Thursday, 4 May 2017

भगवान शिव के शीश पर गंगा क्यों बहती है ? --

भगवान शिव के शीश पर गंगा क्यों बहती है ? ---------
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यह प्रश्न मेरे मस्तिष्क में किशोरावस्था से ही था| मैंने महाभारत की एक उपकथा में भागीरथ और गंगावतरण के बारे में पढ़ा था, तभी से यह उत्सुकता थी| अनेक विद्वानों ने अपने लेखों में इस की अनेक तरह से व्याख्याएँ की हैं पर वे मुझे जँची नहीं| अंततः यह कथा मुझे प्रतीकात्मक ही लगने लगी| पर फिर भी लगता था इसके पीछे कोई ना कोई आध्यात्मिक सत्य अवश्य है|
अब मैं निश्चित तौर से यह कह सकता हूँ कि भगवान शिव भी सत्य है और उनके सिर पर बहने वाली गंगा भी सत्य है| यह बात बौद्धिक रूप से नहीं समझाई जा सकती पर गहन ध्यान में अनुभूत की जा सकती है|
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गहन ध्यान में साधक को अपने शिवस्वरूप यानि शिव तत्व की अनुभूति तब होती है जब गुरु कृपा से उसकी घनीभूत प्राण चेतना (जिसे तन्त्र में कुण्डलिनी कहते हैं) उसे जागृत कर सुषुम्ना मार्ग (मूलाधार से आज्ञा चक्र) को पार कर उत्तरा सुषुम्ना (आज्ञा चक्र से सहस्त्रार) में विचरण करते हुए शनेः शनेः सहस्त्रार से भी परे की अनुभूतियाँ करने लगती है| तब साधक और भी अधिक गहन साधना द्वारा गुरुकृपा से अपनी देह की चेतना से मुक्त होकर समष्टि यानि ईश्वर की सर्वव्यापकता से एकाकार होने लगता है| तब उसे शिव तत्व और ज्ञान रुपी गंगा का प्रत्यक्ष साक्षात्कार होता है| यह सिर्फ गुरु की परम कृपा से ही सम्भव है| ऐसी स्थिति में साधक अपनी थोड़ी बहुत चेतना आज्ञा चक्र में रखता है अन्यथा देह का साथ छूट जाता है|
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गंगा का अर्थ है --- ज्ञान|
हमारे पंचकोषात्मक (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय) देह के मस्तिष्क में ज्ञान गंगा नित्य विराजमान है|
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भगवान शिव तो परम चैतन्य के प्रतीक ही नहीं स्वयं परम चैतन्य हैं| समस्त सृष्टि के उद्भव और संहार यानि सर्जन-विसर्जन की क्रिया उनका नृत्य है| परमात्मा की ऊँची से ऊँची परिकल्पना जो एक विराट से विराट मनुष्य का मस्तिष्क कर सकता है वह भगवान शिव का स्वरुप है| उनके माथे पर चन्द्रमा कूटस्थ चैतन्य, गले में सर्प कुण्डलिनी, उनकी दिगंबरता सर्वव्यापकता, और देह पर भभूत वैराग्य के प्रतीक हैं|
ऐसे ही उनके माथे पर गंगा जी समस्त ज्ञान का प्रतीक है जो निरंतर प्रवाहित हो रही है|
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जिस तरह मनुष्य के मस्तिष्क में ज्ञान और बुद्धिमता का भंडार भरा पड़ा है वैसे ही सर्व व्यापक भगवान शिव के माथे पर समस्त चैतन्य और ज्ञान की आधार माँ गंगाजी नित्य विराजमान हैं|
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ॐ नमः शिवाय | ॐ शिव शिव शिव | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२ मई २०१३

परमात्मा की माया क्या परमात्मा की एक मुस्कान मात्र है? हम अपने परिजनों के असह्य कष्टों के साक्षी होने को बाध्य क्यों हैं?

