हमें अपनी चेतना में सदा भगवान के समक्ष ही बैठना चाहिए| शंकर भाष्य के अनुसार --- "उपास्य वस्तु को शास्त्रोक्त विधि से बुद्धि का विषय बनाकर, उसके समीप पहुँचकर, तैलधारा के सदृश समान वृत्तियों के प्रवाह से दीर्घकाल तक उसमें स्थिर रहने को उपासना कहते हैं|"
यहाँ उन्होंने "तैलधारा" शब्द का प्रयोग किया है जो अति महत्वपूर्ण है|
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तैलधारा के सदृश समानवृत्तियों का प्रवाह क्या हो सकता है? पहले इस पर विचार करना होगा| योगियों के अनुसार ध्यान साधना में जब प्रणव यानि अनाहत नाद की ध्वनी सुनाई देती है तब वह तैलधारा के सदृश अखंड होती है| प्रयोग के लिए एक बर्तन में तेल लेकर उसे दुसरे बर्तन में डालिए| जिस तरह बिना खंडित हुए उसकी धार गिरती है, वैसे ही अनाहत नाद यानि प्रणव की ध्वनी सुनाई देती है| प्रणव को परमात्मा का वाचक यानि प्रतीक कहा गया है| यह प्रणव ही कूटस्थ अक्षर ब्रह्म है|
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समानवृत्ति का अर्थ जो मुझे समझ में आता है, वह --- श्वास-प्रश्वास और वासनाओं की चेतना से ऊपर उठना है| चित्त स्वयं को श्वास-प्रश्वास और वासनाओं के रूप में व्यक्त करता है| अतः समानवृत्ति शब्द का यही अर्थ हो सकता है|
मेरी सीमित अल्प बुद्धि के अनुसार "उपासना" का अर्थ --- हर प्रकार की चेतना से ऊपर उठकर ओंकार यानि अनाहत नाद की ध्वनी को सुनते हुए उसी में लय हो जाना है| मेरी दृष्टी में यह ओंकार ही गुरु रूप ब्रह्म है|
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उपासना का उद्देश्य उपास्य के साथ एकाकार होना है| व्यवहारिक रूप से किस व्यक्ति में कौन सा गुण प्रधान है, उस से वैसी ही उपासना होगी| मनुष्य जैसा चिंतन करता है वैसी ही उपासना करता है| तमोगुण की प्रधानता अधिक होने पर मनुष्य परस्त्री/परपुरुष व पराये धन की उपासना करता है जो उसके और भी अधिक पतन का कारण बनती है| चिंतन चाहे परमात्मा का हो या परस्त्री/पुरुष या पराये धन का, होता तो उपासना ही है| रजोगुण प्रधान व्यक्ति सांसारिक उपलब्धियों की उपासना करता है| सतोगुण प्रधान व्यक्ति परमात्मा के विभिन्न रूपों की उपासना करता है|
अंततः हमें इन तीनों गुणों से भी ऊपर उठना पड़ता है| भगवान हमें निःस्त्रेगुण्य, नित्यसत्वस्थ, निर्योगक्षेम और आत्मवान होने का आदेश देते हैं ---
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन| निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्||२:४५||"
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नारद भक्तिसूत्रों के अनुसार उपासक को सर्वदा सत्संग करना चाहिए और किसी भी परिस्थिति में कुसंग का त्याग करना चाहिए क्योंकि संगति का असर पड़े बिना रहता नहीं है| मनुष्य जैसे व्यक्ति का चिंतन करता है वैसा ही बन जाता है| महापुरुषों का संग दुर्लभ, अगम्य तथा अमोध है (महत्सङ्गस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च), लेकिन किसी भी परिस्थिति में हमें कुसंग का त्याग करना चाहिए (दुस्सङ्गः सर्वथैव त्याज्यः)| ( कुसंग) काम, क्रोध, मोह, स्मृतिभ्रंश, बुद्धिनाश एवा सर्वनाश का कारण है (कामक्रोधमोहस्मृतिभ्रंशबुद्धिनाशकारणत्वात्)|
जो पतनोन्मुख है, और जो गलत लोगों का संग करता है, उसका साथ छोड़ देना चाहिए, चाहे वह स्वयं का गुरु ही क्यों ना हो| कुसंग सर्वदा त्याज्य है|
योगसूत्रों में एक सूत्र आता है --- "वीतराग विषयं वा चित्तः", इस पर गंभीरता से विचार करें| किसी वीतराग व्यक्ति का निरंतर चिंतन हमारे चित्त को भी वीतराग (राग-द्वेष-अहंकार से परे) बना देता है|
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नर्क की अग्नि से भी भयावह वासना की अग्नि है| इस से बच कर ही रहना चाहिए| इसकी कल्पना भी नर्क की अग्नि में गिरा देती है| अज्ञानग्रंथि का भेदन कर अपने परम शिवत्व को व्यक्त करना ही उपासना का लक्ष्य है| जब ह्रदय में परमप्रेम उदित होता है तब भगवान किसी गुरु के माध्यम से मार्गदर्शन देते हैं| हमें भगवान को ही इस देहरूपी नौका का कर्णधार बनाना चाहिए| गीता और सारे उपनिषद ओंकार की महिमा से भरे पड़े हैं| अतः कूटस्थ अक्षरब्रह्म का ध्यान में तैलधारा के सदृश निरंतर श्रवण, और कूटस्थ ब्रह्मज्योति का निरंतर दर्शन ही उपासना है| यह कूटस्थ ही गुरुरूप ब्रह्म है, और यह कूटस्थ ही हम स्वयं हैं|
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मैंने जो लिखा है उस में कुछ गलत हो तो मनीषीगण मुझे क्षमा करें| मेरी अति अल्प और अति सीमित बुद्धि इतना ही काम करती है, इस से अधिक नहीं|
भगवान की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति, आप सब को नमन !!
ॐ गुरुभ्यो नमः ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
४ दिसंबर २०२०
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पुनश्च: :---
नारद भक्तिसूत्रों के अनुसार कौन तरता व तारता है? ---
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(१) कस्तरति कस्तरति मायाम् यः सङ्गं त्यजति यो महानुभाव् सेवते निर्ममो भवति |
कौन तरता है कौन तरता है, माया से? जो सब संगों का त्याग करता है, जो महापुरुषों की सेवा करता है, जो ममता रहित होता है|
(२) यो विविक्तस्थानं सेवते यो लोकबन्धमुनमूनयति निस्त्रैगुण्यो भवति योगक्षेमं त्यजति|
जो निर्जन स्थान का सेवन करता है, लौकिक बन्धनों को तोड़ देता है, तीनों गुणों से पार हो जाता है तथा जो योग-क्षेम का त्याग कर देता है|
(जो प्राप्त न हो उसकी प्राप्ती को योग, और जो प्राप्त हो उसके संरक्षण को क्षेम कहा जाता है).
(३) यः कर्मफलं त्यजति कर्माणि सन्नयस्स्यति ततो निर्द्वन्द्वो भवति|
जो कर्म फल का त्याग करता है, (वह) कर्मों का भी त्याग कर देता है, तथा निर्द्वन्द्व हो जाता है|
(४) यो वेदानपि सन्नयस्यति केवलमविच्छिन्नानुरागं लभते|
जो वेदों का भी त्याग कर देता है, केवल तथा अविच्छिन्न अनुराग ही रह जाता है|
(५) स तरति स तरति स लोकांस्तारयति|
वह तरता है, वह तरता है, वह इस लोक को भी तारता है|

४ दिसंबर २०२०