Tuesday, 11 April 2017

हमें परमात्मा की प्राप्ति क्यों नहीं होती ?.............

हमें परमात्मा की प्राप्ति क्यों नहीं होती ? .....
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||ॐ|| विभिन्न देहों में मेरे ही प्रियतम निजात्मन, आप सब में साकार परमात्मा को मैं नमन करता हूँ| एक शाश्वत् प्रश्न है कि हमें परमात्मा की प्राप्ति क्यों नहीं होती ?
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इसका उत्तर मैं अपनी भाषा में यदि सरलतम और स्पष्टतम शब्दों में देना चाहूँ तो इसका एक ही उत्तर है, और वह यह है कि ..... "हमारे में ईमानदारी की कमी है, हम स्वयं के प्रति ईमानदार नहीं हैं, हम स्वयं को ठगना चाहते हैं और स्वयं के द्वारा ही ठगे जा रहे हैं|"
किसी भी सांसारिक उपलब्धी के लिए तो हम दिन रात एक कर देते हैं, हाडतोड़ परिश्रम करते हैं, पर जो उच्चतम उपलब्धी है वह हम सिर्फ ऊँची ऊँची बातों के शब्दजाल से ही प्राप्त करना चाहते हैं| वास्तविकता तो यह है की हम परमात्मा को प्राप्त करना ही नहीं चाहते| हम सिर्फ सांसारिक सुखों को, सांसारिक उपलब्धियों को और अधिक से अधिक अपने अहंकार की तृप्ति के लिए ही भगवान की विभूतियों को प्राप्त करना चाहते हैं| हमारे लिए भगवान एक माध्यम है, पर लक्ष्य तो संसार है| यानि साध्य तो संसार है और भगवान एक साधन मात्र| कोई दो लाख में से एक व्यक्ति ही ऐसा होता है जो परमात्मा को पाना चाहता है|
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प्राचीन भारत एक अपवाद था| यहाँ की सनातन संस्कृति ही विकसित हुई परमात्मा यानि ब्रह्म को पाने का ही लक्ष्य बनाकर| यहाँ की संस्कृति में सम्मान ही हुआ तो ब्रह्मज्ञों का| जीवात्मा का उद्गम जहाँ से हुआ है, वहाँ अपने स्त्रोत में उसे बापस तो जाना ही पड़ेगा चाहे लाखों जन्म और लेने पड़ें| तभी जीवन चक्र पूर्ण होगा|
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इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, बहुत सारा सद्साहित्य इस विषय पर उपलब्ध है| अनेक संत महात्मा हैं जो निष्ठावान मुमुक्षुओं का मार्गदर्शन करते रहते हैं| अतः और लिखने की आवश्यकता नहीं है| जब ह्रदय में अहैतुकी परम प्रेम और निष्ठा होती है तब भगवान मार्गदर्शन स्वयं ही करते हैं| पात्रता होने पर सदगुरु का आविर्भाव भी स्वतः ही होता है|
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जब हम अग्नि के समक्ष बैठते हैं तो ताप की अनुभूति अवश्य होती है| कई बार अनुभूति ना होने पर भी ताप तो मिलता ही है| वैसे ही जब भी हम परमात्मा का स्मरण या ध्यान करते हैं तो उनके अनुग्रह की प्राप्ति अवश्य होती है|
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परमात्मा को पाने का मार्ग है अहैतुकी (Unconditional) परम प्रेम| प्रेम में कोई माँग नहीं होती, मात्र शरणागति और समर्पण होता है| प्रेम, गहन अभीप्सा और समर्पण हो तो और कुछ भी नहीं चाहिए| सब कुछ अपने आप ही मिल जाता है| अपने प्रेमास्पद का ध्यान निरंतर तेलधारा के समान होना चाहिए| प्रेम हो तो आगे का सारा ज्ञान स्वतः ही प्राप्त हो जाता है और आगे के सारे द्वार स्वतः ही खुल जाते हैं|
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जो लोग सेवानिवृत है उन्हें तो अधिक से अधिक समय नामजप और ध्यान में बिताना चाहिए| सांसारिक नौकरी में अपना वेतन प्राप्त करने के लिए दिन में कम से कम आठ घंटे काम करना पड़ता है| व्यापारी की नौकरी तो चौबीस घंटे की होती है| कुछ समय भगवान की नौकरी भी करनी चाहिए| जब जगत मजदूरी देता है तो भगवान क्यों नहीं देंगे? उनसे मजदूरी तो माँगनी ही नहीं चाहिए| माँगना ही है तो सिर्फ उनका प्रेम, प्रेम के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं| प्रेम को ही मजदूरी मान लीजिये| एक बात का ध्यान रखें ..... मजदूरी उतनी ही मिलेगी जितनी आप मेहनत करोगे| बिना मेहनत के मजदूरी नहीं मिलेगी| इस सृष्टि में निःशुल्क कुछ भी नहीं है| हर चीज की कीमत चुकानी पडती है|
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सार :---- हमें परमात्मा की प्राप्ति इसलिए नहीं होती क्योंकि हम परमात्मा को प्राप्त करना ही नहीं चाहते| हम स्वयं के प्रति ईमानदार नहीं हैं| अपने अहंकार की तृप्ति के लिए भक्ति का झूठा दिखावा करते हैं| अपनी मानसिक कल्पना से और झूठे शब्द जाल से स्वयं को ठग रहे हैं| हमने परमात्मा को तो साधन बना रखा है, पर साध्य तो संसार ही है|
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आप सब में हृदयस्थ परमात्मा को पुनश्चः प्रणाम| आप सब की जय हो| ॐ तत्सत् ! ॐ श्रीगुरवे नमः ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ अप्रेल २०१५

