Tuesday, 27 November 2018

हिन्दू राष्ट्र का निर्माण हमारी आध्यात्मिक साधना पर निर्भर है .....

हिन्दू राष्ट्र का निर्माण हमारी आध्यात्मिक साधना पर निर्भर है|

भारतवर्ष का हिन्दू राष्ट्र बनना तो सुनिश्चित है पर इसके लिए शारीरिक और वैचारिक क्षमता के साथ साथ आध्यात्मिक शक्ति का होना भी परमावश्यक है| इसके लिए समाज के सभी घटकों को साधना तो करनी ही होगी| हमारी निष्ठापूर्ण साधना में यदि सत्यता होगी तो परमात्मा हम से हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करवा ही लेंगे| यह कार्य सिर्फ परमात्मा ही कर सकते हैं| वे ही हमें आवश्यक शक्ति और मार्गदर्शन देंगे और यह कार्य निश्चित रूप से होगा| अतः साधना द्वारा परमात्मा की कृपा प्राप्त करें, बाकी काम वे स्वयं ही करेंगे| हिन्दू राष्ट एक विचारपूर्वक किया हुआ संकल्प है|

ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
२५ नबम्बर २०१८

ISKCON (इस्कोन) के पक्ष में .....

ISKCON (इस्कोन) के पक्ष में .....
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मैं सन १९८१ में पहली बार इटली गया था जो कट्टर रोमन कैथोलिक ईसाईयों का देश है| उनके प्रायः हर बड़े नगर में ISKCON द्वारा संचालित FM रेडियो स्टेशन हैं जो दिन में कई बार निश्चित समय पर कृष्ण भजन प्रसारित करते हैं| रोम के वेटिकन में सैंट पीटर्स के बाहर भी मुझे कृष्ण भक्ति का प्रचार करने वाले इस्कोन के सदस्य मिले हैं|
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सन १९८७-८८ की बात है| युक्रेन के ओडेसा नगर में मैं कहीं घूमने गया था| उस समय वहाँ साम्यवादी शासन था और किसी भी धर्म के पालन पर प्रतिबन्ध था| एक पार्क में से महामंत्र (हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे) की आवाज सुनाई दी| वहाँ जा कर देखा तो अनेक युवा लडके-लड़कियाँ साम्यवादी शासन को चुनौती देते हुए बड़े साहस से महामंत्र का जाप कर रहे थे|
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यूरोप के कई नगरों में मुझे इस्कोन के अनुयायी मिले हैं| एक बार मैं कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत के एक नगर में था| एक ईसाई पादरी मेरा अच्छा मित्र बन गया था| मैनें उस से मुझे किसी हिन्दू मंदिर में ले चलने का आग्रह किया| अगले दिन मौसम बड़ा खराब था, बर्फ भी गिर रही थी और कुछ कुछ पानी के छींटे भी पड़ रहे थे| नियत समय पर वह पादरी आया और लगभग एक-डेढ़ घंटे कार चलाकर एक हिन्दू मंदिर में ले गया जो इस्कॉन का था| मंदिर की व्यवस्था देखकर वह पादरी बहुत प्रभावित हुआ| वहाँ के रेस्टोरेंट में मैंने उसे शुद्ध शाकाहारी भोजन खिलाया| कुछ दिनों के बाद उस पादरी की चिट्ठी आई| उसने बताया कि उसे शाकाहारी खाना बहुत अच्छा लगा और दुबारा वह अपनी पत्नी के साथ (प्रोटेस्टेंट पादरी विवाह करते हैं) वहाँ खाना खाने गया और दोनों को ही शाकाहारी खाना इतना अच्छा लगा कि वे शाकाहारी हो गए हैं|
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बहुत पहिले मुझे एक रूसी मित्र ने बताया था कि रूस की सरकार सबसे अधिक हरे-कृष्ण वालों से डरती है| उनको जेल में डालती है तो वहाँ वे लोग छूत की बीमारी की तरह फैलते हैं और वहाँ के सारे कैदी हरे कृष्णा हो जाते हैं|
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मेरा सगा भतीजा जो एक बहुत बड़ा इंजिनियर है, अचानक ही इस्कॉन में साधू बन गया| मैं उस से मिलने गया तो पाया कि उस से वरिष्ठ साधू तो बहुत अधिक उच्च शिक्षा प्राप्त इंजिनियर हैं|
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अपने अनुभवों से मैं ISKCON (इस्कॉन) का समर्थक हूँ, हालांकि मैं उनका भाग नहीं हूँ, मेरी स्वाभाविक रूचि वेदांत दर्शन में है|
सभी को धन्यवाद और नमन !
कृपा शंकर
२४ नवम्बर २०१८

सनातन हिंदुत्व की रक्षा करें .....

