Wednesday, 26 April 2017

परमात्मा एक प्रवाह है .....

>>> "परमात्मा एक प्रवाह है, उसे स्वयं के माध्यम से प्रवाहित होने दो| कोई अवरोध मत खड़ा करो| फिर पाएँगे कि वह प्रवाह हम स्वयं हैं|" <<<
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प्रिय निजात्मगण, आप सब में हृदयस्थ प्रभु को नमन !
आप सब से एक प्रश्न है ..... क्या इस संसार में कुछ पाने योग्य है ?
आध्यात्मिक दृष्टी से सर्वप्रथम तो कुछ पाने की अवधारणा ही गलत है|
कुछ पाने की कामना ही माया का सबसे बड़ा अस्त्र है|
>>> या तो सब कुछ मिलता है या कुछ भी नहीं मिलता, यह एक आध्यात्मिक नियम है| यह कुछ पाने की अभिलाषा एक मृगतृष्णा है| किसी को कुछ नहीं मिलता| <<<
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सब कुछ परमात्मा का है और सब कुछ "वह" ही है| हमें स्वयं को ही समर्पित होना पड़ता है| जो परमात्मा को समर्पित हो गया उसको सब कुछ मिल गया| बाकि अन्य सब को निराशा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं मिलता|
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सब कुछ तो मिला हुआ ही है| पाने योग्य कुछ है तो "वह" ही है जिसे पाने के बाद कुछ भी प्राप्य नहीं है| "वह" मिलता नहीं है, उसमें स्वयं को समर्पित होना पड़ता है| कुछ करने से "वह" नहीं मिलता, कुछ होना पड़ता है| वह होने पर "वह" स्वयं ही कर्ता भी बन जाता है|
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हमें चाहिए बस सिर्फ एक प्रबल सतत अभीप्सा और परम प्रेम, अन्य कुछ भी नहीं|
>>> "परमात्मा एक प्रवाह है, उसे स्वयं के माध्यम से प्रवाहित होने दो| कोई अवरोध मत खड़ा करो| फिर पाएँगे कि वह प्रवाह हम स्वयं हैं|" <<<
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ॐ तत्सत् | शिवोहं शिवोहं शिवोहं शिवोहं शिवोहं | ॐ ॐ ॐ ||
कृपाशंकर
24 April 2016

देश खनन माफियाओं के चंगुल में है .....

April 23, 2013.

