Saturday, 13 November 2021

जीवन का एक भी पल भगवान की स्मृति के बिना व्यतीत न हो ---

जीवन का एक भी पल भगवान की स्मृति के बिना व्यतीत न हो। भगवान की कृपा से हरेक बाधा के मध्य कोई न कोई मार्ग निकल ही आता है। चारों ओर चाहे अंधकार ही अंधकार और मुसीबतों के पहाड़ हों, भगवान की कृपा उन अंधकारमय विकराल पर्वतों को चीर कर हमारा मार्ग प्रशस्त कर देती है। भगवान का शाश्वत् वचन है --

"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्वमहाङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥"१८:५८॥"
अर्थात् - "मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे॥"
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पता नहीं कितने जन्मों के पश्चात इस जन्म की एकमात्र उपलब्धि यही है कि भगवान ने इस हृदय को अपना स्थायी निवास बना लिया है। इस हृदय का केंद्र तो सारी सृष्टि में व उस से परे भी सर्वत्र है, पर परिधि कहीं भी नहीं। इस हृदय में स्थित सर्वव्यापी ज्योतिर्मय भगवान स्वयं ही अपना ध्यान और उपासना करते हैं। भगवान इस हृदय में स्थायी रूप से बस गए हैं, और मुझे भी अपने हृदय में स्थान दे दिया है। इसके अतिरिक्त मुझे अन्य कुछ कभी चाहिए भी नहीं था, और कभी चाहूँगा भी नहीं।
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हे प्रभु, अपनी परम मंगलमय आरोग्यकारी उपस्थिती को सभी के अन्तःकरण में व्यक्त करो। भारत के भीतर और बाहर के सभी शत्रुओं का नाश हो। भारत अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ, एक सत्यनिष्ठ, अखंड, सनातन धर्मावलम्बी, आध्यात्मिक राष्ट्र बने। इस राष्ट्र में छायी हुई असत्य और अंधकार की आसुरी शक्तियों का समूल नाश हो। इस देश के सभी नागरिक सत्यनिष्ठ, राष्ट्रभक्त और उच्च चरित्रवान बनें। ॐ शांति शांति शांति॥ ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ नवंबर २०२१

हे परमशिव, तुम अब और छिप नहीं सकते ---

 हे परमशिव, तुम अब और छिप नहीं सकते। तुम्हें यहीं, और इसी समय मुझे अपने साथ एक करना ही होगा। तुम्हारे से कुछ भी माँगना भी एक दुराग्रह है, लेकिन जायें तो जायें कहाँ? तुम्हारे सिवाय अन्य कुछ है ही नहीं।

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यह अनंताकाश जिसमें सारी सृष्टि समाहित है, तुम्हारा ही संकल्प और तुम्हारी ही अभिव्यक्ति है। तुम स्वयं ही सर्वस्व हो। तुम्हारे सिवाय अन्य कुछ है ही नहीं। मैं तुम्हारी ही अनंतता और तुम्हारा ही परमप्रेम हूँ। तुम्हारी पूर्णता मुझ में पूर्णतः व्यक्त हो। मेरा समर्पण स्वीकार करो। अन्य कुछ होने या पाने की किसी कामना का जन्म ही न हो। तुम ही कर्ता और भोक्ता हो। तुम स्वयं ही स्वयं से प्रसन्न रहो।
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तुम्हारे से विरह का भी एक आनंद था। तुम्हारी कृपा से तुम्हारे प्रति अभीप्सा (कभी न बुझने वाली प्यास), तड़प और प्रेम की निरंतरता बनी हुई थी, लेकिन अब उस से भी हृदय तृप्त हो गया है। तुमने मुझे अपनी माया के आवरण और विक्षेप से सदा बचाकर रखा, अपना विस्मरण एक क्षण के लिए भी नहीं होने दिया, और अपनी चेतना में रखा, इसके लिए आभारी हूँ। अब तो तुम्हारे से एकत्व की तड़प है। इस अभीप्सा को तृप्त करो। ॐ ॐ ॐ !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
११ नवंबर २०२१
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पुनश्च:---
"परमशिव ही सर्वस्व हैं।" हम सब परमशिव में ही रमण करें। इनका ही ध्यान करें, और अंत में इन्हीं में लय हो जायें।
हे प्रियतम परमशिव, मुझे आपसे प्यार हो गया है। आप सदा मुझे प्यारे लगें और मुझे अपने साथ एक करें। यह मेरे हृदय की तड़प और प्यास है। आप ने मेरे चारों ओर एक ऐसा घेरा डाल दिया है मैं उससे बाहर नहीं निकल सकता। मेरी चेतना में तो सर्वत्र मुझे शिव ही शिव दिखाई दे रहे हैं। मेरा अन्तःकरण आपको समर्पित है। सूक्ष्म जगत की अनंतता से भी परे आप अपने परम-ज्योतिर्मय लोक में बिराजमान हैं। जहाँ आप हैं, वहीं मैं हूँ। मैं जितना इस देह में हूँ, उतना ही आपके साथ अनंतता और सर्वव्यापकता में हूँ। ॐ ॐ ॐ !!
२६ नवंबर २०२१

