Wednesday, 29 March 2017

धर्म की रक्षा धर्म के पालन से होगी, एक-दूसरे की निंदा व आलोचना से नहीं .....

धर्म की रक्षा धर्म के पालन से होगी, एक-दूसरे की निंदा व आलोचना से नहीं .....
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आजकल यह एक प्रचलन सा हो गया है कि धर्म की बात आते ही कोई तो धर्माचार्यों को गाली देना शुरू कर देता है, कोई समाज के नेताओं को, कोई प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को| खुद यह नहीं देखते कि उनका स्वयं का योगदान क्या है| वर्तमान परिस्थितियों में हम सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं, यह निश्चय कर के ही कुछ करना चाहिए| धर्म की रक्षा स्वयं के आचरण से ही होगी, अन्य कोई उपाय नहीं है|
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(१) हम जो भी कार्य करें वह अपनी क्षमतानुसार पूरे मनोयोग से और सर्वश्रेष्ठ करें| यह भाव रखें कि हम ईश्वर की प्रसन्नता के लिए, ईश्वर के लिए ही यह कार्य कर रहे है, न कि किसी मनुष्य को प्रसन्न करने के लिए| ईश्वर ने ही हमें कार्य करने का यह अवसर दिया है| धीरे धीरे परमात्मा को कर्ता बनाकर उसके उपकरण मात्र बन जाओ|
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(२) किसी की अनावश्यक आलोचना या निंदा न करें|
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(३) जीवन से ईर्ष्या-द्वेष और अहंकार को मिटाने का प्रयास करते रहें|
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(४) रात्रि को सोने से पूर्व नाम-स्मरण, जप, ध्यान आदि कर के ही सोयें|
प्रातःकाल उठते ही परमात्मा का स्मरण करें| पूरे दिन परमात्मा की स्मृति निरंतर प्रयास करके बनाए रखें|
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(५) पराये धन और पराई स्त्री/पुरुष कि कामना न करें|
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(६) अच्छा साहित्य पढ़ें, अच्छे लोगों के साथ रहें, और कुसंगति से दूर रहे|
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(७) स्वास्थ्यवर्धक अच्छा सात्विक भोजन लें| शराब और जूए से दूर रहें| पर्याप्त मात्रा में विश्राम करें| आयु के अनुसार शारीरिक व्यायाम कर के स्वस्थ रहें|
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उपरोक्त सब बिन्दुओं पर गंभीरता से विचार कर के और उस पर आचरण कर के ही हम धर्म की रक्षा कर पायेंगे, अन्यथा नहीं| धर्माचरण बहुत आवश्यक है क्योंकि विश्व की ही नहीं, अपने देश की भी कई आसुरी शक्तियाँ अपने राष्ट्र को ही तोड़ना चाहती हैं| धर्माचरण ही हमें बचा पायेगा| भगवान की भक्ति के प्रचार-प्रसार से ही जातिवाद टूटेगा, देशभक्ति जागृत होगी और कभी गृहयुद्ध की सी स्थिति नहीं आएगी| अपने राष्ट्र, अपनी संस्कृति, अपने राष्ट्रधर्म और स्वाभिमान की रक्षा करें|
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जय जननी जय भारत ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२८ मार्च २०१६

नव सम्वत्सर की शुभ कामनाएँ और अभिनन्दन ....

