Tuesday, 2 November 2021

सदा हमारी रक्षा हो ---

सदा हमारी रक्षा हो ---
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किसी भी व्यक्ति की बड़ी बड़ी बातों से और दिखावटी आचरण से हमें प्रभावित नहीं होना चाहिए| मार्गदर्शन के लिए प्रत्यक्ष परमात्मा से ही प्रार्थना करें| जो कुछ भी मिलेगा वह स्वयं में स्थित परमात्मा से ही मिलेगा, दूसरों से नहीं| जब भी मैं कुछ मिलने की बात कहता हूँ, उसका अर्थ है परमात्मा में स्थिति, न कि कोई धन-दौलत| किसी से भी कोई अपेक्षा और आशा न रखें, स्वयं में ही आत्म-विश्वास रखें| जो आत्म-साक्षात्कार का मार्ग दिखाये वही सद्गुरु है| गुरु हमारी दृष्टि परमात्मा की ओर कर देता है| हृदय में एक तीब्र अभीप्सा और भक्ति का होना आवश्यक है|
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जैसे गिद्ध, चील-कौए, और लकड़बघ्घे मृत लाशों को ही ढूँढ़ते रहते हैं, और अवसर मिलते ही उन पर टूट पड़ते है, वैसे ही मनुष्य का मन भी एक गिद्ध है, जो दूसरों को लूटने, ठगने और विषय-वासनाओं की पूर्ति के अवसर ढूँढ़ता रहता है और अवसर मिलते ही उन पर टूट पड़ता है| इस संसार में मनुष्य के वेश में घूमने वाले अधिकांश प्राणी तो परभक्षी ही हैं, जिन की गिद्ध-दृष्टी दूसरों से घूस लेने, दूसरों को ठगने, लूटने और वासनापूर्ति को ही लालायित रहती है| ऐसे लोग बातें तो बड़ी बड़ी करते हैं पर अन्दर ही अन्दर उन में कूट कूट कर हिंसा, लालच, कुटिलता व दुष्टता भरी रहती है| मनुष्य के रूप में ऐसे परभक्षी चारों ओर भरे पड़े हैं| भगवान की परम कृपा ही उन से हमारी रक्षा कर सकती है, अन्य कुछ भी नहीं|
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भगवान श्रीकृष्ण और गुरु महाराज की परम कृपा से जीवन में अब बड़ी-बड़ी बातों, बड़े-बड़े सिद्धांतों और उपदेशों का कोई महत्व नहीं रहा है| महत्व सिर्फ परमात्मा का है जो मेरे कूटस्थ चैतन्य में सर्वदा निरंतर बिराजमान हैं| कमी सदा मुझ में ही रही है, उन की ओर से कभी कोई कमी नहीं रही है| सर्वव्यापी कूटस्थ चैतन्य में आस्था रखें| कूटस्थ ही गुरु है, कूटस्थ ही परमात्मा है, और कूटस्थ ही हम स्वयं हैं| अपनी चेतना को सदा आज्ञाचक्र व सहस्त्रार के मध्य रखें| ध्यान साधना का आरंभ तो भ्रूमध्य से होता है, फिर धीरे-धीरे सहस्त्रार, ब्रह्मरंध्र, देह से बाहर परमात्मा की अनंतता, और फिर उस अनंतता से भी परे स्वतः ही चला जाता है| परमात्मा की अनंतता से भी परे की जो स्थिति है, उसे ही मैं 'परमशिव' कहता हूँ|
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भगवान श्रीकृष्ण और गुरुपरंपरा से प्रार्थना है कि सब तरह के कुसंग, बुरे विचारों और प्रलोभनों से रक्षा करें, व निज चेतना में रखें|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३ नवम्बर २०२०

अस्तित्व -- या तो परमात्मा का ही हो सकता है, या सिर्फ मेरा; दोनों साथ-साथ नहीं हो सकते ---

अस्तित्व -- या तो परमात्मा का ही हो सकता है, या सिर्फ मेरा। दोनों साथ-साथ नहीं हो सकते। यह द्वैत बड़ा ही कष्टप्रद है। पहले मैं सोचता था कि मैं इस जीवन में कुछ प्राप्त करना चाहता हूँ, या कुछ होना चाहता हूँ। समय के साथ-साथ जैसे-जैसे परिपक्वता बढ़ी है, अब यह स्पष्ट हो गया है कि जो कुछ भी बना जा सकता है, या प्राप्त किया जा सकता है, वह तो मैं स्वयं हूँ।