जगन्माता से प्रेम ......

जगन्माता से प्रेम .....
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जब अरुणिमा की एक झलक दूर से मिलती है तब यह भी सुनिश्चित है कि सूर्योदय में अधिक विलम्ब नहीं है| वैसे ही जगन्माता के प्रेम की एक झलक मिल जाए तो यह सुनिश्चित है कि जीवन में माँ का अवतरण होने ही वाला है|
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बंगाल में राम प्रसाद नाम के एक भक्त कवि हुए हैं जो नित्य जगन्माता का दर्शन माँ काली के रूप में करते , उनसे बात भी करते और भाव जगत में उनके बालक बनकर साथ साथ खेलते भी थे| उनकी कुछ कविताओं का अनुवाद करवा कर मैनें कई वर्षों पूर्व अध्ययन किया था| उनसे जगन्माता कोई वरदान माँगने के लिए कहतीं तो वे माँ से सिर्फ उनका पूर्ण प्रेम ही माँगते| सदा माँ का उत्तर यही होता कि यदि मैं तुम्हें अपना पूर्ण प्रेम दे दूँगी तो मेरे पास कुछ भी नहीं बचेगा|
माँ से कुछ माँगना ही है तो सिर्फ प्रेम ही माँगना चाहिए फिर सब कुछ अपने आप ही मिल जाता है|
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हमें अपने 'कर्ता' होने के मिथ्या अभिमान को त्याग देना चाहिए| एकमात्र कर्ता तो माँ भगवती ही हैं| अपना सर्वस्व उनके श्री चरणों में समर्पित कर देना चाहिए|
'कर्ता' तो जगन्माता माँ भगवती स्वयं है जो यज्ञ रूप में हमारे कर्मफल परमात्मा को अर्पित करती है| वे 'कर्ता' ही नहीं 'दृष्टा' 'दृश्य' व 'दर्शन' भी हैं, 'साधक' 'साधना' व 'साध्य' भी हैं, और 'उपासना' ;उपासक' और 'उपास्य' भी हैं|
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भगवन श्रीकृष्ण का अभय वचन है .....
"मच्चितः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात् तरिष्यसि |"
अपना चित्त मुझे दे देने से तूँ समस्त कठिनाइयों और संकटों को मेरे प्रसाद से पार कर लेगा|
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भगवान श्रीराम का भी अभय वचनं है --
"सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते| अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं ममः||"
एक बार भी जो मेरी शरण में आ जाता है उसको सब भूतों (यानि प्राणियों से) अभय प्रदान करना मेरा व्रत है|
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जब साकार परमात्मा के इतने बड़े वचन हैं तो शंका किस बात की? तुरंत कमर कस कर उनके प्रेम सागर में डुबकी लगा देनी चाहिए| मोती नहीं मिलते हैं तो दोष सागर का नहीं है, दोष डुबकी में ही है जिसमें पूर्णता लाओ|
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ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||

Saturday, 8 April 2017

स्वभाव और अभाव .......