नव सम्वत्सर विक्रम संवत २०७४ की शुभ कामनाएँ और अभिनन्दन|

हमारे जीवन का हर क्षण नववर्ष हो| आत्म-चैतन्य की अनुभूति में हम देश-काल से परे (beyond time and space) होते हैं| वहाँ न कोई भूत है और न भविष्य, सिर्फ वर्तमान का ही अस्तित्व है| पर लौकिक जगत में नवसंवत्सर का दिन साधना की दृष्टी से अति शुभ है| आज से वासंतीय नवरात्रों का प्रारम्भ हो रहा है और रामनवमी भी शीघ्र आने ही वाली है| आज से नौ दिनों में हमारा जीवन राममय हो, हमारे निज जीवन में राम का प्राकट्य हो, यह हमारा आज का शुभ संकल्प है|
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जगन्माता ..... महाकाली के रूप में हमारे चैतन्य में व्याप्त अशुभ संस्कारों का नाश करे, महालक्ष्मी के रूप में सारे शुभ संस्कार दे और महासरस्वती के रूप में आत्मज्ञान दे| आज यह हमारी प्रार्थना है|
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इस लौकिक जीवन का अधिकाँश काल व्यतीत हो चुका है, जीवन का संध्याकाल है और बहुत कम समय बचा है| लोग निंदा करें या स्तुति, धन आये या जाए, यह शरीर रहे या न रहे, पर इस बचे हुए शेष जीवन में हमें परमात्मा को प्राप्त करना ही है|
 

मन में शुभ संकल्प और दृढ़ निश्चय होगा तो परमात्मा की परम कृपा भी होगी और स्वतः मार्गदर्शन भी प्राप्त होगा|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

Wednesday, 8 March 2017

भारत में महिलाओं की स्थिति .......

भारत में महिलाओं की स्थिति .......
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स्त्री और पुरुष दोनों एक ही गाडी के दो पहिये होते हैं| दोनों एक दूसरे पर निर्भर हैं| न तो स्त्री के बिना पुरुष रह सकता है और न पुरुष के बिना स्त्री| स्त्री जहाँ भाव प्रधान है, वहीं पुरुष विवेक प्रधान| मूल रूप से दोनों आत्मा हैं, आत्मा के कोई लिंग नहीं होता|
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भारत में स्त्रियों की स्थिति विदेशी आक्रमणों से पूर्व तक विश्व में सर्वाधिक सम्माननीय थी| भारत की नारियाँ विद्वान् और वीरांगणा होती थीं|
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भारत पर विदेशी आक्रमणकारी, पुरुषों को मार कर उनकी स्त्रियों का बलात् अपहरण कर लेते थे| आतताइयों द्वारा उन पर बहुत अधिक अत्याचार होता था| या तो वे बेच दी जाती या उन्हें घर में रखैल की तरह रख लिया जाता| इस कारण पर्दाप्रथा और बालविवाह का आरम्भ हुआ| जौहर की प्रथा क्षत्रानियों ने अपने मान सम्मान की रक्षा के लिए आरम्भ कीं|
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अंग्रेजों ने अपनी सैनिक छावनियों के आसपास वैश्यालय स्थापित किये जहाँ वे भारतीय विधवाओं को बलात् अपहरण कर उन्हें वैश्या बना देते थे ताकि उनके अँगरेज़ सिपाही बापस अपने देश जाने की जल्दी न करें| इस कारण सती प्रथा का आरम्भ हुआ| जहाँ जहाँ अंग्रेजों की छावनियाँ थीं उनके आसपास के क्षेत्रों में ही विधवाएँ आत्मदाह कर लेती थी या उन्हें आत्मदाह के लिए बाध्य कर दिया जाता था| वहीं से सतीप्रथा का आरम्भ हुआ|
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स्त्रियों पर अबसे अधिक अत्याचार यूरोप में ही हुए जहाँ डायन होने के संदेह में करोड़ों महिलाओं की ह्त्या कर दी जाती थी|
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भारत में स्त्रियों की दुर्दशा विदेशी आक्रमणकारियों के कारण ही हुई| पर अब भारत का पुनर्जागरण हो रहा है| पुरुषों के साथ साथ महिलाएँ भी प्रबुद्ध होंगी|
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महिला उत्थान के नाम पर आज जहाँ स्त्री-पुरुष दोनों को एक-दूसरे के विरुद्ध खडा किया जा रहा है उसका मैं विरोध करता हूँ|
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दोनों मिलकर सहयोग और प्रेम से रहें और दोनों मिलकर अपने जीवन के परम लक्ष्य परमात्मा को प्राप्त करें|

ॐ ॐ ॐ ||

होली की दारुण रात्री ......