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एक अज्ञात/अदृश्य शक्ति है जो मेरे माध्यम से स्वयम् को व्यक्त करना चाहती है। मैं उसे सिर्फ अवसर दे सकता हूँ, और कुछ नहीं कर सकता। उसे अवसर देने का अर्थ है स्वयं को मिटाना। वास्तव में सत्य तो यह है कि मेरा कुछ होना ही सारे अनर्थों का मूल है। कुछ होने की भावना ही सारा भटकाव है। स्वयं को मिटाना ही पड़ेगा। एक प्रवाह है, जो मेरे माध्यम से प्रवाहित होना चाहता है। उसे प्रवाहित होने का अवसर मुझे देना ही पड़ेगा। यही नहीं मुझे मेरी पृथकता के बोध और स्वयं को भी उस प्रवाह में समर्पित कर विसर्जित होना ही पड़ेगा। कोई विकल्प शेष नहीं रहा है।
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पिछले कुछ दिनों से यह सोचकर मुझे बड़ी पीड़ा हो रही थी कि पता नहीं पिछले जन्मों में ऐसी क्या भूलचूक और ऐसे क्या खराब कर्म हुए थे कि यह जन्म बड़ा ही कष्टों से भरा हुआ और अभाव ग्रस्त मिला? लेकिन अब यह जानकार बड़ा हर्ष हो रहा है कि मैं तो निमित्त मात्र था, मुझे माध्यम बना कर भगवान ही स्वयं को व्यक्त कर रहे थे। भगवान ने तो मुझे अपना पूर्ण प्रेम, और अपने स्वयं के हृदय में स्थान दे रखा है। मेरा अस्तित्व -- परमात्मा का अस्तित्व है। मैं कुछ भी नहीं हूँ, जो कुछ भी है, वे तो भगवान स्वयं हैं। वे कभी गलत नहीं हो सकते।
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वे स्वयं को पूर्ण रूप से व्यक्त करें, और एकमात्र अस्तित्व उन्हीं का रहे।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
२ नवंबर २०२१

मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य निज जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति है ---

मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य निज जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति है| जीवन का अन्य कोई उद्देश्य नहीं है| बड़ी-बड़ी इंसानियत की, मानवता की, अच्छा बनने की, और तथाकथित परोपकार आदि की बातें छलावा और भटकाव मात्र हैं, जो हमें भ्रमित कर अपने लक्ष्य से दूर ले जाती हैं| मेरे निज अनुभव ही मेरे प्रमाण हैं, और इस विषय पर किसी से कोई बहस नहीं करनी है|
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परमात्मा की चेतना में तो अभी भी हूँ, पर आंशिक रूप से, पूर्णता तो अभी तक नहीं है| माया का एक आवरण अभी भी मेरे चारों ओर है| यह बात मैं परमात्मा की चेतना में स्थित होकर पूरी सुध-बुध, सचेतनता व सजगता से कह रहा हूँ कि मेरी आस्था किसी भी तरह के मोक्ष या मुक्ति में नहीं है| मेरे हृदय की एक अभीप्सा यानि परम-प्यास और तड़प थी जीवन में परमात्मा की पूर्णता को व्यक्त करने की जो इस जन्म में पूरी नहीं हुई| इस जीवन के आरंभ से ही प्रतिकूल परिस्थितियाँ व प्रतिकूल वातावारण मिला| स्वयं के व्यक्तित्व में ही अनेक कमियाँ थीं| पूर्व जन्मों के कर्म इतने अच्छे नहीं थे कि इस जन्म में परमात्मा की पूर्णता को व्यक्त कर सकूँ| अब कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं है| परमात्मा की इच्छा ही मेरी इच्छा है| परमात्मा चाहेंगे तब तक बार-बार पुनर्जन्म होगा, और हर जन्म में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति होगी|
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अहंकारी लोगों की फालतू बातों और मिथ्या बनावटी उपदेशों का जीवन में अब कोई महत्व नहीं है| संपर्क ही मैं उन्हीं से रखना चाहता हूँ जिनके हृदय में परमात्मा है, अन्य किसी से नहीं| सारा मार्ग-दर्शन प्रत्यक्ष परमात्मा ही करेंगे| मैं तो निमित्त मात्र हूँ, वे ही कर्ता हैं, और वे ही स्वयं को व्यक्त कर रहे हैं| उनके सिवाय अब कोई अन्य नहीं है|
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परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति आप सब निजात्मगण को सप्रेम नमन! ॐ तत्सत् !
कृपा शंकर
२ नवंबर २०२०

