Tuesday, 26 October 2021

उस्मानिया सल्तनत को किसने हराया ? ---

सल्तनत-ए-उस्मानिया (Ottoman Empire) (सन १३५० ई. से सन १९१८ ई.) को प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय हिन्दू सैनिकों ने ही हराया था। अंग्रेजों में इतना साहस नहीं था कि वे तुर्कों या जर्मनों से सीधे युद्ध कर सकें। फिर भी श्रेय ब्रिटेन को ही मिला क्योंकि भारत उस समय ब्रिटेन के आधीन था।

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सीधे युद्ध में तुर्कों और जर्मनों ने अंग्रेजों को सदा ही बहुत बुरी तरह पीटा था। अंग्रेज़ उनसे डरते थे। अंग्रेजों द्वारा युद्ध में चारे की तरह हमेशा भारतीय सैनिकों को ही आगे रखा जाता था। अंग्रेजों की विजय के पीछे सदा भारतीय सैनिकों का बलिदान था। तुर्की और जर्मनी सदा मित्र थे और उन्होने आपस में सदा मित्रता निभाई।
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यूरोप के ईसाईयों और उस्मानिया सल्तनत के मुसलमानों के मध्य तीन बहुत बड़े भयंकर खूनी मज़हबी युद्ध हुए थे, जिनमें सदा यूरोप के ईसाई ही हारे। यूरोप के उन ईसाईयों को अरबों ने नहीं, उत्तरी अफ्रीका के लड़ाकों ने हराया था जो कालांतर में मुसलमान बन गए थे। अरब तो उस समय तुर्कों के गुलाम थे, उनका कोई योगदान नहीं था। उत्तरी अफ्रीका के मुसलमान, इस्लाम के आगमन से पूर्व हिन्दू धर्म को मानते थे।
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उस्मानिया सल्तनत का कोई भी खलीफा कभी हज करने नहीं गया, यद्यपि मक्का-मदीना सहित पूरा अरब उनके आधीन था। एक बार सऊदी अरब के बादशाह ने स्वयं को स्वतंत्र करना चाहा तो तुर्क सेना सऊदी बादशाह और मुख्य इमाम को जंजीरों से बांधकर इस्तांबूल ले गई और इस्तांबूल की हागिया सोफिया शाही मस्जिद के सामने सऊदी बादशाह का सिर कलम कर दिया। वहाँ उपस्थित हजारों की भीड़ ने तालियाँ बजाई और पटाखे छोड़े। मुख्य इमाम का सिर मुख्य बाज़ार में कलम किया गया। यही एक कारण है कि अरबों के दिल में तुर्कों के प्रति एक घृणा का भाव अभी भी है।
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भारत में जिन मुसलमान बादशाहों ने राज्य किया वे सभी मूल रूप से तुर्क ही थे। मुगल लोग उज्बेकिस्तान से आए थे जो उस्मानिया सल्तनत का एक भाग था।
ईसाईयों ने निरंतर संघर्ष जारी रखा और यूरोप में इस्लाम का प्रवेश नहीं होने दिया। उन्होने विश्व के अधिकांश भागों में छल से ईसाईयत को फैलाया।
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हिंदुओं को अपने मंदिरों में प्रवेश की अनुमति सिर्फ हिन्दू श्रद्धालुओं को ही देनी चाहिए। जिनकी श्रद्धा हिन्दू धर्म में नहीं है, उनका प्रवेश हिन्दू मंदिरों में निषिद्ध हो।
२२ अक्तूबर २०२१

मेरा तो एक ही धर्म है, और वह है -- "भगवत्-प्राप्ति", अन्य कुछ भी मेरा धर्म नहीं है ---

 मेरा तो एक ही धर्म है, और वह है -- "भगवत्-प्राप्ति", अन्य कुछ भी मेरा धर्म नहीं है। यही मेरे मन की एकमात्र भावना और प्रार्थना है ---

