Friday, 14 April 2017

अगर हमें वास्तव में परमात्मा से प्रेम हैै तो ......

April 12, 2016

अगर हमें वास्तव में परमात्मा से प्रेम हैै तो ......
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दिन का आरम्भ भगवान के ध्यान से करें| दिन में हर समय भगवान को अपनी चेतना में रखें| यदि भूल जाएँ तो याद आते ही पुनश्चः उन्हें अपनी चेतना में जीवन का केंद्रबिंदु बनाएँ| उनके उपकरण मात्र बनें| समर्पण का निरंतर प्रयास हो|
रात्रि को सोने से पहिले यथासंभव गहनतम ध्यान करके ही सोयें| रात्रि का ध्यान सबसे अधिक महत्वपूर्ण है|
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जो द्विज हैं यानि जिन्होंने यज्ञोपवीत धारण कर रखा है उन्हें नित्य संध्या (संधि क्षणों में की गई साधना) और ब्रह्मगायत्री का यथासंभव अधिकाधिक जप करना चाहिए| मानसिक रूप से तो किसी भी परिस्थिति में कर ही सकते हैं| हर कार्य का आरम्भ ब्रह्मगायत्री के मानसिक जप से ही करें| कुछ आचार्यों के अनुसार जिन द्विजों ने यज्ञोपवीत धारण कर रखा है उनकी धर्म-पत्नियों को भी ब्रह्मगायत्री का जप करना चाहिए| संध्या तो सब का कर्तव्य है| सामान्यतः रात्री और दिवस का सन्धिक्षण, मध्याह्न, दिवस और रात्री का सन्धिक्षण और मध्यरात्रि का समय संध्याकाल होता है| इन संधिक्षणों में की गयी साधना को संध्या कहते हैं| अपनी गुरु परम्परानुसार सभी को संध्या करनी चाहिए| संध्या का फल कभी क्षीण नहीं होता|
योगियों के लिए हर श्वास प्रश्वास और हर क्षण सन्धिक्षण है| अतः वे अपने कूटस्थ में निरंतर प्रणव का ध्यान करते हैं|
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जैसा हम सोचते हैं वैसे ही हम बन जाते हैं| निरंतर भगवान का ध्यान करेंगे तो स्वतः ही उपास्य के सारे सद्गुण हमारे में खिंचे चले आयेंगे और हमारी सारी विकृतियाँ स्वतः ही दूर हो जायेंगी|
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भगवान के प्रति अहैतुकी परम प्रेम हमारा स्वाभाविक धर्म है| उनके प्रति समर्पित होकर जीवन का हर कार्य करना और शरणागति द्वारा पूर्ण समर्पण हमारा परम धर्म है| हम धर्म की रक्षा करेंगे तो धर्म भी हमारी रक्षा करेगा| बिना धर्म का पालन किये हम निराश्रय और असहाय हैं|
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण का वचन है .....
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते | स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ||२:४०||
अर्थात इस महाभय से हमारी रक्षा थोड़ा बहुत धर्म का पालन ही करेगा|
जब भगवान श्रीकृष्ण का आदेश है तो उसकी पालना हमें करनी ही होगी|
अन्य सारे उपाय अति जटिल और कठिन है अतः सबसे सरल मार्ग के रूप में स्वाभाविक रूप से धर्म का पालन हमें करना ही चाहिए, तभी धर्म ही हमारी रक्षा करेगा| धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है और धर्म की रक्षा ही हमारी स्वयं की रक्षा है|

भारत का गौरवशाली इतिहास हमें क्यों नहीं पढ़ाया जाता ? .....

