Friday, 8 October 2021

सूत्रधार को नमन ! ---

 सूत्रधार को नमन ! --- (संशोधित व पुनर्प्रेषित)

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दोनों आँखों के मध्य में एक भ्रामरी गुफा है जिसमें सारे आध्यात्मिक रहस्य छिपे हैं। इसके प्रवेश द्वार पर आवरण और विक्षेप नाम की दो अति सुंदर, आकर्षक, मोहिनी, महाठगिनी प्रहरिनें बैठी हैं, जो किसी को भी भीतर प्रवेश नहीं करने देतीं। कैसे भी इन ठगिनियों से बचकर इस गुफा में प्रवेश करना है। एक बार प्रवेश कर लिया तो पीछे मुड़कर मत देखना, अन्यथा ये अपने रूपजाल में फंसाकर बापस बुला लेंगी। इसमें आगे बढ़ते रहोगे तो सारे रहस्य अनावृत हो जाएँगे।
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गीता में भगवान कहते हैं ---
"दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥७:१४॥"
"न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥७:१५॥"
"चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥७:१६॥"
"तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्ितर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥७:१७॥"
"उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥७:१८॥"
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥"
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इससे पहिले भगवान कह चुके है --
"असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥६:३५॥"
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(भ्रामरी गुफा में प्रवेश और इसके रहस्य की समझ भगवान की कृपा से ही होती है)
ॐ तत्सत् !!
६ अक्तूबर २०२१

एक मार्मिक प्रार्थना हिन्दू समाज से ---

 एक मार्मिक प्रार्थना हिन्दू समाज से ---

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हिन्दू समाज पर जिस तरह के क्रूर मर्मांतक प्रहार हो रहे हैं, उनका प्रतिकार करने के लिए हिन्दू समाज को अब सब तरह की दुर्बलताओं को त्याग कर सशक्त, निर्भय और आक्रामक होना पड़ेगा। नवरात्रों का आरंभ हो गया है, शक्ति की आराधना करें। हमारे आराध्य देव महाशक्तिशाली और शस्त्रधारी हों, जैसे भगवान श्रीराम, महावीर हनुमान, भगवान श्री कृष्ण, भगवान शिव, भगवान विष्णु या भगवती दुर्गा आदि। शांति और अहिंसा के उपदेशों को एक बार तो भूल जाएँ। जो भी उपदेश हमें कायर और कमजोर बनाते हैं, उनका त्याग कर दें।
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हमें ब्रहमतेज के साथ-साथ अपने क्षातृत्व को भी जागृत करना होगा। ब्रहमतेज और क्षातृत्व ही हमारी रक्षा करेंगे। बलहीन को परमात्मा नहीं मिलते। आसुरी शक्तियों को पराभूत करने के लिए हमें साधना द्वारा दैवीय शक्तियों को जागृत कर उनकी सहायता लेनी ही होगी।
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युवा वर्ग को चाहिए कि वे अपनी देह को तो शक्तिशाली बनायें, बुद्धिबल और विवेक को भी बढ़ाएँ। अपने बच्चों को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दिलवाएँ।
ॐ तत्सत् !!

भगवान की उपासना -- हृदय की अभीप्सा है, आकांक्षा नहीं ---

 भगवान की उपासना -- हृदय की अभीप्सा है, आकांक्षा नहीं ---

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हृदय की बहुत सारी बातें हैं जो मैं लिखना चाहता हूँ, लेकिन इसलिए नहीं लिख रहा हूँ कि उनको लिखने से कुछ भी लाभ नहीं है। मुझे अगर किसी भी तरह की कोई शिकायत या असंतोष है तो वह भगवान से है, किसी अन्य से नहीं। यह सृष्टि भगवान की है, किसी अन्य की नहीं, अतः कुछ कहना होगा तो प्रत्यक्ष उन्हीं से कहेंगे।
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जैसी सृष्टि हम चाहते हैं, और जो जीवन में करना चाहते हें, वह भी उन्हीं से कहेंगे। एकांत में भगवान की उपासना करेंगे और अपने संकल्पों को साकार करेंगे। भगवान की भी यही इच्छा है।
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भगवान की उपासना मेरा स्वधर्म, स्वभाव और परमप्रेम की अभिव्यक्ति है। यह एक अभीप्सा है, आकांक्षा नहीं।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
८ अक्तूबर २०२१