ॐ श्री गुरवे नमः| आज मैं साधन क्रमों पर चर्चा करने वाला था पर उसके स्थान पर अपनी ही व्यथा व्यक्त करने जा रहा हूँ| अपने सामने इतना अन्याय देख रहा हूँ कि इस समाज से विरक्ति हो गयी है| इच्छा यही हो रही है कि विरक्त होकर सांसारिक चेतना से ऊपर उठ जाऊं और स्थाई रूप से एकांतवास करूं व इस समाज और इसकी चेतना से पृथक ही रहूँ|
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सारा देश इस समय खनन माफियाओं के चंगुल में है| हर जिले में पटवारी से जिलाधीश तक, और सिपाही से पुलिस अधीक्षक तक, और सारे मंत्रीगण खनन माफियाओं के बंधुआ मजदूर है| देश की बहुमूल्य खनिज संपदा की लूट हो रही है| और जो भी इन माफियाओं के मार्ग में आता है उसका अंत कर दिया जाता है|
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स्वतन्त्रता संग्राम में हमारे क्षेत्र में स्वतंत्रता सेनानियों के शिरोमणि थे --- पचेरी ग्राम के पं.ताड़केश्वर शर्मा| अंगरेज़ सरकार ने उनके पूरे परिवार को सगे सम्बन्धियों, महिलाओं और बच्चों सहित जेल में डाल रखा था| उनका घर, खेत और सारी सम्पति जब्त कर ली थी| तथाकथित आज़ादी के बाद उनके परिवार के जीवित बचे छ: सदस्यों को राष्ट्रपति ने सम्मानित भी किया था|
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उनके पौत्र पं.प्रदीप शर्मा पर्यावरण प्रेमी होने के कारण और परोपकार हेतु खनिज माफियों के विरुद्ध संघर्षरत थे| दो माह पूर्व उनके परिवार के अनुसार पुलिस की मिलीभगत से चुनौती देकर भोजन करते समय घर से बाहर बुलाकर उनकी ह्त्या कर दी गयी और लाश को एक-डेढ़ फुट गहरे नाले में फेंक दिया गया| उनकी मृत्यु का समाचार सुनकर आसपास के गाँवों से हजारों लोग एकत्र हो गए व जिले के कई प्रतिष्ठित लोग भी आ गए तब प्रशासन ने पूर्ण आश्वासन दिया था कि मामले की निष्पक्ष जांच होगी| उनके शरीर पर और गले पर चोट के निशान भी थे|
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अब सरकार यह सिद्ध करने पर अड़ी हुई है कि पं.प्रदीप शर्मा ने पानी में डूब कर आत्म-हत्या की है| सरकारी पोस्ट मार्टम रिपोर्ट में भी दम घुटने से मौत दिखाई गई है और शरीर पर चोटों के निशान नहीं होना बताया है| उनके गाँव पचेरी में अभी तक आन्दोलन चल रहा है| सारे गाँव के लोग पाबन्द किए गए हैं| आस पास के गाँवों में पूर्ण बंद रहा है और प्रशासन ने जन आन्दोलन को कुचलने की पूर्ण चेष्टा की है| पं.प्रदीप शर्मा के घर का ताला तोड़कर उनका चलभाष और अन्य साक्ष्य चोरी किये गए| जाँच के नाम पर सारे साक्ष्यों को मिटाया गया है| क्या इतने जीवट का व्यक्ति जो खनन माफियाओं के विरुद्ध संघर्ष कर रहा था एक फुट गहरे पानी में डूब कर आत्म-ह्त्या करेगा?
क्या कोई एक फुट गहरे पानी में डूब कर आत्म-हत्या कर सकता है?
दो महीने बीत जाने पर भी किसी नामजद को गिरफ्तार नहीं किया गया है| CBI से जाँच की मांग नहीं मानी जा रही है| यदि CBI से जाँच हो तो पूरी सरकार बेनकाब हो जायेगी| पर सीबीआई भी तो सरकार से ही आदेश लेगी|
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कल जिला मुख्यालय पर एक बहुत बड़ा धरना दिया गया जिसमे अनेक पूर्व वरिष्ठ पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी, प्रसिद्ध डॉक्टर, प्रबुद्धजन, शिक्षाविद और मातृशक्ति थी| सबने इस घटना की निंदा की| ज्ञापन लेने के लिए कोई अधिकारी उपलब्ध नहीं था| अब उस महान स्वतंत्रता सेनानी के परवार के सदस्यों ने निर्णय लिया है की वे अपने सम्मान लौटा देंगे और आमरण अनशन करेंगे|
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जब एक प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी का परिवार इन खनन माफियाओं से सुरक्षित नहीं है तो एक सामान्य जन का क्या हाल होगा?
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और भी अनेक बातें हैं जो पीड़ित करती हैं| इसमें दोष बुरे लोगों का नहीं है| दोष तो हमारा ही है हम निर्बल और संवेदन हीन बन गए हैं|
दुनिया को खतरा बुरे लोगों की ताकत से नहीं है बल्कि अच्छों की दुर्बलता के कारण है|
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वर्त्तमान में Democracy (लोकतंत्र) समाप्त होकर Plutocracy (धनी व कुटिल लोगों का राज्यतंत्र) रह गयी है| वर्त्तमान लोकतंत्रीय व्यवस्था काले विषधर उगल रही है और हम उन्हें दूध पिला रहे हैं| आज की राजनीति आत्मा पर लात मार रही है और हम वफादारी के साथ अपनी दुम हिला रहे हैं|
हम सत्य को कहने से डर रहे हैं|
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अधिक से अधिक 50 या 60 प्रतिशत मतदान होता है फिर ये मत अनेक प्रत्याशियों में बँट जाते हैं| मात्र 20-25 मत प्राप्त करने वाला व्यक्ति जनप्रतिनिधी बन जाता है|
वोट बेंक की राजनीति, जातिवाद, साम्प्रदायिकता की भावना भड़का कर, पैसे शराब आदि बाँट कर 15 से 20 प्रतिशत वोट प्राप्त कर लेने वाले की जीत पक्की है| सारे माफिया इसी तरीके से सत्ता में आते हैं|
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हमारे मन में लाचारी का भाव की मैं अकेला क्या कर सकता हूँ, मेरी कौन सुनेगा आदि के कारण ही यह democracy बदल कर plutocracy हो गई है| मैं सभी पाठकों से निवेदन करता हूँ की हम सब यह संकल्प करें की अगले चुनावों में शत-प्रतिशत मतदान के लक्ष्य को प्राप्त करें| समाज के जिस पात्र भाई बहिन का नाम मतदाता सूचि में नहीं है वे अपना नाम जुड़ायें| मतदान वाले दिन सूर्य उदय होते ही एक धार्मिक कर्तव्य मानकर मतदान देने पहुँच जाएँ| अन्यथा यही अन्याय और माफिया राज्य सहने के लिए तैयार रहें| सोचें, विचारें और सक्रियता से आगे बढ़ें अन्यथा पांचाली के चीर हरण में जो चुप रहेंगे उन्हें भावी पीढी कभी क्षमा नहीं करेगी|
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शुभ कामनाएँ| जय जननी जय भारत|
२३ अप्रेल, २०१३.

