Thursday, 1 November 2018

साक्षात परमात्मा के साथ सत्संग :---

साक्षात परमात्मा के साथ सत्संग :---
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(१) जितने समय तक हम परमात्मा का ध्यान करते हैं उतने समय तक हम निश्चित रूप से परमात्मा के साथ एक होते हैं| बाकी समय तो हमें दुनियाँ पकड़ लेती है| ध्यान के समय हम दुनियाँ की पकड़, गृह-नक्षत्रों व युग के प्रभाव, व हर तरह के कुसंग से दूर भगवान के साथ ही होते हैं| अतः भगवान के साथ जितना समय बीत जाय उतना ही अच्छा है| साक्षात परमात्मा के साथ हमारा सत्संग हो, इससे अच्छा और क्या हो सकता है? उस कालखंड में परमात्मा की कृपा से न तो कोई युग हमारा कुछ बिगाड़ सकता है और न कोई गृह-नक्षत्र| उस कालखंड में कोई कामना नहीं होती, हम कामना रहित होते हैं, स्वयं परमात्मा हमारे साथ होते हैं|
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भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि इस से बड़ा कोई अन्य लाभ या कोई अन्य उपलब्धि नहीं है.....

"यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः| यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते||६:२२|"
आत्मप्राप्तिरूप लाभ को पाकर जो उससे अधिक किसी अन्य लाभ को नहीं मानता, कोई दूसरा लाभ है ऐसा स्मरण भी नहीं करता, उस आत्मतत्त्व में स्थित हुआ योगी शस्त्राघात आदि बड़े भारी दुःखों द्वारा भी विचलित नहीं किया जा सकता|
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सारा ब्रह्मांड टूट कर बिखर जाए, सारी सृष्टि नष्ट हो जाए, तो भी कोई हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता, क्योंकि हम सृष्टिकर्ता परमात्मा के साथ एक हैं| भगवान को जिस भी रूप में जैसे भी हम मानते हैं, भगवान उसी रूप में हमारे समक्ष होते हैं| स्वयं भगवान का वचन है .....
"ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्| मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः||४:११||"
जिस प्रकार से जिस प्रयोजन से जिस फलप्राप्ति की इच्छा से भक्त मुझे भजते हैं उनको मैं भी उसी प्रकार भजता हूँ, अर्थात् उनकी कामना के अनुसार ही फल देकर मैं उन पर अनुग्रह करता हूँ|
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एक ही पुरुषमें मुमुक्षुत्व और फलार्थित्व ..... ये दोनों एक साथ नहीं हो सकते| हमें इन से भी परे जाना होगा| परमात्मा के सिवा हमें कुछ भी अन्य नहीं चाहिए| किसी अन्य की स्वप्न में भी कोई कामना न हो| परमात्मा का साथ शाश्वत है| इस जन्म से पूर्व भी वे हमारे साथ एक थे और इस जन्म के बाद भी वे ही हमारे साथ रहेंगे| जो कभी भी हमारा साथ न छोड़े वे ही हमारे शाश्वत मित्र हैं, अतः उनका साथ ही श्रेयस्कर है|
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>>> जो नारकीय जीवन हम इस संसार में जी रहे हैं उस से तो अच्छा है कि भगवान का गहनतम ध्यान करते करते हम इस शरीर महाराज को ही छोड़ दें|<<< पर जब इस शरीर महाराज में परमात्मा ही बिराजमान हो जाएँ तो इस की भी चिंता करने की हमें कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इसकी चिंता वे देहस्थ परमात्मा स्वयं ही करेंगे|
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(२) ध्यान हम कभी भी अकेले नहीं करते, पूरी सृष्टि हमारे साथ ध्यान करती है| हमारे माध्यम से स्वयं परमात्मा ध्यान करते हैं, हम तो परमात्मा को एक अवसर देते हैं हमारे माध्यम से प्रवाहित होने का| ध्यान तो हम करते हैं, पर इस से कल्याण सारी सृष्टि का होता है अतः इस से बड़ी सेवा और इस से बड़ी उपासना अन्य कुछ नहीं है|
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परमात्मा के साथ सत्संग ही सर्वश्रेष्ठ है| इसके लिए किसी के पीछे पीछे भागने की कोई आवश्यकता नहीं है| हम जहाँ हैं, वहीं परमात्मा हैं, वही तीर्थ है और वही सबसे बड़ा धाम है| हमारा सत्संग निरंतर सदा परमात्मा के साथ ही हो|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३० अक्टूबर २०१८

ध्यान किस का होता है ? .....

