Wednesday, 6 October 2021

लंबी यात्रा न कर सकें तो परमात्मा की गहराई में उतरें ...

लंबी यात्रा न कर सकें तो परमात्मा की गहराई में उतरें ...
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हम लंबी यात्रा नहीं कर सकते तो जहाँ पर भी हैं वहीं से गहराई में तो उतर ही सकते हैं| नकारात्मकता का चिंतन न करें| हमारी भूलें चाहे हिमालय से भी बड़ी हों, जीवन में चाहे कितना भी भयावह अंधकार हो, उसका चिंतन न करें| परमात्मा का चिंतन हमारी हर कमी को दूर कर सकता है| मेरुदंड को उन्नत रखते हुए एकांत व पवित्र स्थान में बैठकर दृष्टिपथ को भ्रूमध्य में रखें| अजपा-जप का अभ्यास करें| कानों को बंद कर भगवान के पवित्र नाम का श्रवण करें| हर साँस हमें परमात्मा से जोड़ती है| अपना पूर्ण प्रेम परमात्मा को दें| स्वयं को परमात्मा को समर्पित कर दें| हमारे में परमप्रेम और सत्यनिष्ठा होगी तो हमें मार्गदर्शन भी मिलेगा, हमारी रक्षा भी होगी और भगवान की परमकृपा भी होगी|
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आध्यात्मिक मार्ग में सबसे अधिक संघर्ष स्वयं की निम्न-प्रकृति से होता है| निम्न-प्रकृति अधोगामी होती है जो हमें परमात्मा से दूर ले जाती है| उच्च-प्रकृति ऊर्ध्वगामी होती है जो परमात्मा की ओर बढ़ने की ओर प्रेरणा देती है| इनमें संघर्ष व्यक्तित्व का विखंडन तक कर सकता है| इससे बचने के लिए हमें सत्संग यानि उस तरह के लोगों का साथ चाहिए जैसा हम बनना चाहते हैं| सत्संग भी सुलभ नहीं है, यह हरिः कृपा से ही प्राप्त होता है| सत्संग के नाम पर ठगी भी बहुत अधिक है| बाहरी सत्संग न मिले तो परमात्मा के साथ या महापुरुषों के साथ आंतरिक सत्संग करें| भगवान से यदि हम सत्संग लाभ के लिए सत्यनिष्ठा से प्रार्थना करते हैं तो भगवान निश्चित रूप से हम पर कृपा करते हैं|
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जीवन में और उस से भी परे, ईश्वर ही एकमात्र सत्य है। यह आभासित जगत उसी की अभिव्यक्ति है, पर यह आभासित जगत एक धोखा है| किसी से किसी भी प्रकार की अपेक्षा महादुःखदायी है| स्वयं में ही उसे व्यक्त करना होगा| बाहर की भागदौड़ और अपेक्षाओं का अब अंत होना चाहिए|
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उस परम सत्य का बोध जब हो जाये तब इस अंतहीन भागदौड़ पर पूर्णविराम लगना ही चाहिए अन्यथा धोखा ही धोखा है| हमारी हर साँस, हमारा हर क्षण, हमारा हर विचार, उसी परम सत्य परमात्मा की अभिव्यक्ति हो|
ॐ ॐ ॐ !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शांकर
६ अक्टूबर २०२०

 

Saturday, 2 October 2021

हम कितने भाग्यशाली हैं कि भगवान स्वयं हमें याद कर रहे हैं ---

 

हम कितने भाग्यशाली हैं कि भगवान स्वयं हमें याद कर रहे हैं ---
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भगवान की प्राप्ति के लिए ऐसी छटपटाहट और पीड़ा होनी चाहिए जैसे किसी ने एक परात में जलते हुए कोयले भर कर सिर पर रख दिए हों, और हमें उस अग्नि की दाहकता से मुक्ति पानी हो| ऐसी भक्ति हमें अनेक जन्मों के पुण्य और परमात्मा की कृपा द्वारा ही प्राप्त हो सकती है| वराह पुराण में भगवान् हरि कहते हैं --
"वातादि दोषेण मद्भक्तों मां न च स्मरेत्।
अहं स्मरामि मद्भक्तं नयामि परमां गतिम्॥"
अर्थात् -- यदि वातादि दोष के कारण मृत्यु के समय मेरा भक्त मेरा स्मरण नहीं कर पाता तो मैं उसका स्मरण कर उसे परम गति प्राप्त करवाता हूँ॥
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अतः भगवान का नाम निरन्तर जपें और सदा प्रसन्न रहें। निश्चय कर संकल्प सहित अपने आप को परमात्मा के हाथों में सौंप दो| जहाँ हम विफल हो जाएँगे, वहाँ वे हाथ थाम लेंगे|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३ अक्टूबर २०१७

