Tuesday, 16 November 2021

मन की चंचलता कैसे दूर हो ? ...

 मन की चंचलता कैसे दूर हो ? ...

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गीता में भगवान कहते हैं ...
"असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं| अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते||६:३५||"
भगवान् कहते हैं -- हे महबाहो ! नि:सन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है; परन्तु, हे कुन्तीपुत्र ! उसे अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वश में किया जा सकता है||
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उपरोक्त श्लोक में भगवान ने यह तो कह दिया कि अभ्यास और वैराग्य के द्वारा ही मन को वश में किया जा सकता है, लेकिन यहाँ पर यह नहीं बताया कि अभ्यास किस का करें, और वैराग्य कैसे हो?
भाष्यकार भगवान आचार्य शंकर के अनुसार अभ्यास से अर्थात् किसी चित्तभूमि में एक समान वृत्ति की बारंबार आवृत्ति करने से और दृष्ट तथा अदृष्ट प्रिय भोगों में बारंबार दोषदर्शन के अभ्यास द्वारा उत्पन्न हुए अनिच्छारूप वैराग्य से चित्त के विक्षेपरूप प्रचार ( चञ्चलता ) को रोका जा सकता है| अर्थात् इस प्रकार उस मन का निग्रह निरोध किया जा सकता है|
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यहाँ दो बातें मुझे समझ मे आई हैं| पहली बात तो यह है कि माया का विक्षेप ही मन की चंचलता है| माया के दो अस्त्र हैं जिनसे वह हमें भ्रमित करती है ... पहिला अस्त्र तो है ..."आवरण", और दूसरा है ... "विक्षेप"| यह विक्षेप ही मन की चंचलता है|
दूसरी बात यह है कि "एक समान वृत्तिकी बारंबार आवृत्ति" का अर्थ हंसःयोग या क्रियायोग की साधना ही हो सकती है|
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योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय के अनुसार मन की चंचलता का कारण प्राण-तत्व की चंचलता है| प्राणतत्व को स्थिर कर के ही मन की चंचलता को समाप्त किया जा सकता है| इस के लिए वे क्रियायोग की साधना को ही सर्वश्रेष्ठ बताते हैं| हंसःयोग भी क्रियायोग साधना का ही एक अंग है|
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ये साधनायें तो सद्गुरु के मार्गदर्शन और उन के सान्निध्य में ही करने की हैं| लेकिन एक बात याद रहे कि बिना भक्ति और सत्यनिष्ठा के कोई भी साधना सफल नहीं हो सकती|
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आप सब महान आत्माओं को सप्रेम नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१७ नवंबर २०२०

सत्य का प्रमाण - स्वयं की अनुभूतियाँ हैं ---

सत्य का प्रमाण - स्वयं की अनुभूतियाँ हैं ---
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"दूध में घी है", यह पढ़ने या सुनने से घी नहीं प्राप्त होता। उसे प्राप्त करने की विधि किसी जानकार से जाननी होगी, और उस विधि का प्रयोग कर के दूध से घी निकालना होगा। दूसरे के द्वारा भोजन ग्रहण करने से स्वयं की क्षुधा शांत नहीं होती। स्वयं की क्षुधा शांत करने के लिए भोजन स्वयं को ही करना होगा। वैसे ही आध्यात्मिक/धार्मिक पुस्तकें/लेख पढने से, या प्रवचन सुनने से प्रेरणा तो मिल सकती है, लेकिन आध्यात्मिक विकास नहीं हो सकता, और ईश्वर की प्राप्ति भी नहीं हो सकती। सत्य का बोध तो स्वयं को ही करना होगा, दूसरा कोई यह नहीं करा सकता।
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सत्य का प्रमाण स्वयं की अनुभूति है। उन सब विचारधाराओं से दूर रहो जो दूसरों से नफ़रत करना सिखाती हैं, जो अपने से भिन्न विचार वालों की ह्त्या करना सिखाती हैं, जो आत्म-हीनता का बोध कराती हैं, जो यह सिखाती हैं कि तुम जन्म से ही पापी हो, या फिर असहमति होने पर हमें भयभीत करती हैं। परमात्मा प्रेम का विषय है, भय का नहीं। जो सीख हमें परमात्मा से भयभीत होना सिखाती है, वह धार्मिक नहीं हो सकती। यदि परमात्मा में श्रद्धा और विश्वास है तो भयभीत होने का कोई कारण नहीं है। भयभीत होने की शिक्षा हमारे किसी भी शास्त्र में नहीं है, यह एक विजातीय प्रभाव है। डरना ही है तो अपने बुरे कर्मफलों से डरो, अन्य किसी भी वस्तु से नहीं। भगवान ने हमारी ही रक्षा के लिए अस्त्र-शस्त्र धारण कर रखे हैं। उन अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए भगवान को हृदय में रखकर असत्य व अन्धकार की शक्तियों का निरंतर प्रतिकार करो, और अपने पथ पर अडिग रहो। भगवान कहते हैं --
"क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥२:३॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् - हे पार्थ क्लीव (कायर) मत बनो, यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है। हे परंतप हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ॥
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
इसलिए तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो, और युद्ध करो। मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
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माया के वशीभूत होकर हम निरंतर भ्रमित हो रहे हैं। सच्चिदानंद के प्रति पूर्ण परम प्रेम जागृत कर उनको पूर्ण समर्पित होने का निरंतर प्रयास ही साधना है, और पूर्ण समर्पण ही लक्ष्य है। नित्य नियमित ध्यान साधना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, अन्यथा परमात्मा को पाने की इच्छा ही समाप्त हो जाती है। मन पर निरंतर मैल चढ़ता रहता है जिस की नित्य नियमित सफाई आवश्यक है। साधना में कर्ताभाव न हो, कर्ता तो भगवान स्वयं हैं। भगवान हमारे दोषों पर नहीं, बल्कि प्रेम पर ध्यान देते हैं। उन की कृपा हम पर निरंतर बरस रही है।
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उपास्य के गुण उपासक में अवश्य आते हैं, यही सच्चिदानंद परमात्मा के ध्यान का लाभ है। उनके ध्यान से हमें भय, चिंता और क्रोध से भी मुक्ति मिलती है। आप सब को नमन!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ नवंबर २०२१

