Sunday, 26 February 2017

हमें पानीपत के तृतीय युद्ध वाली मानसिकता से बाहर आना ही होगा .....

हमें पानीपत के तृतीय युद्ध वाली मानसिकता से बाहर आना ही होगा .....
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पानीपत का तृतीय युद्ध अति शक्तिशाली मराठा सेना अपने सेनापति की अदूरदर्शिता और गलत निर्णय के कारण हारी थी| वह हिन्दुओं की एक अत्यंत भयावह पराजय थी| पर उससे हमने कोई सबक नहीं लिया, और वे ही भूलें हम अब तक करते आये हैं| चीन से युद्ध भी हम उसी भूल से हारे| कारगिल के युद्ध में भी वही भूल हमने नियंत्रण रेखा को पार नहीं कर के की, पर सौभाग्य से हम विजयी रहे| कश्मीर की समस्या का हल भी हम अपनी यथास्थितिवादी मानसिकता के कारण नहीं कर पाए हैं| अब पहली बार सर्जिकल स्ट्राइक कर के हमने अपनी भूल सुधारी है, और यथास्थितिवादी मानसिकता से बाहर निकलने का प्रयास किया है|
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पानीपत के तृतीय युद्ध में अगर मराठा सेना आगे बढकर पहले आक्रमण करती तो निश्चित रूप से विजयी होतीं और पूरे भारत पर उनका राज्य होता| युद्धभूमि में जो पहले आगे बढकर आक्रमण करता है पलड़ा उसी का भारी रहता है| उनको पता था कि आतताई अहमदशाह अब्दाली कुछ अन्य नवाबों की फौजों के साथ सिर्फ विध्वंश और लूटने के उद्देश्य से आ रहा है| उन्हें आगे बढ़कर मौक़ा मिलते ही उसे नष्ट कर देना चाहिए था| अन्य हिन्दू राजाओं से भी सहायता माँगनी चाहिए थी| पर मराठा सेना उसके यमुना के इस पार आने की प्रतीक्षा करती रहीं| अब्दाली निश्चिन्त था कि जब तक मैं नदी के उस पार नहीं जाऊंगा मराठा सेना आक्रमण नहीं करेगी| उसने कब और कैसे नदी पार की मराठों को पता ही नहीं चला और ऐसे अवसर पर आक्रमण किया जब मराठा सेना असावधान और निश्चिन्त थीं| मराठों को सँभलने का अवसर भी नहीं मिला|

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कारगिल के युद्ध में भी वाजपेयी जी ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि हम काल्पनिक नियंत्रण रेखा को किसी भी स्थिति में पार नहीं करेंगे| पकिस्तान तो निश्चिन्त हो गया था कि भारत किसी भी परिस्थिति में नियंत्रण रेखा को पार नहीं करेगा| यह हमारी मुर्खता थी| यदि हमारी सेना नियंत्रण रेखा को पार कर के आक्रमण करती तो न तो हमारे इतने सैनिक मरते और न युद्ध इतना लंबा चलता|
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कश्मीर की समस्या का स्थायी समाधान करने का प्रयास भी हमने कभी किया ही नहीं| बस यथास्थिति बनाए रखी| अब कश्मीर की समस्या का स्थायी समाधान करने का ईमानदारी और कठोरता से प्रयास आरम्भ हुआ है|
मुझे पूरी आशा है कि अब जो भी होगा वह अच्छा ही होगा, क्योंकि कालचक्र की गति भारत के पक्ष में है|
ॐ ॐ ॐ ||

१८ फरवरी १९४६ का नौसैनिक विद्रोह .....

