Saturday, 13 November 2021

जो कुछ वे दे सकते थे, वह तो वे दे चुके हैं, अब और कुछ है ही नहीं उनके पास देने के लिए ---

 जीव भगवान का अंश है तो मरता कौन है?

८४ लाख योनियों में कौन जाता है?
स्वर्ग-नर्क में कौन जाता है?
भोगों को कौन भोगता है?
जन्म कौन लेता है?
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"न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता"
यदि मैं नहीं होता तो कितना अच्छा होता !! तब सिर्फ भगवान खुद ही होते। मेरे होने ने ही भगवान को मुझ से दूर करने का अनर्थ कर दिया। मैं नहीं रहूँगा, तो मेरे स्थान पर सिर्फ भगवान ही होंगे।
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अब भगवान से कुछ भी नहीं चाहिये. जो कुछ वे दे सकते थे, वह तो वे दे चुके हैं, और क्या बाकी है?
अपना प्रेम वे मुझे दे चुके हैं, अब और कुछ है ही नहीं उनके पास देने के लिए।

किस को नमन करूँ? अन्य कोई तो है ही नहीं ---

किस को नमन करूँ? अन्य कोई तो है ही नहीं ...
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सांसारिकता से प्रेम एक धोखा है| वास्तविक प्रेम सिर्फ परमात्मा से ही हो सकता है| मेरी एकमात्र संपत्ति मेरे ह्रदय का प्रेम है| यह प्रेम ही मेरा स्वभाव है| यह प्रेम ही मुझे निश्चिन्त, निर्भय, निःशोक और निःशंक बना सकता है| परमात्मा को मेरा प्रेम स्वीकार है, तभी तो वे निरंतर परम ज्योतिर्मय हो कर मेरे कूटस्थ में हैं| मुझे सारी तृप्ति व संतुष्टि उन से ही मिलती है| हृदय की हर घनीभूत पीड़ा को वे ही शांत करते हैं| समस्त अस्तित्व वे ही हैं, उन से पृथकता अब और नहीं हो सकती| वे हैं, यहीं पर, इसी समय, मेरे साथ हैं, और सदा मेरे साथ ही रहते हैं, एक क्षण के लिए भी नहीं छोड़ते| जब कभी मैं उन को भूल जाता हूँ तो वे पीछे से आकर पकड़ लेते हैं और अपनी याद दिला कर छिप जाते हैं| यह खेल कई जन्म-जन्मांतरों से चल रहा है| किस को नमन करूँ? अन्य कोई तो है ही नहीं| ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ नवंबर २०२०

Sunday, 7 November 2021

गीता में "ॐ तत्सत्" का अर्थ ---

 गीता में "ॐ तत्सत्" का अर्थ .....