होली की दारुण रात्री ......
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भगवान नृसिंह और भक्त प्रहलाद को नमन करते हुए मैं होली के सुअवसर पर पाँच दिन पूर्व ही आप सब को भी सप्रेम सादर नमन करता हूँ| इस माह रविवार 12 मार्च 2017 के दिन होली का त्यौहार है| होली का एक आध्यात्मिक महत्त्व है|
होली की यह दारुण रात्री, देह की चेतना से ऊपर उठने की साधना का एक अवसर है| आत्म-विस्मृति ही सब दुःखों का कारण है| इस दारुण रात्री को गुरु प्रदत्त विधि से अपने आत्म-स्वरुप यानि सर्वव्यापी परमात्मा का ध्यान करें| इस रात्री में सुषुम्ना का प्रवाह प्रबल रहता है अतः निष्ठा और भक्ति से सिद्धि अवश्य मिलेगी|
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अपने गुरु नारद के द्वारा बताए हुए मन्त्रों से प्रह्लाद ने पाँचों तत्वों पर विजय प्राप्त कर ली थी, इस से उन्हें प्रत्येक पदार्थ में परमात्मा के दर्शन होने लगे| उनका कुछ भी अनिष्ट नहीं हो सका और उनकी रक्षा के लिए भगवान को स्वयं प्रकट होना ही पड़ा| इस रात्रि में पाँचों तत्व विद्यमान रहते हैं|
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आध्यात्मिक साधना और मंत्र सिद्धि के लिए चार रात्रियों का बड़ा महत्त्व है| होली की रात्री दारुण रात्री है जो मन्त्र सिद्धि के लिए सर्वश्रेष्ठ है| इसके अतिरिक्त अन्य रात्रियाँ है .... कालरात्रि ,महारात्रि , और मोहरात्रि|
दारुण रात्री को की गयी मंत्र साधना बहुत महत्वपूर्ण और सिद्धिदायी है| अनिष्ट शक्तियों से रक्षा, रोग निवारण, शत्रु बाधा, ग्रह बाधा आदि समस्त नकारात्मक बाधाओं के निवारण के लिए किसी आध्यात्मिक रक्षा कवच की साधना अवश्य करें| मेरी टाइमलाइन वाल पर श्रद्धेय Swami Rupeshwaranand जी ने एक लेख टैग किया है उसे अवश्य पढ़िए जिस में उन्होंने कवच सिद्धी की विधि लिखी है|
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मैं तो व्यक्तिगत रूप से अपनी गुरु प्रदत्त साधना में रहूँगा और आप ध्यान में मुझे अपने समीप ही पाओगे| होली पर करने के कई तांत्रिक टोटके व साधनाएँ हैं जिन्हें लिखना मैं उचित नहीं समझता हूँ क्योकि मैं स्वयं उनकी साधना नहीं करता|
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इस सुअवसर का सदुपयोग करें और समय इधर उधर नष्ट करने की बजाय आत्मज्ञान ही नहीं बल्कि धर्म और राष्ट्र के अभ्युदय के लिए भी साधना करें| एक विराट आध्यात्मिक शक्ति के जागरण की हमें आवश्यकता है| यह कार्य हमें करना ही पड़ेगा| अन्य कोई विकल्प नहीं है|
पुनश्चः आप सब को नमन और होली की शुभ कामनाएँ|
ॐ ॐ ॐ ||

वास्तविक स्वतन्त्रता परमात्मा में ही है .....

 जिन्होनें कभी जन्म ही न लिया हो, जिनकी कभी मृत्यु भी नहीं हो सकती, उन भगवान परम शिव का ध्यान ही हमें इस देह की चेतना से मुक्त कर सकता है| हर हर महादेव !

