Saturday, 4 September 2021

जिन लोगों ने देश को लूटकर हजारों करोड़ की संपत्ति बनाई है, वह संपत्ति उन के क्या काम आएगी? ---

 

जिन लोगों ने देश को लूटकर हजारों करोड़ की संपत्ति बनाई है, वह संपत्ति उन के क्या काम आएगी?
मुगल बादशाहों के वंशज अब कपड़ों की सिलाई कर के या सब्जियाँ बेचकर दिल्ली में अपना गुजारा कर रहे हैं| बड़े बड़े नवाबों की सन्तानें पहले तांगा चलाती थीं, अब टेक्सी चला रहे हैं| पूर्व शासकों के परिवारों के सदस्य नरेगा में मजदूरी कर रहे हैं| अनेक समृद्ध लोग आत्महत्या कर के या पागल होकर मर रहे हैं| बड़े बड़े महल और हवेलियाँ खंडहर हो रही हैं, किसी को पता ही नहीं है कि इन के स्वामी कौन थे?
 
किसी भी मंदिर के बाहर भिखारियों की भीड़ देखो| ये भिखारी अपने पूर्व जन्म में बड़े-बड़े सरकारी कर्मचारी और अधिकारी थे| दुनियाँ इनसे डरती थी| इनकी माँगने की आदत नहीं गई तो भगवान ने इनकी ड्यूटि यहाँ लगा दी| अब जो घूसखोर व चोर कर्मचारी हैं, वे भी दर दर भटक कर भीख माँगने की तैयारी कर रहे हैं|
 
यह सदा से होता आया है और सदा होता ही रहेगा|
४ सितंबर २०२१

अपनी पीड़ा और व्यथा किस से कहें? ---

 