परमात्मा की माया क्या परमात्मा की एक मुस्कान मात्र है?
हम अपने परिजनों के असह्य कष्टों के साक्षी होने को बाध्य क्यों हैं?
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प्रेम से चिंतन करने पर विचार तो आता है कि परमात्मा की माया उनकी एक मुस्कान मात्र है, पर हम अपने प्रियजनों के कष्टों के साक्षी होने को बाध्य क्यों हैं? इसका भी चिंतन होता है| हम दिन रात एक करके हाडतोड़ परिश्रम करते हैं ताकि हम पर आश्रित परिजन सुखी रहें, पर उन पर आये हुए कष्टों के साक्षी होने को भी बाध्य होते हैं| इसका क्या कारण है? इसका कुछ कुछ आभास होता है|
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संभवतः प्रकृति यह बोध कराना चाहती है कि हम यह देह ही नहीं हैं तब ये परिजन हमारे कैसे हुए? सब के अपने अपने प्रारब्ध हैं, सबका अपना अपना भाग्य है| सभी अपने कर्मों का फल भोगने को जन्म लेते हैं| पूर्व जन्मों के शत्रु और मित्र अगले जन्मों में या तो एक ही परिवार या समाज में जन्म लेते हैं या फिर पुनश्चः आपस में एक दूसरे से मिलते हैं, और पुराना हिसाब किताब चुकाते हैं| यह बात सभी पर लागू होती है| मेरे साथ भी ऐसा ही हो रहा है| मैं भी अपने घर-परिवार के सदस्यों के असह्य कष्टों का साक्षी होने को बाध्य हूँ| पर मैं क्या शिकायत करूँ? ऐसा तो सभी के साथ हो रहा है| किसी का कष्ट कम है, किसी का अधिक, कष्ट तो सब को है|
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जो लोग आध्यात्म मार्ग के पथिक हैं उनको तो ये कष्ट अधिक ही होते हैं|
साधना के मार्ग में भी "विक्षेप" व "आवरण" नाम की राक्षसियाँ, और "राग", "द्वेष" व "अहंकार" नाम के महा असुर, भयावह कष्ट देते हैं| इनसे बचने का प्रयास करते हैं तो ये अपने अनेक भाई-बंधुओं सहित आकर बार बार हमें चारों खाने चित गिरा ही देते हैं| ये कभी नहीं हटेंगे, स्थायी रूप से यहीं रहेंगे| इनके साथ संघर्ष करते है तो ये हमें अपनी बिरादरी में ही मिला लेने का प्रयास करते हैं| परमात्मा को शरणागति द्वारा समर्पित होने का निरंतर प्रयास और प्रभु के प्रति प्रेम, प्रेम, प्रेम और परम प्रेम ही हमारी रक्षा कर सकता है, अन्य कोई उपाय नहीं है |
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ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ ||

रामनाम मणि दीप धरु, जीह देहरी द्वार .....