स्वभाव और अभाव .......
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इन दो शब्दों को समझ लेने पर आध्यात्मिक यात्रा अति सरल हो जाती है| मैं भी इसी का पाठ अभी तक पढ़ रहा हूँ| इससे परे नहीं जा पाया हूँ| जब मैं स्वभाव में जीता हूँ तब मैं पूर्णतः सकारात्मक होता हूँ| जब अभाव में होता हूँ तब बहुत अधिक नकारात्मक हो जाता हूँ| अभाव है उस वस्तु या उस तत्व का जो हमारे पास नहीं है| अभाव माया है, अभाव मृत्यु के सामान है|
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स्वभाव है परमात्मा में जीना| हमारा वास्तविक "स्व" तो परमात्मा है| परमात्मा की चेतना में जीना ही हमारा वास्तविक और सही स्वभाव है| हम अपने स्वभाव में जीएँ और स्वभाव के विरुद्ध जो कुछ भी है उसका परित्याग करें|
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निरंतर अभ्यास करते करते परमात्मा व गुरु की असीम कृपा से निरंतर ब्रह्म-चिंतन और भक्ति ही हमारा स्वभाव बन जाता है| जब भगवान ह्रदय में आकर बैठ जाते हैं तब वे फिर बापस नहीं जाते| यह स्वाभाविक अवस्था कभी न कभी तो सभी को प्राप्त होती है|
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सरिता प्रवाहित होती है, पर किसी के लिए नहीं| प्रवाहित होना उसका स्वभाव है| व्यक्ति .. स्वयं को व्यक्त करना चाहता है, यह उसका स्वभाव है| हमें किसी से कुछ अपेक्षा नहीं होती और किसी से कुछ भी नहीं चाहिए पर स्वयं को व्यक्त करते हैं, यह भी हमारा स्वभाव है| जो लोग सर्वस्व यानि समष्टि की उपेक्षा करते हुए इस मनुष्य देह के हित की ही सोचते हैं, प्रकृति उन्हें कभी क्षमा नहीं करती| वे सब दंड के भागी होते हैं| समस्त सृष्टि ही अपना परिवार है और समस्त ब्रह्माण्ड ही अपना घर| यह देह रूपी वाहन और यह पृथ्वी भी बहुत छोटी है अपने निवास के लिए| अपना प्रेम सर्वस्व में पूर्णता से व्यक्त हो|
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जो मेरी बात को समझते हैं मैं उनका भी आभारी हूँ और जिन्होंने नहीं समझा है उनका भी| आप सब मेरी निजात्माएँ हैं, आप परमात्मा के साकार रूप हो| आप सब मेरे प्राण हो| आप को मेरा अनंत असीम अहैतुकी परम प्यार| आप सब अपनी पूर्णता को उपलब्ध हों, यही मेरी शुभ कामना है|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
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पुनश्चः :----
(१) व्याघ्रः सेवति काननं च गहनं सिंहो गुहां सेवते
हंसः सेवति पद्मिनीं कुसुमितां गृधः श्मशानस्थलीम् |
साधुः सेवति साधुमेव सततं नीचोऽपि नीचं जनम्
या यस्य प्रकृतिः स्वभावजनिता केनापि न त्यज्यते ||
बाघ घने वन में और सिंह गुफा में रहता है, हंस विकसित कमलिनी के पास रहता है और गिद्ध श्मशान भूमि में| वैसे ही साधु, साधु की, और नीच, नीच की संगती करता है; जन्मजात स्वभाव किसी से छूटता नहीं है|


(२) निम्नोन्नतं वक्ष्यति को जलानाम्
विचित्रभावं मृगपक्षिणां च |
माधुर्यमिक्षौ कटुतां च निम्बे
स्वभावतः सर्वमिदं हि सिद्धम् ||
जल को ऊँचाई और गहराई किसने दिखायी? पशु-पक्षियों को विचित्रता किसने सीखाई? गन्ने में मधुरता और नीम में कड़वापन कौन लाया? यह सब स्वभावसिद्ध है|

(३) स्वभावो न उपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा |
सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम् ||
उपदेश देकर स्वभाव बदला नहीं जाता| पानी को खूब गर्म करने के पश्चात् भी वह पुनः (स्वभावानुसार) शीतल हो जाता है|

Friday, 7 April 2017

जब बुद्धि जड़ हो जाए तो क्या करें ? .....