अपनी पीड़ा और व्यथा किस से कहें? ---
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🌹🙋‍♂️🌹आप सब निजात्मगण, परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्तियाँ हों| आप सब की कीर्ति, यश और महिमा अमर रहे| परमात्मा की परम कृपा आप सब पर बनी रहे| आप सब की जय हो|
बहुत ही सत्यनिष्ठा से मैंने अपने जीवन का विहंगावलोकन किया तो इस जीवन में कमियाँ ही कमियाँ दिखाई दीं| एक भी कोई अच्छी बात नहीं मिली| अपनी निम्न प्रकृति व अवचेतन को तमोगुण से भरा हुआ पाया| अंधकार ही अंधकार, कहीं कोई प्रकाश नहीं| स्वयं को निरंतर असहाय पाया| पता नहीं, कभी नर्क में भी कहीं स्थान मिलेगा या नहीं, इतनी अधिक कमियाँ स्वयं में पाईं|
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हारे को हरिः नाम !! और करता भी क्या? मेरे एक ही शाश्वत मित्र हैं... भगवान स्वयं, दुःखी होकर उन्हीं को याद किया| वे हर प्रश्न का उत्तर तुरंत दे देते हैं| उन्हीं से उत्तर मिला कि यह सृष्टि, प्रकाश और अंधकार का खेल है, यहाँ पूर्ण प्रकाश भी नहीं हो सकता, और पूर्ण अंधकार भी, अन्यथा यह सृष्टि ही नहीं रहेगी| इस द्वैत से ऊपर उठो जहाँ प्रकाश ही प्रकाश है, अन्य कोई उपाय नहीं है| सारा मार्ग ही प्रशस्त हो उठा, सब कुछ उसी क्षण समझ में आ गया| गीता में वे कहते हैं ...
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे||१८:६५||
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज| अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः||१८:६६||"
"तुम मच्चित, मद्भक्त और मेरे पूजक (मद्याजी) बनो और मुझे नमस्कार करो; (इस प्रकार) तुम मुझे ही प्राप्त होगे; यह मैं तुम्हे सत्य वचन देता हूँ,(क्योंकि) तुम मेरे प्रिय हो||
सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो|"
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हमारा लोभ और अहंकार ही हमें भगवान से दूर करते हैं| चिंता और भय से मुक्त होने के लिए अपनी पीड़ा भगवान को अकेले में कह कर उन्हें ही समर्पित कर दें| दुनिया के आगे रोने से कोई लाभ नहीं है| लोग हमारे सामने तो सहानुभूति दिखाएँगे पर पीठ पीछे हंसी और उपहास उड़ा कर मजा ही लेंगे| परमात्मा में श्रद्धा और विश्वास रखें व सदा उनसे आतंरिक सत्संग करते रहें| संसार में किसी से भी मिलना तो एक नदी-नाव संयोग मात्र है, और कुछ नहीं| सिर्फ परमात्मा का साथ ही शाश्वत है|अपने लोभ और अहंकार को दूर कर उनके शरणागत हों तो वे हमारी रक्षा करते हैं| वाल्मीकि रामायण में वे कहते हैं ...
""सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते| अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम||" (वा रा ६/१८/३३)
अर्थात् जो एक बार भी शरणमें आकर ‘मैं तुम्हारा हूँ’ ऐसा कहकर मेरे से रक्षा की याचना करता है, उसको मैं सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय कर देता हूँ, यह मेरा व्रत है
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ऐसे लोगों से दूर रहे जिन्हें भय और चिंता की आदत है, क्योंकि यह एक संक्रामक मानसिक बीमारी है| सकारात्मक और आध्यात्मिक लोगों का साथ करें, सद्साहित्य का अध्ययन करें, परमात्मा से प्रेम करें और उनका खूब ध्यान करें| हरेक व्यक्ति का अपना अपना प्रारब्ध होता है जिसे उसे भुगतना ही पड़ता है, अतः जो होनी है सो तो होगी ही, उसके बारे में चिंता कर के अकाल मृत्यु को क्यों प्राप्त हों? भगवान कहते हैं ....
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते| तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्||९:२२||"
अर्थात् अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ|
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महाभारत के शांति पर्व में लिखा है ....
एकोऽपि कृष्णस्य कृतः प्रणामो दशाश्वमेधावभृथेन तुल्यः| दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय|| (महाभारत, शान्तिपर्व ४७/९२)
अर्थात् ‘भगवान्‌ श्रीकृष्ण को एक बार भी प्रणाम किया जाय तो वह दस अश्वमेध यज्ञों के अन्त में किये गये स्नान के समान फल देने वाला होता है| इसके सिवाय प्रणाम में एक विशेषता है कि दस अश्वमेध करने वाले का तो पुनः संसार में जन्म होता है, पर श्रीकृष्ण को प्रणाम करने वाला अर्थात्‌ उनकी शरण में जाने वाला फिर संसार-बन्धनमें नहीं आता|'
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दुःखी व्यक्ति को सब ठगने का प्रयास करते हैं| धर्म के नाम पर बहुत अधिक ठगी हो रही है| स्वयं को परमात्मा से जोड़ें, न कि इस नश्वर देह से| समष्टि के कल्याण की ही प्रार्थना करें| समष्टि के कल्याण में ही स्वयं का कल्याण है| बीता हुआ समय स्वप्न है जिसे सोचकर ग्लानि ग्रस्त नहीं होना चाहिए| भगवान की कृपा सब भवरोगों का नाश करती है| अतः उन्हीं का आश्रय लें| अपने जीवन के महत्वपूर्ण रहस्यों को जहाँ तक संभव हो सके, गोपनीय रखना चाहिए| पता नहीं जीवन के किस मोड़ पर, कौन व्यक्ति कब मित्र से शत्रु बन जाये या वह ऐसे लोगों से जा मिले जो हमारे विरोधी हों| अतः अपनी पीड़ा भगवान से ही कहें ताकि कोई चिंता और भय न रहे| वे हमारे सब कष्टों को हरते हैं, उनका नाम ही हरिः है|
"ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने| प्रणत: क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:||"
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
४ सितंबर २०२०

Thursday, 2 September 2021

पूरे भारत की एकमात्र समस्या राष्ट्रीय चरित्र की है, अन्य कोई समस्या नहीं है ---

 