ध्यान किस का होता है ? .....
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ध्यान उसी का होता है जिस से हमें परमप्रेम होता है| बिना परमप्रेम के कोई ध्यान नहीं होता| इस परमप्रेम को ही भक्ति कहते हैं| अपने विचारों के प्रति सतत् सचेत रहिये| जैसा हम सोचते हैं वैसे ही बन जाते हैं| हमारे विचार ही हमारे "कर्म" हैं, जिनका फल हमें भोगना ही पड़ता है| मन की हर इच्छा, हर कामना एक कर्म या क्रिया है जिसकी प्रतिक्रिया अवश्य होती है| यही कर्मफल का नियम है| अतः हम स्वयं को मुक्त करें ..... सब कामनाओं से, सब संकल्पों से, सब विचारों से, और निरंतर शिव भाव में स्थित रहें| यह शिवभाव भी परमप्रेम का ही एक रूप है जिसमें हम स्वयं ही परमप्रेममय हो प्रेमास्पद के साथ एक हो जाते हैं, कहीं कोई भेद नहीं रहता| यही पराभक्ति है और यही वेदान्त है|
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प्रेमास्पद से पृथकता के भाव का होना ही सारे दुःखों, पीडाओं और कष्टों का कारण है| प्रेम तो हमें उस से हो गया है जिस का कभी जन्म ही नहीं हुआ है, और जिस की कभी मृत्यु भी नहीं होगी| जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु तो अवश्य ही होगी| पर जिसने कभी जन्म ही नहीं लिया, क्या वह मृत्यु को प्राप्त कर सकता है?
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हमारा एक अजन्मा स्वरुप भी है जो अनादि और अनंत है| वह ही हमारा वास्तविक अस्तित्व है| हम यह देह नहीं हैं, प्रभु की अनंतता हैं| उस अनंतता को ही प्रेम करें और उसी का ध्यान करें| यही शिव भाव है| उन सर्वव्यापी भगवान परम शिव में परम प्रेममय हो कर पूर्ण समर्पण करना ही उच्चतम साधना है, यही मुक्ति है, और यही लक्ष्य है| महासागर के जल की एक बूँद क्या महासागर से पृथक है? वह स्वयं भी महासागर ही है|
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निरंतर ब्रह्म चिंतन व स्वाध्याय में चित्त सदा रमा रहे| कूटस्थ में ब्रह्मज्योति निरंतर प्रज्ज्वलित रहे और अक्षर नादब्रह्म में हम लीन हो जाएँ|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ अक्तूबर २०१८

जापान पर भारत का प्रभाव .....

