Sunday, 28 May 2017

आनंद की झलक :----

आनंद की झलक :----
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मनुष्य मौज-मस्ती करता है सुख की खोज में| यह सुख की खोज, अचेतन मन में छिपी आनंद की ही चाह है| सांसारिक सुख की खोज कभी संतुष्टि नहीं देती, अपने पीछे एक पीड़ा की लकीर छोड़ जाती है|
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आनंद की अनुभूतियाँ होती हैं सिर्फ ..... परमात्मा के ध्यान में| परमात्मा ही आनंद है, परम प्रेम जिसका द्वार है|
प्राण ऊर्जा का घनीभूत होकर मेरुदंड की सुषुम्ना नाड़ी के छः चक्रों में ऊर्ध्वगमन, कूटस्थ में अप्रतिम ब्रह्मज्योति के दर्शन और ओंकार का नाद, सहस्त्रार में व उससे भी आगे सर्वव्यापी भगवान परमशिव की अनुभूतियाँ जो शाश्वत आनंद देती हैं, वह भौतिक जगत में असम्भव है|
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 एक ध्वनी ऐसी भी है जो किसी शब्द का प्रयोग नहीं करती | उस निःशब्द ध्वनी में तन्मय हो जाना उच्चतम साधनाओं में से एक है | ॐ ॐ ॐ ||

ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

अहंकार यानि ईश्वर से पृथकता मनुष्य की समस्त पीडाओं का एकमात्र कारण है ....

