Friday, 8 October 2021

वेटिकन की अति गोपनीय, अति समृद्ध और अति कूट छद्म शाखा अंतर्राष्ट्रीय Penetration Wing, भारत की अस्मिता की सबसे बड़ी शत्रु है ---

 

भारत की अस्मिता की सबसे बड़ी शत्रु - वेटिकन की अति गोपनीय, अति समृद्ध और अति कूट छद्म शाखा अंतर्राष्ट्रीय Penetration Wing है, जो इटली के अंतर्राष्ट्रीय माफिया के साथ मिलकर --
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(१) हिन्दू संस्थाओं के भीतर घुसकर उन्हें खोखला करती है। पैसे के बल पर, और अपने विशेष रूप से प्रशिक्षित व्यक्तियों को हिन्दू साधुओं के रूप में संस्थाओं के भीतर प्रवेश करवा कर उन संस्थाओं पर अपना अधिकार करती है। देश के अनेक काली मंदिरों में भगवती काली के साथ साथ मदर टेरेसा की भी पूजा होती है। अनेक हिन्दू आश्रमों में भगवान श्रीकृष्ण के साथ-साथ जीसस क्राइस्ट की भी पूजा होती है।
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(२) सच्चे हिन्दू साधुओं पर महिलाओं से छेड़छाड़ या बलात्कार के झूठे आरोप लगवाकर उन्हें बदनाम करती है, गिरफ्तार करवाती है, सजा दिलवाती है, या आत्महत्या के लिए बाध्य कर देती है। यदि काम न बने तो नक्सलियों के साथ मिलकर हिन्दू साधुओं की हत्या भी करवा देती है। हिन्दू धर्मगुरुओं को बदनाम करने में गुप्त रूप से इस संस्था का बहुत बड़ा योगदान है।
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(३) चर्चों में खुद ही तोड़फोड़ करवा कर हिंदुओं को बदनाम करती है। और Victim card खेलती है।
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(४) भारत में हिंदुओं को अपने विद्यालयों में हिन्दू धर्म की शिक्षा को सरकारी मान्यता प्राप्त नहीं है, जब कि तथाकथित अल्पसंख्यकों को है। हिन्दू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण है, जिनका धन जो हिन्दू धर्म के प्रचार में खर्च होना होना चाहिए वह तथाकथित अल्पसंख्यकों के कल्याण में खर्च होता है। भारत की बड़ी बड़ी अङ्ग्रेज़ी माध्य की शिक्षण संस्थाओं पर इसी के पादरियों का नियंत्रण है। पूरे विश्व में सनातन हिन्दू धर्म को बदनाम किया जाता है। उपरोक्त सब बड़े सुनियोजित तरीके से पूरे विश्व में हो रहा है।
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(५) भारत की सत्ता पर कैसे भी अधिकार कर के भारत से हिन्दुत्व को नष्ट कर, ईसाई राष्ट्र की स्थापना करना इन का ध्येय है। सनातन हिन्दू धर्म यदि बचा हुआ है वह भगवान की कृपा से ही बचा हुआ है।
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इस विषय पर पश्चिमी जगत में ही अनेक पुस्तकें लिखी गयी हैं।
४ अक्तूबर २०२१

सिर्फ दैवीय शक्तियों की कृपा से ही हम बचे हुये हैं ---

 

सिर्फ दैवीय शक्तियों की कृपा से ही हम बचे हुये हैं ---
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विचारधाराओं के संघर्ष में इस समय ईसाईयत पर इस्लाम विजयी हो रहा है। यह मैं अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ। इसका कारण है कि इस्लाम में अपने मजहब के प्रति सांसारिक आत्म-त्याग (self giving) की भावना है, और किसी भी प्रकार के हानि-लाभ का calculation नहीं है। यह बात ईसाईयत में नहीं है। आप यह पूरे विश्व में धटित होते हुए देख सकते हैं।
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हिंदुओं की शक्ति सिर्फ आध्यात्म में है| आध्यात्म के बिना हिंदुओं का कोई भविष्य नहीं है। Self giving की भावना अब हिंदुओं में नहीं के बराबर है। हर चीज में अब हम लोग भी लाभ-हानि का calculation करने लगे हैं। धर्म और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना लगभग नगण्य है, जिसके बिना हमारा भविष्य उज्ज्वल नहीं है। यदि यही हाल रहा तो आसुरी शाक्तियाँ हमें नष्ट कर देंगी। एक परिवर्तन लाना होगा जिसका आरंभ तो स्वयं से ही करना होगा।
४ अक्तूबर २०२१

गांधीजी को 22 वर्षों के पश्चात ही गुस्सा क्यों आया? ---

 