असहमति में उठा मेरा हाथ ---

असहमति में उठा मेरा हाथ ---
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मुझे असहमत होने का अधिकार है। कोई व्यक्ति दुनियाँ की निगाह में चाहे कितना भी महान हो, लेकिन मेरे लिए महान वही है जिसने निज जीवन में परोपकार ही परोपकार किये हैं, और परमात्मा को व्यक्त किया है। जिसके जीवन में कोई भी अनुकरणीय आदर्श नहीं है, वह कभी महान नहीं हो सकता, चाहे सारी दुनियाँ उसे महात्मा कहती हो।
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एक अश्वेत युवा लंदन में रहते हुए बिना किसी बाधा के श्वेतों के साथ पढ़ सकते हैं, छात्रावास के एक कमरे में रह सकते हैं, एक भोजनालय में भोजन कर सकते हैं, फिर अचानक ही रेलगाड़ी में एक साथ यात्रा करने पर डिब्बे से बाहर फेंक दिये जाते हैं, -- यह बात पचती नहीं है। वही व्यक्ति बाद में उन्हीं गोरों की सेना में सार्जेंट मेजर बनते हैं, और दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश बोर युद्ध में उन की नियुक्ति एम्बुलेंस यूनिट में होती है। सैनिक वेश में उन का चित्र अंतर्जाल पर उपलब्ध है। आप सार्जेंट मेजर गांधी लिखकर खोज लीजिए।
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सन १९१५ में ४६ वर्ष की आयु में उनका देशप्रेम जागता है और सैनिक पोशाक (मिलिट्री यूनिफार्म) उतारकर उन्हें बैरिस्टर घोषित कर दिया जाता है। फिर उन्हें शांति और अहिंसा का दूत बनाकर दक्षिण अफ्रीका से सीधे चंपारण (बिहार, भारत) में भेज दिया जाता है। वहाँ वे विवशता में आतंकित कर के बलात् नील उगाने को बाध्य किसानों के आंदोलन का अपहरण कर लेते हैं। यानि हिंसक होते आंदोलन को अहिंसा शांति के आंदोलन में परिवर्तित कर देते हैं।
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दिन में आधी धोती लपेट कर शांति-अहिंसा के नाम पर भारतीयों की स्वतन्त्रता के लिये होनेवाले हर उग्र आंदोलन की हवा निकाल कर उसे बिना किसी परिणाम के अचानक समाप्त कर देते हैं, और अंग्रेजों को सुख-शांति से रहने देते हैं। दिन में आधी धोती लपेटे अहिंसा के ये पुजारी रात्रि में निर्वस्त्र होकर अपने साथ अपनी बेटी भतीजी के अलावा अनेक महिलाओं के साथ स्वयं पर परीक्षण करने के लिए सोते हैं। शारीरिक संभोग करने की शक्ति को जाँचने के लिये किये गए दुष्कृत्य को ब्रह्मचर्य का प्रयोग कहते हैं। (यह अपनी पुस्तक "सत्य के साथ मेरे प्रयोग" में उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है।)
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मुझे लगता है ये अंग्रेजों के एजेंट थे। अंग्रेजों की प्रेस और प्रचार ने ही इन्हें महान बनाया। अंग्रेजों ने हरेक क्रांतिकारी की भूमि जब्त कर ली थी, लेकिन इन्हें दक्षिण अफ्रीका में, और भारत में -- (वर्धा, साबरमती और नोआखली में) सैंकड़ों एकड़ भूमि निःशुल्क भेंट में दी। जब ये गिरफ्तार होते थे तब सब तरह से सुख-सुविधापूर्ण भवनों में इनको रखा जाता। रेलगाड़ी में यात्रा करते थे तब पूरा डिब्बा आरक्षित होता था। डिब्बा तो प्रथम श्रेणी का ही होता, लेकिन बाहर तृतीय श्रेणी लिख दिया जाता था। जिस बकरी का ये दूध पीते थे, उसको नित्य एक सेर बादाम खिलाया जाता था। नित्य एक सेर बादाम खिलाई हुई बकरी का दूध इनकी भौतिक सामर्थ्य को बनाए रखता।
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तुर्की के खलीफा अब्दुल मजीद को बापस खलीफा बनाए जाने के लिए इन्होंने खिलाफत आंदोलन आरंभ किया, जिसकी परिणिति मोपलाओं द्वारा केरल में हजारों हिंदुओं की निर्मम हत्या, बलात्कार, और देश के विभाजन के रूप में हुई। देश को बांटने वाला राष्ट्रपिता बन जाता है, और लाखों को मरवा देनेवाला अहिंसा का पुजारी और महात्मा बन जाता है। देश के विभाजन के ये स्वयं दोषी थे, जिसमें लाखों लोगों की हत्या हुई, और करोड़ों लोग विस्थापित हुये। अनशन कर के पाकिस्तान को आपने करोड़ों रुपये दिलवाए, और उसी धन से धनवान बने पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण किया। इनकी धर्म-निरपेक्षता एक ढोंग थी। दिल्ली के मंदिर में कुरान पढ़ने की जिद पूरी करने के लिए ये पुलिस बुला लेते थे, लेकिन कभी मस्जिद में गीता या रामायण पढ़ने की हिम्मत ये नहीं जुटा पाये। पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान जाने के लिए १६ किलोमीटर चौड़े मार्ग को आप बनाना चाहते थे, जिसके दोनों ओर १० कि.मी. तक केवल मुस्लिम ही जमीन खरीद सकते थे। जिद पकड़ कर अनशन कर के आपने देश को ब्लैकमेल ही किया। स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती के हत्यारे को आपने अपना भाई कहा, और उसे बचाया, यह आपका अक्षम्य अपराध था।
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फिर भी मैं आपको श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ, क्योंकि आप ने देश को नेतृत्व दिया। उस जमाने में सब नेताओं को या तो बंदी बना लिया जाता या उनको फांसी दे दी जाती। कैसे भी आपने अंग्रेजों को अपने अनुकूल रखते हुए देश का नेतृत्व संभाला। आपको उसके लिए धन्यवाद॥ यद्यपि आपका नेतृत्व भारत के लिए विनाशकारी था, क्योंकि आपने एक बहुत बड़ी उलझन और भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर दी थी देश में।
आज गांधी-जयंती है। भारत माता की जय॥
२ अक्तूबर २०२१
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पुनश्च: -- आपका नेतृत्व भारत के लिए विनाशकारी था, क्योंकि आपने एक बहुत बड़ी उलझन और भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर दी थी देश में। 