Sunday, 31 October 2021

अक्षरब्रह्म योग व भूमा ---

जिन्हें इसी जीवनकाल में मुक्ति या मोक्ष चाहिए, उनके लिए श्रीमद्भगवद्गीता का आठवाँ अध्याय "अक्षरब्रह्म योग" है। इसका सिद्धान्त पक्ष तो कोई भी विद्वान आचार्य सिखा देखा, लेकिन व्यावहारिक पक्ष सीखने के लिए विरक्त तपस्वी महात्माओं का सत्संग करना होगा, और स्वयं को भी तपस्वी महात्मा बनना होगा।

एक पथ-प्रदर्शक गुरु का सान्निध्य चाहिए जो हमें उठा कर अमृत-कुंड में फेंक सके। यदि सत्यनिष्ठा है तो भगवान उसकी भी व्यवस्था कर देते हैं।।

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" यो वै भूमा तत् सुखं नाल्पे सुखमस्ति "
भूमा तत्व में यानि परमात्मा की व्यापकता और विराटता में जो सुख है, वह अल्पता में नहीं है। जो भूमा है, व्यापक है वह सुख है। कम में सुख नहीं है।
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"भूमा" एक वैदिक विद्या है जिसके प्रथम आचार्य भगवान सनतकुमार हैं। वे "ब्रह्मविद्या" के भी प्रथम आचार्य हैं। इनको सीखने के लिए सिद्ध सन्यासी संतों का सत्संग करें। "श्रीविद्या" पौराणिक है, इसके आचार्य भी प्रायः सन्यासी ही होते हैं। भारत में विद्वान सन्यासी संतों की कोई कमी नहीं है। भगवान की कृपा से इस जीवन में अनेक संतों का सत्संग और आशीर्वाद प्राप्त हुआ है। उनसे बहुत कुछ सीखा है। उन सब का आभारी हूँ।

हम भगवान के साथ एक हैं, उन से पृथक नहीं ---

 हम भगवान के साथ एक हैं, उन से पृथक नहीं ---

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"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि यह सब वासुदेव है ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है।
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सब नामरूपों से परे भगवान वासुदेव ही सर्वस्व हैं। जो अपने पूर्ण ह्रदय से भगवान से प्रेम करते हैं, जो निरंतर भगवान का स्मरण करते हैं, ऐसे सभी महात्माओं को मैं नमन करता हूँ। सारे उपदेश और सारी बड़ी बड़ी दार्शनिक बातें बेकार हैं यदि परमात्मा से प्रेम न हो तो। परमात्मा से प्रेम ही सारे सद्गुणों को अपनी ओर खींचता है। राष्ट्रभक्ति भी उसी में हो सकती है जिस के हृदय में परमात्मा से प्रेम हो। जो परमात्मा को प्रेम नहीं कर सकता, वह किसी को भी प्रेम नहीं कर सकता। ऐसा व्यक्ति इस धरा पर भार ही है।
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भगवान की भक्ति, भगवान से कुछ लेने के लिए नहीं, उन्हें अपना पृथकत्व का मायावी बोध बापस लौटाने के लिए होती है। हम उन सच्चिदानंद भगवान के अंश हैं, वे स्वयं ही हमारे हैं, और हम उनके हैं, अतः जो कुछ भी भगवान का है, वह हम स्वयं हैं। हम उनके साथ एक हैं, उन से पृथक नहीं।
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ नवंबर २०२१

जो कुछ भी भगवान का है, वह हम स्वयं हैं ---

भगवान की भक्ति, भगवान से कुछ लेने के लिए नहीं, उन्हें अपना पृथकत्व का मायावी बोध बापस लौटाने के लिए होती है| हम उन सच्चिदानंद भगवान के अंश हैं, वे स्वयं ही हमारे हैं और हम उनके हैं, अतः जो कुछ भी भगवान का ही, वह हम स्वयं हैं| हम उनके साथ एक हैं, उन से पृथक नहीं|
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प्रश्न : भगवान से हमें पृथक किसने किया है?
उत्तर : हमारे राग-द्वेष और अहंकार ने| और भी स्पष्ट शब्दों में हमारा सत्यनिष्ठा का अभाव, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, और लोभ हमें भगवान से दूर करते हैं| हमारा थोड़ा सा भी लोभ, बड़े-बड़े कालनेमि/ठगों को हमारी ओर आकर्षित करता है| जो भी व्यक्ति हमें थोड़ा सा भी प्रलोभन देता है, चाहे वह आर्थिक या धार्मिक प्रलोभन हो, वह शैतान है, उस से दूर रहें|
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जो वास्तव में भगवान का भक्त है, वह भगवान के सिवाय और कुछ भी नहीं चाहता| जो हमारे में भगवान के प्रति प्रेम जागृत करे, जो हमें सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे, वही संत-महात्मा है, उसी का संग करें| अन्य सब विष यानि जहर मिले हुए शहद की तरह हैं| किसी भी तरह के शब्द जाल से बचें| हमारा प्रेम यानि भक्ति सच्ची होगी तो भगवान हमारी रक्षा करेंगे| सभी का कल्याण हो|
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हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ नवंबर २०२०