गांधीजी को 22 वर्षों के पश्चात ही गुस्सा क्यों आया? ---
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कहते हैं कि किसी अंग्रेज ने नस्लभेद के कारण गांधीजी को ट्रेन से उतार दिया था। इस घटना के कारण गांधी जी अंग्रेजों के विरुद्ध हो गए, और उन्होंने अंग्रेजो के विरुद्ध भारत में स्वाधीनता आंदोलन आरंभ कर दिया।
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अगर यह घटना सच भी है तो यह सन १८९३ ई. की है जब गांधीजी २४ वर्ष के थे। गांधीजी भारत में बापस सन १९१५ में आए, जब वे ४६ वर्ष के थे। इन २२ वर्षों में गांधीजी को कभी गुस्सा नहीं आया।
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गांधीजी के पिता करमचंद गांधी काफी धनवान थे। अंग्रेजी राज में उन्होने खूब धन कमाया और कभी उनके साथ कोई भेदभाव नहीं हुआ। गांधीजी ने अंग्रेजों के साथ रहकर पढ़ाई की और वकालत की प्रैक्टिस की, लेकिन उनके साथ कोई भेदभाव नहीं हुआ। गांधीजी का बहुत सारा जीवन इंग्लैण्ड और दक्षिण अफ्रीका में गुजर गया मगर उनके साथ कोई भेदभाव नहीं हुआ। वे अंग्रेजों के साथ ही रहते रहे, पढ़ते रहे और काम भी करते रहे। किसी भी अंग्रेज ने उनको कभी परेशान नहीं किया। ब्रिटिश सेना में सार्जेंट मेजर के पद काम करते हुये भी उनको कभी गुस्सा नहीं आया।
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इसी बीच भारत में अंग्रेजो के विरुद्ध स्वाधीनता संघर्ष छिड़ गया। सन १९०७ में वीर सावरकर के ग्रन्थ "१८५७ - प्रथम स्वातंत्र्य समर" ने क्रान्ति की ज्वाला को और ज्यादा भड़का दिया। क्रांतिकारियों ने अंग्रेज अधिकारियों की हत्या करना आरंभ कर दिया। अनेक अंग्रेज़ अधिकारियों की हत्या क्रांतिकारियों द्वारा कर दी गई। इस अपराध में अनेक क्रांतिकारियों को फांसी हुई और अनेकों को रंगून और कालापानी की जेलों में भेज दिया गया।
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इसी बीच अचानक गांधी जी को याद आया कि २१ वर्ष पूर्व किसी अंग्रेज ने उनको ट्रेन से उतारा था, बस गांधी जी अपनी विदेशी संपत्ति को बेचकर सन १९१५ ई. में भारत आ गए। एक महत्वपूर्ण बात है कि गांधीजी को साउथ अफ्रीका की ट्रेन से ७ जून १८९३ को उतारा गया, तब उनको गुस्सा नहीं आया। २२ वर्षों के बाद उनको गुस्सा आया और वे अंग्रेजों से बदला लेने के लिए ९ जनवरी १९१५ को भारत में बापस आए।
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अंग्रेजों ने और उन की प्रेस ने गांधीजी को भारत में स्थापित और प्रसिद्ध किया। अंग्रेजों को एक ऐसा भारतीय नेता चाहिए था जो अंग्रेजों के विरुद्ध हो रही हिंसा को अहिंसक बना सके, और किसी भी संभावित सशस्त्र विद्रोह की हवा निकाल सके। गांधीजी ने सदा अंग्रेजों का हित देखा और वही किया जो अंग्रेजों के हित में था।

सूत्रधार को नमन ! ---

 सूत्रधार को नमन ! --- (संशोधित व पुनर्प्रेषित)

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दोनों आँखों के मध्य में एक भ्रामरी गुफा है जिसमें सारे आध्यात्मिक रहस्य छिपे हैं। इसके प्रवेश द्वार पर आवरण और विक्षेप नाम की दो अति सुंदर, आकर्षक, मोहिनी, महाठगिनी प्रहरिनें बैठी हैं, जो किसी को भी भीतर प्रवेश नहीं करने देतीं। कैसे भी इन ठगिनियों से बचकर इस गुफा में प्रवेश करना है। एक बार प्रवेश कर लिया तो पीछे मुड़कर मत देखना, अन्यथा ये अपने रूपजाल में फंसाकर बापस बुला लेंगी। इसमें आगे बढ़ते रहोगे तो सारे रहस्य अनावृत हो जाएँगे।
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गीता में भगवान कहते हैं ---
"दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥७:१४॥"
"न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥७:१५॥"
"चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥७:१६॥"
"तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्ितर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥७:१७॥"
"उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥७:१८॥"
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥"
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इससे पहिले भगवान कह चुके है --
"असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥६:३५॥"
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(भ्रामरी गुफा में प्रवेश और इसके रहस्य की समझ भगवान की कृपा से ही होती है)
ॐ तत्सत् !!
६ अक्तूबर २०२१