सत्यनिष्ठ होना ही सबसे बड़ी साधना है ---

सत्यनिष्ठ होना ही सबसे बड़ी साधना है ---
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राग-द्वेष, लोभ व अहंकार से मुक्ति मिल जाए और साथ-साथ भगवान के प्रति परमप्रेम हृदय में हो तो संसार में रहते हुए भी सत्यनिष्ठ होकर धर्माचरण कर सकते हैं। आदर्श रूप में यह कहना तो बड़ा सरल है पर व्यवहार रूप में करना बड़ा कठिन। सत्यनिष्ठ होना ही सबसे बड़ी साधना है। इसका प्रयास करते-करते मेरे अनेक जन्म व्यतीत हो गए हैं, लेकिन लगता है अभी भी सफलता नहीं मिली है। पूर्वजन्म का कुछ कुछ आभास यानि स्मृतियाँ हैं। इस जन्म का भी पता है, जो मरुभूमि में गिरी हुई जल की एक बूँद की तरह ही था। चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाये।
आए थे हरिभजन को ओटन लगे कपास
बाना पहिना सिंह का, चले भेड़ की चाल
लेकिन यह चलने वाली बात नहीं है। इस तरह भेड़ की चाल सदा नहीं चल सकते। अपनी क्षमता पर भी संदेह ही नहीं भरोसा भी टूट गया है। स्वयं में कोई क्षमता या गुण नहीं है। एकमात्र कृपा है -- भगवान को पाने की अभीप्सा, यानि एक अतृप्त गहन प्यास और तड़प। इसके अतिरिक्त और कुछ भी संपत्ति मेरे पास में नहीं है। यह अभीप्सा ही मेरी एकमात्र संपत्ति है, जिसके साथ-साथ कुछ प्रेम भी है जो मेरा स्वभाव है। भगवान का यह कृपा रूपी प्रसाद ही मुझे भगवान से मिला देगा। और कुछ भी नहीं चाहिए, यही पर्याप्त है।
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करें तो क्या करें? गीता में दिये भगवान के चरम उपदेश और गीता के ही अंतिम श्लोकों के सिवाय इस समय और कुछ भी याद नहीं आ रहा है --
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥१८:७८॥"
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जहां तक मेरी कल्पना जाती है, इस सृष्टि में भगवान वासुदेव के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। मेरा भी कोई अस्तित्व नहीं है। जो कुछ भी है, वह वे स्वयं हैं। वे स्वयं ही इस देह से सब क्रियाएँ कर रहे हैं। वे स्वयं ही स्वयं का अवलोकन और अनुभव कर रहे हैं। उनकी जय हो। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर

८ अक्तूबर २०२१ 

Thursday, 7 October 2021

इस सृष्टि में सद्भाव और एकता संभव है सिर्फ परमात्मा से प्रेम और ध्यान साधना से ही ---

इस सृष्टि में सद्भाव और एकता संभव है सिर्फ परमात्मा से प्रेम और ध्यान साधना से ही, अन्यथा यह संसार एक मृग-मरीचिका है| संसार में सबसे अधिक मार-काट, हिंसा और अन्याय, मज़हब के नाम पर ही हुए हैं, और हो रहे हैं| जीवन में सुख-शांति और सुरक्षा चाहिए तो दिन में जब भी समय मिले, भगवान की उपासना करो, ध्यान-साधना करो, अन्यथा जीवन में कुछ भी मिलने वाला नहीं है|
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भारत में कल ही एक व्यक्ति ने आत्म-हत्या की, जो हिमाचल प्रदेश का पुलिस महानिर्देशक, सीबीआई का निर्देशक, दो राज्यों का राज्यपाल, और एक विश्वविद्यालय का उपकुलपति भी रह चुका था| उसने संसार की उच्चतम उपलब्धियाँ प्राप्त कीं, और खूब रुपया-पैसा और सम्मान भी कमाया| किसी भी प्रकार की कमी उसके पास नहीं थी, पर जीवन में सुख-शांति नहीं थी| यह सुख-शांति जीवन में भिखारियों के पीछे-पीछे भागने से या दूसरों से नहीं, सिर्फ परमात्मा के प्रेम और ध्यान-साधना से ही मिल सकती है|
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संसार में अधिकांश लोग उचित-अनुचित हर प्रकार से धन एकत्र करते हैं, और संसार से अपेक्षा व माँग करते हैं कि संसार उन का सम्मान करे| पर ऐसे लोगों को जीवन में निराशा के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं मिलता| यह संसार हमें सुख की आशा देता है, पर अंततः निराशा ही हाथ लगती है|
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !! आप सब को नमन और शुभ कामनायें !!
कृपा शंकर
८ अक्टूबर २०२०