१८ फरवरी १९४६ के दिन एक अति महत्वपूर्ण घटना भारत के इतिहास में हुई थी, जिसने भारत से अंग्रेजों को भागने को बाध्य कर दिया था| यह भारतीयों के जनसंहारकारी अंग्रेजी राज के कफन में आख़िरी कील थी| इस घटना के इतिहास को स्वतंत्र भारत में छिपा दिया गया और विद्यालयों में कभी पढ़ाया नहीं गया|
अगस्त १९४२ का भारत छोड़ो आन्दोलन पूर्ण रूपेण विफल हो गया था| अंग्रेजों ने उसे हिंसात्मक रूप से कुचल दिया था| गांधी जी की नीतियों ने पूरे भारत में एक भ्रम उत्पन्न कर दिया था और उनके द्वारा तुर्की के खलीफा को बापस गद्दी पर बैठाए जाने के लिए किये गए खिलाफत आन्दोलन ने भारत में विनाश ही विनाश किया| उसकी प्रतिक्रियास्वरूप केरल में मोपला विद्रोह हुआ और लाखों हिन्दुओं की हत्याएँ हुई| गाँधी ने उन हत्यारों को स्वतंत्रता सेनानी कहा| पकिस्तान की मांग भी भयावह रूप से तीब्र हो उठी|
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भारत स्वतंत्र हुआ इसका कारण था कि ..... द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात अंग्रेजी सेना की कमर टूट गयी थी और वह भारत पर नियंत्रण करने में असमर्थ थी| भारतीय सिपाहियों ने अन्ग्रेज़ अधिकारियों के आदेश मानने से मना कर दिया था और नौसेना ने विद्रोह कर दिया जिससे अँगरेज़ बहुत बुरी तरह डर गए और उन्होंने भारत छोड़ने में ही अपनी भलाई समझी|
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यहाँ मैं माननीय श्री विश्वजीत सिंह जी के द्वारा लिखे इस लेख को यों का यों उद्धृत कर रहा हूँ ......
इंडियन नेवी का मुक्ति संग्राम और भारत की स्वतंत्रता .....
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नेताजी सुभाष चन्द्र बोस व आजाद हिन्द फौज द्वारा भारत की स्वतंत्रता के लिए शुरू किये गये सशस्त्र संघर्ष से प्रेरित होकर रॉयल इंडियन नेवी के भारतीय सैनिकों ने 18 फरवरी 1946 को एचआईएमएस तलवार नाम के जहाज से मुम्बई में अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध मुक्ति संग्राम का उद्घोष कर दिया था । उनके क्रान्तिकारी मुक्ति संग्राम ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा प्रदान की|
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नौसैनिकों का यह मुक्ति संग्राम इतना तीव्र था कि शीघ्र ही यह मुम्बई से चेन्नई , कोलकात्ता , रंगून और कराँची तक फैल गया । महानगर , नगर और गाँवों में अंग्रेज अधिकारियों पर आक्रमण किये जाने लगे तथा कुछ अंग्रेज अधिकारियों को मार दिया गया । उनके घरों पर धावा बोला गया तथा धर्मान्तरण व राष्ट्रीय एकता विखण्डित करने के केन्द्र बने उनके पूजा स्थलों को नष्ट किये जाने लगा । स्थान - स्थान पर मुक्ति सैनिकों की अंग्रेज सैनिकों के साथ मुठभेड होने लगी । ऐसे समय में भारतीय नेताओं ने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए लड रहे उन वीर सैनिकों का कोई साथ नहीं दिया , जबकि देश की आम जनता ने उन सैनिकों को पूरा सहयोग दिया । क्रान्तिकारी नौसैनिकों के नेतृत्वकर्ता ' श्री बी. सी. दत्त ' ने खेद प्रकट किया कि उनकों प्रोत्साहन और समर्थन देने के लिए कोई राष्ट्रीय नेता उनके पास नहीं आया , राष्ट्रीय नेता केवल अंग्रेजों के साथ लम्बी वार्ता करने में तथा सत्रों व बैठकों के आयोजन में विश्वास रखते है । उनसे क्रान्तिकारी कार्यवाही की कोई भी आशा नहीं की जा सकती ।
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नौसैनिकों के मुक्ति संग्राम की मौहम्मद अली जिन्ना ने निन्दा की थी व जवाहरलाल नेहरू ने अपने को नौसैनिक मुक्ति संग्राम से अलग कर लिया था । मोहनदास जी गांधी जो उस समय पुणे में थे तथा जिन्हें इंडियन नेवी के मुक्ति संग्राम से हिंसा की गंध आती थी , उन्होंने नेवी के सैनिकों के समर्थन में एक शब्द भी नहीं बोला , अपितु इसके विपरीत उन्होंने वक्तव्य दे डाला कि -
" यदि नेवी के सैनिक असन्तुष्ठ थे तो वे त्यागपत्र दे सकते थे । "
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क्या अपने देश की स्वतंत्रता के लिए उनका मुक्ति संग्राम करना बुरा था ? जो लोग देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों पर खेलते थे , जो लोग कोल्हू में बैल की तरह जोते गये , नंगी पीठ पर कोडे खाए , भारत माता की जय का उद्घोष करते हुए फाँसी के फंदे पर झुल गये क्या इसमें उनका अपना कोई निजी स्वार्थ था ?
इंडियन नेवी के क्षुब्ध सैनिकों ने राष्ट्रीय नेताओं के प्रति अपना क्रोध प्रकट करते हुए कहा कि -