Saturday, 30 October 2021

जहाँ परमात्मा का परम प्रकाश है, वहाँ अंधकार नहीं रह सकता ---

जहाँ परमात्मा का परम प्रकाश है, वहाँ अंधकार नहीं रह सकता| परमात्मा के प्रकाश का भ्रूमध्य (कूटस्थ) में ध्यान, अनाहत नाद का श्रवण, और अजपाजप (हंसःयोग) इस युग की उच्चतम आध्यात्मिक साधना है, जिसका बोध परमात्मा की परम कृपा से ही होता है| अतः अपने हृदय का सर्वश्रेष्ठ प्रेम परमात्मा को दें| हम परमात्मा के उपकरण बनें, उन्हें अपने माध्यम से प्रवाहित होने दें|
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जगन्माता ही साधक हैं, हम नहीं| वे स्वयं हमारे सूक्ष्म देह के मेरुदंड की सुषुम्ना नाड़ी के भीतर ब्राह्मी उपनाड़ी में कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में विचरण कर रही हैं| चाँदी (रजत) के समान चमकती हुई उनकी आभा से ब्रह्मनाड़ी आलोकित है| उनका ब्रह्मरंध्र के बाहर, परमात्मा की अनंतता से भी परे करोड़ों सूर्यों की ज्योति से भी अधिक ज्योतिर्मय परमशिव से मिलन ही योग की परम सिद्धि और परमगति है|
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उनके तेज के अंशमात्र को सहन करना भी वैसे ही है जैसे ५ वाट के बल्ब से करोड़ों वोल्ट की विद्युत का प्रवाहित होना| उनके तेज के अंश को भी सहन करने योग्य बनने के लिए हमें अनेक जन्मों तक साधना करनी पड़ती है| परमात्मा की कृपा के बिना उनके तेज को हम सहन नहीं कर सकते| उनका अंशमात्र भी हमें प्राप्त हो जाये तो यह भोगी शरीर तुरंत नष्ट हो जाएगा|
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सर्वश्रेष्ठ तो यही है कि हम उन्हें प्रेम करें, भक्ति करें, और उन्हें समर्पित हो जाएँ| गीता जैसे ग्रन्थों में पूरा मार्गदर्शन प्राप्त है| आचार्य मधुसूदन सरस्वती, आचार्य शंकर की परंपरा के सन्यासी थे| उन्होने भगवान श्रीकृष्ण को ही परम तत्व बताया है ...
"वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात् |
पूर्णेंदुसुंदरमुखादरविंदनेत्रात कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने ||"
अर्थात, पूर्णेन्दु चन्द्रमा के समान जिनका अतुलित सौन्दर्य-माधुर्य है, जिनके कर-पल्लव वंशी-विभूषित हैं, जिनके नेत्र कमल-दलतुल्य हैं ऐसे कृष्णचन्द्र परमानन्द के तुल्य और कोई वस्तु है ही नहीं; सच्चिदानन्दघन आनन्दकन्द परमानन्द श्रीकृष्णस्वरूप से भिन्न कोई तत्त्व है ऐसा में नहीं जानता; तात्पर्य कि श्रीकृष्णस्वरूप ही सर्वोपरि तत्त्व है | अन्ततोगत्वा तात्पर्य यह कि परात्पर परब्रह्म ही श्रीकृष्णस्वरूप में साक्षात् हुए हैं ||
सार की बात :--- "येन-केन प्रकारेण मनः कृष्णे निवेशयेत् |"
जिस किसी भी भावना से प्रेरित हो, भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र से अपना संबंध जोड़ लो; यही वेद वेदांग, उपनिषद्-पुराण आदि सम्पूर्ण सत्-शास्त्रों का एकमात्र उपदेश-आदेश है||
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
३१ अक्तूबर २०२०