अप्राप्त के लालच का त्याग .........

अप्राप्त के लालच का त्याग .........
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प्रिय निजात्मगण,
आप सब में हृदयस्थ भगवन नारायण को नमन!
आज प्रातः ही एक लेख पढ़ रहा था जिसने मुझे झकझोर कर रख दिया| एक बात जो बार बार भूल जाता हूँ वह चैतन्य की गहराई में बैठ गयी|
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से हमारे जीवन का लक्ष्य है --- शरणागति द्वारा भगवान के श्रीचरणों में सम्पूर्ण समर्पण अर्थात अपने मन बुद्धि चित्त और अहंकार का सम्पूर्ण समर्पण|
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अब प्रश्न उठता है कि इसमें बाधा क्या है? इसमें सबसे बड़ी बाधा है --- कुछ पाने का लालच अर्थात जो अप्राप्त है उसे पाने का लोभ| हम कुछ माँगते हैं यह हमारा लोभ ही है| इच्छा शक्ति मात्र से इस लोभ रूपी महाशत्रु पर विजय नहीं पाई जा सकती| किसी भी प्रकार के संकल्प-विकल्पों से बचो|
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जीवन का सार कुछ होने में है, न की कुछ प्राप्त करने में| आप यह देह नहीं हैं, परमात्मा की सर्वव्यापकता हैं| जब आप परमात्मा को उपलब्ध हैं तो सब कुछ आपका ही है| फिर काहे की इच्छा?
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जो कुछ भी प्राप्त है उसका पूर्ण सदुपयोग भी होना चाहिए| इसमें मार्गदर्शन प्रत्यक्ष परमात्मा की कृपा से ही मिलता है जो उनके प्रति परम प्रेम से प्राप्त होती है| कोई भी कामना न करें| कामना ही सब दुःखों का कारण है|
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ॐ नमः शिवाय| ॐ ॐ ॐ ||
कृपाशंकर

जिस गति से हमारा भौतिक ज्ञान बढ़ रहा है उसी गति से हमारा आध्यात्मिक अज्ञान भी अनावृत हो रहा है .......

जिस गति से हमारा भौतिक ज्ञान बढ़ रहा है उसी गति से हमारा आध्यात्मिक अज्ञान भी अनावृत हो रहा है ........
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चाहे कोई मेरा कितना भी उपहास करे, मेरी कितनी भी हँसी उड़ाये या मुझे कितना भी बुरा बताए, पर यह सुनिश्चित है कि वर्तमान सभ्यता निकट भविष्य में नष्ट होगी व एक नई प्रजाति इस पृथ्वी पर राज्य करेगी| ऐसा मुझे बार बार आभास होता है|
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वर्तमान सभ्यता ने आत्मज्ञान यानि ब्रह्मज्ञान को असंगत बना रखा है, आत्मा व परमात्मा के चिंतन को पिछड़ेपन की निशानी, साम्प्रदायिक व बेकार की बात बना रखा है| वर्त्तमान सभ्यता का एकमात्र लक्ष्य इन्द्रिय सुखों के लिए ही भौतिक समृद्धि की प्राप्ति है| भौतिक समृद्धि आवश्यक है पर उस का लक्ष्य निज जीवन में परमात्मा की अभिव्यक्ति है| सारे ज्ञान का एकमात्र स्त्रोत भी परमात्मा ही है| आसुरी सभ्यताएँ चिरस्थायी नहीं होतीं|
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अपने स्वयं को यानि आत्म-तत्व को जाने बिना हम सब कुछ जानना चाहते हैं| अपने वास्तविक कल्याण के लिए हमें क्या करना चाहिए, इस पर कोई प्रयास नहीं हो रहा है| सौभाग्य से इस लक्ष्य के प्रति जागरूक दिव्यात्माओं का भी जन्म हो रहा है जो एक नई प्रजाति ही है|
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हे प्रभु, हे परमशिव, आप की आरोग्यकारी उपस्थिति आप की सभी संतानों के देह, मन और आत्माओं में प्रकट हो| सभी का कल्याण हो| आपके अतिरिक्त हमारी कोई अन्य कोई कामना नहीं हो| हम राग-द्वेष और अहंकार जैसे सभी बंधनों से मुक्त हों|
ॐ ॐ ॐ ||