हमें भगवान की प्रत्यक्ष उपस्थिती चाहिये ---

हमें भगवान की प्रत्यक्ष उपस्थिती चाहिये, न कि मीठी मीठी बातें या किसी भी तरह का कोई उपदेश। सत्संग भी प्रत्यक्ष भगवान का ही चाहिये, न कि उनके बारे में बात करने वालों का। हमारे हृदय की भक्ति, अभीप्सा, तड़प, और समर्पण सिर्फ भगवान के लिए है, न कि किसी अन्य के लिए।

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भगवान की भक्ति हमारा स्वधर्म है। कहते हैं -- "यतो धर्मस्ततो जयः", लेकिन जब धर्म ही नहीं रहेगा, तो जय किस की होगी? हमारा जीवन -- धर्म और अधर्म के बीच का एक युद्ध है जो सनातन काल से ही चल रहा है। भारत की सबसे बड़ी समस्या और असली युद्ध अधर्म से है, जिसे हम छल, कपट, ठगी, भ्रष्टाचार, घूसखोरी और बेईमानी कहते हैं। अन्य सब समस्यायें गौण हैं। हमारी सबसे बड़ी कमी राष्ट्रीय चरित्र का अभाव है।
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भगवान से प्रार्थना भी हम लोग अपने झूठ, कपट और बेईमानी में सिद्धि यानि अधर्म/असत्य की सफलता के लिए ही करते हैं। लोग बातें बड़ी बड़ी धर्म की करते हैं पर उन सब के जीवन में अधर्माचरण एक व्यावहारिकता और शिष्टाचार हो गया है। यह महाविनाश को आमंत्रण है। भगवान हमारी रक्षा करें।
ॐ तत्सत् !!
१२ नवंबर २०२१