भारत से तुर्की क्यों चिढ़ता और द्वेष रखता है? ---

भारत से तुर्की क्यों चिढ़ता और द्वेष रखता है? इसका कारण जैसा मुझे समझ में आया है, वैसा ही यहाँ लिख रहा हूँ|
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प्रथम विश्व युद्ध में गैलिपोली की अति भयंकर लड़ाई में तुर्की की पराजय के साथ ही सल्तनत-ए-उस्मानिया (Ottoman empire) का पतन हो गया था| इस से वह सल्तनत बिखर गई और उस के आधीन बुल्गारिया, मिश्र, हंगरी, जॉर्डन, लेबनान, इज़राइल, फिलिस्तीन, मसीडोनिया, रोमानिया, सीरिया, अरब का अधिकांश भाग, मध्य एशिया और उत्तरी अफ्रीका के सारे समुद्र-तटीय देश इस सल्तनत से स्वतंत्र हो गए| इस युद्ध में ब्रिटेन की ओर से लड़ने वाले सारे सैनिक भारतीय थे जिनको श्रेय इसलिए नहीं मिला क्योंकि भारत उस समय अंग्रेजों के आधीन था| सारे अधिकारी अंग्रेज़ थे जिनमें भारतीय सैनिकों के बिना युद्ध करने का साहस नहीं था| विशुद्ध अंग्रेजी फौज ने हर जगह बुरी तरह मार खाई और उन्हें भारतीय सैनिकों द्वारा ही सदा बचाया गया| हर अंग्रेज़ सैनिक अधिकारी भारतीय सिपाहियों की सहायता के साथ ही लड़ना चाहता था क्योंकि भारतीय सिपाही अपने प्राणों की परवाह किए बिना युद्ध करते थे| तुर्की से भारतीय सिपाहियों की सहायता के बिना युद्ध जीतना असंभव था| यरूशलम को भी तुर्की से अंग्रेजों ने भारतीय सिपाहियों के द्वारा ही मुक्त कराया था|
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तुर्की के खलीफा की यह इच्छा थी कि वह अंग्रेजों को हराकर भारत पर अपना अधिकार करे| तुर्की की पराजय के पश्चात भारत में गांधी जी ने दुर्भाग्य से खलीफा को बापस सत्ता दिलाने के लिए खिलाफत आंदोलन आरंभ किया था| तुर्की के इतिहास में यह नहीं पढ़ाया जाता है कि उन्हें अंग्रेजों ने हराया था| उन्हें पढ़ाया जाता है कि ब्रिटिश-इंडिया की हिन्दुस्तानी फौज ने उन्हें हराया था| वहाँ का राष्ट्रपति अर्दोआन चाहता है कि भारत में गजवा-ए-हिन्द हो, अतः वह पाकिस्तान का समर्थन करता है| तुर्की को यह मलाल है कि वे अंग्रेजों से नहीं बल्कि हिन्दुस्तानी सैनिकों से हारे थे|
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प्रथम विश्वयुद्ध में कुल मिलाकर ७४,१८७ भारतीय सैनिक मारे गए , और ६७,००० घायल हुए थे| जयपुर राज्य के ७,००० से अधिक सैनिक मारे गए जिनमें से अधिकांश शेखावाटी के थे| उनकी स्मृति में एक छोटा सा शिलालेख झुंझुनूं के जोरावर गढ़ के दरवाजे पर (सब्जी मंडी में) लगा है, जिसे ध्यान से देखने पर दिखाई देता है|
ॐ तत्सत् !!
८ अक्तूबर २०२०