इस राष्ट्र की अस्मिता सनातन हिन्दू धर्म है| हिदुत्व ही इस राष्ट्र की पहिचान है|
सनातन हिन्दू धर्म ही भारत है और भारत ही सनातन हिन्दू धर्म है| अनगिनत युगों में मिले संस्कारों से यहाँ की संस्कृति का जन्म हुआ है| इस संस्कृति का आधार ही सनातन धर्म है| यदि यह संस्कृति और धर्म ही नष्ट हो गए तो यह राष्ट्र भी नष्ट हो जाएगा|
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हिंदुत्व क्या है? :----
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सनातन धर्म अपरिभाष्य है| जितना शब्दों में व्यक्त कर सकते हैं उसके अनुसार ...."जीवन में पूर्णता का सतत प्रयास, अपनी श्रेष्ठतम सम्भावनाओं की अभिव्यक्ति, परम तत्व की खोज, दिव्य अहैतुकी परम प्रेम, भक्ति, करुणा और परमात्मा को समर्पण ये सब सनातन हिन्दू धर्म और भारत की ही संस्कृति है|
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हमारे पर आक्रमण कैसे हो रहे हैं? :----
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धर्म-निरपेक्षता, सर्वधर्म समभाव और आधुनिकता आदि आदि नामों से हमारी अस्मिता पर मर्मान्तक प्रहार हो रहे हैं| भारत की शिक्षा और कृषि व्यवस्था को नष्ट कर दिया गया है| झूठा इतिहास पढ़ाया जा रहा है| पशुधन को कत्लखानों में कत्ल कर के विदेशों में भेजा जा रहा है| बाजार में मिलने वाला दूध असली नहीं है| दूध के पाउडर को घोलकर थैलियों में बंद कर असली दूध के नाम से बेचा जा रहा है| संस्कृति के नाम पर फूहड़ नाच गाने परोसे जा रहे हैं| हमारी कोई नाचने गाने वालों की संस्कृति नहीं है| हमारी संस्कृति -- ऋषियों मुनियों, महाप्रतापी धर्म रक्षक वीर राजाओं, ईश्वर के अवतारों, वेद वेदांगों, दर्शनशास्त्रों, धर्मग्रंथों और संस्कृत साहित्य की है| जो कुछ भी भारतीय है उसे हेय दृष्टी से देखा जा रहा है| विदेशी मूल्य थोपे जा रहे हैं| देश को निरंतर खोखला, निर्वीर्य और धर्महीन बनाया जा रहा है|
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हिंदुत्व की विशेषता :-----
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परोपकार, सब के सुखी व निरोगी होने और कल्याण की कामना हिन्दू धर्म व संस्कृति में ही है, अन्यत्र नहीं| अन्य मतावलम्बी सिर्फ अपने मत के अनुयाइयों के कल्याण की ही कामना करते हैं, उससे परे नहीं| औरों के लिए तो उनके मतानुसार अनंत काल तक नर्क की ज्वाला ही है और उनका ईश्वर भी मात्र उनके मतावलंबियों पर ही दयालू है| उनके ईश्वर की परिकल्पना भी एक ऐसे व्यक्ति की है जो अति भयंकर और डरावना है जो उनके मतावलम्बियों को तो सुख ही सुख देगा और दूसरों को अनंत काल तक नर्क की अग्नि में तड़फा कर आनंदित होगा| पर पीड़ा से आनंदित होने वाले ईश्वर से भय करना व अन्य मतावलंबियों को भयभीत और आतंकित करना ही उनकी संस्कृति है|
समुत्कर्ष, अभ्युदय और नि:श्रेयस की भावना ही सनातन हिदू धर्म का आधार हैं| अन्य संस्कृतियाँ इंद्रीय सुख और दूसरों के शोषण की कामना पर ही आधारित हैं|
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इन पंक्तियों के लेखक ने प्रायः पूरे विश्व की यात्राएँ की हैं और वहाँ के जीवन को प्रत्यक्ष देखा है| जो कुछ भी लिख रहा है वह अपने अनुभव से लिख रहा है|