जब बुद्धि जड़ हो जाए तो क्या करें ? .....
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जीव ईश्वर का अंश है पर अपने प्रारब्ध कर्मफलों को भुगतने के लिए जड़बुद्धि भी हो जाता है| इसका समाधान प्रभु के श्रीचरणों की भक्ति ही है| अन्य कोई समाधान नहीं है|
विषयों का आकर्षण इतना प्रबल है कि मनुष्य उसमें फंसे बिना नहीं रह सकता|
वृद्धावस्था में प्रायः सभी की बुद्धि जड़ हो जाती है| अतः वृद्धावस्था में भगवान की शरणागत होना अति आवश्यक है|
ॐ ॐ ॐ ||

ब्रह्मचर्य सबसे बड़ा तप है जो देवों को भी दुर्लभ है .....

ब्रह्मचर्य सबसे बड़ा तप है जो देवों को भी दुर्लभ है .....
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आप सब में साकार परमात्मा को मैं नमन करता हूँ| निम्न पंक्तियाँ सिर्फ आध्यात्मिक साधकों के लिए है, अन्य कृपया क्षमा करें|
निज जीवन में जो भी मनुष्य परमात्मा को उपलब्ध होना चाहते हैं उन्हें ब्रह्मचर्य का पालन तो करना ही होगा| ईश्वर के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा ही काम-वासना है| मनुष्य की आत्मशक्ति का विकास ब्रह्मचर्य से ही होता है| वासनाओं के चिंतन से मनुष्य की चित्त शक्ति निरंतर क्षीण होती चली जाती है| सात्विक भोजन, कुसंग त्याग, सत्संग और निरंतर परमात्मा का चिंतन इसके लिए आवश्यक है|
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आध्यात्म मार्ग के पथिक को टीवी पर आने वाले सभी धारावाहिक नाटकों (सीरियल्स) को देखना भी बंद करन होगा क्योंकि सभी धारावाहिक नाटक परस्त्री/परपुरुष सम्बन्धों और एक दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्रों पर आधारित होते हैं जो समाज में विखंडन और पारिवारिक सम्बन्धों को नष्ट करने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं| इनमें कुछ भी सकारात्मकता नहीं है|
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ऐसे ही अधिकाँश समाचार चैनलें हैं जो विकृत मानसिकता के प्रदर्शन के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है| इन सब के मालिक विदेशी और भारत विरोधी हैं| भारत की अस्मिता हिंदुत्व है और ये सब हिंदुत्व विरोधी हैं| जो समय इन्हें देखने में नष्ट होता है वह परमात्मा के चिंतन में लगाएँ|
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नित्य प्रातः उठते ही संकल्प करें ...... "आज का दिन मेंरे जीवन का सर्वश्रेष्ठ दिन होगा| आज के दिन मेंरे जीवन में परमात्मा के परमप्रेम की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति होगी| मैं परमात्मा का अमृतपुत्र हूँ, मैं परमात्मा के साथ एक हूँ, मैं आध्यात्म के उच्चतम शिखर पर आरूढ़ हूँ, मैं परमशिव हूँ, शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि| ॐ ॐ ॐ ||"
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रक्तबीज और महिषासुर हमारे भीतर अभी भी जीवित हैं, उनकी चुनौती और अट्टहास हम सब को नित्य सुनाई देता है| ये हमारे अवचेतन मन में छिपे हैं और चित्त की वृत्तियों के रूप में निरंतर प्रकट होते हैं| जितना इनका दमन करते हैं, उतना ही इनका विस्तार होता है| हमारे सारे दुःखों, कष्टों, पीड़ाओं, दरिद्रता और दुर्गति के मूल में ये दोनों ही महा असुर हैं| निज प्रयास से इनका नाश नहीं हो सकता| जगन्माता की शक्ति ही इनका विनाश कर सकती है जिस के लिए हमें साधना करनी होगी|
परस्त्री/पुरुष व पराये धन की कामना, अन्याय/अधर्म द्वारा धन पाने की इच्छा, परपीड़ा, अधर्माचरण और मिथ्या अहंकार ही रक्तबीज है|
प्रमाद यानि आलस्य, काम को आगे टालने की प्रवृत्ति और तमोगुण ही महिषासुर है|
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हे माँ भगवती, यह सारी सृष्टि तुम्हारे मन की एक कल्पना, विचार और संकल्प मात्र है| मैं तुम्हें पूर्णतः समर्पित हूँ| मेरी रक्षा करो| भारत के भीतर और बाहर के सभी शत्रुओं का नाश करो| सनातन धर्म की सर्वत्र पुनर्प्रतिष्ठा हो| सब का कल्याण हो| .
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
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पुनश्चः :--- जब तक मन में कामुकता का कण मात्र भी है तब तक किसी भी परिस्थिति में ज़रा सी भी आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो सकती|

Thursday, 6 April 2017

भगवान सत्यनारायण हैं .....