आजकल भारत के प्रधान मंत्री जापान की यात्रा पर हैं जिसका सामरिक और टेक्नोलॉजी की दृष्टी से बहुत अधिक महत्त्व है| जापान की कई यादें मुझे भी आ रही हैं| वहाँ भारतीयों की संख्या खूब अच्छी है| नौकरी करने वाले भारतीय भी वहाँ खूब हैं और भारतीय व्यापारी भी वहाँ खूब हैं| जापान में अनेक स्थानों पर जाने, घूमने-फिरने और अनेक लोगों से मिलने-जुलने का अवसर मुझे कई बार खूब मिला है| एक बार सपत्नीक भी वहाँ जाने का मुझे अवसर मिला था| वहाँ सिर्फ भाषा की ही कठिनाई रही पर इस कारण कभी भी कोई परेशानी नहीं हुई| सारा कामकाज और पढाई-लिखाई उनकी स्वयं की जापानी भाषा में ही होता है| अंग्रेजी सिर्फ उन्हीं को आती है जो इसे एक भाषा के रूप में अपनी इच्छा से सीखते हैं|
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जापान पर सबसे अधिक प्रभाव 'बोधिधर्म' नाम के एक भारतीय बौद्ध भिक्षु का है जो ईसा की छठी शताब्दी में वहाँ महायान बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए गए थे| बोधिधर्म की पद्धति में ध्यान पर विशेष जोर था| संस्कृत का शब्द "ध्यान" अपभ्रंस होकर चीन में "चान" हुआ और जापान में "झेन" (ZEN) हुआ| बोधिधर्म द्वारा फैलाए हुए बौद्धधर्म का जो रूप वहाँ प्रचलित है, उसे झेन (ZEN) कहते हैं| बौद्धधर्म की इस पद्धति में ध्यान साधना का ही विशेष महत्त्व है| यह झेन मत कई शताब्दियों तक जापान का राजधर्म रहा|
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बोधिधर्म का जन्म दक्षिण भारत में पल्लव राज्य के राज परिवार में हुआ था| वे कांचीपुरम के राजा के पुत्र थे, लेकिन छोटी आयु में ही उन्होंने राज्य छोड़ दिया और भिक्षुक बन गए| भारत से समुद्री मार्ग से वे चीन के हुनान प्रान्त में गए और वहाँ के प्रसिद्ध शाओलिन मंदिर में लम्बे समय तक रहे| वहाँ से वे जापान गए| उनके बारे में अनेक कहानियाँ और किस्से प्रसिद्ध हैं जिनकी प्रामाणिकता के बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता| बोधिधर्म के बारे में तो मुझे जो कुछ भी ज्ञात है वह जापान के याकोहामा नगर के सबसे बड़े बौद्ध मठ से प्राप्त परिचयात्मक साहित्य से है|
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जापान में बौद्ध मत चीन के माध्यम से एक भारतीय धर्मप्रचारक बोधिधर्म द्वारा आया| पर चीन में तो बौद्धधर्म सन ००६७ ई.में ही आ गया था| तीन-चार बार चीन जाने का अवसर मुझे मिला है| चीन में सरकारी पर्यटन विभाग द्वारा दी हुई एक पुस्तक में लिखा था कि सन ००६७ ई.में भारत से दो धर्मप्रचारक आये थे जिन्होनें चीन में बौद्ध धर्म फैलाया| उनके नाम भी उस पुस्तक में थे|
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भारत से दक्षिण दिशा की ओर में जो बौद्ध देश हैं उन में हीनयान बौद्धमत, और भारत के उत्तर में स्थित देशों में महायान बौद्धमत प्रचलित है| तिब्बत में महायान बौद्धधर्म का ही रूप बदल कर वज्रयान हो गया| इस विषय पर एक लेख भी कुछ वर्षों पूर्व मैनें लिखा था| कभी अवसर मिला तो हीनयान और महायान आदि के बारे में फिर कभी लिखूंगा| जापान ने इस्लाम को कभी भी अपने देश में नहीं आने दिया| वहाँ के लोग अपने देश और अपनी संस्कृति के प्रति बहुत संवेदनशील हैं|
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सभी को शुभ कामनाएँ और नमन !
कृपा शंकर
२८ अक्टूबर २०१८

Thursday, 25 October 2018

समाजवाद/साम्यवाद/मार्क्सवाद से सावधान ....