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गीता के सत्रहवें अध्याय के अंतिम छः श्लोक "ॐ तत्सत्" का अर्थ बतलाते हैं....
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥ (२३)
भावार्थ : सृष्टि के आरम्भ से "ॐ" (परम-ब्रह्म), "तत्‌" (वह), "सत्‌" (शाश्वत) इस प्रकार से ब्रह्म को उच्चारण के रूप में तीन प्रकार का माना जाता है, और इन तीनों शब्दों का प्रयोग यज्ञ करते समय ब्राह्मणों द्वारा वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करके ब्रह्म को संतुष्ट करने के लिये किया जाता है। (२३)
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्तः सततं ब्रह्मवादिनाम्‌॥ (२४)
भावार्थ : इस प्रकार ब्रह्म प्राप्ति की इच्छा वाले मनुष्य शास्त्र विधि के अनुसार यज्ञ, दान और तप रूपी क्रियाओं का आरम्भ सदैव "ओम" (ॐ) शब्द के उच्चारण के साथ ही करते हैं। (२४)
तदित्यनभिसन्दाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
दानक्रियाश्चविविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥ (२५)
भावार्थ : इस प्रकार मोक्ष की इच्छा वाले मनुष्यों द्वारा बिना किसी फल की इच्छा से अनेकों प्रकार से यज्ञ, दान और तप रूपी क्रियाऎं "तत्‌" शब्द के उच्चारण द्वारा की जाती हैं। (२५)
सद्भावे साधुभावे च सदित्यतत्प्रयुज्यते ।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥ (२६)
भावार्थ : हे पृथापुत्र अर्जुन! इस प्रकार साधु स्वभाव वाले मनुष्यों द्वारा परमात्मा के लिये "सत्" शब्द का प्रयोग किया जाता है तथा परमात्मा प्राप्ति के लिये जो कर्म किये जाते हैं उनमें भी "सत्‌" शब्द का प्रयोग किया जाता है। (२६)
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्यवाभिधीयते ॥ (२७)
भावार्थ : जिस प्रकार यज्ञ से, तप से और दान से जो स्थिति प्राप्त होती है, उसे भी "सत्‌" ही कहा जाता है और उस परमात्मा की प्रसन्नता लिए जो भी कर्म किया जाता है वह भी निश्चित रूप से "सत्‌" ही कहा जाता है। (२७)
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्‌ ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ (२८)
भावार्थ : हे पृथापुत्र अर्जुन! बिना श्रद्धा के यज्ञ, दान और तप के रूप में जो कुछ भी सम्पन्न किया जाता है, वह सभी "असत्‌" कहा जाता है, इसलिए वह न तो इस जन्म में लाभदायक होता है और न ही अगले जन्म में लाभदायक होता है। (२८)
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"ॐ तत्सत्" शब्द परमात्मा की ओर किया गया एक निर्देश है| इस का प्रयोग गीता के हरेक अध्याय के अंत में किया गया है ....."ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुन ... ."
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ईसाई मत में इसी की नक़ल कर के "Father Son and the Holy Ghost" की परिकल्पना की गयी है| गहराई से यदि चिन्तन किया जाए तो "Father Son and the Holy Ghost" का अर्थ भी वही निकलता है जो "ॐ तत्सत्" का अर्थ है|
हरि: ॐ तत् सत् !
७ नवम्बर २०१८

'स्वार्थ' और 'परमार्थ' इन दोनों शब्दों में आध्यात्मिक रूप से कोई अंतर नहीं है ---

'स्वार्थ' और 'परमार्थ' इन दोनों शब्दों में आध्यात्मिक रूप से कोई अंतर नहीं है| 'स्व' क्या है? और 'परम' क्या है? ये दोनों शब्द पारब्रह्म परमात्मा का संकेत करते हैं| हम यह देह नहीं, शाश्वत आत्मा, आत्म-तत्व ... स्वयं परमात्मा हैं। पूर्ण प्रेम से उन्हीं का ध्यान और उपासना करें|
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ध्यान-साधना ... अपनी भावना में इस देह के ब्रह्मरंध्र से बाहर रहकर करने का अभ्यास करें| परमात्मा की अनंतता का ध्यान करें| यह भाव रखें कि यह समस्त अनंतता ही 'मैं' हूँ, यह नश्वर देह नहीं| जब यह भाव गहरा हो जाएगा, तब उस अनंतता से परे एक परम ज्योति का आभास होने लगेगा| उस परम ज्योति को ही समर्पित होने की साधना करें| वह परम ज्योति ही कूटस्थ आत्म-तत्व यानि हम हैं, यह नश्वर देह नहीं|

ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
८ नवंबर २०२०

Tuesday, 2 November 2021

सदा हमारी रक्षा हो ---

सदा हमारी रक्षा हो ---
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किसी भी व्यक्ति की बड़ी बड़ी बातों से और दिखावटी आचरण से हमें प्रभावित नहीं होना चाहिए| मार्गदर्शन के लिए प्रत्यक्ष परमात्मा से ही प्रार्थना करें| जो कुछ भी मिलेगा वह स्वयं में स्थित परमात्मा से ही मिलेगा, दूसरों से नहीं| जब भी मैं कुछ मिलने की बात कहता हूँ, उसका अर्थ है परमात्मा में स्थिति, न कि कोई धन-दौलत| किसी से भी कोई अपेक्षा और आशा न रखें, स्वयं में ही आत्म-विश्वास रखें| जो आत्म-साक्षात्कार का मार्ग दिखाये वही सद्गुरु है| गुरु हमारी दृष्टि परमात्मा की ओर कर देता है| हृदय में एक तीब्र अभीप्सा और भक्ति का होना आवश्यक है|
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जैसे गिद्ध, चील-कौए, और लकड़बघ्घे मृत लाशों को ही ढूँढ़ते रहते हैं, और अवसर मिलते ही उन पर टूट पड़ते है, वैसे ही मनुष्य का मन भी एक गिद्ध है, जो दूसरों को लूटने, ठगने और विषय-वासनाओं की पूर्ति के अवसर ढूँढ़ता रहता है और अवसर मिलते ही उन पर टूट पड़ता है| इस संसार में मनुष्य के वेश में घूमने वाले अधिकांश प्राणी तो परभक्षी ही हैं, जिन की गिद्ध-दृष्टी दूसरों से घूस लेने, दूसरों को ठगने, लूटने और वासनापूर्ति को ही लालायित रहती है| ऐसे लोग बातें तो बड़ी बड़ी करते हैं पर अन्दर ही अन्दर उन में कूट कूट कर हिंसा, लालच, कुटिलता व दुष्टता भरी रहती है| मनुष्य के रूप में ऐसे परभक्षी चारों ओर भरे पड़े हैं| भगवान की परम कृपा ही उन से हमारी रक्षा कर सकती है, अन्य कुछ भी नहीं|
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भगवान श्रीकृष्ण और गुरु महाराज की परम कृपा से जीवन में अब बड़ी-बड़ी बातों, बड़े-बड़े सिद्धांतों और उपदेशों का कोई महत्व नहीं रहा है| महत्व सिर्फ परमात्मा का है जो मेरे कूटस्थ चैतन्य में सर्वदा निरंतर बिराजमान हैं| कमी सदा मुझ में ही रही है, उन की ओर से कभी कोई कमी नहीं रही है| सर्वव्यापी कूटस्थ चैतन्य में आस्था रखें| कूटस्थ ही गुरु है, कूटस्थ ही परमात्मा है, और कूटस्थ ही हम स्वयं हैं| अपनी चेतना को सदा आज्ञाचक्र व सहस्त्रार के मध्य रखें| ध्यान साधना का आरंभ तो भ्रूमध्य से होता है, फिर धीरे-धीरे सहस्त्रार, ब्रह्मरंध्र, देह से बाहर परमात्मा की अनंतता, और फिर उस अनंतता से भी परे स्वतः ही चला जाता है| परमात्मा की अनंतता से भी परे की जो स्थिति है, उसे ही मैं 'परमशिव' कहता हूँ|
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भगवान श्रीकृष्ण और गुरुपरंपरा से प्रार्थना है कि सब तरह के कुसंग, बुरे विचारों और प्रलोभनों से रक्षा करें, व निज चेतना में रखें|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३ नवम्बर २०२०

अस्तित्व -- या तो परमात्मा का ही हो सकता है, या सिर्फ मेरा; दोनों साथ-साथ नहीं हो सकते ---

अस्तित्व -- या तो परमात्मा का ही हो सकता है, या सिर्फ मेरा। दोनों साथ-साथ नहीं हो सकते। यह द्वैत बड़ा ही कष्टप्रद है। पहले मैं सोचता था कि मैं इस जीवन में कुछ प्राप्त करना चाहता हूँ, या कुछ होना चाहता हूँ। समय के साथ-साथ जैसे-जैसे परिपक्वता बढ़ी है, अब यह स्पष्ट हो गया है कि जो कुछ भी बना जा सकता है, या प्राप्त किया जा सकता है, वह तो मैं स्वयं हूँ।