" हमने रॉयल इंडियन नेवी को राष्ट्रीय नेवी में परिवर्तित पर दिया है , किन्तु हमारे राष्ट्रीय नेता इसे स्वीकार करने को तैयार नही है । इसलिए हम स्वयं को कुण्ठित और अपमानित अनुभव कर रहे है । हमारे राष्ट्रीय नेताओं की नकारात्मक प्रतिक्रिया ने हमको अंग्रेज नेवी अधिकारियों से अधिक धक्का पहुँचाया है । "
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भारतीय राष्ट्रीय नेताओं के विश्वासघात के कारण नौसैनिको का मुक्ति संग्राम हालाँकि कुचल दिया गया , लेकिन इसने ब्रिटिस साम्राज्य की जडे हिला दी और अंग्रेजों के दिलों को भय से भर दिया । अंग्रेजों को ज्ञात हो गया कि केवल गोरे सैनिको के भरोसे भारत पर राज नहीं किया किया जा सकता , भारतीय सैनिक कभी भी क्रान्ति का शंखनाद कर 1857 का स्वतंत्रता समर दोहरा सकते है और इस बार सशस्त्र क्रान्ति हुई तो उनमें से एक भी जिन्दा नहीं बचेगा , अतः अब भारत को छोडकर वापिस जाने में ही उनकी भलाई है ।
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तत्कालीन ब्रिटिस हाई कमिश्नर जॉन फ्रोमैन का मत था कि 1946 में रॉयल इंडियन नेवी के विद्रोह ( मुक्ति संग्राम ) के पश्चात भारत की स्वतंत्रता सुनिश्चित हो गई थी । 1947 में ब्रिटिस प्रधानमंत्री लार्ड एटली ने भारत की स्वतंत्रता विधेयक पर चर्चा के दौरान टोरी दल के आलोचकों को उत्तर देते हुए हाउस ऑफ कॉमन्स में कहा था कि -
" हमने भारत को इसलिए छोडा , क्योंकि हम भारत में ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठे थे । "
( दि महात्मा एण्ड नेता जी , पृष्ठ - 125 , लेखक - प्रोफेसर समर गुहा )
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नेताजी सुभाष से प्रेरणाप्राप्त इंडियन नेवी के वे क्रान्तिकारी सैनिक ही थे जिन्होंने भारत में अंग्रजों के विनाश के लिए ज्वालामुखी का निर्माण किया था । इसका स्पष्ट प्रमाण ब्रिटिस प्रधानमंत्री ' लार्ड ' एटली और कोलकात्ता उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ' पी. बी. चक्रवर्ती ' जो उस समय पश्चिम बंगाल के कार्यवाहक राज्यपाल भी थे के वार्तालाप से मिलता है ।
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जब चक्रवर्ती ने एटली से सीधे - सीधे पूछा कि " गांधी का अंग्रेजों भारत छोडो आन्दोलन तो 1947 से बहुत पहले ही मुरझा चुका था तथा उस समय भारतीय स्थिति में ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे अंग्रेजों को भारत छोडना आवश्यक हो जाए , तब आपने ऐसा क्यों किया ? "
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तब एटली ने उत्तर देते हुए कई कारणों का उल्लेख किया , जिनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण कारण " इंडियन नेवी का विद्रोह ( मुक्ति संग्राम ) व नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के कार्यकलाप थे जिसने भारत की जल सेना , थल सेना और वायु सेना के अंग्रेजों के प्रति लगाव को लगभग समाप्त करके उनकों अंग्रेजों के ही विरूद्ध लडने के लिए प्रेरित कर दिया था । "
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अन्त में जब चक्रवर्ती ने एटली से अंग्रेजों के भारत छोडने के निर्णय पर गांधी जी के कार्यकलाप से पडने वाले प्रभाव के बारे मेँ पूछा तो इस प्रश्न को सुनकर एटली हंसने लगा और हंसते हुए कहा कि " गांधी जी का प्रभाव तो न्यूनतम् ही रहा । "
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एटली और चक्रवर्ती का वार्तालाप निम्नलिखित तीन पुस्तकों में मिलता है -
1. हिस्ट्री ऑफ इंडियन इन्डिपेन्डेन्ट्स वाल्यूम - 3 , लेखक - डॉ. आर. सी. मजूमदार ।
2. हिस्ट्री ऑफ इंडियन नेशनल कांग्रेस , लेखिका - गिरिजा के. मुखर्जी ।
3. दि महात्मा एण्ड नेता जी , लेखक - प्रोफेसर समर गुहा ।
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- विश्वजीतसिंह
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पुनश्चः :- आज़ादी हमें कोई चरखा चलाकर या अहिंसा से नहीं मिली| इस आज़ादी के पीछे लाखों लोगों का बलिदान था| नेहरु और जिन्ना दोनों ही अंग्रेजों के हितचिन्तक थे जिन्हें गांधी की मूक स्वीकृति थी| भारत से अँगरेज़ गए और जाते जाते अपने ही मानस पुत्रों .... नेहरु और जिन्ना को सत्ता सौंप गए| जितना अधिकतम भारत का विनाश वे कर सकते थे उतना विनाश जाते जाते भी कर गए|
वन्दे मातरं | भारत माता की जय |

