Thursday, 1 June 2017

लोकतंत्र में नेतृत्व को निर्णय लेने की कितनी स्वतन्त्रता प्राप्त है ? .......

लोकतंत्र में नेतृत्व को निर्णय लेने की कितनी स्वतन्त्रता प्राप्त है ? .......
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लोकतंत्र में एक नेता के लिए स्वतंत्र निर्णय लेना वास्तव में सर्वाधिक कठिन कार्य है| उसे हर समय चिंता रहती ही होगी कि मेरे मतदाता कहीं मेरे विरुद्ध न हो जाएँ और मैं कहीं अगला चुनाव हार न जाऊँ| चाहे वह कितना भी अच्छा काम करे, बुराई तो उसकी होगी ही| अगला चुनाव जीतने के लिए और पिछले चुनाव में हुए खर्चे की पूर्ति के लिए रुपयों की व्यवस्था करने की चिंता भी तो रहती ही होगी| यही सब घोटालों और भ्रष्टाचार की जड़ है|
इसका समाधान क्या हो सकता है ?

साधना में जप यज्ञ .....

साधना में जप यज्ञ .....
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने "यज्ञानां जपयज्ञोsस्मि" कहा है|
अग्नि पुराण के अनुसार ..... जकारो जन्म विच्छेदः पकारः पाप नाशकः। तस्याज्जप इति प्रोक्तो जन्म पाप विनाशकः || इसका अर्थ है .... ‘ज’ अर्थात् जन्म मरण से छुटकारा, ‘प’ अर्थात् पापों का नाश ..... इन दोनों प्रयोजनों को पूरा कराने वाली साधना को ‘जप’ कहते हैं|
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मेरी सोच है कि कोई भी साधना जितने सूक्ष्म स्तर पर होती है वह उतनी ही फलदायी होती है| जितना हम सूक्ष्म में जाते हैं उतना ही समष्टि का कल्याण कर सकते हैं|

पश्यन्ति और परा देवताओं की बोली है| परा में प्रवेश कर के ही हम समष्टि का वास्तविक कल्याण कर सकते हैं| जप के लिये प्रयुक्त की जाने वाली वाणी का स्तर कैसा हो, इसे हर व्यक्ति अपने अपने स्तर पर ही समझ सकता है|
वाणी के चार क्रम हैं ----- परा, पश्यन्ति, मध्यमा और बैखरी|
जिह्वा से होने वाले शब्दोच्चारण को बैखरी वाणी कहते हैं।
उससे पूर्व जो मन में जो भाव आते हैं वह मध्यमा वाणी है|
मन में भाव उत्पन्न हों, उससे पूर्व वे मानस पटल पर दिखाई भी दें वह पश्यन्ति वाणी है|
और उससे भी परे जहाँ से विचार जन्म लेते हैं वह परा वाणी है|
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विचारों का जन्म क्यों व कैसे होता है? क्या विचार हमारे अपने भावों की ही स्थूल अवस्था है? हमारे भाव कैसे व क्यों बनते हैं, इसे समझने का प्रयास कर रहा हूँ| यह बुद्धि से परे का विषय है|
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
०१ जून २०१५

मोदी को देश ने प्रधान मंत्री चुना है कोई जादूगर नहीं ---

मोदी को देश ने प्रधान मंत्री चुना है कोई जादूगर नहीं ---

भारत के लोग बिकी हुई भांड मिडिया के दुष्प्रचार में आकर और ईर्ष्यालु राजनीतिकों के प्रभाव में हर बात पर मोदी को दोष दे रहे हैं| मोदी कोई सर्वव्यापक भगवान या कोई जादूगर नहीं है| पहली बार कोई राष्ट्रवादी प्रधानमन्त्री बना है जो हर दिन १५ घंटों से अधिक राष्ट्रहित में कार्य कर रहा है| उसका कार्य किसी भी अन्य प्रधानमंत्री से श्रेष्ठ रहा है|

मोदी को प्रधानमंत्री बने 1 वर्ष भी नहीं हुआ कि अच्छे दिन का ताना मारने लगे हैं कुछ लोग
अन्य प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल देखो ---
1. जवाहरलाल नेहरु 16 वर्ष 286 दिन
2. इंदिरा गाँधी 15 वर्ष 91 दिन
3. राजीव गाँधी 5 वर्ष 32 दिन
4. मनमोहन सिंह 10 वर्ष 4 दिन

कुल मिला कर 47 वर्ष 48 दिन में अच्छे दिनको ढूंढ नहीं सकते और 1 वर्ष में हीं अच्छे दिन चाहिएँ,
ये कैसा न्याय है??? ये कैसी राष्ट्रभक्ति है????