धर्मनिरपेक्षतावादियों, सर्वधर्मसमभाववादियों और अल्पसन्ख्यकवादियों से मैं इतना ही कहना चाहूँगा कि आपकी धर्मनिरपेक्षता, सर्वधर्मसमभाववाद और अल्पसंख्यकवाद तभी तक है जब तक भारत में हिन्दू बहुमत है| हिन्दुओं के अल्पमत में आते ही भारत, भारत ना होकर अखंड पकिस्तान हो जाएगा, और आपका वही हाल होगा जो पाकिस्तान और बंगलादेश के हिन्दुओं का हुआ है| यह अनुसंधान का विषय है कि वहाँ के मन्दिर और वहाँ के हिन्दू कहाँ गए? क्या उनको धरती निगल गई या आसमान खा गया? आपके सारे के सारे उपदेश और सीख क्या हिन्दुओं के लिए ही है? यह भी अनुसंधान का विषय है कि भारत के भी देवालय और मंदिर कहाँ गए? यहाँ की तो संस्कृति ही देवालयों और मंदिरों की संस्कृति थी| सन १९७१ में पाकिस्तानी सेना ने बांग्लादेशी हिन्दुओं को बड़ी हैवानियत के साथ मौत के घाट उतार दिया| तक़रीबन 30 लाख हिन्दुओं को एक महीने में क़त्ल कर दिया| 40 लाख हिन्दू महिलाओं का बलात्कार किया गया| इतना भयावह नरसंहार किया गया जिसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि ५ करोड़ बंगलादेशी हिन्दू अभी तक लापता हैं| सच बात है अगर एक बार मुस्लिम बहुसंख्यक हो गये तो फिर मुस्लिम राष्ट्र बनाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं| तब हिन्दुओं का सामूहिक नर-संहार निश्चित है|
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सनातन धर्म ही भारत का भविष्य है| सनातन धर्म ही भारत की राजनीति हो सकती है| भारत का भविष्य ही विश्व का भविष्य है| भारत की संस्कृति और हिन्दू धर्म का नाश ही विश्व के विनाश का कारण होगा| क्या पता उस विनाश का साक्षी होना ही हमारी नियति हो| जयशंकर प्रसाद जी के शब्दों में --
"हिमगिरी के उत्तुंग शिखर पर,
बैठ शिला की शीतल छाँह|
एक व्यक्ति भीगे नयनों से,
देख रहा था प्रलय अथाह|"
हो सकता है कि उस व्यक्ति की पीड़ा ही हमारी पीड़ा हो, और उसकी नियति ही हमारी नियति हो|
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मेरे ह्रदय की यह पीड़ा समस्त राष्ट्र की पीड़ा है जिसे मैंने व्यक्त किया है| मुझे तो पता है की मुझे क्या करना है, और वह करने का प्रयास कर रहा हूँ| मुझे किसी को और कुछ भी नहीं कहना है| यह मेरे ह्रदय की अभिव्यक्ति मात्र है| किसी से मुझे कुछ भी नहीं लेना देना है| सिर्फ एक प्रार्थना मात्र है आप सब से कि अपने देश भारत के धर्म और संस्कृति की रक्षा करें|
वन्दे मातरम| भारत माता कीजय|
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ॐ सहना भवतु, सहनो भुनक्तु सहवीर्यं करवावहै ।
तेजस्वीनावधीतमस्तु माविद्विषावहै ॥ ॐ शांति:! शांति: !! शांति !!
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वन्दे मातरम्।
सुजलां सुफलां मलय़जशीतलाम्,
शस्यश्यामलां मातरम्। वन्दे मातरम् ।।१।।
शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीम्,
फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुरभाषिणीम्,
सुखदां वरदां मातरम् । वन्दे मातरम् ।।२।।
कोटि-कोटि कण्ठ कल-कल निनाद कराले,
कोटि-कोटि भुजैर्धृत खरकरवाले,
के बॉले माँ तुमि अबले,
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीम्,
रिपुदलवारिणीं मातरम्। वन्दे मातरम् ।।३।।
तुमि विद्या तुमि धर्म,
तुमि हृदि तुमि मर्म,
त्वं हि प्राणाः शरीरे,
बाहुते तुमि माँ शक्ति,
हृदय़े तुमि माँ भक्ति,
तोमारेई प्रतिमा गड़ि मन्दिरे-मन्दिरे। वन्दे मातरम् ।।४।।
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,
कमला कमलदलविहारिणी,
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्,
नमामि कमलां अमलां अतुलाम्,
सुजलां सुफलां मातरम्। वन्दे मातरम् ।।५।।
श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्,
धरणीं भरणीं मातरम्। वन्दे मातरम् ।।६।।