अब भारत को पूर्णतः जागृत होकर उठना ही होगा ---

 अब भारत को पूर्णतः जागृत होकर उठना ही होगा ---

प्रश्न उठता है कि भारत को उठाएगा कौन? हमें ही यह कार्य करना होगा, हमें ही साधना करनी होगी। हम जहाँ पर भी हैं, और जो भी कार्य हमें भगवान ने सौंपा है, उसे पूर्ण कौशल्य और सत्यनिष्ठा से भगवान को प्रसन्न करने के लिए करना होगा। स्वयं को निमित्त मात्र बनाकर भगवान को ही कर्ता बनाना होगा। तभी हम राष्ट्र का कल्याण कर पायेंगे। स्वधर्म पर अडिग रहते हुए हम अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ करें। राष्ट्रीय चरित्र का अभाव ही भारत की एकमात्र समस्या है।
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भारत की राजनीति में -- धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, जातिगत आरक्षण, स्वतन्त्रता, समानता, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक, पिछड़ा-अतिपिछड़ा, आदि की सब बातें सिर्फ सत्ता में बने रहने के साधन हैं। शासक वर्ग को इन से मतलब सिर्फ सत्ता में बलात् बने रहने से है, अन्य कुछ भी नहीं। यह सब वैसे ही है जैसे लेनिन, स्टालिन, व माओ आदि के लिए साम्यवाद/मार्क्सवाद से कोई मतलब नहीं था, मतलब सिर्फ सत्ता छीनने से था।
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भारत की अस्मिता को नष्ट करने के अधिकतम प्रयास अङ्ग्रेज़ी शासन में और उस के बाद किये गये। लेकिन भारत कभी नष्ट नहीं हुआ। भारत फिर से जागृत होगा और अखंड होकर अपने परम वैभव को प्राप्त कर एक सनातन धर्मावलम्बी आध्यात्मिक राष्ट्र बनेगा। सनातन धर्म की भी पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण होगा। असत्य और अंधकार रूपी अधर्म का नाश होगा।
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बार-बार ये संकल्प हृदय में आते हैं कि सत्य-सनातन-धर्म की पुनर्स्थापना व वैश्वीकरण हो, और भारत माता अपने द्विगुणित परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर बिराजमान हो। सदियों से दबाया और कुचला हुआ हिन्दू समाज सब तरह के भेदभाव व हीनता का बोध छोड़ते हुए संगठित व सक्षम हो। भारत से असत्य और अंधकार की शक्तियों का पराभव हो, व ज्ञान के आलोक से पूरा भारत ज्योतिर्मय हो| अब भारत को उठना ही होगा|
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१२ नवंबर २०२१

परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग ही हिन्दुत्व है ---

 क्या है हिन्दुत्व? इसे दुष्ट प्रकृति के नराधम तमोगुणी नहीं समझ सकते। परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग ही हिन्दुत्व है ---

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आजकल सत्य-सनातन-हिन्दू धर्म पर मर्मांतक प्रहार हो रहे हैं, उसका प्रतिकार हम आध्यात्मिक स्तर पर उपासना द्वारा भी करेंगे। परमात्मा की निज जीवन में पूर्ण अभिव्यक्ति ही हिन्दुत्व है। हिन्दू शब्द का अर्थ है -- हिंसा से दूरी। महाभारत का स्वाध्याय करने से समझ में आता है कि हिंसा है -- मनुष्य का अहंकार और लोभ। जो अहंकार और लोभ से मुक्त है वही परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। इसीलिए अहिंसा को परमधर्म कहा गया है। अहंकार और लोभ से मुक्ति ही अहिंसा है। हम शाश्वत आत्मा हैं, जो अपने कर्मफलों को भोगने के लिए बारंबार पुनर्जन्म लेती है, और अनेक कष्ट पाती है। इस जन्म-मृत्यु के दुष्चक्र से भगवत्-प्राप्ति द्वारा ही मुक्त हो सकते हैं।
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जो भगवत्-प्राप्ति का मार्ग दिखाये वही हिन्दुत्व है। जिसकी चेतना ऊर्ध्वमुखी है, जिसे परमात्मा से प्रेम है, और जो निज जीवन में परमात्मा को व्यक्त करना चाहता है, वह हिन्दू है। जो जीवात्मा को परमात्मा से जोड़ दे, वह हिन्दुत्व है।
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गीता में भगवान हमें स्थितप्रज्ञ होने का उपदेश देते हैं। स्थितप्रज्ञ होने के लिए -- अनुद्विग्नमना, विगतस्पृह, और वीतरागभयक्रोध होना आवश्यक है। इसके लिए तप, यानि साधना/उपासना करनी पड़ती है। जो हमें इसका मार्ग दिखाये वह हिन्दुत्व है।
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आध्यात्मिक, आधिभौतिक और अघिदैविक -- इन तीनों प्रकार के दुःखों से जिसका मन उद्विग्न नहीं होता, उसे "अनुद्विग्नमना" कहते हैं। सुख प्राप्ति की स्पृहा/तृष्णा का नष्ट हो जाना "विगतस्पृह" कहलाता है। सब प्रकार की आसक्ति, भय और क्रोध का नष्ट हो जाना "वीतरागभयक्रोध" कहलाता है। ऐसे गुणोंसे युक्त हो जाने वाला "स्थितधी" यानि "स्थितप्रज्ञ" कहलाता है। जिसने इस स्थिति को प्राप्त कर लिया है, वह "मुनि" व "संन्यासी" है।
यह हिन्दुत्व का मार्ग है जो हमें उच्चतम गुणों से युक्त करता है। सिर्फ हिन्दुत्व ही सिखाता है कि हम उच्चतम गुणों से युक्त होकर परमात्मा को प्राप्त करें। परमात्मा की प्राप्ति ही हिन्दुत्व है। गर्व से कहो "हम हिन्दू हैं।"
ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१३ नवंबर २०२१
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पुनश्च ---
सांसारिक चेतना में मैं कुछ भी नहीं हूँ, मेरा कुछ भी नहीं है, मुझे कुछ भी नहीं चाहिये। सर्वसमर्थ प्रभु मेरे अपने हैं, उनसे प्रेम ही मेरा स्वभाव है।
आध्यात्मिक चेतना में मैं मेरे प्रभु के साथ एक हूँ। मैं ही परमप्रेम, आनंद, और परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति हूँ।
यही हिन्दुत्व है। गर्व से कहो हम हिन्दू हैं।
!! ॐ ॐ ॐ !!