राष्ट्र और समाज की चिंता संत महात्माओ को ही होती है .....

राष्ट्र और समाज की चिंता संत महात्माओ को ही होती है .....
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जिस समय पृथ्बी पर रावण का आतंक था, उस समय जनक तथा दशरथ जैसे चक्रवर्ती राजा राज्य कर रहे थे| वे कभी भी रावण का वध कर सकते थे, पर धर्मरक्षा की चिंता विश्वामित्र जैसे संतों को ही हुई| राष्ट्र और समाज की चिंता सिर्फ संत महात्माओ को ही होती है|
गाधि तनय मन चिंता व्यापी ,हरि बिन मरय न निशिचर पापी|
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मेरे मन में प्रश्न यह उठता है जब इतने बड़े बड़े पराक्रमी चक्रवर्ती राजा थे उन्होंने रावण से युद्ध क्यों नहीं किया? एक संत को ही यह चिंता क्यों हुई कि हरि बिना ये निशाचर पापी नहीं मरेंगे|
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वर्त्तमान में भी देश की चिंता सिर्फ संत महात्माओं को ही है| वे ही इस समय सर्वाधिक प्रयास कर रहे हैं और अपना सर्वस्व न्योछावर कर रहे हैं| उन्ही के पुण्य प्रताप से सनातन धर्म और भारतवर्ष जीवित है|
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भारतवर्ष को इस समय आवश्यकता है एक ब्रह्मतेज की| जब ब्रह्मत्व जागृत होगा तब क्षातृत्व भी जागृत होगा| इसके लिए साधना और समर्पित साधकों की आवश्यकता है| यह संत महात्माओं का तप ही रक्षा करेगा|

ॐ शिव !

परमात्मा से जुड़ कर ही मनुष्य महान बनता है ......

परमात्मा से जुड़ कर ही मनुष्य महान बनता है ......
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पानी का एक बुलबुला सागर से दूर होकर अत्यंत असहाय, अकेला और अकिंचन है| उस क्षणभंगुर बुलबुले से छोटा और कौन हो सकता है? पर वही बुलबुला जब सागर में मिल जाता है तो एक विकराल, विराट और प्रचंड रूप धारण कर लेता है|
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वैसे ही मनुष्य जितना परमात्मा से समीप है, उतना ही महान है| जितना वह परमात्मा से दूर है, उतना ही छोटा है| जितने हम परमात्मा से समीप हैं उसी अनुपात में प्रकृति की प्रत्येक शक्ति हमारा सहयोग करने को बाध्य है| जितना हम परमात्मा से दूर जायेंगे प्रकृति की प्रत्येक शक्ति उसी अनुपात में हम से विपरीत जाने को बाध्य होगी |

ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
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हमारी आत्मा हम स्वयं हैं, और यह संसार एक दर्पण है .....
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दर्पण को कितना भी सजा लें, यदि हमारी आत्मा कलुषित है तो प्रतिबिंब भी कलुषित ही होगा | उज्जवल ही करना है तो बिम्ब का करें | शृंगार स्वयं अपनी आत्मा का करें, फिर उसका प्रतिबिंब यह संसार भी अति सुन्दर होगा |
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हम उस दाता से जुड़ें, न कि भिखारी दुनिया से | शृंगार ही करना है तो स्वयं के चेहरे का करें, न की दर्पण का |
ॐ ॐ ॐ || ॐ ॐ ॐ || ॐ ॐ ॐ ||

कलियुग केवल नाम अधारा,सुमिर-सुमिर नर उतरहिं पारा.....