हे जगन्माता, हे भगवती, मैं पूर्ण रूप से तुम्हारी कृपा पर आश्रित हूँ ....

हे जगन्माता, हे भगवती, मैं पूर्ण रूप से तुम्हारी कृपा पर आश्रित हूँ| धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष कुछ भी मेरी क्षमता में नहीं है| मेरे में न तो कोई विवेक है और न शक्ति| अब मेरे वश में कुछ भी नहीं है| जो करना है वह तुम ही करो, मैं तुम्हारी शरणागत हूँ| सत्य-असत्य, नित्य-अनित्य आदि का मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं है| अपनी सृष्टि के लिए इस देह का जो भी उपयोग करना चाहो वह तुम ही करो| मेरी कोई इच्छा नहीं है| तुम चाहो तो इस देह को इसी क्षण नष्ट कर सकती हो| मेरी करुण पुकार तुम्हें सुननी ही होगी|
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हे भगवती, तुम्ही एकमात्र कर्ता हो| तुम्हीं इन पैरों से चल रही हो, इन हाथों से तुम्हीं कार्य कर रही हो, इस ह्रदय में तुम्हीं धड़क रही हो, ये साँसें भी तुम्ही ले रही हो, इन विचारों से जगत की सृष्टि संरक्षण और संहार भी तुम्ही कर रही हो| हे जगन्माता, तुम ही यह 'मैं' बन गयी हो| यह पानी का बुलबुला तुम्हारे ही अनंत महासागर में तैर रहा है| इसे अपने साथ एक करो| इस बुलबुले में कोई स्वतंत्र क्षमता नहीं है|
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हे भगवती, इस जीवन में मैं जितने भी लोगों से मिला हूँ और जहाँ कहीं भी गया हूँ, तुम्हारे ही विभिन रूपों से मिला हूँ, तुम्हारे में ही विचरण करता आया हूँ, अन्य कोई है ही नहीं| यह 'मैं' होना एक भ्रम है, इस पृथकता के बोध को समाप्त करो| हे भगवती, तुम ही यह 'मैं' बन गयी हो, अब तुम्हारा ही आश्रय है, तुम ही मेरी गति हो|
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ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ || ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ | ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ||