April 12, 2016 

भारत का गौरवशाली इतिहास हमें क्यों नहीं पढ़ाया जाता ?
भारत के महान शासकों के बारे में हमें क्यों नहीं बताया जाता ?
क्या विदेशी लुटेरों का झूठा प्रशस्तिगान ही भारत का इतिहास है ?
यह कैसा षडयंत्र है ?
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भारत का इतिहास गौरवशाली है| भारत ने पराधीनता को कभी भी पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया था| सदा विदेशी लुटेरों का प्रतिकार किया| मराठों का इतिहास, विजयनगर साम्राज्य और अन्य भी अनेक महान क्षेत्रीय शासकों और योद्धाओं का इतिहास अत्यधिक गौरवशाली था जिनके बारे में हमें नहीं पढ़ाया जाता|
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लगता है भारत का इतिहास भारत के शत्रुओं ने लिखा है|
हमें यह पढ़ाया गया है कि अंग्रेजों के आने से पहिले भारत भारत नहीं था, भारत को एक किया तो अंग्रेजों ने ही किया| यह एक बहुत बड़ा झूठ है|
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समुद्रगुप्त के बारे में तो बच्चों को बिलकुल नहीं पढ़ाया जाता जिसका साम्राज्य पूर्व में आसाम और ब्रह्मदेश से लेकर पश्चिम में वर्तमान ईरान के भीतर तक, और उत्तर में सम्पूर्ण हिमालय से लेकर दक्षिण में श्रीलंका तक था|
समुद्र्गुप्त भारत का महान शासक था जिसने अपने जीवन काल मे कभी भी पराजय का स्वाद नही चखा| सारे भारत को उसने अपने पराक्रम से एक सूत्र में बाँध रखा था| पूरी पृथ्वी पर उसका कोई विरोधी नहीं था| उसकी कीर्ति चारों ओर फ़ैली हुई थी|
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वह वैदिक धर्म का अनुयायी था| उसने अनेक तीर्थों का पुनरुद्धार किया, अनेक अश्वमेध यज्ञ किए और ब्राह्मणों दीनों, अनाथों को अपार दान दिया| वह सत्संग का प्रेमी था| माँ सरस्वती और लक्ष्मी की उस पर अपार कृपा थी| ऐसा कोई भी सद्गुण नहीं है जो उसमें न रहा हो| उसकी नीति थी साधुता का उदय हो तथा असाधुता कर नाश हो| उसका हृदय इतना मृदुल था कि प्रणतिमात्र से पिघल जाता था| उसने लाखों गायों का दान किया था| अपनी कुशाग्र बुद्धि और संगीत कला के ज्ञान तथा प्रयोग से उसने ऐसें उत्कृष्ट काव्य का सर्जन किया था कि लोग 'कविराज' कहकर उसका सम्मान करते थे| उसने अपने आधीन सिंहल द्वीप (श्रीलंका) के राजा मेघवर्ण को बोधगया में बौद्धविहार बनाने की अनुमति देकर अपनी महती उदारता का परिचय दिया था|
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अन्य भी अनेक महान शासक, योद्धा और वीर पुरुष भारत में हुए हैं जिनके बारे में हमें नहीं पढ़ाया जाता| कभी ना कभी वह दिन अवश्य आयेगा जब हमें अपने सही इतिहास का ज्ञान होगा हमें अपने राष्ट्र और संस्कृति पर गर्व होगा, तभी भारत अपने परम वैभव को पुनश्चः प्राप्त करेगा|
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साधुता का उदय हो, असाधुता कर नाश हो| भारत माता की जय हो|
ॐ नमःशिवाय | हर हर महादेव | जय श्रीराम | ॐ ॐ ॐ ||

भारत पर हो रहा मनोवैज्ञानिक आक्रमण .....