पूरे भारत की सबसे बड़ी और लगभग एकमात्र समस्या राष्ट्रीय चरित्र की है। अन्य कोई समस्या नहीं है। हमारा अब इस समय कोई राष्ट्रीय चरित्र नहीं रह गया है। हमारा राष्ट्रीय चरित्र -- उचित/अनुचित कैसे भी साधन से सिर्फ पैसे बनाना, परनिंदा और दूसरों को नीचा दिखाना ही हो गया है। इसके लिए दूसरों का गला भी काटने को हम तैयार रहते हैं। सारे पारिवारिक संबंध सिर्फ ढोंग मात्र ही रह गए हैं, जिनके पीछे सिर्फ छल-कपट, झूठ और बेईमानी ही दिखाई देती है।
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क्या ऐसी भी कोई विद्या है जिसे जानने के पश्चात अन्य कुछ भी जानने की आवश्यकता नहीं पड़ती? मुंडकोपनिषद के अनुसार एक तो पराविद्या है जो परमात्मा का ज्ञान कराती है। दूसरी अपराविद्या है जो धर्म-अधर्म और कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान कराती है। परमात्मा का साक्षात्कार जिससे होता है, वह पराविद्या है, और लौकिक ज्ञान अपरा विद्या है।
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पूरे भारत में शिक्षा का समान अधिकार, और समान नागरिक संहिता होनी चाहिए। तथाकथित धर्मनिरपेक्षता एक धोखा है। भारत का संविधान हिंदुओं को अपने विद्यालयों में सनातन-धर्म की शिक्षा का अधिकार नहीं देता। इसलिए हिन्दू युवाओं को अपने धर्म का ज्ञान नहीं रहा है। गुरुकुलों की शिक्षा को मान्यता प्राप्त नहीं है। वहाँ से शिक्षित सिर्फ कर्मकांड ही कर सकता है। उसे चपड़ासी की नौकरी भी नहीं मिल सकती। मदरसों व कोन्वेंटों की शिक्षा को मान्यता प्राप्त है। इस्लामी शिक्षा को पढ़ा युवा प्रशासनिक सेवा की परीक्षा दे सकता है, वहीं पर वेद-उपनिषदों को पढ़ा युवा एक क्लर्क की नौकरी के लिए भी आवेदन नहीं कर सकता। समाज का वातावरण ऐसा बन गया है कि हिन्दू धर्म व मान्यताओं को हर कदम पर नीचा दिखाया जाता है।
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ठीक है जो भी जैसा भी है, हम कुछ भी नहीं कर सकते। यह संसार भगवान का बनाया हुआ है। वे जानें और उनका काम जाने। संसार को सुधारना भगवान का काम है, हमारा नहीं। यदि भगवान चाहते हैं कि अधर्म का राज्य हो तो अधर्म का आसुरी राज्य ही होगा। हमारा काम तो भक्ति और समर्पण मात्र ही है, वह भी भगवान की इच्छा पर निर्भर है।
ॐ तत्सत् !!
१ सितंबर २०२१

असत्य का अंधकार दूर होगा ---

 

असत्य का अंधकार दूर होगा, सनातन धर्म विश्वव्यापी होगा; और अपने परम वैभव के साथ भारत - एक अखंड सत्यनिष्ठ आध्यात्मिक राष्ट्र बनेगा। इस कार्य का वर्तमान राजनीति या राजनेताओं से कोई संबंध नहीं है। एक दुर्धर्ष प्रचंड आध्यात्मिक शक्ति इस दिशा में गतिशील व कार्यरत है, जिसे रोकने की क्षमता किसी में नहीं है। यह दृश्य मुझे कई बार दिखाई दिया है, जो निश्चित रूप से फलीभूत होगा। मैं पूर्णतः आश्वस्त हूँ। ॐ ॐ ॐ !!
१ सितंबर २०२१
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पुनश्च :--- इसे आप जो भी समझें, एक भविष्यवाणी भी मान सकते हैं, क्योंकि मेरी श्रद्धा-विश्वास-आस्था कभी गलत नहीं हो सकती।

स्वयं की श्रद्धा ही फलदायी होती है, अन्य कुछ भी नहीं ---

 