अहंकार यानि ईश्वर से पृथकता मनुष्य की समस्त पीडाओं का एकमात्र कारण है|
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सब दू:खों, कष्टों और पीडाओं का स्थाई समाधान है --- शरणागति, यानि पूर्ण समर्पण|
प्रभु को इतना प्रेम करो, इतना प्रेम करो कि निरंतर उनका ही चिंतन रहे| फिर आपकी समस्त चिंताओं का भार वे स्वयं अपने ऊपर ले लेंगे| जो भगवान का सदैव ध्यान करता है उसका काम स्वयं भगवान ही करते हैं| संसार में सबसे बड़ी और सबसे अच्छी सेवा जो आप किसी के लिए कर सकते हो वह है -- परमात्मा की प्राप्ति|
तब आपका अस्तित्व ही दूसरों के लिए वरदान बन जाता है| तब आप इस धरा को पवित्र करते हैं, पृथ्वी पर चलते फिरते भगवान बन जाते हैं, आपके पितृगण आनंदित होते हैं, देवता नृत्य करते हैं और यह पृथ्वी सनाथ हो जाती है|
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परमात्मा के प्रेम की पूर्ण अभिव्यक्ति हुई है श्रीराधाजी में और श्रीहनुमानजी में अतः ये दोनों हमारे परम आदर्श हैं|
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं....
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥
यह तीनों दिव्य गुणों से युक्त मेरी माया को पार कर पाना असंभव है, परन्तु जो मनुष्य मेरे शरणागत हो जाते हैं, वह मेरी इस माया को आसानी से पार कर जाते हैं।
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मनुष्य जन्म अत्यन्त ही दुर्लभ है, मनुष्य जीवन का केवल एक ही उद्देश्य और एक ही लक्ष्य होता है, वह भगवान की अनन्य-भक्ति प्राप्त करना है। अनन्य-भक्ति को प्राप्त करके मनुष्य सुख और दुखों से मुक्त होकर कभी न समाप्त होने वाले आनन्द को प्राप्त हो जाता है। यहाँ सभी सांसारिक संबंध स्वार्थ से प्रेरित होते हैं। हमारे पास किसी प्रकार की शक्ति है, धन-सम्पदा है, शारीरिक बल है, किसी प्रकार का पद है, बुद्धि की योग्यता है तो उसी को सभी चाहते है न कि हमको चाहते है। हम भी संसार से किसी न किसी प्रकार की विद्या, धन, योग्यता, कला आदि ही चाहते हैं, संसार को नहीं चाहते हैं। इन बातों से सिद्ध होता है संसार में हमारा कोई नहीं है, सभी किसी न किसी स्वार्थ सिद्धि के लिये ही हम से जुड़े हुए है। सभी एक दूसरे से अपना ही मतलब सिद्ध करना चाहते हैं। जीवात्मा रूपी हम, संसार रूपी माया से अपना मतलब सिद्ध करना चाहते हैं और माया रूपी संसार हम से अपना मतलब सिद्ध करना चाहता है। हम माया को ठगने में लगे रहते है और माया हमारे को ठगने में लगी रहती है इस प्रकार दोनों ठग एक दूसरे को ठगते रहते हैं। भ्रम के कारण हम समझते हैं कि हम माया को भोग रहें है जबकि माया जन्म-जन्मान्तर से हमारा भोग कर रही है।
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वास्तव में संसार को हमारे से जो अपेक्षा है, वही संसार हमारे से चाहता है। हमें अपनी शक्ति को पहचान कर संसार से किसी प्रकार की अपेक्षा न रखते हुए अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही संसार की इच्छा को पूरी करनी चाहिए। इस प्रकार से कार्य करने से ही जीवात्मा रूपी हम कर्म बंधन से मुक्त हो सकतें हैं। सामर्थ्य से अधिक सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति करने से हम पुन: कर्म बंधन में बंध जाते हैं। हमें कर्म बंधन से मुक्त होने के लिये ही कर्म करना होता है, कर्म बंधन से मुक्त होना ही मोक्ष है। मनुष्य कर्म बंधन से मुक्त होने पर ही जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर परम-लक्ष्य स्वरूप परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। जब तक संसार को हम अपना समझते रहेंगे और संसार से किसी भी प्रकार की आशा रखेंगे, तब तक परम-लक्ष्य की प्राप्ति असंभव है। जब तक अपना सुख, आदर, सम्मान चाहते रहेंगे तब तक परमात्मा को अपना कभी नहीं समझ सकेंगे। परमात्मा की कितनी भी बातें कर लें, सुन भी लें, पढ़ भी लें लेकिन जब तक सुख की चाहत बनी रहेगी तब तक भगवान में मन नहीं लग पायेगा।
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इसलिये हमें संसार से किसी भी वस्तु को पाने की इच्छा का त्याग कर देना चाहिये और शरीर सहित जो कुछ भी सांसारिक वस्तु हमारे पास है उसे सहज मन-भाव से संसार को ही सोंप देनी चाहिये। हम स्वयं आत्मा स्वरूप परमात्मा के अंश हैं इसलिये स्वयं को सहज मन-भाव से परमात्मा को सोंप चाहिये यानि भगवान के प्रति मन से, वाणी से और कर्म से पूर्ण समर्पण कर देना चाहिये। यही मानव जीवन का एक मात्र उद्देश्य है। यही मनुष्य जीवन का एक मात्र लक्ष्य है। यही मानव जीवन की परमसिद्धि है। यही वास्तविक मुक्ति है। यह मुक्ति शरीर रहते हुए ही प्राप्त होती है।
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साधना, शरणागति और कृपा के साक्षात् स्वरूप हैं महावीर हनुमान। ... ... ... श्री हनुमान जी जब लंका दहन के पश्चात लौटकर आए तो प्रभु श्री राम ने उनसे कहा, ‘‘लंका में तो तुमने बड़े महान कार्य किए।’’ इस पर हनुमान जी प्रभु के चरणों को पकड़ कर बोले, ‘‘लंका तो आपने मुझे बहुत बड़ी शिक्षा लेने के लिए भेजा था।’’ ‘‘देने के लिए या लेने के लिए?’’ प्रभु राम ने पूछा ... हनुमान जी ने कहा, ‘‘महाराज, मैं क्या शिक्षा देता? मैं तो लंका से शिक्षा लेकर आया हूं। प्रभो! जब मैंने इतने बड़े समुद्र को पार कर लिया, तो सोचा कि सीता जी को भी ढूंढ लूंगा, पर ढूंढ नहीं सका। तो इसके द्वारा आपने स्पष्ट बता दिया कि भक्ति तो कृपा के द्वारा ही पाई जाती है और उसके द्वारा पा लिया तो स्पष्ट ही है कि मेरे पुरुषार्थ का कोई अर्थ नहीं। प्रभो! इतना ही नहीं, दूसरा पाठ तब मिला, जब अशोक वाटिका में रावण के आने पर सीता जी व्याकुल हो गईं और शरीर त्याग करने तक के लिए व्याकुल हो गईं। उनकी व्याकुलता को देखकर त्रिजटा नाम की राक्षसी बोली कि आज रात मैंने सपने में देखा कि एक वानर लंका में आया हुआ है। प्रभो यह सुनकर मैं लज्जा के मारे गड़ गया। मैं सोचता था कि भला लंका में संत कहां हैं? पर वहां तो मुझे ऐसे-ऐसे संत मिले, जैसे संसार में अन्यत्र नहीं मिले। उसने स्वप्न में भी सत्य देख लिया और उस राक्षसी ने जब कहा कि वह आया हुआ वानर लंका को जलाएगा, तब तो मैं चकित रह गया परन्तु बाद में जब वह बात सत्य सिद्ध हुई, तब मैंने कहा कि त्रिजटा इतनी महान भक्त है कि जो बात आप ने मुझसे नहीं कही, वह त्रिजटा से कह दी। मुझसे तो आप ने बिल्कुल नहीं कहा था कि लंका को जलाना है, पर आपने त्रिजटा से संदेश भिजवाया। त्रिजटा ने कहा : सपनें बानर लंका जारी,जातुधान सेना सब मारी। तो प्रभु, मेरा यह भ्रम दूर हो गया कि किसी देश विशेष में संत होते हैं, किसी जाति में ही संत होते हैं। हमें लगने लगा कि आप सर्वव्यापी हैं तो आपके संत भी सर्वत्र हैं। कितना बड़ा चमत्कार, त्रिजटा कोई साधारण नहीं थी। भगवान राम के चरणों में उसकी महानतम रति है :
त्रिजटा राम राच्छसी एका।
राम चरन रति निपुन बिबेका।।
‘‘वह रति ऐसी है, जिसकी याचना करते हुए भरत जी कहते हैं-मुझे न धन की इच्छा है, न धर्म की, न काम की और न मोक्ष की। मैं तो बस यही वरदान मांगता हूं कि जन्म-जन्म में मेरा श्रीराम के चरणों में प्रेम बना रहे।
अरथ न धरम न काम रुचि,
गति न चहउं निरबान।
जनम-जनम रति राम पद,
यह बरदान न आन।।
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और राधा जी ने तो सारी सीमाएँ ही पार कर दीं ... ... ... भक्त अज्ञानी नहीं होता, वह भगवान के प्रभाव, गुण, रहस्य को तत्व से जानने वाला होता है। प्रेम के लिए ज्ञान की बड़ी आवश्यकता है। किसी न किसी अंश में जाने बिना उससे प्रेम नहीं हो सकता और प्रेम होने पर ही उसका गुह्तम यथार्थ रहस्य जाना जाता है। भक्त भगवान के गुह्तम रहस्य को जानता है, इसलिए भगवान के प्रति उसका प्रेम उतरोतर बढ़ता ही रहता है। भगवान रससार है। उपनिषद भगवान को ‘रसो वै स:’ कहते है। इस प्रेम में भी द्वैत नहीं भासता! प्रेम की प्रबलता से ही राधा जी कृष्ण बन जाती है और श्री कृष्ण राधा जी। कबीर साहब कहते है –
जब में था तब हरी नहीं, अब हरी हैं मैं नायँ।
प्रेम-गली अति साँकरी, यामे दो न समायँ ।। 
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वस्तुत: ज्ञानी और भक्त की स्थिति में कोई अन्तर नहीं होता भेद इतना ही है, ज्ञानी ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ कहता है और भक्त ‘वासुदेव: सर्वमिति’ अथवा गोसाइजी की भाषा में वह कहता है –
सिय राममय सब जग जानी।
करऊँ प्रनाम जोरि जग पानी। 
वाल्मीकि रामायण में भी भगवान श्रीराम से ऐसी ही बात कही है –
सकृदेव प्रपत्राय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्व भूतेभ्यो ददाम्येतद्वत्व्रतं मम।
जो एक बार भी मेरी शरण होकर यह कह देता है की ‘मै तेरा हुँ, मै उसको सम्पुर्ण भूतो से अभय कर देता हूँ, यह मेरा व्रत है।’ भला ऐसी हालत में भगवान का सच्चा भक्त निर्भय क्यों न होगा? 
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वाल्मीकि रामायण में भी भगवान श्रीराम से ऐसी ही बात कही है –
सकृदेव प्रपत्राय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्व भूतेभ्यो ददाम्येतद्वत्व्रतं मम।
जो एक बार भी मेरी शरण होकर यह कह देता है की ‘मै तेरा हुँ, मै उसको सम्पुर्ण भूतो से अभय कर देता हूँ, यह मेरा व्रत है।’ भला ऐसी हालत में भगवान का सच्चा भक्त निर्भय क्यों न होगा? 
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बार बार बर माँगऊ हरषि देइ श्रीरंग।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सत्संग।
अनपायनी शब्द का अर्थ है- शरणागति!
महान तपस्वी, योगी, देवों के देव भगवान शिव भी झोली फैलाकर मांग रहे हैं, हे मेरे श्रीरंग! अर्थात श्री के साथ रमण करने वाले नारायण, मुझे यह भीख दे दीजिए।
भगवान बोले, क्या दे दूं? तपस्वी बने शिव बोले, आपके चरणों की सदा अनुपायन करता रहूँ। अर्थात आपके चरणों की शरणागति कभी न छूटे। ऐसी ही शरणागति की महिमा है देवता भी इससे अछूते नहीं हैं। फिर मानव जो नरकगामी है, वह इस संसार में, मृत्यु लोक में शरणागति के बिना एक पल भी कैसे जी सकते हैं, यदि हमें सोचना चाहिए, समझना चाहिए।
शरणागत ऐसा शब्द है कि जब आदमी थक जाए तो शरणागति स्वीकार कर ले। उपनिषदों में भगवान को शरणागत वत्सल लिखा गया है। शरणागति वत्सल का स्वभाव है कि वे शरण में आए हुए से उतना ही प्यार करते हैं, उतना ही पालन- पोषण करते हैं, जितना माँ- बाप अपनी संतान से करते हैं। 
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न विद्या येषां श्रीर्न शरणमपीषन्न च गुणाः
परित्यक्ता लोकैरपि वृजिनयुक्ताः श्रुतिजडाः।
शरण्यं यं तेऽपि प्रसृतगुणमाश्रित्य सुजना
विमुक्तास्तं वन्दे यदुपतिमहं कृष्णममलम्।।
‘जिनके पास न विद्या है, न धन है, न कोई सहारा है; जिनमें न कोई गुण है, न वेद-शास्त्रों का ज्ञान है; जिनको संसार के लोगों ने पापी समझकर त्याग दिया है, ऐसे प्राणी भी जिन शरणागतपालक प्रभुकी शरण लेकर संत बन जाते और मुक्त हो जाते हैं, उन विश्वविख्यात गुणोंवाले अमलात्मा यदुनाथ श्रीकृष्णभगवान् को मैं प्रणाम करता हूँ । 