" रामनाम मणि दीप धरु, जीह देहरी द्वार| तुलसी भीतर बाहिरऊ, जो चाहसि उजियार ||"
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यहाँ संत तुलसीदास जी ने बहुत ही सुन्दर बात कही है कि देह रूपी मंदिर के द्वार की देहरी पर रामनाम रुपी दीपक को जला देने से बाहर और भीतर चारों और उजियाला छा जाएगा| पर राम नाम रूपी दीपक को कब प्रज्जवलित किया जाए?
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कबीरदास जी ने कहा है --
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब| पल में परलय होएगी, बहुरी करोगे कब||"
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इस बारे में योगवाशिष्ठ का आदेश है .....
"अद्यैव कुरु यच्छ्रेयो वृद्ध: सन किम् करिष्यसि| स्वगात्राण्यपि भाराय भवन्ति ही विपर्यये||"
अर्थात जो श्रेय कर्म है उसे आज से ही नहीं बल्कि अभी से ही करना आरम्भ करो| बुढ़ापे में भला कितना काम पूरा कर सकोगे? उस समय तो अपना शरीर ही तुम्हे भारी बोझा सा लगेगा तब तुम श्रेय साधना का अभ्यास करने के अनुपयुक्त हो जाओगे|
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मनुष्य कुछ दशाब्दियों के लिए यह देह धारण करता है| अनंत जीवन में इन दशाब्दियों का क्या महत्व है? जीवन बहुत छोटा है अतः कैसे इस का सदुपयोग किया जाए इस पर विचार करें|
कुछ लोग कहते हैं कि जब हाथ पैर काम करना बंद कर देंगे तब भगवान का नाम लेंगे| तब वे क्या सचमुच ऐसा कर पायेंगे? इस पर विचार करें|
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वर्षों पूर्व मैं एक बार मॉरिशस गया था| वहाँ अधिकाँश लोगों को भोजपुरी बोलते देखकर आश्चर्य हुआ| एक गाँव में अनेक लोग मेरे से मिलने आये| उन्होंने अपने पूर्वजों के बारे में बताया कि कैसे अँगरेज़ लोग धोखे से गिरमिटिया मजदूर बना कर उन्हें यहाँ ले आये और बापस जाने के सब मार्ग बंद कर दिए| सिर्फ राम नाम के भरोसे उन्होंने हाड-तोड़ मेहनत की और इस पथरीली धरा को कृषियोग्य और स्वर्ग बना दिया| उनका एकमात्र आश्रय राम का नाम ही था और वही उनका मनोरंजन था| यही हाल फिजी और वेस्ट इंडीज़ में गए भारतीयों का हुआ| राम का नाम सबसे बड़ा सहारा है|
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कृपाशंकर
१ मई २०१३


अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती की हार्दिक शुभ कामनाएँ

अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती की हार्दिक शुभ कामनाएँ .....
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हमारे पुण्य अक्षय हों. हमारा राष्ट्र परम वैभव को प्राप्त हो. हमारे राष्ट्र को सदा सही नेतृत्व मिले और कायरता का कोई अवशेष हम में न रहे. हम सब के जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो. ॐ ॐ ॐ ||
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आज की जैसी परिस्थितियाँ हैं और वातावरण है उसमें हमें परशुराम जैसे अनेक व्यक्तित्वों की आवश्यकता है जो अधर्म का नाश कर धर्म की पुनर्स्थापना कर सके| हमें परशुराम की प्रतीक्षा है|
पत्थर सी हों मांसपेशियाँ, लौहदंड भुजबल अभय;
नस-नस में हो लहर आग की, तभी जवानी पाती जय।
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श्री रामधारी सिंह दिनकर जी की "परशुराम की प्रतीक्षा" नामक कविता का एक अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ जो उन्होंने भारत पर चीनी आक्रमण और भारत की पराजय के उपरांत भारतीयों में पुनः उत्साह और जोश भरने के लिए लिखी थी|
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"जब परशुराम पर मातृ-हत्या का पाप चढ़ा, वे उससे मुक्ति पाने को सभी तीर्थों में फिरे, किन्तु, कहीं भी परशु पर से उनकी वज्रमूठ नहीं खुली यानी उनके मन में से पाप का भान नहीं दूर हुआ। तब पिता ने उनसे कहा कि कैलास के समीप जो ब्रह्मकुण्ड है, उसमें स्नान करने से यह पाप छूट जायगा। निदान, परशुराम हिमालय पर चढ़कर कैलास पहुँचे और ब्रह्मकुण्ड में उन्होंने स्नान किया। ब्रह्मकुण्ड में डुबकी लगाते ही परशु उनके हाश से छूट कर गिर गया अर्थात् उनका मन पाप-मुक्त हो गया।
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तीर्थ को इतना जाग्रत देखकर परशुराम के मन में यह भाव जगा कि इस कुण्ड के पवित्र जल को पृथ्वी पर उतार देना चाहिए। अतएव, उन्होंने पर्वत काट कर कुण्ड से एक धारा निकाली, जिसका नाम, ब्रह्मकुण्ड से निकलने के कारण, ब्रह्मपुत्र हुआ। ब्रह्मकुण्ड का एक नाम लोहित-कुण्ड भी मिलता है। एक जगह यह भी लिखा है कि ब्रह्मपुत्र की धारा परशुराम ने ब्रह्मकुण्ड से ही निकाली थी, किन्तु, आगे चलकर वह धारा लोहित-कुण्ड नामक एक अन्य कुण्ड में समा गयी। परशुराम ने उस कुण्ड से भी धारा को आगे निकाला, इसलिए, ब्रह्मपुत्र का एक नाम लोहित भी मिलता है। स्वयं कालिदास ने ब्रह्मपुत्र को लोहित नाम से ही अभिहित किया है। और जहाँ ब्रह्मपुत्र नदी पर्वत से पृथ्वी पर अवतीर्ण होती है, वहाँ आज भी परशुराम-कुण्ड मौजूद है, जो हिन्दुओं को परम पवित्र तीर्थ माना जाता है।
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लोहित में गिर कर जब परशुराम का कुठार-पाप-मुक्त हो गया, तब उस कुठार से उन्होंने एक सौ वर्ष तक लड़ाइयाँ लड़ीं और समन्तपंचक में पाँच शोणित-ह्रद बना कर उन्होंने पितरों का तर्पण किया। जब उनका प्रतिशोध शान्त हो गया, उन्होंने कोंकण के पास पहुँच कर अपना कुठार समुद्र में फेंक दिया और वे नवनिर्माण में प्रवृत्त हो गये। भारत का वह भाग, जो अब कोंकण और केरल कहलाता है, भगवान् परशुराम का ही बसाया हुआ है।
लोहित भारतवर्ष का बड़ा ही पवित्र भाग है। पुरा काल में वहाँ परशुराम का पाप-मोचन हुआ था। आज एक बार फिर लोहित में ही भारतवर्ष का पाप छूटा है। इसीलिए, भविष्य मुझे आशा से पूर्ण दिखाई देता है।"
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परशुराम की प्रतीक्षा (शक्ति और कर्तव्य)
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जो सत्य जान कर भी न सत्य कहता है,
या किसी लोभ के विवश मूक रहता है,
उस कुटिल राजतन्त्री कदर्य को धिक् है,
यह मूक सत्यहन्ता कम नहीं वधिक है।
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चोरों के हैं जो हितू, ठगों के बल हैं,
जिनके प्रताप से पलते पाप सकल हैं,
जो छल-प्रपंच, सब को प्रश्रय देते हैं,
या चाटुकार जन से सेवा लेते हैं;
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यह पाप उन्हीं का हमको मार गया है,
भारत अपने घर में ही हार गया है।
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है कौन यहाँ, कारण जो नहीं विपद् का ?
किस पर जिम्मा है नहीं हमारे वध का ?
जो चरम पाप है, हमें उसी की लत है,
दैहिक बल को रहता यह देश ग़लत है।
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नेता निमग्न दिन-रात शान्ति-चिन्तन में,
कवि-कलाकार ऊपर उड़ रहे गगन में।
यज्ञाग्नि हिन्द में समिध नहीं पाती है,
पौरुष की ज्वाला रोज बुझी जाती है।
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ओ बदनसीब अन्धो ! कमजोर अभागो ?
अब भी तो खोलो नयन, नींद से जागो।
वह अघी, बाहुबल का जो अपलापी है,
जिसकी ज्वाला बुझ गयी, वही पापी है।
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जब तक प्रसन्न यह अनल, सुगुण हँसते है;
है जहाँ खड्ग, सब पुण्य वहीं बसते हैं।
वीरता जहाँ पर नहीं, पुण्य का क्षय है,
वीरता जहाँ पर नहीं, स्वार्थ की जय है।
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तलवार पुण्य की सखी‚ धर्मपालक है‚
लालच पर अंकुश कठिन‚ लोभ–सालक है।
असि छोड़‚ भीरु बन जहां धर्म सोता है‚
पातक प्रचंडतम वहीं प्रगट होता है।
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तलवारें सोतीं जहां बंद म्यानों में‚
किस्मतें वहां सड़ती हैं तहखानों में।
बलिवेदी पर बालियें–नथें चढ़ती हैं‚
सोने की ईंटें‚ मगर‚ नहीं कढ़ती हैं।
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पूछो कुबेर से कब सुवर्ण वे देंगे?
यदि आज नहीं तो सुयश और कब लेंगे?
तूफान उठेगा‚ प्रलय बाण छूटेगा‚
है जहां स्वर्ण‚ बम वहीं‚ स्यात्‚ फूटेगा।
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जो करें‚ किंतु‚ कंचन यह नहीं बचेगा‚
शायद‚ सुवर्ण पर ही संहार मचेगा।
हम पर अपने पापों का बोझ न डालें‚
कह दो सब से‚ अपना दायित्व संभालें।
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कह दो प्रपंचकारी‚ कपटी‚ जाली से‚
आलसी‚ अकर्मठ‚ काहिल‚ हड़ताली से‚
सी लें जबान‚ चुपचाप काम पर जायें‚
हम यहां रक्त‚ वे घर पर स्वेद बहायें।
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हम दे दें उस को विजय‚ हमें तुम बल दो‚
दो शस्त्र और अपना संकल्प अटल दो।
हों खड़े लोग कटिबद्ध वहां यदि घर में‚
है कौन हमें जीते जो यहां समर में?
∼ रामधारी सिंह ‘दिनकर