स्वयं की श्रद्धा ही फलदायी होती है, अन्य कुछ भी नहीं ---
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जब तक संपूर्ण श्रद्धा नहीं होती तब तक किसी भी विषय में कोई सफलता नहीं मिलती। "श्रद्धा की पूर्णता" ही सिद्धि है। श्रद्धा होने से ही वृत्ति एकाग्र होती है, और उस एकात्रता से ही मनचाहा फल मिलता है। मनुष्य किसी कामना को लेकर इधर-उधर भटकता है -- मज़ारों पर, देवस्थानों पर और फकीरों या साधुओं के पीछे-पीछे, लेकिन वहाँ से उसे कुछ भी नहीं मिलता। लेकिन ज्यों ही उसकी श्रद्धा में पूर्णता आती है उसे अपने अभीष्ट की प्राप्ति हो जाती है। अज्ञानतावश वह सोचता है कि उसकी कामना की पूर्ति फलाँ-फलाँ मजार पर जाने से , किसी फकीर से, या साधु-महात्मा या किसी विशेष देवता की कृपा से हुई है, लेकिन यह असत्य है। उसे जो कुछ भी मिला है, वह स्वयं की श्रद्धा की पूर्णता से ही मिला है।
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रामचरितमानस में संत तुलसीदास जी ने श्रद्धा-विश्वास को ही भवानी-शंकर बताया है --
"भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाःस्वान्तःस्थमीश्वरम्॥"
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गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने श्रद्धा का महत्व बताया है --
"श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥४:३९॥"
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स्वयं की ही श्रद्धा काम आती है, दूसरे की नहीं। कार्यों की असिद्धि --श्रद्धा/निष्ठा की कमी के कारण होती है। श्रद्धा की पूर्णता होने पर ही भगवान की प्राप्ति होती है, अन्यथा कभी नहीं।
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यहाँ एक रहस्य की बात और बताना चाहता हूँ कि गुरुकृपा भी श्रद्धावान को ही प्राप्त होती है, अश्रद्धावान को तो कभी भी नहीं। चेले के पास यदि श्रद्धा नहीं है तो गुरु चाहकर भी चेले का कल्याण नहीं कर सकता। चेला यदि श्रद्धावान है तो बिना मांगे ही गुरु का आशीर्वाद उसे मिल जाता है, और उसका कल्याण हो जाता है।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ सितंबर २०२१

ध्यान साधना ---

ध्यान साधना .....

हमारे जीवन का उद्देश्य ईश्वर की प्राप्ति है, न कि कुछ अन्य। जब हृदय में परमात्मा के प्रति परम-प्रेम (भक्ति) होता है, तब उनका ध्यान करते हैं। ध्यान-साधना भगवान के दो ही रूपों की होती है जो तत्व-रूप में एक ही हैं... शिव और विष्णु। गुरु महाराज के आदेशानुसार ध्यान का आरंभ आज्ञाचक्र से ही होता है। मेरुदंड (कमर) सदा उन्नत (सीधी) रहे, दृष्टि भ्रूमध्य में, और ठुड्डी भूमि के समानान्तर। सबसे अधिक महत्वपूर्ण है ... हमारे आचरण और विचारों की पवित्रता, अन्यथा परिणाम विपरीत ही होता है। जिनके विचारों में पवित्रता नहीं है, उन्हें अगले जन्मों में फिर अवसर मिलेगा। इस जन्म में ध्यान साधना उन के लिए नहीं है, वे बाह्य पूजा-पाठ ही करें और अपने विचारों में पवित्रता लाएँ। जिनके विचार शुद्ध नहीं हैं और आचरण अपवित्र है, ऐसे लोग यदि ध्यान करते हैं तो उनका संपर्क आसुरी जगत से हो जाता है, आसुरी शक्तियाँ उन पर अधिकार कर लेती हैं, और उन्हें असुर यानि राक्षस बना देती हैं।
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हठयोग में कुछ आसन होते हैं जिन के अभ्यास से कमर सदा सीधी रहती है, उन का अभ्यास दिन में दो बार करना चाहिए। इन से जीवन भर कमर झुकेगी नहीं| इसी तरह हठयोग में कुछ विधियाँ हैं जिनके अभ्यास से साँस दोनों नासिकाओं से बराबर चलती है, उनका भी अभ्यास करना चाहिए। ध्यान तभी सिद्ध होगा जब कमर सीधी रहेगी, और साँस दोनों नासिकाओं से चलेगी, अन्यथा ध्यान लगेगा ही नहीं। युवावस्था से ही अभ्यास किया जाये तो खेचरी मुद्रा सिद्ध हो जाती है। जिन्हें खेचरी मुद्रा सिद्ध है वे ध्यान की गहराइयों में जा सकते हैं। एक आयु के पश्चात खेचरी सिद्ध नहीं होती। इसका अभ्यास युवावस्था से ही करना होता है। श्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय द्वारा बताई हुए तालव्य क्रिया, खेचरी सिद्धि के लिए बहुत उपयोगी है।
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शक्ति... स्वयं को प्राण-तत्व के रूप में व्यक्त करती है, और शिव... आकाश-तत्व के रूप में। इन का बोध गुरु-कृपा से ही होता है। इसके लिए अजपा-जप की साधना करनी होती है| अजपा-जप एक वैदिक विधि है जिसके आज के युग में अनेक नाम है। कहीं न कहीं से आरंभ तो करें। आगे का मार्गदर्शन भगवान स्वयं गुरु-रूप में आकर करते हैं।
आप सब महान आत्माओं को नमन ! ॐ तत्सत् !
कृपा शंकर
२ सितंबर २०२०