माँ काली ---

माँ काली
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जिस माँ के प्रकाश से समस्त नक्षत्रमंडल और ब्रह्मांड प्रकाशित हैं, उस माँ की महिमा के बारे में इस अकिंचन का कुछ भी लिखना, सूर्य को दीपक दिखाने का प्रयास मात्र सा है, जिसके लिए यह अकिंचन क्षमा याचना करता है| पता नहीं जिनकी देह से समस्त सृष्टि प्रकाशित है, उनका नाम "काली" क्यों रख दिया?
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सृष्टि की रचना के पीछे जो आद्यशक्ति है, जो स्वयं अदृश्य रहकर अपने लीला विलास से समस्त सृष्टि का संचालन करती हैं, समस्त अस्तित्व जो कभी था, है, और आगे भी होगा वह शक्ति माँ काली ही है| सृष्टि, स्थिति और संहार उसकी अभिव्यक्ति मात्र है| यह संहार नकारात्मक नहीं है, यह वैसे ही है जैसे एक बीज स्वयं अपना अस्तित्व खोकर एक वृक्ष को जन्म देता है|
सृष्टि में कुछ भी नष्ट नहीं होता है, मात्र रूपांतरित होता है| यह रूपांतरण ही माँ का विवेक, सौन्दर्य और करुणा है| माँ प्रेम और करुणामयी है|
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माँ के वास्तविक सौन्दर्य को तो गहन ध्यान में तुरीय चेतना में ही अनुभूत किया जा सकता है| उसकी साधना जिस साकार विग्रह रूप में की जाती है वह प्रतीकात्मक ही है|
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माँ के विग्रह में चार हाथ है| अपने दो दायें हाथों में से एक से माँ सृष्टि का निर्माण कर रही है और एक से अपने भक्तों को आशीर्वाद दे रही है| माँ के दो बाएँ हाथों में से एक में कटार है, और एक में कटा हुआ नरमुंड है जो संहार और स्थिति के प्रतीक है| ये प्रकृति के द्वंद्व और द्वैत का बोध कराते हैं|
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माँ के गले में पचास नरमुंडों कि माला है जो वर्णमाला के पचास अक्षर हैं| यह उनके ज्ञान और विवेक के प्रतीक हैं|
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माँ के लहराते हुए काले बाल माया के प्रतीक हैं| माँ के विग्रह में उनकी देह का रंग काला है क्योंकि यह प्रकाशहीन प्रकाश और अन्धकारविहीन अन्धकार का प्रतीक हैं, जो उनका स्वाभाविक काला रंग है| किसी भी रंग का ना होना काला होना है जिसमें कोई विविधता नहीं है|
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माँ की दिगंबरता दशों दिशाओं और अनंतता की प्रतीक है|
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उनकी कमर में मनुष्य के हाथ बंधे हुए हैं वे मनुष्य कि अंतहीन वासनाओं और अंतहीन जन्मों के प्रतीक हैं|
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माँ के तीन आँखें हैं जो सूर्य चन्द्र और अग्नि यानि भूत भविष्य और वर्तमान की प्रतीक हैं|
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माँ के स्तन समस्त सृष्टि का पालन करते हैं|
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उनकी लाल जिह्वा रजोगुण की प्रतीक है जो सफ़ेद दाँतों यानि सतोगुण से नियंत्रित हैं|
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उनकी लीला में एक पैर भगवान शिव के वक्षस्थल को छू रहा है जो दिखाता है कि माँ अपने प्रकृति रूप में स्वतंत्र है पर शिव यानि पुरुष को छूते ही नियंत्रित हो जाती है|
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माँ का रूप डरावना है क्योंकि वह किसी भी बुराई से समझौता नहीं करती, पर उसकी हँसी करुणा की प्रतीक है|
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माँ इतनी करुणामयी है कि उसके प्रेमसिन्धु में मेरी हिमालय सी भूलें भी कंकड़ पत्थर से अधिक नहीं है| माँ से मैंने उनके चरणों में आश्रय माँगा था तो उन्होनें अपने ह्रदय में ही स्थान दे दिया है| माँ कि यह करुणा और अनुकम्पा सब पर बनी रहे|
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जब तक मैं उनकी गोद में हूँ, तब तक ही जीवित हूँ| उनकी गोद से परे जो कुछ भी है वह मृत्यु का द्वार है| माँ, अपनी गोद में ही रखो, मृत्यु के द्वार पर मत जाने दो, अन्य कुछ भी मुझे नहीं चाहिए
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|| ॐ ॐ ॐ ||
२ अक्टूबर २०२०