Monday, 15 November 2021

परमप्रेममय और मौन होकर ही हम परमात्मा के साथ एक हो सकते हैं ---

परमप्रेममय होकर ही मौन परमात्मा के साथ हम एक हो सकते हैं। हमारे चारों ओर एक आभा है, जिसका चुम्बकत्व स्वयं ही सब कुछ बोल देता है। उस चुम्बकत्व को हम अपने-आप ही बोलने दें। यह चुम्बकत्व - "मौन की भाषा" है, जो कि सर्वश्रेष्ठ वाणी है। स्वयं प्रेममय हो जाना ही अनन्य प्रेम है जो प्रेम की सर्वतोत्कृष्ट अभिव्यक्ति है। यह प्रेम ही हमें परमात्मा से एकाकार कर सकता है। स्वयं प्रेममय हुए बिना हम परमात्मा का चिंतन निष्काम भाव से नहीं कर सकते।  फिर तो परमात्मा स्वयं ही खिंचे चले आते हैं। परमात्मा के सिवाय कोई "अन्य" हो ही नहीं सकता। सम्पूर्ण सृष्टि और हम सब परमात्मा के ही प्रतिरूप हैं। 

 किसी भी तरह की दरिद्रता, सब से बड़ा पाप है। निज जीवन में परमात्मा की उपस्थिती ही हमें सब तरह की दरिद्रताओं से मुक्त कर सकती है। आध्यात्मिक दरिद्रता - भौतिक दरिद्रता से कहीं अधिक दुःखदायी है।  .

भगवान न तो कहीं जा सकते हैं, और न ही कहीं छिप सकते हैं, क्योंकि समान रूप से हर समय वे सर्वत्र व्याप्त हैं। इसीलिए वे वासुदेव कहलाते हैं। उनके पास न तो कहीं जाने की जगह है, और न कहीं छिपने की। वे सदा कूटस्थ हृदय में बिराजमान हैं। उनसे पृथकता का बोध ही माया है। यश, कीर्ति और प्रशंसा की कामना एक धोखा है। यह कामना हमें हमेशा निराश ही नहीं करती बल्कि हमारे लिए नर्क का द्वार भी खोलती है।

इस सृष्टि का सम्पूर्ण सौन्दर्य हमारा ही प्रतिबिंब है। हम यह देह नहीं, विराट अनंतता हैं। हम इस महासागर की एक बूंद नहीं, सम्पूर्ण महासागर हैं। हम कण नहीं प्रवाह हैं। यह सारी सृष्टि हमारी ही देह है। सम्पूर्ण अस्तित्व हम स्वयं हैं। हमारे सिवाय कोई अन्य या कुछ भी अन्य नहीं है। हम अपने प्रभु के साथ एक हैं। 

ॐ नमः शंभवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च !! 

ॐ तत्सत् ॥ ॐ ॐ ॐ !!