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भगवान के प्रेम में खड़ा हूँ तो एक विशाल वृक्ष की तरह खड़ा हूँ, कोई भी झंझावात उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इतनी तो हरिःकृपा मुझ अकिंचन पर बनी रहे। यदि गिरूँगा तो एक बीज की तरह ही गिरूँगा जो पुनश्च उग आता है।
जन्म-मृत्यु, भूख-प्यास, श्रम-कष्ट , भय-तृष्णा -- ये तो इस शरीर के धर्म हैं, मेरे नहीं। मेरा तो एक ही धर्म है, और वह है -- "भगवत्-प्राप्ति"। अन्य कुछ भी मेरा धर्म नहीं है।
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भगवान की पूर्णता -- उनका जगन्माता का स्वरूप है, जिसने इस पूरी सृष्टि को धारण किया हुआ है। वे भी अंततः परमशिव में विलीन हो जाती हैं। वे मुझे अपनी स्मृति में इतना तन्मय रखें कि कभी पराभूत नहीं होना पड़े। मुझ अकिंचन में तो इतनी सामर्थ्य नहीं है कि उनका निरंतर स्मरण कर सकूँ। वे ही मुझे भगवद्-दृष्टि प्रदान करें, सदा अपनी स्मृति में, हर तरह के मोह-माया से मुक्त रखें।
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जो हुआ सो हुआ और होकर चला भी गया। अब इसी क्षण से यह जीवन मङ्गलमय और धन्य हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ अक्तूबर २०२१

सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण कैसे होगा? ---

 काल की गति पर पूर्ण नियंत्रण सिर्फ भगवान का है। इस समय काल की गति ऊर्ध्वमुखी है, अतः इस आरोह-काल में मनुष्य की चेतना का भी निरंतर उत्थान और विस्तार हो रहा है। जिस दिन आत्मा की शाश्वतता और कर्मफलों की प्राप्ति हेतु पुनर्जन्म का सत्य , जन-सामान्य को समझ में आने लगेगा, उसी दिन से सत्य-सनातन-धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा सम्पूर्ण विश्व में होने लगेगी। सत्य-सनातन-धर्म सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त होगा, और असत्य का अंधकार दूर होगा।

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भगवान की सर्वोत्तम और सर्वाधिक अभिव्यक्ति भारतभूमि में हुई है। अतः भारत निश्चित रूप से एक सत्य-सनातन-धर्मनिष्ठ अखंड हिन्दू राष्ट्र बनेगा। भारत में छाया असत्य का अंधकार दूर होगा, और सनातन-धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण होगा। वह दिन देखने के लिए मैं जीवित रहूँ या नहीं, लेकिन उस घटना का साक्षी अवश्य रहूँगा। सनातन धर्म का आधार ही -- आत्मा की शाश्वतता, कर्मफलों की प्राप्ति हेतु पुनर्जन्म, और भगवत्-प्राप्ति है।
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अपनी वर्तमान आयु और अवस्था में अब भगवत्-प्राप्ति को ही अपना एकमात्र धंधा बना लिया है। इस धंधे में केवल भगवान ही सम्मिलित हैं, और कोई भी अन्य नहीं है। सारी साधनाएँ और उपासना इसी धंधे का भाग हैं। सारा नफा-नुकसान भी भगवान का है, अन्य किसी से कुछ भी लेना-देना नहीं है। मैं रहूँ या न रहूँ, इसका भी कोई महत्व नहीं है। मेरी चेतना में एकमात्र अस्तित्व भगवान का ही रहे। इस समय मेरी आयु आधिकारिक रूप से ७५ वर्ष है, अतः यही धंधा मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ है।
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सभी को मंगलमय शुभ कामनाएँ और नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२४ अक्तूबर २०२१