भगवान सत्यनारायण हैं .....
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असत्य वादन यानि झूठ बोलने से और दूसरों की निंदा करने से वाणी दग्ध हो जाती है| उस दग्ध वाणी से किया गया कोई मंत्रपाठ, प्रार्थना या आराधना सफल नहीं होती है| वे दग्ध वाणी के शब्द चाहे बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ति या परा, किसी भी स्तर के हों|
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जो सदा सत्य बोलते हैं उनके मुख से निकले वचन स्वतः ही सत्य हो जाते हैं| हमारे धर्म और संस्कृति में सत्य का सर्वाधिक महत्व इसी लिए है| इस विषय पर शास्त्रों में बहुत कुछ लिखा हुआ है| आध्यात्मिक अनुभव भी उन्हीं को होते हैं जो सत्य में जीते हैं|
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एकमात्र सत्य परमात्मा है| सत्य का साक्षात्कार ही परमात्मा का साक्षात्कार है|
मन में हम अनेक शुभ संकल्प कर लेते हैं पर भौतिक स्तर पर उनका क्रियान्वन नहीं करते इसलिए वे संकल्प मिथ्या और व्यर्थ हो जाते हैं| सभी संकल्पों को साकार रूप भी देना चाहिए, यह भी सत्य की साधना है| हमारे भौतिक अस्तित्व से अन्यों को लाभ पहुँचना चाहिए|
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हम अपने नित्य कर्मों का पालन करें, किसी को पीड़ित न करें, परोपकार के कार्य करें, और स्वयं के प्रति ईमानदार रहें| आत्मप्रशंसा, परनिंदा और असत्य बोलने से बचें| दूसरों का गला काटकर कोई बड़ा या महान नहीं बन सकता| वर्षा का जल पर्वत के शिखर से नीचे तालाब में आता है तो तालाब पर्वत के शिखर को दोष नहीं दे सकता| हमें स्वयं को ऊपर उठ कर सत्य में प्रतिष्ठित होना होगा|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

इस दुःख रुपी संसार सागर के महाभय से रक्षा सिर्फ धर्म के पालन से ही होगी ...

इस दुःख रुपी संसार सागर के महाभय से रक्षा सिर्फ धर्म के पालन से ही होगी ...
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण का वचन है ---
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते |
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ||२:४०||
अर्थात इस महाभय से हमारी रक्षा थोड़ा बहुत धर्म का पालन ही करेगा|
जब भगवान श्रीकृष्ण का आदेश है तो उसकी पालना हमें करनी ही होगी| अन्य सारे उपाय अति जटिल और कठिन है अतः सबसे सरल मार्ग के रूप में स्वाभाविक रूप से धर्म का पालन हमें करना ही चाहिए, तभी धर्म ही हमारी रक्षा करेगा| धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है और धर्म की रक्षा ही अपनी स्वयं की रक्षा है|
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वैसे तो महाभारत में "धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां" कहा गया है, पर भारतवर्ष पर इतनी तो कृपा है परमात्मा की कि भारत में एक सामान्य से सामान्य व्यक्ति को भी पता है कि धर्म और अधर्म क्या है| कभी कोई संशय हो तो निष्ठापूर्वक अपने हृदय से पूछिए, हमारा हृदय बता देगा कि धर्म क्या है और अधर्म क्या है| हम अपने नित्य कर्मों का पालन करें, किसी को पीड़ित न करें, परोपकार के कार्य करें, और स्वयं के प्रति ईमानदार रहें, इतना ही पर्याप्त है| आत्मप्रशंसा, परनिंदा और असत्य बोलने से बचें| दूसरों का गला काटकर कोई बड़ा या महान नहीं बन सकता| वर्षा का जल पर्वत के शिखर से नीचे तालाब में आता है तो तालाब पर्वत के शिखर को दोष नहीं दे सकता| हमें स्वयं को ऊपर उठना होगा|

ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
७ अप्रेल २०१६