फल खाना है तो पेड़ बड़ा होने दो|
राम मंदिर न बन पाने के लिए क्या मोदी दोषी है?
यदि हाँ तो सोनिया, राहुल, मायावती, मुलायम, लालू, मायावती या नितीश में से किसी को प्रधानमंत्री बना दो| ये सब पूजा का थाल सजाकर राम जी की पूजा को आतुर बैठे हैं| शासन में आते ही एक दिन में राम मंदिर बना देंगे|
भारतवासियों से विनम्र विनतीहै ---- अगर अच्छे दिन चाहिए तो धैर्य रखें, आपने प्रधानमंत्री चुना है कोई जादूगर नहीं|

अच्छे दिन आ जाये हैं, इसी लिए श्री नरेन्द्र मोदी प्रधान मंत्री बने हैं|
जय भारत ||
June 01, 2015.

पूर्णता कहाँ नहीं है ? .....


पूर्णता कहाँ नहीं है ? ......

सारे पूर्णता ही पूर्णता है| सिर्फ हमारी चेतना और समझ में ही अपूर्णता है| परमात्मा की सृष्टि में कहीं भी अपूर्णता तो हो ही नहीं सकती| भगवान ने हमें अपने निज जीवन को सृजन करने की पूरी छूट दे रखी है, जो हमारी ही सृष्टि है| अपूर्णता है तो वह हमारी स्वयं की सृष्टि में ही है| पूरे जीवन भर हम अपने से बाहर पूर्णता ढूँढते रहते हैं, पर पूर्णता का कहीं आभास तक भी नहीं मिलता| पूर्णता कहीं मिलेगी तो अंतर में ही मिलेगी, ऐसा मुझे लगता है|
इस सृष्टि में कुछ भी निःशुल्क नहीं है, हर चीज की कीमत चुकानी पड़ती है| पूर्णता को प्राप्त करने की कीमत भी चुकानी ही पड़ेगी| मुझे लगता है कि पूर्णता की कीमत है .... भगवान की भक्ति और सम्पूर्ण समर्पण| भगवान की भक्ति और समर्पण में ही पूर्णता है|
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ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पुर्णमुदच्यते पूर्णश्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ ॐ ॐ ॐ ||

Monday, 29 May 2017

"Indian Education Act 1858" द्वारा भारत का विनाश .....

"Indian Education Act  1858" द्वारा भारत का विनाश .....