वेदों के चार महावाक्य .....

वेदान्त में वेदों के चार महावाक्यों का बड़ा महत्व है .....
(१) 'प्रज्ञानं ब्रह्म' -------- (ऐतरेय उपनिषद) --------- ऋग्वेद,
(२) 'अहम् ब्रह्मास्मि' --- (बृहदारण्यक उपनिषद) --- यजुर्वेद,
(३) 'तत्वमसि' ---------- (छान्दोग्य उपनिषद्) ------- सामवेद,
(४) 'अयमात्माब्रह्म' ----- (मांडूक्य उपनिषद) --------अथर्व-वेद |
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इन के शाब्दिक अर्थ पर मत जाइए, इनका तात्विक अर्थ परमात्मा की कृपा से ही समझ में आ सकता है| इन महावाक्यों को आधार बना कर हमारे महान ऋषियों ने तपस्या की और महान बने| वे महावाक्य हमारे भी जीवन का आधार बनें| इनके दर्शन ऋषियों को गहन समाधि में हुए| इनकी समाधि भाषा है जिसे कोई श्रौत्रीय ब्रह्मनिष्ठ आचार्य ही समझा सकता है|

साधन चतुष्टय :-----

साधन चतुष्टय :-----
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'ब्रह्मसूत्र शंकरभाष्य' में तथा 'विवेक चूडामणि' ग्रंथ में आचार्य शंकर इन की चर्चा करते हैं| वेदान्त दर्शन में प्रवेश के लिए इन चारों साधनों की योग्यता होनी अनिवार्य है| किसी भी मार्ग के साधक हों, इनकी योग्यता के बिना मार्ग प्रशस्त नहीं होता| ये चारों साधन हैं .....
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(१) नित्यानित्य वस्तु विवेक : --- अर्थात् नित्य एवं अनित्य तत्त्व का विवेक ज्ञान| सबसे पहले साधक अपने से अधिक उन्नत सज्जन पुरुषों व महात्माओं का सत्संग करे| 'बिनु सत्संग विवेक न होई| राम कृपा बिनु सुलभ न सोई||' अर्थात बिना सत्संग के विवेक नही मिलता, प्रभु कृपा के बिना सत्संग नही मिलता| सज्जन पुरुषों का सत्संग करने से पाप नष्ट होता है, कुसंस्कार नष्ट होता है, उत्तम संस्कार प्राप्त होता है, और नित्य-अनित्य का विवेक मिलता है| सत्संग के द्वारा ही विवेक प्राप्त होता है, यह विवेक मनुष्य की पहली योग्यता है|
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(२) इहमुत्रार्थ भोगविराग :--- जागतिक एवं स्वार्गिक दोनों प्रकार के भोग-ऐश्वर्यों से अनासक्ति| जब मनुष्य की विवेक शक्ति पूर्ण रूप से जागृत हो जाती है तब उसे संसार से वैराग्य हो जाता है, और संसार के विषय भोगों की आसक्ति नष्ट हो जाती है, तब मनुष्य संसार के विषय भोगों में लिप्त नही होता, निष्काम भाव से कर्म करता है और कर्म-फल के बंधन से मुक्त हो जाता है| यह वैराग्य मनुष्य की दूसरी योग्यता है|
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(३) शमदमादि षट् साधन सम्पत् :----
शम, दम, श्रद्धा, समाधान, उपरति, तितिक्षा, ये छः साधन हैं| वैराग्य होने के बाद शम, दम, श्रद्धा, समाधान, उपरति और तितिक्षा .... इन छः गुणों का होना बड़ा आवश्यक है| मैं यहाँ विस्तार से संमझा नहीं पाऊंगा| किसी विद्वान् महात्मा से इनको समझ लें|
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(४) मुमुक्षत्व :--–
मोक्षानुभूति की उत्कण्ठ अभिलाषा| ही मुमुक्षत्व है| जब साधक शम दमादि षट सम्पत्तियों के द्वारा जितेंद्रिय हो जाता है, तब मुमुक्षुत्व मिलता है|
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उपरोक्त चारों साधन .... "साधन-चतुष्टय" कहलाते हैं| ये चारों साधन ही साधक को वेदान्त दर्शन का अधिकारी बनाते हैं| इस छोटे से लेख में इनको ठीक से समझा पाना असंभव है| मुमुक्षु को चाहिए कि वह विद्वान् संत-महात्माओं का सत्संग करे और उन से ही इस विषय का ज्ञान प्राप्त करे| सभी को धन्यवाद !
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
२३ नवम्बर २०१८