भारत पर एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक आक्रमण हो रहा है| इस का उद्देश्य भारतीयों में अपनी अस्मिता, स्वाभिमान और देशभक्ति की भावना को मिटा देना है ताकि भारत के और टुकड़ेे कर के उसे नष्ट कर दिया जाये|इसके पीछे अमेरिका, चीन, पाकिस्तान जैसे देशों का हाथ तो है ही, साथ साथ अंग्रेजों के उन मानसपुत्रों का भी हाथ है जिनके हाथ में अँगरेज़ भारत की सत्ता सौंप गए थे| इनका साथ दे रहे हैं भारत के असंख्य जयचंद|
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पहले यह आक्रमण धर्मनिरपेक्षतावाद, सर्वधर्मसमभाववाद के विचार थोपने, जातीय आधार पर वर्गसंघर्ष करवाने और हमारे गौरवशाली अतीत को विस्मृत करवाने के रूप में था, अब भारतीयों को असहिष्णु बताकर उनमें आत्महीनता का बोध लाने के रूप में है| भारत एक आध्यात्मिक राष्ट्र तभी बन सकता है जब सभी भारतीयों में अपने भारतीय होने का स्वाभिमान यानि आत्म-गौरव हो|
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हमें अपने सही इतिहास, साहित्य और वैभव का ज्ञान होना अति आवश्यक है| हमें हर दृष्टिकोण से शक्तिशाली और संगठित होना होगा| इसके लिए दैवीय शक्तियों के सहयोग की भी आवश्यकता होगी और जीवन में परमात्मा की भी| भारत हमारे लिए कोई भूमि का टुकडा नहीं, साक्षात माता है| आध्यात्म की और परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति भारत में ही हुई है| भारत एक ऊर्ध्वमुखी विभा-रत मनीषियों का समूह है| सनातन धर्म का ज्ञान सर्वप्रथम भारतीयों को ही हुआ और सनातन धर्म का पुनरोत्थान भी भारत से ही होगा| भारत की अस्मिता सनातन धर्म है और भारत की राजनीति भी सनातन धर्म ही होगी|
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हे जन्म भूमि भारत, हे कर्म भूमि भारत,
हे वन्दनीय भारत, अभिनंदनीय भारत |
जीवन सुमन चढ़ाकर, आराधना करेंगे,
तेरी जनम-जनम भर, हम वंदना करेंगे|
हम अर्चना करेंगे ||१||
महिमा महान तू है, गौरव निधान तू है,
तू प्राण है हमारा, जननी समान तू है |
तेरे लिए जियेंगे, तेरे लिए मरेंगे,
तेरे लिए जनम भर, हम साधना करेंगे |
हम अर्चना करेंगे ||२||
जिसका मुकुट हिमालय, जग जग मगा रहा है,
सागर जिसे रतन की, अंजुली चढा रहा है |
वह देश है हमारा, ललकार कर कहेंगे,
इस देश के बिना हम, जीवित नहीं रहेंगे |
हम अर्चना करेंगे ||३||
भारत माता की जय | वन्दे मातरम् ||
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सभी को शुभ कामनाएँ और सादर नमन |
ॐ नमःशिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय |

कृपा शंकर
११ अप्रेल २०१६

Tuesday, 11 April 2017

"भारतीय नववर्ष" व "नवरात्र स्थापन" की शुभ कामनाएँ और अभिनन्दन .....