भारतवर्ष ....

भारतवर्ष ........
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सनातन धर्म ही भारतवर्ष है, और भारतवर्ष ही सनातन धर्म है| भारतवर्ष ऊर्ध्वमुखी चेतना के ऐसे लोगों का समूह है जो निरंतर विभा में रत हैं| सनातन धर्म ही भारतवर्ष की राजनीति है|
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मुझे गर्व है ऐसे भारत पर जहाँ गंगा, यमुना, सरस्वती, सिन्धु, गोमती, गोदावरी, नर्मदा, कृष्णा और कावेरी जैसी अनेक पवित्र नदियाँ हैं, जहाँ हिमालय की गुफाएँ हैं और ऐसे महान भक्त, त्यागी-तपस्वी, विरक्त संत हैं जो दिन-रात निरंतर परमात्मा का चिंतन करते हैं|
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यह संत-महात्माओं, त्यागी-तपस्वियों, सिद्ध-योगियों, भक्तों, दानियों और शूरवीरों का देश सदा अज्ञान और अन्धकार में नहीं रह सकता|
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परमात्मा की सबसे अधिक अभिव्यक्ति कहीं हुई है तो बस इसी देश में|
हजारों वर्षों के कालखंड में पिछले एक हज़ार वर्षों का समय अज्ञानान्धकार का था जो व्यतीत हो चुका है| अब आगे आने वाला समय प्रकाश ही प्रकाश का है| भारत का भविष्य सनातन धर्म है और इस पृथ्वी का भविष्य भारतवर्ष है| परमात्मा के प्रति पूर्ण प्रेम की अभिव्यक्ति और पूर्ण समर्पण ही जीवन का ध्येय है|
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एक प्रचंड प्रबल आध्यात्मिक ब्रह्मतेज का प्राकट्य इस राष्ट्र में होने वाला है जो सब तरह की दुर्बलताओं का विनाश कर एक नए भारत को साकार रूप देगा|
भारत माँ अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर विराजमान होगी|
सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा समस्त विश्व में होगी|
इसे कोई नहीं रोक सकता क्योंकि यही ईश्वर की इच्छा है जिसको क्रियान्वित करने के लिए समस्त प्रकृति बाध्य है|
असत्य और अन्धकार की शक्तियों का पूर्ण विनाश निश्चित है|
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ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२४ मई २०१५