समाजवाद/साम्यवाद/मार्क्सवाद से सावधान ....
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मार्क्सवाद/साम्यवाद/समाजवाद .... एक अति कुटिल धूर्ततापूर्ण भ्रामक व्यवस्था है जिसने अपने अनुयायियों को सदा भ्रमित कर धोखा दिया है| जहाँ जहाँ भी यह व्यवस्था प्रभावी रही, अपने पीछे एक विनाशलीला छोड़ गई| यह व्यवस्था जहाँ भी फैली, बन्दूक की नोक पर या छल-कपट से फैली| समाज में व्याप्त अन्याय, अभाव और वर्गसंघर्ष की भावना ही मार्क्सवाद को जन्म देती है| यह एक घोर भौतिक और आध्यात्म विरोधी विचारधारा है| विश्व को इसके अनुभव से निकलना ही था| इस विचारधारा ने अन्याय और अभाव से पीड़ित विश्व में एक समता की आशा जगाई पर कालांतर में सभी को निराश किया|
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१०१ वर्ष पूर्व २५ अक्टूबर १९१७ को वोल्गा नदी में खड़े रूसी युद्धपोत औरोरा से एक सैनिक विद्रोह के रूप में आरम्भ हुई रूस की बोल्शेविक क्रांति विश्व की बहुत बड़ी एक ऐसी घटना थी जिसने पूरे विश्व को प्रभावित किया| इस विचारधारा का उद्गम ब्रिटेन से हुआ पर ब्रिटेन में इसका प्रभाव शून्य था| रूस उस समय एक ऐसा देश था जहाँ विषमता, अन्याय, शोषण और अभावग्रस्तता बहुत अधिक थी| व्लादिमीर इल्यिच उलियानोव लेनिन एक ऊर्जावान और ओजस्वी वक्ता था जिसने रूस में इस विचार को फैलाया| लेनिन का जन्म १० अप्रेल १८७० को सिम्बर्स्क (रूस) में हुआ था| सन १८९१ में इसने क़ानून की पढाई पूरी की| अपने उग्र विचारों के कारण यह रूस से बाहर निर्वासित जीवन जी रहा था| रूसी शासक जार निकोलस रोमानोव ने इसके भाई को मरवा दिया था अतः यह जार के विरुद्ध एक बदले की भावना से भी ग्रस्त था| इसी के प्रयास से (और कुछ पश्चिमी शक्तियों की अप्रत्यक्ष सहायता से) सोवियत सरकार की स्थापना हुई और रूस एक कमजोर देश से विश्व की महाशक्ति बना| मार्क्स के विचारों को मूर्त रूप लेनिन ने ही दिया| मार्क्सवाद की स्थापना के लिए करोड़ों लोगों की हत्याएँ हुईं, बहुत अधिक अन्याय हुआ| पूरे विश्व में यह विचारधारा फ़ैली, कई देशों में मार्क्सवादी सरकारें भी बनीं, पर अंततः यह विचारधारा विफल ही सिद्ध हुई क्योंकि यह घोर भौतिक विचारधारा थी| ७ नवम्बर १९१७ को सोवियत सरकार स्थापित हुई थी अतः विधिवत रूप से ७ नवम्बर को ही बोल्शेविक क्रांति दिवस के रूप में रूस में मनाया जाता था| २१ जनवरी १९२४ को लेनिन की मृत्यु हुई| उसके बाद स्टालिन ने सोवियत संघ पर राज्य किया| स्टालिन रूसी नहीं था, जॉर्जियन था (जॉर्जिया अब रूस से अलग देश है)| निरंकुश निर्दयी तानाशाह स्टालिन को ही द्वितीय विश्वयुद्ध जीतने और मार्क्सवादी विचारधारा को फैलाने का श्रेय जाता है|
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चीन में साम्यवाद माओ के लम्बे अभियान से नहीं बल्कि स्टालिन की रूसी सेना की सहायता से आया| मध्य एशिया, पूर्वी यूरोप, कोरिया, क्यूबा आदि में में सोवियत संघ के सैन्य बल और पैसों के प्रभाव से साम्यवाद आया| भारत में इस आसुरी विचारधारा को ब्रिटेन ने एम.ऐन.राय जैसे विचारकों के माध्यम से निर्यात किया| दुनिया भर के फसादी लोगों को ब्रिटेन अपने यहाँ शरण देता है, और सारे विश्व में झगड़े और फसाद फैलाता है| अभी भी इल्युमिनाती जैसी अति खतरनाक गुप्त संस्थाएँ ब्रिटेन में ही हैं जो अमेरिका और वेटिकन के साथ मिलकर पूरे विश्व पर अपना राज्य स्थापित करना चाहती हैं| मार्क्स और लेनिन की जैसे खुराफाती भी ब्रिटेन द्वारा ही तैयार हुए|
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हम आज जीवित हैं तो भगवान की कृपा से ही जीवित हैं, अन्यथा तो ये जिहादी, क्रूसेडर, नाजी, साम्यवादी जैसे धूर्त कुटिल निर्दयी लोग हमें कभी का मार डालते| मनुष्य की सभी समस्याओं का हल परमात्मा से प्रेम और सनातन धर्म में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ अक्तूबर २०१८

धर्मांतरण करने वाले सैंट व फादरों से सावधान .....

धर्मांतरण करने वाले सैंट व फादरों से सावधान .....
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आजकल हिन्दुओं का धर्मांतरण करने और हिन्दुओं को भ्रमित करने बहुत सारे देशी-विदेशी सैंट लोग (Saint) साधू-संत के वेश में भांड/बहुरुपिये, भारत में घूम रहे हैं, अपने विद्यालय खोल रहे हैं, सेवा के दिखावे कर रहे हैं, व और भी अनेक फर्जी कार्य कर रहे हैं | उनके प्रभाव में न आयें |
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हमारी आस्था को खंडित करने वाला, हमारा धर्मांतरण करने वाला, हमारी जड़ें खोदने वाला, और हमारी अस्मिता पर मर्मान्तक प्रहार करने वाला कोई व्यक्ति कभी संत नहीं हो सकता है | आँख मींच कर किसी को संत ना मानें चाहे सरकार, समाज या दुनिया उसे संत कहती हो| संतों में कुटिलता का अंशमात्र भी नहीं होता ...... संत जैसे भीतर से हैं, वैसे ही बाहर से होते है| उनमें छल-कपट नहीं होता | संत सत्यनिष्ठ होते हैं ...... चाहे निज प्राणों पर संकट आ जाए, संत किसी भी परिस्थिति में झूठ नहीं बोलेंगे | रुपये-पैसे माँगने वे चोर-बदमाशों के पास नहीं जायेंगे| वे पूर्णतः परमात्मा पर निर्भर होते हैं | संत समष्टि के कल्याण की कामना करते हैं, न कि सिर्फ अपने मत के अनुयायियों की | उनमें प्रभु के प्रति अहैतुकी प्रेम लबालब भरा होता है | उनके पास जाते ही कोई भी उस दिव्य प्रेम से भर जाता है |
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२६ अक्तूबर २०१८