सत्यधर्मनिष्ठ क्षत्रिय ही देश की रक्षा, और सुशासन दे सकते हैं ---

 सत्यधर्मनिष्ठ क्षत्रिय ही देश की रक्षा, और सुशासन दे सकते हैं।

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अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए हिंदुओं को एक ब्रहमतेज के साथ-साथ क्षात्रबल भी जागृत कर अपना सैन्यीकरण करना होगा। क्षत्रियत्व ही वास्तव में देश की रक्षा कर सकता है। हिन्दू जाति शस्त्र धारण करे। सभी हिंदुओं के पास आत्मरक्षा हेतु अस्त्र-शस्त्र हों, और उनका प्रयोग करना भी आता हो। सरकार को बाध्य किया जाये कि वह नियमों में परिवर्तन करे, और हिंदुओं को अस्त्र-शस्त्र रखने और धर्मरक्षा का अधिकार दे। सत्यधर्मनिष्ठ क्षत्रिय ही देश की रक्षा और सुशासन दे सकते हैं।
२५ अक्तूबर २०२१

जिसे प्यास लगी है, वही पानी पीयेगा ---

 जिसे प्यास लगी है, वही पानी पीयेगा ---

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यह संसार त्रिगुणात्मक है। इस समय विश्व में तमोगुण का प्रभाव अधिक है। इस सृष्टि के स्वामी स्वयं भगवान हैं जिन का आदेश है कि हम इस त्रिगुणात्मक सृष्टि से ऊपर उठें। स्वयं निमित्त मात्र बनकर भगवान के आदेश का ही पालन करेंगे।
जीवन में परमात्मा का अवतरण सर्वप्रथम स्वयं में हो, फिर जो कुछ भी करना है, वह वे परमात्मा स्वयं करेंगे।
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जब तक स्वयं में प्राण और चेतना है, तब तक हरिःनाम विस्मृत नहीं हो सकता। यह शरीर रहे या न रहे, लेकिन परमात्मा का चैतन्य और उनकी स्मृति सदा रहेगी। मेरा नहीं, सिर्फ परमात्मा का ही अस्तित्व होगा।
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"हरिः अनंत हरिः कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥
रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥"
हरिः अनंत हैं (उनका कोई पार नहीं पा सकता) और उनकी कथा भी अनंत है। सब संत उसे बहुत प्रकार से कहते-सुनते हैं। रामचंद्र के सुंदर चरित्र करोड़ों कल्पों में भी गाए नहीं जा सकते।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
२५ अक्तूबर २०२१

भगवत्-प्राप्ति में सफलता कैसे प्राप्त हो? सत्य-सनातन-धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण कब व कैसे होगा? ----

प्रश्न (१):--- भगवत्-प्राप्ति में सफलता कैसे प्राप्त हो?

प्रश्न (२):--- सत्य-सनातन-धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण कब व कैसे होगा?

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उत्तर (१):-- जिस तरह एक व्यापारी दिन-रात अपने धंधे के बारे में नफे-नुकसान की ही सोचता है, और उन्हीं लोगों से मिलता-जुलता है जो उसके धंधे में सहायक हों, --- उसी तरह जिन लोगों ने अपना धंधा ही परमात्मा की प्राप्ति को बना लिया है, वे दिन-रात सप्ताह में सातों दिन, और दिन में चौबीस घंटे --- सिर्फ परमात्मा का ही चिंतन करे; और उन्हीं लोगों से मेल-जोल रखें जो उनके धंधे में सहायक हों। बाकी अन्य सब का विष की तरह परित्याग कर दें। भगवान श्रीकृष्ण के वचनों में श्रद्धा और विश्वास रखें --
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
अर्थात् -- "जो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, मेरे में निरन्तर लगे हुए उन भक्तों का योगक्षेम (अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्तकी रक्षा) मैं वहन करता हूँ।"
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यही एकमात्र मार्ग है परमात्मा की प्राप्ति का। हृदय में सत्यनिष्ठा, श्रद्धा और विश्वास होना चाहिए। यह भगवत्-प्राप्ति ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। यही कल्याण का, और मोक्ष का एकमात्र मार्ग है। यही सत्य-सनातन-धर्म है।
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उत्तर (२):--- जिस दिन आधुनिक विज्ञान व निज अनुभव द्वारा मनुष्य की बुद्धि -- कर्मफलों, पुनर्जन्म व आत्मा की शाश्वतता को मान लेगी, उसी दिन से सनातन-धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण आरंभ हो जाएगा। फिर भारत भी अखंड होगा और अपने परम वैभव को भी प्राप्त करेगा। कलियुगी पंथों का प्रभाव भी क्षीण होते होते लुप्त हो जाएगा।
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विशेष :-- परमात्मा से प्रेम (भक्ति) व अन्य संबन्धित विषयों पर अब तक अनेक बार लिख चुका हूँ। बार बार उसी बात को घूमा-फिरा कर लिखना समय की बर्बादी है।
जिन के हृदय में परमात्मा के प्रति प्रेम होगा, वे निश्चित रूप से रामायण, महाभारत और उपनिषदों आदि का स्वाध्याय, व सत्संग करेंगे।
जिन का मन और बुद्धि -- विषय-वासनाओं में लिप्त है, उनके भाग्य में भटकना ही लिखा है, वे भटकते ही रहेंगे। अनेक जन्मों तक कष्ट पाते-पाते वे भी एक न एक दिन सन्मार्ग पर आ ही जाएँगे।
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आप सब महान आत्माएँ हैं और परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्तियाँ हैं।
आप सब को मेरा नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२५ अक्तूबर २०२१