अब मेरी कभी भी कोई भी इच्छा नहीं हो .....

 अब मेरी कभी भी कोई भी इच्छा नहीं हो .....
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मैं समान विचार और समान साधना पद्धति के लोगों का एक समूह बनाना चाहता था जो सप्ताह में कम से कम एक दिन एक निश्चित समय और निश्चित स्थान पर आकर मिले और कम से कम दो घंटे तक सामूहिक ध्यान करे जिसमें कुछ समय प्रार्थना, भजन और स्वाध्याय का भी हो|
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पर मैं मेरे इस उद्देश्य में विफल रहा| मैं इस बारे में मैं कोई बहाना नहीं बनाना चाहता| यह मेरे प्रयासों या मेरी क्षमता में कमी और मेरी विफलता ही थी|
बड़े नगरों में तो निष्ठावान साधकों के इस तरह के कई समूह हैं, पर छोटे स्थानों पर यह एक कठिन कार्य है| संभवतः यह मेरी नियती ही थी|
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कुछ साधकों को मैंने तैयार भी किया पर अपने व्यवसाय और नौकरी आदि के लिए वे दूर चले गए|
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एकांतवास, निःसंगत्व, वैराग्य आदि मेरे प्रारब्ध में नहीं थे| मन बड़ा बेचैन और अशांत रहने लगा| फिर एक विचार ने बड़ी शान्ति, स्थिरता और दृढ़ता प्रदान की| वह विचार था कि एकमात्र अस्तित्व परमात्मा का है, अन्य कोई तो है ही नहीं| जल की एक बूँद जैसे महासागर में मिलकर स्वयं महासागर बन जाती है, वैसे ही इस परिछिन्न आत्मा को अपरिछिन्न परमात्मा में समर्पित हो जाना चाहिए|
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यह संसार अपने नियमों से चलता है, न कि मेरी कामनाओं और अपेक्षाओं से| मेरा कुछ कामना करना ही गलत था| मैं कुछ नहीं करता, सब कुछ तो भगवान ही कर रहे हैं| जैसी भी उनकी इच्छा हो वह पूर्ण हो| इस विचार ने ही मुझे जीवित रखा है|
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हे प्रभु, अब मेरी कभी भी कोई भी इच्छा नहीं हो| कभी मेरी कोई इच्छा पूरी भी मत करना| कोई इच्छा जागृत ही न हो|
हे प्रभु, तुम महासागर हो, और मैं जल की एक बूँद हूँ जो तुम्हारे साथ एक है|
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ॐ तत्सत | ॐ ॐ ॐ ||

गायत्री मन्त्र की अनिवार्यता ....