1858 में Indian Education Act बनाया गया। इसकी ड्राफ्टिंग 'लोर्ड मैकोले' ने की थी। लेकिन उसके पहले उसने यहाँ (भारत) के शिक्षा व्यवस्था का सर्वेक्षण कराया था, उसके पहले भी कई अंग्रेजों ने भारत के शिक्षा व्यवस्था के बारे में अपनी रिपोर्ट दी थी। अंग्रेजों का एक अधिकारी था G.W.Litnar और दूसरा था Thomas Munro, दोनों ने अलग अलग इलाकों का अलग-अलग समय सर्वे किया था। 1823 के आसपास की बात है ये Litnar , जिसने उत्तर भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा है कि यहाँ 97% साक्षरता है और Munro, जिसने दक्षिण भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा कि यहाँ तो 100 % साक्षरता है, और उस समय जब भारत में इतनी साक्षरता है और मैकोले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो इसकी "देशी और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था" को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह "अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था" लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से हिन्दुस्तानी लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे और मैकोले एक मुहावरा इस्तेमाल कर रहा है:
"कि जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी।"
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इसलिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित किया, जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता जो समाज के तरफ से होती थी वो गैरकानूनी हो गयी, फिर संस्कृत को गैरकानूनी घोषित किया और इस देश के गुरुकुलों को घूम घूम कर ख़त्म कर दिया उनमे आग लगा दी, उसमें पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारा-पीटा, जेल में डाला।
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1850 तक इस देश में '7 लाख 32 हजार' गुरुकुल हुआ करते थे और उस समय इस देश में गाँव थे '7 लाख 50 हजार', मतलब हर गाँव में औसतन एक गुरुकुल और ये जो गुरुकुल होते थे वो सब के सब आज की भाषा में 'Higher Learning Institute' हुआ करते थे उन सबमे 18 विषय पढाया जाता था और ये गुरुकुल समाज के लोग मिल के चलाते थे न कि राजा, महाराजा, और इन गुरुकुलों में शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी।
इस तरह से सारे गुरुकुलों को ख़त्म किया गया और फिर अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया और कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे 'फ्री स्कूल' कहा जाता था, इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के ज़माने के यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं और मैकोले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है वो, उसमें वो लिखता है कि:
"इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।"
उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रोब पड़ेगा, अरे हम तो खुद में हीन हो गए हैं जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है, दूसरों पर रोब क्या पड़ेगा।
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लोगों का तर्क है कि अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है, दुनिया में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर ये कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है। शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है। इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे। ईशा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी। अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी, समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी। संयुक्त राष्ट संघ जो अमेरिका में है वहां की भाषा अंग्रेजी नहीं है, वहां का सारा काम फ्रेंच में होता है।
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जो समाज अपनी मातृभाषा से कट जाता है उसका कभी भला नहीं होता और यही मैकोले की रणनीति थी।
- स्व॰ श्री राजीव भाई
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टिप्पणी :- भारत का प्राण भारत की शिक्षा और कृषि व्यवस्था थी| नर-पिशाच अंग्रेजों नें दोनों को ही नष्ट कर दिया| इसीलिए भारत अभी तक उन्नति नहीं कर पाया है|

३० मई २०१३

कश्मीर की समस्या और एक सामान्य नागरिक की सोच ......