 

कोई किसी का शत्रु या मित्र नहीं होता, सब अपने-अपने स्वार्थ देखते हैं, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में तो यह शत-प्रतिशत सत्य है ---

 

कोई किसी का शत्रु या मित्र नहीं होता| सब अपने-अपने स्वार्थ देखते हैं| अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में तो यह शत-प्रतिशत सत्य है|
आजकल अर्मेनिया और अज़रबेजान में एक धर्मयुद्ध चल रहा है| जिसमें मुख्य भूमिका तुर्की की है| इसकी पृष्ठभूमि में जाते हैं| प्रथम विश्व युद्ध (२८ जुलाई १९१४ से ११ नवंबर १९१८) की समाप्ति ..... तुर्की की पराजय, और सल्तनत-ए-उस्मानिया (The Ottoman Empire) के विखंडन के साथ हुई थी| यह सल्तनत उस समय से पीछे लगभग ६०० वर्षों से विश्व का एक सबसे बड़ा साम्राज्य था, जिसके आधीन बुल्गारिया, मिश्र, हंगरी, जॉर्डन, लेबनान, इज़राइल, फिलिस्तीन, मसीडोनिया, रोमानिया, सीरिया, अरब का अधिकांश भाग, मध्य एशिया और उत्तरी अफ्रीका के सारे समुद्र-तटीय देश थे| भारत पर भी जितने मुसलमान बादशाहों ने राज्य किया, वे मूल रूप से तुर्क ही थे और तुर्की के खलीफा सुल्तान को अपने लगान का एक भाग नियमित रूप से भेजते थे| वर्तमान सऊदी अरब भी तुर्की के आधीन था|
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प्रथम विश्व युद्ध को समाप्त हुए एक सौ वर्ष पूरे हो चुके हैं| तुर्की के वर्तमान राष्ट्रपति अर्दोआन चाहते हैं कि तुर्की अपने प्राचीन गौरव को प्राप्त कर विश्व की एक महाशक्ति बने| इसके लिए उन्हें मुस्लिम देशों का समर्थन चाहिए जो उन्हें सिर्फ पाकिस्तान से मिला| तुर्की ने अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए मुसलमान देश अज़र्बेज़ान को भड़का कर अपने पुराने शत्रु आर्मेनिया से युद्ध करवा ही दिया| आर्मेनिया एक कट्टर ईसाई देश है जहाँ का आर्मेनियायी चर्च रूस के ओर्थोंडॉक्स चर्च से निकला है| अज़र्बेज़ान में सुन्नी सिर्फ १५% ही हैं, और शिया ८५%, पर सुन्नी तुर्की उनको भड़का कर अपनी ओर करने में सफल रहा है| अरब और तुर्क, हालाँकि कट्टर सुन्नी मुसलमान हैं पर एक-दूसरे से बहुत घृणा करते हैं|
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आश्चर्य इस बात का हो रहा है कि विश्व का सबसे बड़ा शिया देश ईरान, विश्व के दूसरे सबसे बड़े शिया देश अज़र्बेजान की सहायता न कर के उसके विरोध में ईसाई देश आर्मेनिया की सहायता कर रहा है, और आर्मेनिया को भारी मात्रा में युद्ध लड़ने के लिए सामान दे रहा है| रूस भी ईरान के माध्यम से आर्मेनिया को सहायता भेज रहा है|
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सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि इज़राइल, अज़र्बेज़ान की सहायता कर रहा है| चीन भी अज़र्बेज़ान की सहायता कर रहा है| यह दिखाता है कि कोई भी देश हो अपनी विदेश नीति अपने आर्थिक हितों को देख कर ही करता है|
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जब से यह सृष्टि बनी है तब से युद्ध होते रहे हैं, और होते रहेंगे| उन्हें कोई भी नहीं रोक पाया है| सभ्यताओं का उदय और अस्त ऐसे ही होता रहेगा|
कृपा शंकर
७ अक्तूबर २०२०