कृपा शंकर  १६ नवंबर २०२१

(१) क्या भगवान भी किसी को पकड़ लेते हैं ? (२) भगवान अपना दिया सामान अब बापस ले रहे हैं ---

 (१) क्या भगवान भी किसी को पकड़ लेते हैं ?? ---

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यह सत्य है कि भगवान भी कभी कभी हमें पकड़ लेते हैं। पर वे किसी को क्यों पकड़ते हैं, यह बुद्धि से परे की बात है। यह वही समझ सकता है जिसमें कूट कूट कर भक्तिभाव भरा होता है। भक्ति भी एक जन्म की उपलब्धि नहीं होती, अनेक जन्मों के पुण्योदय का परिणाम होता है। जब कभी अचानक ही बिना किसी प्रयास के स्वतः ही भगवान से परमप्रेम जागृत हो जाये, तब लगता है कि भगवान ने पकड़ लिया है।
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आजकल कई बार भगवान ने मुझे भी पकड़ना आरंभ कर दिया है। अचानक ही कई बार प्रेममय होकर ध्यानस्थ हो जाता हूँ, आँखों से आँसू निकलने लगते हैं। समझ में नहीं आता कि यह क्या हो रहा है। आसपास के लोग पूछते हैं कि आँखों में आँसू क्यों आ रहे हैं? उनको उत्तर यही देता हूँ कि बहुत तेज जुकाम लगी हुई है।
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(२) भगवान अपना दिया सामान अब बापस ले रहे हैं ---
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भगवान ने चार चीजें उधार में दी थीं -- मन, बुद्धि, चित्त, और अहंकार। इनका न तो मैंने कभी कोई भाड़ा चुकाया, और न ही मूलधन बापस किया। अतः भगवान ने भी अब परेशान होकर अपना सामान बापस लेना आरंभ कर दिया है। जितना शीघ्र वे अपना सामान बापस ले लें, उतना ही मेरे लिए अच्छा है। वे तो श्रीहरिः हैं, अपना नाम सार्थक करें। इस जीवन की सार्थकता तभी होगी जब भगवान अपना ये सामान बापस ले लेंगे।
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आप सब कैसे हैं? आप सब सदा प्रसन्न रहो। मेरे पास अब कुछ भी नहीं है। जो कुछ भी सामान है, वह भगवान से उधार लिया हुआ है, जो उन्हें बापस लौटाना है।
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मेरा एकमात्र संबंध भी उन्हीं से है, क्योंकि उनका साथ शाश्वत है। इस जन्म से पूर्व भी वे मेरे साथ थे, और इस जन्म के उपरांत भी वे ही साथ रहेंगे। वे ही माँ-बाप, व सभी संबंधियों और मित्रों के रूप में आये, और उनके माध्यम से अपना प्रेम मुझे दिया। मेरा सर्वस्व उन्हें अर्पित है। जो कुछ भी है, वह वे ही हैं। पृथकता का बोध मिथ्या था, और मिथ्या ही है।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१५ नवंबर २०२१

यदि भगवान में आस्था है तो कभी भी निराश न हों ---

 यदि भगवान में आस्था है तो कभी भी निराश न हों। चाहे कितनी भी घोर विपत्तियों के बादल मंडरा रहे हों, चारों ओर अंधकार ही अंधकार ही हो, कहीं से भी कोई आशा की किरण नहीं दिखाई दे रही हो, अपना हाथ उनके हाथ में थमा दो, यह संसार उनका है, हमारी रक्षा सुनिश्चित है। इस शरीर में प्राण रहे या न रहे, कोई अंतर नहीं पड़ता। लेकिन निराशा, भीरुता लाना -- नीच कायरता है। गीता में भगवान कहते हैं --

"क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥२:३॥"
अर्थात् -- हे पार्थ क्लीव (कायर) मत बनो। यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है, हे परंतप हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ॥
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"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥११:३३॥"
अर्थात् -- इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो॥"
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"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१८:१७॥"
अर्थात् -- जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है॥
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"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
अर्थात् -- मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे? तो तुम नष्ट हो जाओगे॥
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वाल्मीकि रामायण में भी भगवान का वचन है --
"सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥"
अर्थात् -- जो एक बार भी मेरी शरण में आकर 'मैं तुम्हारा हूँ' ऐसा कहकर रक्षा की याचना करता है, उसे मैं सम्पूर्ण प्राणियों से अभय कर देता हूँ – यह मेरा व्रत है।
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भगवान के इतने स्पष्ट आश्वासन हैं, फिर कैसी तो निराशा? और कैसी भीरुता?
भगवान हैं, यहीं पर इसी समय, सर्वत्र और सर्वदा हैं। फिर काहे का अवसाद? सदा प्रसन्न रहो। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१४ नवंबर २०२१

भगवान कहाँ जा सकते हैं? कहाँ छिप सकते हैं?

 भगवान कहाँ जा सकते हैं? कहाँ छिप सकते हैं?