ॐ| विभिन्न देहों में मेरे ही प्रियतम निजात्मण, आप सब में साकार परमात्मा को मैं नमन करता हूँ| आप सब को ......
"भारतीय नववर्ष" व "नवरात्र स्थापन" की शुभ कामनाएँ और अभिनन्दन.
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नववर्ष का संकल्प :---- यह वर्ष हमारे जीवन का अब तक का सर्वश्रेष्ठ वर्ष होगा| हमारे जीवन में प्रभु का परम प्रेम और परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति होगी|
हम अपने राष्ट्र भारतवर्ष को अपनी वर्तमान स्थिति से उबारने के लिए एक ब्रह्मतेज को जागृत करेंगे, हम गुणातीत होंगे, किसी भी तरह की विकृती हमारे भीतर नहीं होगी और परम तत्व का साक्षात्कार कर हम उच्चतम आध्यात्मिक शिखर पर आरूढ़ होंगे|
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रक्तबीज और महिषासुर हमारे भीतर अभी भी जीवित हैं, उनकी चुनौती और अट्टहास हम सब को नित्य सुनाई देता है| ये हमारे अवचेतन मन में छिपे हैं और चित्त की वृत्तियों के रूप में निरंतर प्रकट होते हैं| जितना इनका दमन करते हैं, उतना ही इनका विस्तार होता है| सारे दुःखों, कष्टों, पीड़ाओं, दरिद्रता और दुर्गति के मूल में ये दोनों ही महा असुर हैं| निज प्रयास से इनका नाश नहीं हो सकता| भगवान श्रीराम और जगन्माता की शक्ति ही इनका विनाश कर सकती है| उस शक्ति के लिए हमें साधना करनी होगी|
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परस्त्री/पुरुष व पराये धन की कामना, अन्याय/अधर्म द्वारा धन पाने की इच्छा, परपीड़ा, अधर्माचरण और मिथ्या अहंकार ही रक्तबीज है|
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प्रमाद यानि आलस्य, काम को आगे टालने की प्रवृत्ति और तमोगुण ही महिषासुर है|
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जगन्माता ......
महाकाली के रूप में दुष्वृत्तियों का विनाश करती हैं|
महालक्ष्मी के रूप में सद्वृत्तियाँ प्रदान करती हैं|
महासरस्वती के रूप में आत्मज्ञान प्रदान करती हैं|
दुर्गा के रूप में मनुष्य को दुर्गति से बचाती है
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प्रार्थना :-
माँ, यह सारी सृष्टि तुम्हारे मन की एक कल्पना, विचार और संकल्प मात्र है|
हमारा समर्पण स्वीकार करो| हम सब तुम्हारी संतानें हैं, हमारी रक्षा करो| हमारे भीतर और बाहर चारों ओर छाई हुई असत्य और अन्धकार की शक्तियों व अज्ञान रुपी ग्रंथियों का नाश हो| भारत के भीतर और बाहर के सभी शत्रुओं का नाश हो| सनातन धर्म की सर्वत्र पुनर्प्रतिष्ठा हो| भगवान श्रीराम का हमारे चैतन्य में सदा निवास हो| सब का कल्याण हो| ॐ ॐ ॐ ||
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पुनश्चः.... भारतीय नववर्ष की शुभ कामनाएँ |
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जय माँ ! जय श्रीराम ! ॐ नमःशिवाय ! ॐ ॐ ॐ ||


कृपाशंकर चै.शु.१वि.सं.२०७३ .  08April2016

हमें परमात्मा की प्राप्ति क्यों नहीं होती ?.............