जो कुछ वे दे सकते थे, वह तो वे दे चुके हैं, अब और कुछ है ही नहीं उनके पास देने के लिए ---

 जीव भगवान का अंश है तो मरता कौन है?

८४ लाख योनियों में कौन जाता है?
स्वर्ग-नर्क में कौन जाता है?
भोगों को कौन भोगता है?
जन्म कौन लेता है?
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"न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता"
यदि मैं नहीं होता तो कितना अच्छा होता !! तब सिर्फ भगवान खुद ही होते। मेरे होने ने ही भगवान को मुझ से दूर करने का अनर्थ कर दिया। मैं नहीं रहूँगा, तो मेरे स्थान पर सिर्फ भगवान ही होंगे।
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अब भगवान से कुछ भी नहीं चाहिये. जो कुछ वे दे सकते थे, वह तो वे दे चुके हैं, और क्या बाकी है?
अपना प्रेम वे मुझे दे चुके हैं, अब और कुछ है ही नहीं उनके पास देने के लिए।

किस को नमन करूँ? अन्य कोई तो है ही नहीं ---

किस को नमन करूँ? अन्य कोई तो है ही नहीं ...
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सांसारिकता से प्रेम एक धोखा है| वास्तविक प्रेम सिर्फ परमात्मा से ही हो सकता है| मेरी एकमात्र संपत्ति मेरे ह्रदय का प्रेम है| यह प्रेम ही मेरा स्वभाव है| यह प्रेम ही मुझे निश्चिन्त, निर्भय, निःशोक और निःशंक बना सकता है| परमात्मा को मेरा प्रेम स्वीकार है, तभी तो वे निरंतर परम ज्योतिर्मय हो कर मेरे कूटस्थ में हैं| मुझे सारी तृप्ति व संतुष्टि उन से ही मिलती है| हृदय की हर घनीभूत पीड़ा को वे ही शांत करते हैं| समस्त अस्तित्व वे ही हैं, उन से पृथकता अब और नहीं हो सकती| वे हैं, यहीं पर, इसी समय, मेरे साथ हैं, और सदा मेरे साथ ही रहते हैं, एक क्षण के लिए भी नहीं छोड़ते| जब कभी मैं उन को भूल जाता हूँ तो वे पीछे से आकर पकड़ लेते हैं और अपनी याद दिला कर छिप जाते हैं| यह खेल कई जन्म-जन्मांतरों से चल रहा है| किस को नमन करूँ? अन्य कोई तो है ही नहीं| ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ नवंबर २०२०