 

Tuesday, 28 September 2021

अब उनकी ओर निहारें या उनके बारे में लिखें? ---

 

अब उनकी ओर निहारें या उनके बारे में लिखें?
फेसबुक पर जो कुछ जैसा भी मुझे आता-जाता है, वैसे ही लेख लिखता आ रहा हूँ| वही लिखा जिस को लिखने की प्रेरणा मिली| भगवान के प्रेम पर तो लिखना अब अति कठिन है क्योंकि अब उनकी ओर निहारें या उनके बारे में लिखें?
सारी भागदौड़ और दूसरों के पीछे भागना बंद हो गया है| जहाँ भी मैं हूँ, वहीं हर समय भगवान मेरे साथ हैं| जीवन में तृप्ति, संतुष्टि और आनंद है| सभी सत्संगी मित्रों को धन्यवाद, जिनसे मैंने बहुत कुछ सीखा और जिन्होंने मुझे खूब प्रोत्साहन और साथ दिया| समय समय पर फेसबुक पर आता रहूँगा|
"चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ||" "हरिः ॐ तत्सत् !!"
२९ सितंबर २०२०

अर्मेनिया और तुर्की सदा से ही एक दूसरे के कट्टर शत्रु रहे हैं ---

(दिनांक २९ सितंबर २०२० को लिखा लेख)