हमें परमात्मा की प्राप्ति क्यों नहीं होती ? .....
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||ॐ|| विभिन्न देहों में मेरे ही प्रियतम निजात्मन, आप सब में साकार परमात्मा को मैं नमन करता हूँ| एक शाश्वत् प्रश्न है कि हमें परमात्मा की प्राप्ति क्यों नहीं होती ?
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इसका उत्तर मैं अपनी भाषा में यदि सरलतम और स्पष्टतम शब्दों में देना चाहूँ तो इसका एक ही उत्तर है, और वह यह है कि ..... "हमारे में ईमानदारी की कमी है, हम स्वयं के प्रति ईमानदार नहीं हैं, हम स्वयं को ठगना चाहते हैं और स्वयं के द्वारा ही ठगे जा रहे हैं|"
किसी भी सांसारिक उपलब्धी के लिए तो हम दिन रात एक कर देते हैं, हाडतोड़ परिश्रम करते हैं, पर जो उच्चतम उपलब्धी है वह हम सिर्फ ऊँची ऊँची बातों के शब्दजाल से ही प्राप्त करना चाहते हैं| वास्तविकता तो यह है की हम परमात्मा को प्राप्त करना ही नहीं चाहते| हम सिर्फ सांसारिक सुखों को, सांसारिक उपलब्धियों को और अधिक से अधिक अपने अहंकार की तृप्ति के लिए ही भगवान की विभूतियों को प्राप्त करना चाहते हैं| हमारे लिए भगवान एक माध्यम है, पर लक्ष्य तो संसार है| यानि साध्य तो संसार है और भगवान एक साधन मात्र| कोई दो लाख में से एक व्यक्ति ही ऐसा होता है जो परमात्मा को पाना चाहता है|
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प्राचीन भारत एक अपवाद था| यहाँ की सनातन संस्कृति ही विकसित हुई परमात्मा यानि ब्रह्म को पाने का ही लक्ष्य बनाकर| यहाँ की संस्कृति में सम्मान ही हुआ तो ब्रह्मज्ञों का| जीवात्मा का उद्गम जहाँ से हुआ है, वहाँ अपने स्त्रोत में उसे बापस तो जाना ही पड़ेगा चाहे लाखों जन्म और लेने पड़ें| तभी जीवन चक्र पूर्ण होगा|
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इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, बहुत सारा सद्साहित्य इस विषय पर उपलब्ध है| अनेक संत महात्मा हैं जो निष्ठावान मुमुक्षुओं का मार्गदर्शन करते रहते हैं| अतः और लिखने की आवश्यकता नहीं है| जब ह्रदय में अहैतुकी परम प्रेम और निष्ठा होती है तब भगवान मार्गदर्शन स्वयं ही करते हैं| पात्रता होने पर सदगुरु का आविर्भाव भी स्वतः ही होता है|
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जब हम अग्नि के समक्ष बैठते हैं तो ताप की अनुभूति अवश्य होती है| कई बार अनुभूति ना होने पर भी ताप तो मिलता ही है| वैसे ही जब भी हम परमात्मा का स्मरण या ध्यान करते हैं तो उनके अनुग्रह की प्राप्ति अवश्य होती है|
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परमात्मा को पाने का मार्ग है अहैतुकी (Unconditional) परम प्रेम| प्रेम में कोई माँग नहीं होती, मात्र शरणागति और समर्पण होता है| प्रेम, गहन अभीप्सा और समर्पण हो तो और कुछ भी नहीं चाहिए| सब कुछ अपने आप ही मिल जाता है| अपने प्रेमास्पद का ध्यान निरंतर तेलधारा के समान होना चाहिए| प्रेम हो तो आगे का सारा ज्ञान स्वतः ही प्राप्त हो जाता है और आगे के सारे द्वार स्वतः ही खुल जाते हैं|
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जो लोग सेवानिवृत है उन्हें तो अधिक से अधिक समय नामजप और ध्यान में बिताना चाहिए| सांसारिक नौकरी में अपना वेतन प्राप्त करने के लिए दिन में कम से कम आठ घंटे काम करना पड़ता है| व्यापारी की नौकरी तो चौबीस घंटे की होती है| कुछ समय भगवान की नौकरी भी करनी चाहिए| जब जगत मजदूरी देता है तो भगवान क्यों नहीं देंगे? उनसे मजदूरी तो माँगनी ही नहीं चाहिए| माँगना ही है तो सिर्फ उनका प्रेम, प्रेम के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं| प्रेम को ही मजदूरी मान लीजिये| एक बात का ध्यान रखें ..... मजदूरी उतनी ही मिलेगी जितनी आप मेहनत करोगे| बिना मेहनत के मजदूरी नहीं मिलेगी| इस सृष्टि में निःशुल्क कुछ भी नहीं है| हर चीज की कीमत चुकानी पडती है|
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सार :---- हमें परमात्मा की प्राप्ति इसलिए नहीं होती क्योंकि हम परमात्मा को प्राप्त करना ही नहीं चाहते| हम स्वयं के प्रति ईमानदार नहीं हैं| अपने अहंकार की तृप्ति के लिए भक्ति का झूठा दिखावा करते हैं| अपनी मानसिक कल्पना से और झूठे शब्द जाल से स्वयं को ठग रहे हैं| हमने परमात्मा को तो साधन बना रखा है, पर साध्य तो संसार ही है|
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आप सब में हृदयस्थ परमात्मा को पुनश्चः प्रणाम| आप सब की जय हो| ॐ तत्सत् ! ॐ श्रीगुरवे नमः ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ अप्रेल २०१५

जगन्माता से प्रेम ......