साधकों के लिए दीपावली की रात्रि का महत्त्व .....

साधकों के लिए दीपावली की रात्रि का महत्त्व .....
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दीपावली की रात्री को व्यर्थ की गपशप, इधर-उधर घूमने, पटाखे फोड़ने, जूआ खेलने, शराब पीने, अदि में समय नष्ट नहीं करें| सब को पता होना चाहिए कि उस रात्री को समय का कितना बड़ा महत्त्व है| साधना की दृष्टी से चार रात्रियाँ बड़ी महत्वपूर्ण होती हैं ..... (१) कालरात्रि (दीपावली), (२) महारात्रि (शिवरात्रि), (३) दारुण रात्रि (होली), और (४) मोहरात्रि (कृष्ण जन्माष्टमी)| कालरात्रि (दीपावली) का आध्यात्मिक महत्व बहुत अधिक है|
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जो योगमार्ग के साधक हैं, उन्हें इस रात्री को 'परमाकाश' (ब्रह्मरंध्र व सहस्त्रार से बहुत ऊपर उच्चतम अनंत विस्तार) का ध्यान अपनी गुरु परम्परानुसार करना चाहिए| साधक का लक्ष्य कालातीत अवस्था में स्थित होना है| वहाँ श्वेत रंग के परम ज्योतिर्मय पञ्चकोणीय श्वेत नक्षत्र के दर्शन होंगे, वे पंचमुखी महादेव हैं, उन्हीं में दृढ़ता से स्थित होकर उन्हीं का ध्यान करना है| गुरु कृपा से मार्ग दर्शन व सिद्धि निश्चित रूप से प्राप्त होगी| कुछ पढ़ने की इच्छा हो तो अर्थ सहित पुरुष सूक्त व श्री सूक्त का पाठ करना चाहिए| शुद्ध आचार-विचार, ब्रह्मचर्य, नियमित साधना और पराभक्ति (परमात्मा से परम प्रेम) अत्यंत आवश्यक हैं| बिना भक्ति के कोई भी द्वार नहीं खुलता|
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सामान्यतः सभी को अपनी अपनी गुरु परम्परानुसार जप तप व साधना अवश्य करना चाहिए| कुछ समझ में नहीं आये तो राम नाम का खूब जप करें जो बहुत अधिक शक्तिशाली व परम कल्याणकारी है| राम नाम तारक मन्त्र है, जो सर्वसुलभ सर्वदा सब के लिए उपलब्ध है| सभी को शुभ कामनाएँ और नमन!
हरि ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!

कृपा शंकर
२५ अक्टूबर २०१८

शरद पूर्णिमा .....

शरद पूर्णिमा पर आप सब का अभिनंदन ! इस दिन बालक भगवान श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचा था| उस समय उनकी आयु आठ-नौ वर्ष की थी| इस के पश्चात तो अध्ययन के लिए उन्हें गुरुकुल भेज दिया गया था| राजस्थान के कुछ भागों में हनुमान जी के मंदिरों में विशेष आराधना होती है और उत्सव मनाया जाता है|

शरदपूर्णिमा की चांदनी रात में रखी खीर को सुबह भोग लगाने का विशेष रूप से महत्व है| मान्यता है कि शरद पूर्णिमा का चांद सम्पूर्ण १६ कलाओं से युक्त होकर रात भर अमृत की वर्षा करता है| ऐसी भी मान्यता है कि माँ लक्ष्मी इस रात्रि में भ्रमण करती हैं और उन्हें जागरण व आराधना करता हुआ कोई मिलता है तो उस पर कृपा करती हैं|

२४ अक्टूबर २०१८