आज अभी कुछ देर पहिले एक टीवी चैनल पर समाचार देखा कि तुर्की को प्रसन्न करने के लिए पाकिस्तान, आर्मेनिया से लड़ने के लिए अपने सैनिक और जिहादी आतंकियों को अज़रबेजान भेज रहा है| यह समाचार पढ़कर बड़ा अच्छा लगा| यह आज की सबसे अच्छी खबर थी| देखते हैं, पाकिस्तान वहाँ कौन सी तोप चलाता है?
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अर्मेनिया और तुर्की दोनों ही सदा से एक दूसरे के कट्टर शत्रु रहे हैं, वैसे ही जैसे तुर्की और ग्रीस| इसका एकमात्र कारण है अर्मेनिया का कट्टर ईसाई होना, व तुर्की का कट्टर सुन्नी मुसलमान होना| आर्मेनिया की राजधानी येरेवान बहुत प्राचीन नगर है, वेटिकन व रोम से भी अधिक प्राचीन| १६ वी सदी में पूर्वी आर्मेनिया फारस के अधिकार में आ गया था और पश्चिमी भाग तुर्की के अधिकार में| १९ वीं सदी में रूस ने आर्मेनिया को तुर्कों से मुक्त कराया| इस बीच तुर्कों ने लाखों अर्मेनियाई लोगों का नरसंहार किया| आर्मेनिया के कई लाख लोग विश्व के दूसरे भागों में शरणार्थी होकर भाग गए थे| अभी वहाँ की जनसंख्या मुश्किल से ३० लाख से भी कम है, जो सभी कट्टर ईसाई हैं| आर्मेनिया के पूर्व में अजरबेजान है, पश्चिम में तुर्की, उत्तर में रूस, और दक्षिण में ईरान|
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आज़रबेजान अग्निपूजक लोगों का देश था जो अग्नि को देवता मानते थे| वहाँ की खुदाई में हिन्दू देवो-देवताओं की मूर्तियाँ भी निकलती हैं| फारसियों ने वहाँ के अग्निपूजकों को मारकर अधिकांश को मुसलमान बना दिया, व अन्यों को भगा दिया| अब वहाँ ८५% शिया और १५% सुन्नी मुसलमान हैं| वहाँ की कुल जनसंख्या ९९ लाख से भी कम है|
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सोवियत संघ के विघटन तक दोनों देश सोवियत संघ के भाग थे| कोई विवाद नहीं था| स्टालिन के आदेश से नगोरना-काराबाख का ईसाई बहुल क्षेत्र आज़रबेजान को दे दिया गया था| सोवियत संघ के विघटन के बाद नगोरना-काराबाख के ईसाईयों ने विद्रोह कर स्वयं को आर्मेनिया का भाग घोषित कर दिया| यही वहाँ के युद्ध का कारण है| एक बात तो निश्चित है कि रूस कभी भी किसी कीमत पर आर्मेनिया को नहीं हारने देगा|
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तुर्की ने मुस्लिम विश्व का नेता बनने के चक्कर में यह युद्ध आरंभ किया है, जिसमें उसकी पराजय निश्चित है| मुस्लिम देश कभी एक नहीं हो सकते| तुर्क और अरब ... एक-दूसरे की शक्ल भी देखना भी पसंद नहीं करते| शिया और सुन्नियों के बीच में तो एक स्थायी दीवार खिंच गई है| पाकिस्तान अब मुस्लिम विश्व का नेता बनना चाहता है क्योंकि वह स्वयं को अणुबम होने के कारण सबसे अधिक शक्तिशाली मुस्लिम देश मानता है|
२९ सितंबर २०२१

"श्रद्धा" और "व्रत" क्या हैं? ---

 

"श्रद्धा" और "व्रत" क्या हैं?
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जीवन में जैसी हमारी "श्रद्धा" है, वही हम हैं| जैसी हमारी "श्रद्धा" होती हैं वैसे ही हम बन जाते हैं| गीता में भगवान कहते हैं ...
"सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत| श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः||१७:३||"
अर्थात् हे भारत, सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके सत्त्व (स्वभाव, संस्कार) के अनुरूप होती है| यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जिस श्रद्धा वाला है वह स्वयं भी वही है अर्थात् जैसी जिसकी श्रद्धा वैसा ही उसका स्वरूप होता है||
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हमारे ऊपर जैसे संस्कार बार-बार डाले जाते हैं, वैसे ही हम बन जाते हैं| "श्रद्धा" का निर्माण "व्र्त" से होता है| "व्रत" का अर्थ भूखा रहना नहीं है| किसी नियम या विचार का वरण कर के उस पर स्थिर रहने का नाम "व्रत" है| जो हम बनना चाहते हैं, उसके संस्कार डालने पड़ेंगे, बार - बार उसको दोहराना पड़ेगा| यही वास्तविक "श्रद्धा" है और यही वास्तविक "व्रत" है|
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जैसा हम सोचते हैं वैसा ही हम बन जाते हैं| जो भी भाव गहराई से ह्रदय में बैठ जाता है, प्रकृति वैसा ही हमें बना देती है| जो और जैसे भी हम बनना चाहते हैं ह्रदय में गहराई से उसी का चिंतन करते हुए उस पर दृढ़ रहना चाहिए, हम निश्चित रूप से वह ही बन जायेंगे|
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उपास्य यानि परमात्मा के जिन गुणों का हम चिंतन करते हैं वे गुण निश्चित रूप से उपासक में आ जाते हैं| परमात्मा का निरंतर चिंतन करने से निश्चित रूप से हम मानवीय चेतना से मुक्त हो कर परमात्मा से जुड़ जाते हैं| यही अपने सच्चिदानंद स्वरूप में स्थित होना है, यही मुक्ति है| इसी के लिए ध्यान साधना की जाती है|
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ सितंबर २०२०