जगन्माता से प्रेम .....
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जब अरुणिमा की एक झलक दूर से मिलती है तब यह भी सुनिश्चित है कि सूर्योदय में अधिक विलम्ब नहीं है| वैसे ही जगन्माता के प्रेम की एक झलक मिल जाए तो यह सुनिश्चित है कि जीवन में माँ का अवतरण होने ही वाला है|
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बंगाल में राम प्रसाद नाम के एक भक्त कवि हुए हैं जो नित्य जगन्माता का दर्शन माँ काली के रूप में करते , उनसे बात भी करते और भाव जगत में उनके बालक बनकर साथ साथ खेलते भी थे| उनकी कुछ कविताओं का अनुवाद करवा कर मैनें कई वर्षों पूर्व अध्ययन किया था| उनसे जगन्माता कोई वरदान माँगने के लिए कहतीं तो वे माँ से सिर्फ उनका पूर्ण प्रेम ही माँगते| सदा माँ का उत्तर यही होता कि यदि मैं तुम्हें अपना पूर्ण प्रेम दे दूँगी तो मेरे पास कुछ भी नहीं बचेगा|
माँ से कुछ माँगना ही है तो सिर्फ प्रेम ही माँगना चाहिए फिर सब कुछ अपने आप ही मिल जाता है|
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हमें अपने 'कर्ता' होने के मिथ्या अभिमान को त्याग देना चाहिए| एकमात्र कर्ता तो माँ भगवती ही हैं| अपना सर्वस्व उनके श्री चरणों में समर्पित कर देना चाहिए|
'कर्ता' तो जगन्माता माँ भगवती स्वयं है जो यज्ञ रूप में हमारे कर्मफल परमात्मा को अर्पित करती है| वे 'कर्ता' ही नहीं 'दृष्टा' 'दृश्य' व 'दर्शन' भी हैं, 'साधक' 'साधना' व 'साध्य' भी हैं, और 'उपासना' ;उपासक' और 'उपास्य' भी हैं|
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भगवन श्रीकृष्ण का अभय वचन है .....
"मच्चितः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात् तरिष्यसि |"
अपना चित्त मुझे दे देने से तूँ समस्त कठिनाइयों और संकटों को मेरे प्रसाद से पार कर लेगा|
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भगवान श्रीराम का भी अभय वचनं है --
"सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते| अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं ममः||"
एक बार भी जो मेरी शरण में आ जाता है उसको सब भूतों (यानि प्राणियों से) अभय प्रदान करना मेरा व्रत है|
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जब साकार परमात्मा के इतने बड़े वचन हैं तो शंका किस बात की? तुरंत कमर कस कर उनके प्रेम सागर में डुबकी लगा देनी चाहिए| मोती नहीं मिलते हैं तो दोष सागर का नहीं है, दोष डुबकी में ही है जिसमें पूर्णता लाओ|
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ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||

Saturday, 8 April 2017

स्वभाव और अभाव .......