गायत्री मन्त्र की अनिवार्यता ....
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जिन का भी यज्ञोपवीत संस्कार हुआ है उन्हें तो हर परिस्थिती में गायत्री मन्त्र का नियमित जाप करना अनिवार्य है| इसके बिना वह व्यक्ति द्विजत्व से च्युत हो जाता है, उसकी अन्य कोई भी साधना सफल नहीं होती|

कुछ आचार्यों के अनुसार गायत्री मन्त्र की कम से कम दस माला तो नित्य जपनी ही चाहिए| एक माला तो कम से कम किसी भी परिस्थिति में अनिवार्य है|

योग मार्ग के साधक सप्त व्याहृतियों के साथ षटचक्रों में एक गुरु प्रदत्त गुप्त विधि से गायत्री मन्त्र का जप करते हैं जो बड़ी प्रभावी है|

कुछ आचार्यों के अनुसार जिन पुरुषों का यज्ञोपवीत संस्कार हो चुका है उनकी पत्नियाँ भी गायत्री मन्त्र के जाप की अधिकारिणी हैं|

इस विषय पर किसी भी विवाद में न पड़कर अपनी अपनी गुरु परम्परानुसार गायत्री की उपासना करनी चाहिए|

कोई संदेह हो तो किसी ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय आचार्य से मार्गदर्शन लें| पर साधना करें अवश्य| ॐ ॐ ॐ ||

भगवान शिव के माथे पर सदा गंगाजी क्यों विराजमान हैं ----------

भगवान शिव के माथे पर सदा गंगाजी क्यों विराजमान हैं .......
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गंगा का अर्थ है .....ज्ञान | हमारे पंचकोषात्मक (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय) देह के मस्तिष्क में ज्ञान गंगा नित्य विराजमान है| भगवान शिव तो परम चैतन्य के प्रतीक ही नहीं स्वयं परम चैतन्य हैं| समस्त सृष्टि के सर्जन-विसर्जन की क्रिया उनका नृत्य है| परमात्मा की ऊँची से ऊँची विराट से विराट परिकल्पना जो मनुष्य का मस्तिष्क परमात्मा की कृपा से ही कर सकता है वह भगवान शिव का स्वरुप है| उनके माथे पर चन्द्रमा कूटस्थ चैतन्य, गले में सर्प कुण्डलिनी महाशक्ति, उनकी दिगंबरता सर्वव्यापकता, और देह पर भभूत वैराग्य के प्रतीक हैं| ऐसे ही उनके माथे पर गंगा जी समस्त ज्ञान का प्रतीक है जो निरंतर प्रवाहित हो रही है| जिस तरह मनुष्य के मस्तिष्क में ज्ञान और बुद्धिमता का भंडार भरा पड़ा है वैसे ही सर्व व्यापक भगवान शिव के माथे पर सम्यक चैतन्य की आधार माँ गंगाजी नित्य विराजमान हैं|
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भगवान शिव का स्वरुप पूर्णता का प्रतीक है| स्वर्णिम लहराती जटा उनकी व्यापकता की सूचक है जिसमें उन्होंने सारे संसार का भार उठा रखा है| गले में लिपटा सर्प काल स्वरुप है जिस पर वश करने के कारण ही वे मृत्युंजय हैं| यदि वे विष को अपने कंठ में धारण नहीं करते, तो देवताओं को अमृत कभी नहीं मिल पाता| वही अमृत हमें कुम्भ के मेलों में मिल रहा है| सारी सृष्टि के हलाहल का उन्होंने पान कर लिया, पर स्वयं अमृतमय होने के कारण वह हलाहल नीचे नहीं उतर रहा है अतः वे नीलकंठ हैं| त्रिशुल त्रिगुणात्मक शक्तियों और तीन प्रकार के कष्टों के विनाश का सूचक है| व्याघ्र चर्म मन की चंचलता के दमन का सूचक है| नन्दी रुपी धर्म पर भस्म लपेटे हुये पूर्ण निर्लिप्तता के साथ वे सारी सृष्टि में विचरण करते हैं| माँ भगवती पार्वती, गणेश और कार्तिकेय ..... सब की पृथक पृथक उपासना भी महा फलदायी है, पर एक शिव की उपासना में ही सभी का फल मिल जाता है| उनकी महिमा अनंत है|
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ॐ नमः शिवाय ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ मई २०१३