आध्यात्मिक साधनाओं का आरम्भ .....

आध्यात्मिक साधनाओं का आरम्भ .....
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हे विश्व के अमृत पुत्रो, श्रुति भगवती हमें "शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः" कह कर संबोधित करती है| हम सब परमात्मा के अमृतपुत्र हैं|
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सारी आध्यात्मिक साधनाओं का आरम्भ कृष्ण यजुर्वेद से होता है| तत्पश्चात तो उसका सिर्फ विस्तार ही विस्तार है| कृष्ण यजुर्वेद के श्वेताश्वतरोपनिषद में सनातन हिन्दू धर्म का सारा साधना पक्ष और ज्ञानयोग दिया हुआ है| इस उपनिषद् के छओं अध्यायों में जगत के मूल कारण, ॐकार-साधना, परमात्म-तत्व से साक्षात्कार, ध्यानयोग, प्राणायाम, जगत की उत्पत्ति, जगत के संचालन और विलय का कारण, विद्या-अविद्या, जीव की नाना योनियों से मुक्ति के उपाय, और परमात्मा की सर्वव्यापकता का वर्णन किया गया है| सारी आध्यात्मिक साधनाएँ यहीं से आरम्भ होती हैं| यह उपनिषद् अपने दूसरे अध्याय में हम सब को अमृत पुत्र कहता है| हम सब परमात्मा के अमृतपुत्र हैं|
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स्वयं को पापी कहना सबसे बड़ा पाप है| जो भी शिक्षा हमें जन्म से पापी होना सिखाती है वह वेदविरुद्ध होने के कारण विष के समान त्याज्य है| सिर्फ वेद ही प्रमाण हैं| कोई भी पौराणिक या आगम शास्त्रों की शिक्षा भी यदि वेदविरुद्ध है तो वह त्याज्य है| कुछ मंदिरों में आरती के बाद " पापोऽहं पापकर्माऽहं पापात्मा पापसंभवः" जैसा अभद्र मंत्रपाठ करते हैं, मैं उस पर ध्यान नहीं देता क्योंकि मेरी दृष्टी में यह मन्त्र वेदविरुद्ध है|
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ईसाईयत यानि ईसाई पंथ का मुख्य आधार मूल-पाप यानि Original Sin का सिद्धांत है अतः वह वेदविरुद्ध, अमान्य और त्याज्य है| सारी ईसाईयत Original Sin के सिद्धांत पर खड़ी है जो खोखला और झूठा सिद्धांत है| ईसाई पंथ दो सिद्धांतों पर एक खडा है .... पहला तो है Original Sin, और दूसरा है Resurrection| इनके बिना यह पंथ आधारहीन है| दोनों ही झूठे हैं|
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श्रुति भगवती तो ऋग्वेद में कहती है ..... "अहं इन्द्रो न पराजिग्ये" अर्थात मैं इंद्र हूँ, मेरा पराभव नहीं हो सकता| वेदों के चार महावाक्य हैं ....
(१) प्रज्ञानं ब्रह्म --- (ऐतरेय उपनिषद) --- ऋग्वेद,
(२) अहम् ब्रह्मास्मि --- (बृहदारण्यक उपनिषद) --- यजुर्वेद,
(३) तत्वमसि --- (छान्दोग्य उपनिषद्) --- सामवेद,
(४) अयमात्माब्रह्म --- (मांडूक्य उपनिषद) ---अथर्व-वेद |
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हम महान ऋषियों की संतानें हैं, अतः जिन महावाक्यों को आधार बना कर हमारे हमारे महान ऋषियों ने तपस्या की और महान बने वे महावाक्य हमारे भी जीवन का आधार बनें| इन्हें परमात्मा की कृपा द्वारा ही समझा जा सकता है क्योंकि इनके दर्शन ऋषियों को गहन समाधि में हुए| इनकी समाधि भाषा है| इन्हें कोई श्रौत्रीय ब्रह्मनिष्ठ आचार्य ही समझा सकता है|
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सारे उपनिषद् हमें प्रणव यानि ओंकार पर ध्यान करने का आदेश देते हैं| गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण का भी यही आदेश और उपदेश है| हमारे शास्त्रों में कहीं भी मनुष्य को जन्म से पापी नहीं कहा गया है| अतः हम स्वधर्म पर अडिग रहें और स्वधर्म का पालन करें|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ नवम्बर २०१८