"कलियुग केवल नाम अधारा,सुमिर-सुमिर नर उतरहिं पारा".....

भगवान के नाम का जो इतना अवर्णनीय महत्व है वह तो सभी युगों के लिए होना चाहिए, पर सिर्फ कलियुग के लिए ही इसका इतना अधिक महत्व क्यों बताया गया है? अन्य युगों में क्या और भी कोई आधार था?
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यह प्रश्न मैनें माननीय स्वर्गीय श्री मिथिलेश व्दिवेदी जी से पूछा था| उन्होंने जो उत्तर दिया था उसे साभार उन्हीं के शब्दों में प्रेषित कर रहा हूँ......
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"हर हर महादेव......नमन मान्यवर कृपा शंकर बी. जी,
एक बार कुछ मुनि मिलकर विचार करने लगे कि किस समय में थोड़ा सा पुण्य भी महान फल देता है और कौन उसका सुखपूर्वक अनुष्ठान कर सकते हैं?…। वे जब कोई निर्णय नहीं कर सके,तब निर्णय के लिए मुनि व्यास के पास पहुंचे। व्यासजी उस समय गंगाजी में स्नान कर रहे थे। मुनि मंडली उनकी प्रतीक्षा में गंगाजी के तट पर स्थित एक वृक्ष के पास बैठ गयी……। वृक्ष के पास बैठे मुनियों ने देखा कि व्यासजी गंगा में डुबकी लगाकर जल से ऊपर उठे और “शूद्रः साधुः“,”कलिः साधुः” पढ़कर उन्होंने पुनः डुबकी लगायी…। जल से ऊपर उठकर ‘योषितः साधु धन्यास्ताभ्यो धन्यरोस्ति कः ‘ कहकर उन्होंने पुनः डुबकी लगायी…। मुनिगण इसे सुनकर संदेह में पड़ गए। व्यासजी द्वारा कहे गए मन्त्र नदी स्नान-काल में पढ़े जानेवाले मंत्रो में से नहीं थे, वो जो कह रहे थे उसका अर्थ है ‘कलियुग प्रशंसनीय है, शूद्र साधु है, स्त्रियाँ श्रेष्ठ हैं, वे ही धन्य हैं, उनसे अधिक धन्य और कौन है!!!’ मुनिगण संदेह के समाधान हेतु आये थे,परन्तु यह सुनकर वे पहले से भी विकट संदेह में पड़ गए और जिज्ञासा से एक दुसरे को देखने लगे……कुछ देर बाद स्नान कर लेने पर नित्यकर्म से निवृत्त होकर व्यासजी जब आश्रम में आये,तब मुनिगण भी उनके समीप पहुंचे। वे सब जब यथायोग्य अभिवादन आदि के अनंतर आसनों पर बैठ गए तब व्यासजी ने उनसे आगमन का उद्देश्य पूछा। मुनियों ने कहा कि हमलोग आपसे एक संदेह का समाधान कराने आये थे, किन्तु इस समय उसे रहने दिया जाए, केवल हमें संभव हो तो यह बतलाया जाए कि आपने स्नान करते समय कई बार कहा था कि ‘कलियुग प्रशंसनीय है, शूद्र साधु है, स्त्रियाँ श्रेष्ठ हैं, वे ही धन्य हैं, सो बात क्या है? हमें कृपा करके बताएं। यह जान लेने के बाद हम जिस आतंरिक संदेह के समाधान के लिए आये थे,उसे कहेंगे।
व्यासजी उनकी बातें सुनकर बोले कि मैंने कलियुग, शूद्र और स्त्रियों को जो बार बार साधुश्रेष्ठ कहा, आपलोग सुनें। जो फल सतयुग में दस वर्ष ब्रह्मचर्य आदि का पालन करने से मिलता है, उसे मनुष्य त्रेता में एक वर्ष, द्वापर में एक मास और कलियुग में सिर्फ एक दिन में प्राप्त कर लेता है…। जो फल सतयुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ और द्वापर में देवार्चन करने से प्राप्त होता है, वही कलियुग में सिर्फ ईश्वर का नाम-कीर्तन करने से मिल जाता है। कलियुग में थोड़े से परिश्रम से ही लोगों को महान धर्म की प्राप्ति हो जाती है,इन कारणों से मैंने कलियुग को श्रेष्ठ कहा।"