Thursday, 27 April 2017

परमात्मा की सिर्फ चर्चा करें या ध्यान करें ? ....

परमात्मा की सिर्फ चर्चा करें या ध्यान करें ? .....
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हम भगवान की आराधना और ध्यान कितने समय तक करते हैं ? महत्व इसी का है, मात्र उसकी चर्चा या प्रशंसा का नहीं | भगवान को प्रेम करना सबसे अधिक बुद्धिमानी का कार्य है, और भगवान को समर्पित हो जाना सबसे बड़ी सफलता है | यदि किसी के सामने मिठाई रखी हो तो बुद्धिमानी उसकी विवेचना करने में है या उसको खाने में ? मैं सोचता हूँ कि बुद्धिमान उसे खा कर प्रसन्न होगा और विवेचक उसकी विवेचना ही करता रह जाएगा कि इसमें कितनी चीनी है, कितना दूध है, कितना मेवा है, किस विधि से बनाया और इसके क्या हानि लाभ हैं -- आदि आदि| वैसे ही भगवान भी एक रस है| उसे चखो, उसका स्वाद लो, और उसके रस में डूब जाओ| इसी में सार्थकता और आनंद है| उसकी विवेचना मात्र से शायद ही कोई लाभ हो|
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हम कितनी देर तक प्रार्थना करते हैं या ध्यान करते हैं ? अंततः महत्व इसी का है| ध्यान और प्रार्थना के समय मन कहाँ रहता है ? यदि मन चारों दिशाओं में सर्वत्र घूमता रहता है तो ऐसी प्रार्थना किसी काम की नहीं है| हमें ध्यान की गहराई में जाना ही पड़ेगा और हर समय भगवान का स्मरण भी करना ही पड़ेगा| हम छोटी मोटी गपशप में, अखवार पढने में और मनोरंजन में घंटों तक का समय नष्ट कर देते हैं, पर भगवान का नाम पाँच मिनट भी भारी लगने लगता है| चौबीस घंटे का दसवाँ भाग यानि कम से कम लगभग अढाई तीन घंटे तो नित्य हमें ध्यान करना ही चाहिए|
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जब हम अग्नि के समक्ष बैठते हैं तो ताप की अनुभूति होती ही है वैसे ही परमात्मा के समक्ष बैठने से उनका अनुग्रह भी मिलता ही है| प्रभु के समक्ष हमारे सारे दोष भस्म हो जाते हैं| ध्यान साधना से सम्पूर्ण परिवर्तन आ सकता है| जब एक बार निश्चय कर लिया कि मुझे परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं चाहिए तो भगवान आ ही जाते है ---- यह आश्वासन शास्त्रों में भगवान ने स्वयं ही दिया है| जब ह्रदय में अहैतुकी परम प्रेम और निष्ठा होती है तब भगवान मार्गदर्शन भी स्वयं ही करते हैं| पात्रता होने पर सद्गुरु का आविर्भाव भी स्वतः ही होता है|
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अपने प्रेमास्पद का ध्यान निरंतर तेलधारा के सामान होना चाहिए| प्रेम हो तो आगे का सारा ज्ञान स्वतः ही प्राप्त हो जाता है और आगे के सारे द्वार स्वतः ही खुल जाते हैं| इस सृष्टि में निःशुल्क कुछ भी नहीं है| हर चीज की कीमत चुकानी पडती है|
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आप सब में हृदयस्थ परमात्मा को नमन ! आप सब की जय हो |

ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपाशंकर
२८ अप्रेल, २०१५

वृक्षारोपण ....

वृक्षारोपण ....
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अभी भीषण ग्रीष्म ऋतू चल रही है| दो माह पश्चात् वर्षा ऋतू का आगमन होगा| उस समय तरह तरह के वृक्षों का रोपण होगा| पर आजकल एक रुझान चल पडा है .... गुलमोहर, सफेदा (युकलिप्टिस) जैसे सजावटी वृक्ष ही लगाने का| सफेदा तो वहीँ लगाना चाहिए जहाँ भूमि पर बहुत अधिक दलदल है, अन्यथा नहीं| कुछ वृक्ष हैं जो पर्यावरण के लिए बहुत अधिक लाभदायक है जैसे बड़ (वट), पीपल, खेजड़ी, रोहिड़ा व नीम आदि, जिनकी उपेक्षा की जा रही है|
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मरुभूमि में खेजड़ी का वृक्ष अमृत वृक्ष है| इसे प्राचीन काल में शमी वृक्ष कहते थे| इसकी लकड़ियों से ही यज्ञादि होते थे इसलिए इसकी लकड़ी को समिधा कहते थे| इसकी छाया में भी भूमि उर्बरा रहती है और इसकी पत्तियाँ तो जानवरों के लिए सर्वश्रेष्ठ चारा है| जहाँ ये वृक्ष प्रचुर मात्रा में होते थे वहाँ कृष्णमृग (काले हिरन) निर्भय होकर खूब घूमते थे| जहाँ कृष्णमृग निर्भय घुमते हैं वह पवित्र यज्ञभूमि होती है| ग्रामीण क्षेत्र में खेजड़ी को बहुत पवित्र वृक्ष मानते हैं|
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पीपल, बड़, नीम और खेजड़ी के वृक्ष व तुलसी के पौधे लगाना तो पुण्य का काम माना जाता था| ये पर्यावरण के लिए सर्वश्रेष्ठ वृक्ष हैं, पर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इनकी उपेक्षा की जा रही है| क्या ये सांप्रदायिक पेड़-पौधे हैं? और सजावटी वृक्ष सेकुलर हैं?
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बाहर के पर्यावरण जितना ही महत्वपूर्ण है -- भीतर का पर्यावरण, जो परमात्मा के निरंतर ध्यान से ही पवित्र होता है। निरंतर परमात्मा का अनुस्मरण करो, और परमात्मा को स्वयं में व्यक्त करो। आपका जीवन धन्य हो जायेगा, आप इस पृथ्वी पर चलते-फिरते देवता बन जाओगे। जहां भी आपके चरण पड़ेंगे वह भूमि सनाथ और पवित्र हो जाएगी। नित्य, नियमित, गहन, और दीर्घकाल तक उपासना आवश्यक है, अन्यथा मुमुक्षुत्व ही लुप्त हो जाता है। साधक, साध्य और साधना तीनों एक हैं। भगवत्-प्राप्ति का मौसम चल रहा है। परमात्मा को उपलब्ध होने का सबसे अच्छा मौसम है यह।

प्राणायाम ......