कश्मीर की समस्या और एक सामान्य नागरिक की सोच ......
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कुछ दिनों पहिले मैनें दो लेख लिखे थे कि कश्मीर की समस्या राजनीतिक नहीं बल्कि मज़हबी है| इसका समाधान हो सकता है पर चीन, अमेरिका और पश्चिमी देश कभी भी नहीं चाहेंगे कि कश्मीर की समस्या का कोई समाधान हो, क्योंकि इसके पीछे उनके व्यवसायिक और राजनीतिक हित हैं| कश्मीर की समस्या भी वास्तव में नेहरू को मोहरा बनाकर ब्रिटेन और अमेरिका ने ही उत्पन्न की है, ऐसी मेरी सोच है|
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कश्मीर की समस्या ब्रिटेन ने अपने ही ख़ास आदमी हमारे प्रथम प्रधान मंत्री श्री नेहरु जी के माध्यम से उत्पन्न की जिनको उन्होंने सत्ता सौंपी थी| नेहरु जी की कमजोरी एक सुन्दर ब्रिटिश महिला के प्रति थी, और अन्य सुन्दर महिलाओं के प्रति भी जिसका अनुचित लाभ ब्रिटेन ने भरपूर उठाया और सता हस्तांतरण के पश्चात भी भारत में वही हुआ जो ब्रिटेन चाहता था|
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अमेरिका का स्वार्थ यह था की वह पाक अधिकृत कश्मीर के गिलगित में अपना सैनिक अड्डा स्थापित करना चाहता था जहाँ से वह चीन और मध्य एशिया पर दृष्टि रख सके| वह सैनिक अड्डा उसने स्थापित कभी का कर भी लिया है|
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चीन का स्वार्थ एक तो यह था कि कश्मीरी लद्दाख के अक्साई चिन क्षेत्र पर उसका पूर्ण अधिकार हो ताकि सिंकियांग और तिब्बत के मध्य दूरी न रहे| और दूसरा यह कि पाक अधिकृत कश्मीर के माध्यम से पकिस्तान होते हुए वह अरब सागर तक पहुँच सके|
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जब १९४८ में जब भारतीय सेना जीतने लगी तब ब्रिटेन ने नेहरू जी को बहला-फुसला कर मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में भिजवाया और जनमत संग्रह का फैसला करवा दिया| जनमत संग्रह का निर्णय सशर्त था कि पहले पकिस्तान पूरा कश्मीर खाली करेगा, उस पर भारत का अधिकार होगा, और फिर जनमत संग्रह संयुक्त राष्ट्र संघ की निगरानी में होगा| अगर पाकिस्तान पाक अधिकृत कश्मीर खाली करता तो अमेरिका को गिलगिट से अपना सैनिक अड्डा भी हटाना पड़ता जो अमेरिकी हितों के विरुद्ध था| अतः अमेरिका ने सदा पकिस्तान का साथ दिया और भारत को डराने धमकाने के लिए पाकिस्तान का प्रयोग किया| पाकिस्तान ने भारत से जो युद्ध किये हैं वे सब अमेरिका की सहमती और सहायता से ही किये हैं|
नेहरू जी को भारतीय सेना से अधिक अंग्रेजों यानि ब्रिटेन पर भरोसा था, अतः सदा उन्होंने वही किया जो ब्रिटेन चाहता था| अनुच्छेद ३७० को संविधान में जोड़ना भी उनकी एक भयानक गलती थी|
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कश्मीर में अल्पसंख्यक सुविधाएँ सिर्फ मुसलमानों को प्राप्त हैं, हिदुओं को नहीं जो वास्तव में अल्प-संख्यक हैं| कश्मीर को अब छः टुकड़ों में बाँट देना चाहिए ..... (१) जम्मू, (२) लद्दाख, (३) कश्मीर घाटी, (४) कश्मीर घाटी से बाहर का क्षेत्र, (५) पाक अधिकृत कश्मीर और (६) चीन अधिकृत कश्मीर| हिन्दुओं और बौद्धों को अल्प-संख्यक सुविधाएँ दी जाएँ|
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जब तक पकिस्तान और चीन, पाक-अधिकृत कश्मीर को खाली नहीं करते तब तक कश्मीर में जनमत संग्रह नहीं हो सकता| चीन और पाक कभी भी अधिकृत क्षेत्र को खाली नहीं करेंगे|
वैसे जनमत संग्रह हो भी जाए तो वह भारत के ही पक्ष में होगा क्योंकि पूरे कश्मीर में बहुमत शिया मुसलमानों का है जो पाकिस्तान विरोधी हैं| सिर्फ कश्मीर घाटी में ही सुन्नी बहुमत है|
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अब भारत सरकार कानूनी रूप से यह तय करे कि कौन अल्प-संख्यक है और कौन बहु-संख्यक| धारा ३७० समाप्त कर सेवानिवृत सैनिको और अन्य सभी समर्थवान भारतीयों को वहाँ बसाया जाए| कश्मीरी हिन्दुओं को एक सुरक्षित क्षेत्र दिया जाये| कश्मीर को विशेष आर्थिक पैकेज न दिए जाएँ| अपना कमाओ और खाओ| तुष्टिकरण की नीति समाप्त हो| अंततः पकिस्तान को तो तोड़ना ही पड़ेगा जो एक दुष्ट राष्ट्र है|
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मैं कोई विशेषज्ञ नहीं हूँ, एक सामान्य नागरिक हूँ| जैसी मेरी बुद्धि थी और जैसा मुझे समझ में आया वैसा लेख मैनें लिख दिया| बड़े बड़े राजनेता और विशेषज्ञ हैं जो इस मामले को सुलाझायेगे| बाकी जैसी प्रभु की इच्छा|
अब इस विषय पर और कुछ लिखने के लिए मेरे पास नहीं है| आगे और नहीं लिखूंगा|
इति| ॐ ॐ ॐ ||

२९ मई २०१७

मेरे से बाहर कोई समस्या नहीं है, सारी समस्या मैं स्वयं हूँ .....