Tuesday, 31 August 2021

भक्ति और आस्था के संगम --

 

भक्ति और आस्था के संगम --
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(१) राजस्थान के झुंझुनूं जिले के लोहार्गल तीर्थक्षेत्र में प्रति वर्ष गोगा-नवमी से भाद्रपद अमावस्या तक अरावली पर्वत माला की हरी-भरी उपत्यकाओं में वैष्णव खाकी अखाड़े के साधू-संतों के नेतृत्व में ठाकुर जी की पालकी के साथ-साथ निकलने वाली मालकेतु पर्वत (ढाई हजार फीट ऊँचा) की ७ दिवसीय, २४ कोसीय परिक्रमा पिछले वर्ष की भाँति इस वर्ष भी कोरोना महामारी के कारण नहीं निकल रही है।
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मालकेतु पर्वत को साक्षात विष्णु का रूप माना जाता है। इस पर्वत के चारों ओर परिक्रमा पथ पर ७ स्थानों से जलधाराएँ निकलती हैं, जिन के दर्शन, और उन के विशाल कुंडों में स्नान लाखों श्रद्धालु भक्त करते हैं। भगवान विष्णु को इस पर्वत के रूप में पूजा जाता है। परिक्रमा में आगे आगे वैष्णव साधु पालकी में ठाकुर जी को लेकर चलते हैं, और पीछे पीछे भजन-कीर्तन करते हुए उनके लाखों भक्त चलते हैं। यह पूरे राजस्थान में होने वाली सबसे बड़ी परिक्रमा है। इस यात्रा में धरती बिछौना होता है और आसमान छत होती है। भाद्रपद अमावस्या के दिन लोहार्गल में बहुत अधिक श्रद्धालु एकत्र हो जाते हैं, जो सूर्यकुंड में स्नान कर अपने अपने घरों को बापस चले जाते हैं। महाभारत युद्ध के पश्चात् इसी दिन पांडवों ने जब यहाँ सूर्यकुंड में स्नान किया तो भीम की लोहे की गदा गल गयी थी, जिससे इस तीर्थ का नाम लोहार्गल पड़ा। अरावली पर्वत माला की घाटियों में यह यात्रा अति मनोरम होती है। अनेक स्वयंसेवी संस्थाएँ पदयात्रियों की हर सुविधा का ध्यान रखती हैं। वर्षा ऋतु में इस क्षेत्र की अरावली के पहाड़ हरे-भरे हो जाते हैं, लेकिन मार्ग पथरीला और कंटकाकीर्ण रहता है। मालकेत बाबा का मंदिर पहाड़ की थोड़ी ही ऊंचाई पर लोहार्गल तीर्थ में स्थित है।
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(२) भाद्रपद अमावस्या पर झुंझुनूं के विश्व प्रसिद्ध श्रीराणीसती जी मन्दिर सहित जिले के सभी सती मंदिरों की वार्षिक पूजा होती है, जो पिछले वर्ष की भाँति इस वर्ष भी स्थगित है। इन पूजाओं में पूरे विश्व से लाखों श्रद्धालु आते हैं।
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(३) राजस्थान के भादरा तहसील के अंतर्गत आने वाले गांव गोगामेड़ी में रक्षाबंधन के दिन से ही पूरे एक माह तक आयोजित होने वाला मेला भी पिछले वर्ष की भाँति इस वर्ष भी स्थगित है। गोगा-नवमी के दिन तो यह चरम पर होता है। इस मेले में भी लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं।
उपरोक्त तीनों मेले भक्ति और आस्था के संगम होते हैं।
 
३१ अगस्त २०२१