भगवान न तो कहीं जा सकते हैं, और न ही कहीं छिप सकते हैं, क्योंकि समान भाव से सर्वस्व, सर्वत्र वे ही व्याप्त हैं| उनके पास न तो कहीं जाने की जगह है, और न कहीं छिपने की| जब हम उन्हीं के अंश और शाश्वत-आत्मा हैं, तो उनकी माया के आवरण और विक्षेप, जिन्होने हमें अज्ञान में डाल रखा है, अधिक समय तक टिकने वाले नहीं हैं| उन के प्रति प्रेम के समक्ष माया के आवरण और विक्षेप नहीं टिक सकते| वास्तव में हम उन से पृथक नहीं हैं| यह पृथकता का बोध ही माया है|
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प्रत्येक जीवात्मा का सनातन स्वधर्म है कि वह निज जीवन में परमात्मा को व्यक्त करे| निज जीवन में परमात्मा की अभिव्यक्ति ही सनातन धर्म है| यही हमारा स्वधर्म है| हम कर्म करने के लिए स्वतंत्र हैं| लेकिन यह कर्ता भाव ही हमें कर्मफलों को भोगने को बाध्य करता है| जब तक कर्ताभाव है तब तक यह जन्म-मृत्यु का चक्र चलता रहेगा| इसे कोई नहीं रोक सकता| इस चक्र से मुक्त होने के लिए जीवन में भक्ति, वैराग्य और ज्ञान का होना परम आवश्यक है|
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हमारी सबसे बड़ी और एकमात्र समस्या है कि हमें भक्ति, वैराग्य और ज्ञान कैसे प्राप्त हों, क्योंकि ये ही हमें असत्य के अंधकार से बचा सकते हैं| लेकिन कोई जल्दी नहीं है| आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में, भगवान को आना ही पड़ेगा| जैसे कोई माता-पिता अपनी संतान के बिना नहीं रह सकते, वैसे ही भगवान भी हमारे बिना नहीं रह सकते|
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हमारी उन से एक ही प्रार्थना है कि हर नए जन्म के आरंभ से ही यानि जन्म से ही उनकी पूर्ण भक्ति, वैराग्य और ज्ञान, व उन्हें पाने की एक तीब्र अभीप्सा हो| ये तो उन्हें देनी ही पड़ेंगी| इन्हें मांगना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, जिसके लिए वे मना नहीं कर सकते|
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सुख में, दुःख में, भाव में, अभाव में वे ही हमारे साथ हैं| हम जीवन में संघर्ष करते हैं अपनी दरिद्रता से मुक्ति के लिए| दरिद्रता सब से बड़ा पाप है| लेकिन आध्यात्मिक दरिद्रता उस से भी बड़ा पाप है| हमारी आध्यात्मिक दरिद्रता, भगवान की उपस्थिती से ही दूर हो सकती है|
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अभी इतना ही| आप सब निजात्मगण को नमन !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ नवंबर २०२०

Sunday, 14 November 2021

 सत्य-सनातन-धर्म (हिन्दू धर्म) की पुनर्प्रतिष्ठा व वैश्वीकरण कब होगा? ...

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क्रमिक विकास में जब मनुष्य की बुद्धि यह समझने लगेगी कि वह एक शाश्वत आत्मा है, यह देह नहीं; उसी क्षण से सनातन धर्म (हिन्दू धर्म) उसे समझ में आने लगेगा| आत्मा की शाश्वतता, कर्म, कर्म करने की स्वतन्त्रता, कर्मफलों की प्राप्ति, पुनर्जन्म, कर्तृत्व, भक्ति व समर्पण, और समत्व, ... आदि की समझ, और तदानुसार उसका ऊर्ध्वमुखी आचरण ... सनातन धर्म (हिन्दू धर्म) है| इसी से हमारा अभ्युदय और निःश्रेयस की सिद्धि हो सकती है|
उपरोक्त सत्य की समझ और समझाने से ही सनातन-धर्म (हिन्दू धर्म) की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण होगा, अन्यथा नहीं| सर्वप्रथम तो यह समझना और समझाना आवश्यक है कि हम एक शाश्वत आत्मा हैं जो कभी नष्ट नहीं हो सकती| हम इस सृष्टि में जो कुछ भी हैं, वह अपने कर्मफलों के कारण हैं| हम कर्म करने के लिए स्वतंत्र हैं| हमारे विचार और भाव ही हमारे कर्मों के कर्ता हैं| कर्मफलों को भोगने के लिए ही हमारा बार-बार पुनर्जन्म होता है| भक्ति और समर्पण के द्वारा ही हम इस आवागमन के चक्र से मुक्त हो सकते हैं, और समत्व में स्थिति ही वास्तविक ज्ञान है| ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१५ नवंबर २०२०