मेरे से बाहर कोई समस्या नहीं है, सारी समस्या मैं स्वयं हूँ .....
यह समस्या अति विकट है| हे कर्णधार, इस समस्या का हल तुम्ही हो |
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"दीनदयाल सुने जब ते, तब ते मन में कछु ऐसी बसी है |
तेरो कहाये कै जाऊँ कहाँ, अब तेरे ही नाम की फ़ेंट कसी है ||
तेरो ही आसरो एक मलूक, नहीं प्रभु सो कोऊ दूजो जसी है |
ए हो मुरारी ! पुकारि कहूँ, मेरी नहीं, अब तेरी हँसी है ||"
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सभी समस्याएँ प्राणिक (Vital) और मानसिक (Mental) धरातल पर उत्पन्न होती हैं| उन्हें वहीं पर निपटाना होगा| पर वहाँ माया का साम्राज्य इतना प्रबल है जिसे भेदना हमारे लिए बिना हरिकृपा के असम्भव है|
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हमारी एकमात्र समस्या है ..... परमात्मा से पृथकता|
यह बिना शरणागति और समर्पण के दूर नहीं होगी| इस विषय पर बहुत अधिक लिख चुका हूँ, अब और लिखने की ऊर्जा नहीं है| परमात्मा का ध्यान और चिंतन भी सत्संग है| हमें चाहिए सिर्फ सत्संग, सत्संग और सत्संग|
यह निरंतर सत्संग मिल जाए तो सारी समस्याएँ सृष्टिकर्ता परमात्मा की हो जायेंगी|
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हे प्रभु, तुम्हारे चरणों में पूर्ण प्रीति बनी रहे इसके अतिरिक्त अब अन्य कोई इच्छा नहीं है| तुम्हें निवेदन तो कर दिया है पर यह अर्जी भी कभी ना कभी तो स्वीकार करनी ही पड़ेगी| 'आशा' पिशाचिन नहीं पालना चाहता, अतः ना भी करें तो कोई बात नहीं|
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हे प्रभु, आप के भक्तों की आप से कोई पृथकता नहीं हो, आप के वे पूर्ण उपकरण हों, और आपसे पृथक वे अन्य कुछ भी ना हों|
जिस पर भी उन की दृष्टी पड़े वह परम प्रेममय हो निहाल हो जाये| वे जहाँ भी जाएँ वहीं आपके प्रेम की चेतना सब में जागृत हो जाये| आपकी उपस्थिति से जड़ वस्तु भी चैतन्य हो जाये|
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आप के भक्तों में किसी भी तरह का कोई आवेग ..... भूख, प्यास, विषाद, भ्रम, बुढ़ापा और मृत्यु ना हो| वे सब प्रकार की अवस्थाओं ---- जन्म, स्थिति, वृद्धि, परिवर्तन, क्षय और विनाश से परे हों|
हम सब आपके साथ एक हों और आपके पूर्ण पुत्र हों| आपकी जय हो|
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>>>> हम साधना करते हैं, मंत्रजाप करते हैं, पर हमें सिद्धि नहीं मिलती इसका मुख्य कारण है.... असत्यवादन| झूठ बोलने से वाणी दग्ध हो जाती है और किसी भी स्तर पर मन्त्रजाप का फल नहीं मिलता| इस कारण कोई साधना सफल नहीं होती|
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>>>> सत्य और असत्य के अंतर को शास्त्रों में, और विभिन्न मनीषियों ने स्पष्टता से परिभाषित किया है| सत्य बोलो पर अप्रिय सत्य से मौन अच्छा है| प्राणरक्षा और धर्मरक्षा के लिए बोला गया असत्य भी सत्य है, और जिस से किसी की प्राणहानि और धर्म की ग्लानी हो वह सत्य भी असत्य है|

>>>> जिस की हम निंदा करते हैं उसके अवगुण हमारे में भी आ जाते हैं|
जो लोग झूठे होते हैं, चोरी करते हैं, और दुराचारी होते हैं, वे चाहे जितना मंत्रजाप करें, और चाहे जितनी साधना करें उन्हें कभी कोई सिद्धि नहीं मिलेगी|
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ॐ तत्सत् | ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२९ मई 2016