प्राणायाम ......
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प्राणायाम एक आध्यात्मिक साधना है जो हमारी चेतना को परमात्मा से जोड़ता है| यह कोई श्वास-प्रश्वास का व्यायाम नहीं है, यह योग-साधना का भाग है जो हमारी प्राण चेतना को जागृत कर उसे नीचे के चक्रों से ऊपर उठाता है|
मैं यहाँ प्राणायाम की दो अति प्राचीन और विशेष विधियों का उल्लेख कर रहा हूँ| ये निरापद हैं| ध्यान साधना से पूर्व खाली पेट इन्हें करना चाहिए| इनसे ध्यान में गहराई आयेगी|
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(1)
(a) खुली हवा में पवित्र वातावरण में पद्मासन, सिद्धासन या सुखासन में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुँह कर के कम्बल पर बैठ जाइए| यदि भूमि पर नहीं बैठ सकते तो भूमि पर कम्बल बिछाकर, उस पर बिना हत्थे की कुर्सी पर कमर सीधी कर के बैठ जाइए| कमर सीधी रहनी चाहिए अन्यथा कोई लाभ नहीं होगा| कमर सीधी रखने में कठिनाई हो तो नितंबों के नीचे पतली गद्दी रख लीजिये| दृष्टी भ्रूमध्य को निरंतर भेदती रहे, और ठुड्डी भूमि के समानांतर रहे|
(b) बिना किसी तनाब के फेफड़ों की पूरी वायू नाक द्वारा बाहर निकाल दीजिये, गुदा का संकुचन कीजिये, पेट को अन्दर की ओर खींचिए और ठुड्डी को नीचे की ओर कंठमूल तक झुका लीजिये| दृष्टी भ्रूमध्य में ही रहे|
(c) मेरु दंड में नाभी के पीछे के भाग मणिपुर चक्र पर मानसिक रूप से ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ का जितनी देर तक बिना तनाव के जप कर सकें कीजिये| इस जप के समय हम मणिपुर चक्र पर प्रहार कर रहे हैं|
(d) आवश्यक होते ही सांस लीजिये| सांस लेते समय शरीर को तनावमुक्त कर a वाली स्थिति में आइये और कुछ देर अन्दर सांस रोक कर नाभि पर प्रहार करते हुए ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ का जप करें|
(e) उपरोक्त क्रिया को दस बारह बार दिन में दो समय कीजिये| इस के बाद ध्यान कीजिये|
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(2)
एक दूसरी विधि है :------ उपरोक्त प्रक्रिया में a और b के बाद धीरे धीरे नाक से सांस लेते हुए निम्न मन्त्रों को सभी चक्रों पर क्रमश: मानसिक रूप से एक एक बार जपते हुए ऊपर जाएँ|
मूलाधारचक्र ........ ॐ भू:,
स्वाधिष्ठानचक्र ..... ॐ भुव:,
मणिपुरचक्र ........ ॐ स्व:,
अनाहतचक्र ........ ॐ मह:,
विशुद्धिचक्र ......... ॐ जन:,
आज्ञाचक्र ........... ॐ तप:,
सहस्त्रार.............. ॐ सत्यम् |
इसके बाद सांस स्वाभाविक रूप से चलने दें लेते हुए अपनी चेतना को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में विस्तृत कर दीजिये| ईश्वर की सर्वव्यापकता आप स्वयं हैं| आप यह देह नहीं हैं| जैसे ईश्वर सर्वव्यापक है वैसे ही आप भी सर्वव्यापक हैं| पूरे समय तनावमुक्त रहिये|
कई अनुष्ठानों में प्राणायाम करना पड़ता है वहां यह प्राणायाम कीजिये| संध्या और ध्यान से पूर्व भी यह प्राणायाम कर सकते हैं| धन्यवाद| ॐ शिव|