भगवान के प्रति अहैतुकी परमप्रेम, समर्पण और ध्यान साधना -- हिन्दू धर्म का प्राण है ---

 सनातन हिन्दू धर्म क़ा प्राण है ... भगवान के प्रति अहैतुकी पूर्ण-परम-प्रेम, समर्पण और ध्यान साधना|

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भारत का सबसे बड़ा अहित किया है अधर्मसापेक्ष यानि धर्मनिरपेक्ष अधर्मी सेकुलरवाद, मार्क्सवाद और मैकाले की शिक्षा व्यवस्था ने|
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हमारे जीवन का केंद्रबिंदु परमात्मा हों, और हम उन्हें शरणागति द्वारा समर्पित हों ... यही सर्वश्रेष्ठ कार्य है जिसे हम इस जीवन में कर सकते हैं|
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पूरी सृष्टि ओंकार का, यानि राम नाम का जप कर रही है| हमें उसे निरंतर सुनना और उसी में लीन हो जाना चाहिए| अतः पढो कम, और ध्यान अधिक करो| उतना ही पढो जिससे प्रेरणा और शक्ति मिलती हो| पढने का उद्देश्य ही प्रेरणा और शक्ति प्राप्त करना है|
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साथ भी उन्हीं लोगों का करो जो हमारी साधना में सहायक हों, यही सत्संग है| साधना भी वही है, जो हमें निरंतर परमात्मा का बोध कराये|
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सृष्टि निरंतर गतिशील है, कहीं भी जड़ता नहीं है| जड़ता का आभास, माया का आवरण है| यह भौतिक विश्व जिन अणुओं से बना है उनका निरंतर विखंडन और नवसृजन हो रहा है| यह विखंडन और नवसृजन की प्रक्रिया ही नटराज भगवान शिव का नृत्य है|
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वह परम चेतना जिससे समस्त ऊर्जा और सृष्टि निर्मित हुई है वे शिव हैं| सारी आकाश गंगाएँ, सारे नक्षत्र अपने ग्रहों और उपग्रहों के साथ अत्यधिक तीब्र गति से परिक्रमा कर रहे हैं| सृष्टि का कहीं ना कहीं तो कोई केंद्र है, वही विष्णु नाभि है और जिसने समस्त सृष्टि को धारण कर रखा है वे विष्णु हैं|
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उस गति की, उस प्रवाह की, और नटराज के नृत्य की भी एक ध्वनी हो रही है जिसकी आवृति हमारे कानों की सीमा से परे है| वह ध्वनी ही ओंकार रूप में परम सत्य 'राम' का नाम है| उसे सुनना और उसमें लीन हो जाना ही उच्चतम साधना है| समाधिस्थ योगी जिसकी ध्वनी और प्रकाश में लीन हैं, और सारे भक्त साधक जिस की साधना कर रहे हैं, वह 'राम' का नाम ही है जिसे सुनने वालों का मन उसी में मग्न हो जाता है|
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आप सब में हृदयस्थ परमात्मा को नमन ! ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२६ अक्टूबर २०२०