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एक अज्ञात/अदृश्य शक्ति है जो मेरे माध्यम से स्वयम् को व्यक्त करना चाहती है। मैं उसे सिर्फ अवसर दे सकता हूँ, और कुछ नहीं कर सकता। उसे अवसर देने का अर्थ है स्वयं को मिटाना। वास्तव में सत्य तो यह है कि मेरा कुछ होना ही सारे अनर्थों का मूल है। कुछ होने की भावना ही सारा भटकाव है। स्वयं को मिटाना ही पड़ेगा। एक प्रवाह है, जो मेरे माध्यम से प्रवाहित होना चाहता है। उसे प्रवाहित होने का अवसर मुझे देना ही पड़ेगा। यही नहीं मुझे मेरी पृथकता के बोध और स्वयं को भी उस प्रवाह में समर्पित कर विसर्जित होना ही पड़ेगा। कोई विकल्प शेष नहीं रहा है।
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पिछले कुछ दिनों से यह सोचकर मुझे बड़ी पीड़ा हो रही थी कि पता नहीं पिछले जन्मों में ऐसी क्या भूलचूक और ऐसे क्या खराब कर्म हुए थे कि यह जन्म बड़ा ही कष्टों से भरा हुआ और अभाव ग्रस्त मिला? लेकिन अब यह जानकार बड़ा हर्ष हो रहा है कि मैं तो निमित्त मात्र था, मुझे माध्यम बना कर भगवान ही स्वयं को व्यक्त कर रहे थे। भगवान ने तो मुझे अपना पूर्ण प्रेम, और अपने स्वयं के हृदय में स्थान दे रखा है। मेरा अस्तित्व -- परमात्मा का अस्तित्व है। मैं कुछ भी नहीं हूँ, जो कुछ भी है, वे तो भगवान स्वयं हैं। वे कभी गलत नहीं हो सकते।
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वे स्वयं को पूर्ण रूप से व्यक्त करें, और एकमात्र अस्तित्व उन्हीं का रहे।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
२ नवंबर २०२१

मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य निज जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति है ---

मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य निज जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति है| जीवन का अन्य कोई उद्देश्य नहीं है| बड़ी-बड़ी इंसानियत की, मानवता की, अच्छा बनने की, और तथाकथित परोपकार आदि की बातें छलावा और भटकाव मात्र हैं, जो हमें भ्रमित कर अपने लक्ष्य से दूर ले जाती हैं| मेरे निज अनुभव ही मेरे प्रमाण हैं, और इस विषय पर किसी से कोई बहस नहीं करनी है|
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परमात्मा की चेतना में तो अभी भी हूँ, पर आंशिक रूप से, पूर्णता तो अभी तक नहीं है| माया का एक आवरण अभी भी मेरे चारों ओर है| यह बात मैं परमात्मा की चेतना में स्थित होकर पूरी सुध-बुध, सचेतनता व सजगता से कह रहा हूँ कि मेरी आस्था किसी भी तरह के मोक्ष या मुक्ति में नहीं है| मेरे हृदय की एक अभीप्सा यानि परम-प्यास और तड़प थी जीवन में परमात्मा की पूर्णता को व्यक्त करने की जो इस जन्म में पूरी नहीं हुई| इस जीवन के आरंभ से ही प्रतिकूल परिस्थितियाँ व प्रतिकूल वातावारण मिला| स्वयं के व्यक्तित्व में ही अनेक कमियाँ थीं| पूर्व जन्मों के कर्म इतने अच्छे नहीं थे कि इस जन्म में परमात्मा की पूर्णता को व्यक्त कर सकूँ| अब कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं है| परमात्मा की इच्छा ही मेरी इच्छा है| परमात्मा चाहेंगे तब तक बार-बार पुनर्जन्म होगा, और हर जन्म में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति होगी|
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अहंकारी लोगों की फालतू बातों और मिथ्या बनावटी उपदेशों का जीवन में अब कोई महत्व नहीं है| संपर्क ही मैं उन्हीं से रखना चाहता हूँ जिनके हृदय में परमात्मा है, अन्य किसी से नहीं| सारा मार्ग-दर्शन प्रत्यक्ष परमात्मा ही करेंगे| मैं तो निमित्त मात्र हूँ, वे ही कर्ता हैं, और वे ही स्वयं को व्यक्त कर रहे हैं| उनके सिवाय अब कोई अन्य नहीं है|
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परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति आप सब निजात्मगण को सप्रेम नमन! ॐ तत्सत् !
कृपा शंकर
२ नवंबर २०२०