 वास्तविक स्वतन्त्रता परमात्मा में ही है| क्या अच्छा है और क्या बुरा है, इसका निर्णय करने में हमारा विवेक भी विफल हो सकता है| परमात्मा को पूर्ण समर्पण ही अभीष्ट है| परमात्मा या प्रकृति ही अपने नियमों के अनुसार जो करे वह ही सही है| मोक्ष क्रिया से नहीं वरन् ज्ञान से होता है, इतना तो अच्छी तरह समझ में आता है| अज्ञान ही बंधन है| परम प्रिय परमात्मा से पृथकता दूर हो|

हम कृष्ण, काली, क्राइस्ट या अल्लाह किसी की भी आराधना करते हों, वास्तव में हम उस परम ज्योति की ही आराधना कर रहे हैं जो सर्वत्र सर्वव्यापी हम स्वयं है| पूरी सृष्टि उसी ज्योति का ही घनीभूत रूप है| समस्त सृष्टि मूल रूप में वह दिव्य ज्योति ही है| वह ज्योति ही अनाहत नाद के रूप में व्यक्त होती है, वही प्रणव यानि ओंकार है| वह दिव्य ज्योति व ओंकार और उससे परे भी जो भी है वह मैं स्वयं हूँ| समस्त सृष्टि मुझमें है और मैं समस्त सृष्टि में व उससे परे भी हूँ|
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शिवोहं शिवोहं अहं ब्रम्हास्मि || ॐ ॐ ॐ ||


सभी को सप्रेम सादर नमन| ॐ ॐ ॐ ||

Sunday, 5 March 2017

आध्यात्मिक रक्षा कवच की आवश्यकता ...

वर्तमान समय में अनिष्ट आसुरी शक्तियों से रक्षा के लिए घर में एक आध्यात्मिक सुरक्षा कवच का निर्माण आवश्यक है| प्रातः सायंकाल की आरती से, नियमित ध्यान साधना से, निरंतर हरि स्मरण से, या अमोघ शिव कवच, बजरंग बाण, दुर्गा कवच आदि में से किसी एक के पाठ से, एक रक्षा कवच का निर्माण होता है|

पूजा के समय शंख में जल रखें व उसमे तुलसी पत्र हो| पूजा के उपरांत वह जल घर के दरवाजे से लेकर सभी कमरों में छिडकें| इस कार्य में नियमितता और निरंतरता बनाए रखें|

माथे पर तिलक और शिखा धारण, परमात्मा में दृढ़ आस्था, सादा जीवन उच्च विचार, भारतीय वेषभूषा, घर का सात्विक वातावरण, सात्विक आहार, नियमित दिनचर्या ..... ये सब हमारी आसुरी शक्तियों से रक्षा करते हैं|
आनेवाले संकटों से बचने और बचाने के लिए आध्यात्मिक शक्ति का आवाहन व संवर्धन आवश्यक हो गया है|

सभी को शुभ कामनाएँ और नमन ! ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

तमोगुण बहुत अधिक शक्तिशाली है .....

तमोगुण बहुत अधिक शक्तिशाली है| मैं गुणातीत होने की साधना करता हूँ, पर ज़रा सा भी असावधान होते ही तमोगुण आकर मेरे विवेक की अग्नि को अपनी राख से ढक देता है|
अतः साधू, सावधान !
हर समय सजग और सतर्क रह, ज़रा सा भी असावधान मत हो|
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यदि मैं सजग हूँ तो मेरे साथ कुछ भी अनिष्ट नहीं हो सकता, कोई मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता जब तक उसमें परमात्मा की स्वीकृति न हो|
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मैं दुखी और सुखी तो अपने पाप और पुण्य के विचारों से अर्जित प्रारब्ध कर्मों से हूँ, न कि दूसरे व्यक्तियों द्वारा| द्वेषी व्यक्ति तो मेरे हितैषी है क्योंकि वे मेरे पूर्व अर्जित पाप के भार को कम करते हैं| सुख-दुःख का कारण तो मेरे पुण्य और पाप के विचारों का फल हैं, इसमें दूसरे का कोई दोष नहीं है| जिस दुःख-सुख को मैनें अपने कर्मों से उत्पन्न किया है वही मैं भोग रहा हूँ| द्वेषी व्यक्ति तो मेंरा हित ही कर रहे हैं|
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अतः साधू, सावधान ! अब तूँ किसी अन्य को किसी भी परिस्थिति में दोष नहीं देगा|

ॐ तत्सत् | गुरु ॐ | ॐ ॐ ॐ ||