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"शास्त्रों में लिखा है कि कलियुग में भगवान का अवतरण होता है 'नाम' के रूप में। कलियुग में जो युग-धर्म है वह है नाम संकीर्तन। भगवान चैतन्य महाप्रभु ने भी कहा है कि कलियुग में केवल हरिनाम ही हमारा उद्धार कर सकता है। इसके अलावा किसी भी अन्य साधना से सद्गति नहीं है। यही बात नानक देव ने भी कही है, 'नानक दुखिया सब संसार, ओही सुखिया जो नामाधार।' रामचरितमानस में भी यही लिखा है, कलियुग केवल नाम आधारा। किसी भी संत के पास चले जाओ, किसी भी शास्त्र को उठाओ, सब यही इंगित करते हैं कि कलियुग में भगवान का अवतरण उनके नाम के रूप में हुआ है। इसी से उद्धार होगा।
यहां पर मैं एक बात कहना चाहूंगा कि यह भगवद् नाम अन्य भौतिक नामों की तरह जड़ नहीं है। भौतिक जगत में हम देख सकते हैं कि एक व्यक्ति का नाम लक्ष्मीपति है परंतु वह है एक भिखारी। अथवा नयनमणि नाम वाला व्यक्ति एक आँख से काना है। किंतु भगवद् राज्य में ऐसा नहीं होता। लक्ष्मीपति भगवान वास्तव में लक्ष्मी के पति ही हैं व सबसे धनी हैं। गोविंद सभी इंदियों के स्वामी हैं व इंदियां उनकी सेवा में नियुक्त हैं। कृष्ण नाम जिनका है, वे वास्तव में सभी को आकर्षित करने वाले हैं।
भगवद् नाम हमारी दुष्टों से रक्षा करेगा, हमें इस भव सागर से पार कराएगा, हमें हमारी इच्छानुसार वरदान देगा। वह सब कुछ करेगा, किंतु इसके लिए हमें पूर्ण रूप से समर्पित होकर नाम कीर्तन करना होगा। यह तभी होगा। आखिर दौपदी ने वस्त्र हरण के समय जब तक पूर्ण शरणागत होकर दोनों हाथ उठा कर भगवान को नहीं पुकारा था, तब तक भगवान नहीं आए थे।"
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"एक बार राजा परीक्षित जंगल से गुजर रहे थे तो उन्होंने एक बैल को एक टाँग पर खड़ा देखा। जब राजा ने बैल से पूछा तो उसने कुछ स्पष्ट नहीं बताया क्योंकि वे और कोई और नहीं बल्कि स्वयं साक्षात् धर्मराज थे और धर्मराज कैसे किसी की निंदा कर सकते थे? तब परीक्षित ने ध्यान बल से पता लगाया कि इनकी ऐसी दशा का जिम्मेदार कलियुग है। राजा ने सोचा कि कलियुग के आने पर संसार में चारों तरफ लूट-पाट चोरी-डकैती आदि नाना प्रकार के पापकर्मों की वृद्धि हो जायेगी अतः इस कलियुग का अंत कर देना चाहिए। जब उन्होंने कलियुग का अंत करने का पूरा मानस बना लिया था तभी उनके मन में एक विचार आया, जिसके कारण उन्होंने कलियुग का अंत करने का विचार त्याग दिया। उन्होंने सोचा कि कलियुग में सभी प्रकार की बुराइयां हैं, लेकिन इस में एक बहुत बड़ी अच्छाई भी है जिसका लाभ कलियुग में सबको प्राप्त होगा और वो वह है कि कलियुग में ईश्वर की प्राप्ति के लिए लोगों को बड़े-बड़े यज्ञ नहीं करने पड़ेंगे। सालों-साल तक तपस्या नहीं करनी पड़ेगी केवल एक बार सच्चे मन से जो व्यक्ति ईश्वर के नाम का उच्चारण करेगा और ईश्वर को याद करेगा बस उसे ही ईश्वर की प्राप्ति हो जायेगी। यह सोचकर उन्होंने उस समय कलियुग पर केवल पूर्णतया नियंत्रण कर लिया लेकिन उसका वध नहीं किया। इसी का उल्लेख तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में किया है -
कलियुग केवल नाम अधारा,सुमिर-सुमिर नर उतरहिं पारा......
साभार: मिथिलेश व्दिवेदी जी.