मंदिरों का चढ़ावा सिर्फ उनकी सुव्यवस्था और धर्म-प्रचार में ही खर्च हो ---

मंदिरों का चढ़ावा सिर्फ उनकी सुव्यवस्था और धर्म-प्रचार में ही खर्च हो ---
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प्राचीन काल से ही यह परम्परा थी कि मंदिरों का उपयोग एक साधना स्थल के रूप में ही होता था| मंदिरों की वास्तु शैली और दिनचर्या ऐसी होती थी साधकों की साधना के दिव्य स्पंदन वहाँ सुरक्षित रहते और वहाँ आने वाले श्रद्धालुओं के हृदयों को दिव्य भावों और पवित्रता से भर देते|
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मंदिरों के साथ एक गौशाला, पाठशाला, अन्नक्षेत्र और सदावर्त भी होते थे| मंदिरों का धन सिर्फ वहाँ की सुव्यवस्था और धर्मप्रचार के लिए ही होता था| गौशाला में गौसंवर्धन का कार्य होता| भारत की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित व गायों पर निर्भर थी| पाठशाला में बच्चों को आरम्भिक रूप से लौकिक, नैतिक और धार्मिक शिक्षा दी जाती थी| वहाँ से पढ़े विद्द्यार्थी बड़े चरित्रवान होते थे| अन्नक्षेत्र से ब्रह्मचारी विद्यार्थियों को अन्नदान दिया जाता था| सदावर्त से साधू सन्यासियों को उनकी आवश्यकता के सामान की पूर्ती की जाती थी|
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कालांतर में विदेशी आक्रमणों के कारण यह व्यवस्था नष्ट हो गयी| मंदिर भी वे ही बचे जिन्हें प्रत्यक्ष रूप से हिन्दू शासकों का संरक्षण प्राप्त था| हिन्दू शासकों व हिन्दू सेठ साहूकारों द्वारा संचालित मन्दिर ही सुव्यवस्थित रहे| पर राजा महाराजाओं का राज्य समाप्त होने पर हिन्दू मंदिरों की लूट खसोट आरम्भ हो गयी| अधिकांश मंदिर भारत की धर्मनिरपेक्ष (अधर्मसापेक्ष) सरकार ने अपने अधिकार में कर लिए| उनके धन का दुरुपयोग अपने स्वार्थ के लिए करना शुरू कर दिया|
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इस धर्मनिरपेक्ष सरकार ने किसी दरगाह, मस्जिद या चर्च को अपने अधिकार में नहीं लिया, सिर्फ मंदिरों को ही लिया कयोंकि इसकी योजना धीरे धीरे हिन्दू धर्म को नष्ट करने की थी| बाकि बचे मंदिरों पर जिनकी चली उन्होंने अपना निजी अधिकार कर लिया और घर बना लिए|
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भोले भाले हिन्दू, मंदिरों में रूपया चढाते रहे यही सोचकर कि वे भगवान को चढ़ा रहे हैं, पर आज तक क्या किसी ने भगवान को या किसी देवी-देवता को रुपया उठाते या स्वीकार करते हुए देखा है क्या? उनका क्या उपयोग होता है यह कोई नहीं सोचता| पैसा वहीं चढ़ाना चाहिए जहाँ उसका सदुपयोग होता हो|
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अब समय आ गया है कि हिन्दू मंदिरों को हिन्दू धर्माचार्यों द्वारा निर्मित/संचालित ट्रस्टों को सशर्त सौंप दिया जाए कि वे उनका निर्धारित सदुपयोग ही करेंगे| इस विषय पर सभी हिन्दुओं को विचार करना चाहिए और कुछ निर्णायक कदम उठाने चाहियें| धन्यवाद|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ मई २०१४