एक मार्मिक प्रार्थना हिन्दू समाज से ---

 एक मार्मिक प्रार्थना हिन्दू समाज से ---

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हिन्दू समाज पर जिस तरह के क्रूर मर्मांतक प्रहार हो रहे हैं, उनका प्रतिकार करने के लिए हिन्दू समाज को अब सब तरह की दुर्बलताओं को त्याग कर सशक्त, निर्भय और आक्रामक होना पड़ेगा। नवरात्रों का आरंभ हो गया है, शक्ति की आराधना करें। हमारे आराध्य देव महाशक्तिशाली और शस्त्रधारी हों, जैसे भगवान श्रीराम, महावीर हनुमान, भगवान श्री कृष्ण, भगवान शिव, भगवान विष्णु या भगवती दुर्गा आदि। शांति और अहिंसा के उपदेशों को एक बार तो भूल जाएँ। जो भी उपदेश हमें कायर और कमजोर बनाते हैं, उनका त्याग कर दें।
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हमें ब्रहमतेज के साथ-साथ अपने क्षातृत्व को भी जागृत करना होगा। ब्रहमतेज और क्षातृत्व ही हमारी रक्षा करेंगे। बलहीन को परमात्मा नहीं मिलते। आसुरी शक्तियों को पराभूत करने के लिए हमें साधना द्वारा दैवीय शक्तियों को जागृत कर उनकी सहायता लेनी ही होगी।
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युवा वर्ग को चाहिए कि वे अपनी देह को तो शक्तिशाली बनायें, बुद्धिबल और विवेक को भी बढ़ाएँ। अपने बच्चों को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दिलवाएँ।
ॐ तत्सत् !!

भगवान की उपासना -- हृदय की अभीप्सा है, आकांक्षा नहीं ---

 भगवान की उपासना -- हृदय की अभीप्सा है, आकांक्षा नहीं ---

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हृदय की बहुत सारी बातें हैं जो मैं लिखना चाहता हूँ, लेकिन इसलिए नहीं लिख रहा हूँ कि उनको लिखने से कुछ भी लाभ नहीं है। मुझे अगर किसी भी तरह की कोई शिकायत या असंतोष है तो वह भगवान से है, किसी अन्य से नहीं। यह सृष्टि भगवान की है, किसी अन्य की नहीं, अतः कुछ कहना होगा तो प्रत्यक्ष उन्हीं से कहेंगे।
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जैसी सृष्टि हम चाहते हैं, और जो जीवन में करना चाहते हें, वह भी उन्हीं से कहेंगे। एकांत में भगवान की उपासना करेंगे और अपने संकल्पों को साकार करेंगे। भगवान की भी यही इच्छा है।
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भगवान की उपासना मेरा स्वधर्म, स्वभाव और परमप्रेम की अभिव्यक्ति है। यह एक अभीप्सा है, आकांक्षा नहीं।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
८ अक्तूबर २०२१

सत्यनिष्ठ होना ही सबसे बड़ी साधना है ---

सत्यनिष्ठ होना ही सबसे बड़ी साधना है ---
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राग-द्वेष, लोभ व अहंकार से मुक्ति मिल जाए और साथ-साथ भगवान के प्रति परमप्रेम हृदय में हो तो संसार में रहते हुए भी सत्यनिष्ठ होकर धर्माचरण कर सकते हैं। आदर्श रूप में यह कहना तो बड़ा सरल है पर व्यवहार रूप में करना बड़ा कठिन। सत्यनिष्ठ होना ही सबसे बड़ी साधना है। इसका प्रयास करते-करते मेरे अनेक जन्म व्यतीत हो गए हैं, लेकिन लगता है अभी भी सफलता नहीं मिली है। पूर्वजन्म का कुछ कुछ आभास यानि स्मृतियाँ हैं। इस जन्म का भी पता है, जो मरुभूमि में गिरी हुई जल की एक बूँद की तरह ही था। चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाये।
आए थे हरिभजन को ओटन लगे कपास
बाना पहिना सिंह का, चले भेड़ की चाल
लेकिन यह चलने वाली बात नहीं है। इस तरह भेड़ की चाल सदा नहीं चल सकते। अपनी क्षमता पर भी संदेह ही नहीं भरोसा भी टूट गया है। स्वयं में कोई क्षमता या गुण नहीं है। एकमात्र कृपा है -- भगवान को पाने की अभीप्सा, यानि एक अतृप्त गहन प्यास और तड़प। इसके अतिरिक्त और कुछ भी संपत्ति मेरे पास में नहीं है। यह अभीप्सा ही मेरी एकमात्र संपत्ति है, जिसके साथ-साथ कुछ प्रेम भी है जो मेरा स्वभाव है। भगवान का यह कृपा रूपी प्रसाद ही मुझे भगवान से मिला देगा। और कुछ भी नहीं चाहिए, यही पर्याप्त है।
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करें तो क्या करें? गीता में दिये भगवान के चरम उपदेश और गीता के ही अंतिम श्लोकों के सिवाय इस समय और कुछ भी याद नहीं आ रहा है --
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥१८:७८॥"
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जहां तक मेरी कल्पना जाती है, इस सृष्टि में भगवान वासुदेव के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। मेरा भी कोई अस्तित्व नहीं है। जो कुछ भी है, वह वे स्वयं हैं। वे स्वयं ही इस देह से सब क्रियाएँ कर रहे हैं। वे स्वयं ही स्वयं का अवलोकन और अनुभव कर रहे हैं। उनकी जय हो। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर

८ अक्तूबर २०२१