मृत देह का अंतिम संस्कार और आगे के सारे कर्मकांड बहुत अधिक मंहगे होते हैं ....

जब कोई भी प्रारब्धवश या अपना समय आने पर अपनी देह का त्याग करता है, सांसारिक भाषा में कहें तो .... मरता है, तब उसके परिवार जनों को बहुत अधिक कष्ट होता है| मृत देह का अंतिम संस्कार और आगे के सारे कर्मकांड बहुत अधिक मंहगे होते हैं| गरीब लोगों को तो बहुत अधिक कष्ट होता है| वे कहीं से भी रुपया लेकर कर्मकांड करते हैं और कर्ज के नीचे दब जाते हैं| इस का कोई न कोई समाधान तो अवश्य हो सकता ही है| वह क्या हो सकता है इस पर समाज के कर्णधारों को विचार करना चाहिए|
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देहरादून के ब्रह्मलीन स्वामी ज्ञानानंद गिरी महाराज ने मुझे अपने एक गुजराती साधक मित्र के बारे में बताया था जो गुजरात के जूनागढ़ जिले के एक छोटे से गाँव में रहते थे| उन्होंने जब देहत्याग किया तब स्वतः ही उनकी मृत देह बिस्तर पर ही जल कर भस्म हो गयी और राख में परिवर्तित हो गयी| न तो बिस्तर जला और चद्दर पर कोई निशान तक नहीं पड़ा| कहते हैं कि कबीर जब मरे तो उनकी मृत देह फूलों में परिवर्तित हो गयी थी|
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भौतिक विज्ञान में सिद्धांत रूप से यह संभव है यदि हम किसी विद्या से अणुओं की संरचना को परिवर्तित कर सकें| हर पदार्थ अणुओं से बना है, एक पदार्थ की दूसरे पदार्थ से भिन्नता इसी पर निर्भर है कि उस के अणु में कितने इलेक्ट्रान हैं| अंततः अणु भी ऊर्जा से ही निर्मित हैं| इस ऊर्जा के पीछे भी परमात्मा का एक विचार और संकल्प है| परमात्मा के उस विचार यानी संकल्प से जुड़ कर किसी भी भौतिक रचना को परिवर्तित किया जा सकता है| वाराणसी में स्वामी विशुद्धानंद सरस्वती नाम के संत हुए हैं जिनमें यह सिद्धि थी कि वे सूर्य की किरणों से एक पदार्थ को दूसरे पदार्थ में परिवर्तित कर दिया करते थे| वे गंधबाबा के नाम से प्रसिद्ध थे, जिसको भी आशीर्वाद देते उसके हाथों में मनचाहे फूलों की गंध आने लगती थी| परमहंस योगानंद ने अपनी विश्वप्रसिद्ध पुस्तक 'योगी कथामृत' में उनके ऊपर एक पूरा अध्याय ही लिखा है| गंधबाबा के बारे में महामहोपाध्याय पंडित गोपीनाथ कविराज ने, और अँगरेज़ पत्रकार पॉल ब्रंटन ने भी अपनी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक "इन सर्च ऑफ़ सीक्रेट इंडिया" में खूब लिखा है|
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मेरे यह सब लिखने का अभिप्राय यह है कि ऐसी कोई विद्या अवश्य ही होगी जिसका प्रयोग करने पर व्यक्ति अपनी मृत देह के अणुओं की संरचना को विखंडित कर सके ताकि उसके परिवार जनों को कोई आर्थिक कष्ट न हो|
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सभी को धन्यवाद ! ॐ नमो नारायण !
कृपा शंकर
२२ नवम्बर २०१८