स्वभाव और अभाव .......
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इन दो शब्दों को समझ लेने पर आध्यात्मिक यात्रा अति सरल हो जाती है| मैं भी इसी का पाठ अभी तक पढ़ रहा हूँ| इससे परे नहीं जा पाया हूँ| जब मैं स्वभाव में जीता हूँ तब मैं पूर्णतः सकारात्मक होता हूँ| जब अभाव में होता हूँ तब बहुत अधिक नकारात्मक हो जाता हूँ| अभाव है उस वस्तु या उस तत्व का जो हमारे पास नहीं है| अभाव माया है, अभाव मृत्यु के सामान है|
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स्वभाव है परमात्मा में जीना| हमारा वास्तविक "स्व" तो परमात्मा है| परमात्मा की चेतना में जीना ही हमारा वास्तविक और सही स्वभाव है| हम अपने स्वभाव में जीएँ और स्वभाव के विरुद्ध जो कुछ भी है उसका परित्याग करें|
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निरंतर अभ्यास करते करते परमात्मा व गुरु की असीम कृपा से निरंतर ब्रह्म-चिंतन और भक्ति ही हमारा स्वभाव बन जाता है| जब भगवान ह्रदय में आकर बैठ जाते हैं तब वे फिर बापस नहीं जाते| यह स्वाभाविक अवस्था कभी न कभी तो सभी को प्राप्त होती है|
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सरिता प्रवाहित होती है, पर किसी के लिए नहीं| प्रवाहित होना उसका स्वभाव है| व्यक्ति .. स्वयं को व्यक्त करना चाहता है, यह उसका स्वभाव है| हमें किसी से कुछ अपेक्षा नहीं होती और किसी से कुछ भी नहीं चाहिए पर स्वयं को व्यक्त करते हैं, यह भी हमारा स्वभाव है| जो लोग सर्वस्व यानि समष्टि की उपेक्षा करते हुए इस मनुष्य देह के हित की ही सोचते हैं, प्रकृति उन्हें कभी क्षमा नहीं करती| वे सब दंड के भागी होते हैं| समस्त सृष्टि ही अपना परिवार है और समस्त ब्रह्माण्ड ही अपना घर| यह देह रूपी वाहन और यह पृथ्वी भी बहुत छोटी है अपने निवास के लिए| अपना प्रेम सर्वस्व में पूर्णता से व्यक्त हो|
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जो मेरी बात को समझते हैं मैं उनका भी आभारी हूँ और जिन्होंने नहीं समझा है उनका भी| आप सब मेरी निजात्माएँ हैं, आप परमात्मा के साकार रूप हो| आप सब मेरे प्राण हो| आप को मेरा अनंत असीम अहैतुकी परम प्यार| आप सब अपनी पूर्णता को उपलब्ध हों, यही मेरी शुभ कामना है|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
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पुनश्चः :----
(१) व्याघ्रः सेवति काननं च गहनं सिंहो गुहां सेवते
हंसः सेवति पद्मिनीं कुसुमितां गृधः श्मशानस्थलीम् |
साधुः सेवति साधुमेव सततं नीचोऽपि नीचं जनम्
या यस्य प्रकृतिः स्वभावजनिता केनापि न त्यज्यते ||
बाघ घने वन में और सिंह गुफा में रहता है, हंस विकसित कमलिनी के पास रहता है और गिद्ध श्मशान भूमि में| वैसे ही साधु, साधु की, और नीच, नीच की संगती करता है; जन्मजात स्वभाव किसी से छूटता नहीं है|


(२) निम्नोन्नतं वक्ष्यति को जलानाम्
विचित्रभावं मृगपक्षिणां च |
माधुर्यमिक्षौ कटुतां च निम्बे
स्वभावतः सर्वमिदं हि सिद्धम् ||
जल को ऊँचाई और गहराई किसने दिखायी? पशु-पक्षियों को विचित्रता किसने सीखाई? गन्ने में मधुरता और नीम में कड़वापन कौन लाया? यह सब स्वभावसिद्ध है|

(३) स्वभावो न उपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा |
सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम् ||
उपदेश देकर स्वभाव बदला नहीं जाता| पानी को खूब गर्म करने के पश्चात् भी वह पुनः (स्वभावानुसार) शीतल हो जाता है|