हम स्वयं इतने ज्योतिर्मय बनें कि हमारे समक्ष कोई असत्य और अंधकार टिक ही नहीं सके .....

हम स्वयं इतने ज्योतिर्मय बनें कि
हमारे समक्ष कोई असत्य और अंधकार टिक ही नहीं सके .....
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भगवान भुवन भास्कर जब अपने पथ पर अग्रसर होते हैं तब मार्ग में कहीं भी कैसे भी तिमिर का कोई अवशेष मात्र भी नहीं मिलता| हम भी ब्रह्मतेज से युक्त होकर इतने ज्योतिर्मय बनें कि हमारे मार्ग में हमारे समक्ष भी कहीं कोई अन्धकार और असत्य की शक्ति टिक ही न सके| हमारे जीवन का केंद्र बिंदु परमात्मा बने, और परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हम में हो|
ॐ तत्सत | ॐ ॐ ॐ ||

भारत को किसी भी परिस्थिति में वर्गसंघर्ष से बचना होगा ...

भारत को किसी भी परिस्थिति में वर्गसंघर्ष से बचना होगा .....
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वर्गसंघर्ष का अर्थ है समाज के एक वर्ग को दूसरे वर्ग से लड़ा देना| वर्गसंघर्ष की परिणिति ही गृहयुद्ध होता है जिसका लाभ विदेशी आक्रान्ताओं को मिलता है| भारतवर्ष में एक लम्बे समय से बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक, अगड़ा-पिछड़ा-अतिपिछड़ा, मनुवाद-ब्राह्मणवाद, साम्प्रदायिक-धर्मनिरपेक्ष, गुलाम-आज़ाद, शोषक-दलित, आदि नामों से नए वर्गों की रचना कर उन्हें आपस में लड़ाने व गृहयुद्ध का षड्यंत्र रचा जाता रहा है|
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं की वर्ण-व्यवस्था स्वयं उनकी यानि परमात्मा की रचना है| मनुष्य के स्वाभाविक रूप से चार ही वर्ण हैं, अर्थात चार ही तरह के लोग हैं| मनु ने यह भी लिखा है कि जन्म से प्रत्येक व्यक्ति शुद्र होता है और संस्कारों व कर्मों से ऊपर उठता है| ब्राह्मण भी यदि तीन दिन तक संध्या न करे तो वह शुद्र बन जाता है|
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भगवान हमारी रक्षा करें........ कहीं भारत में गृहयुद्ध करवाने का आसुरी षड्यंत्र सफल न हो जाए| जय श्रीराम ! जयश्रीराम ! जय श्री राम !
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ | ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ | ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ||

यह "मनुवाद" क्या है ? ......

यह "मनुवाद" क्या है ? ......
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एक समय था जब साम्यवादी (मार्क्सवादी) लोग किसी को गाली देते तो उसको "प्रतिक्रियावादी", "पूंजीवादी", "फासिस्ट" और "बुर्जुआ" आदि शब्दों से विभूषित करते| ये उनकी बड़ी से बड़ी गालियाँ थीं| किसी की प्रशंसा करते तो उसको "प्रगतिवादी"और 'मानवतावादी" कहते|

फिर समय आया जब कोंग्रेसी लोग किसी को गाली देते तो उसको "साम्प्रदायिक" कहते| किसी की प्रशंसा में उनका सबसे बड़ा शब्द था ... "धर्मनिरपेक्ष"|

भारतीय जनसंघ (वर्तमान भाजपा) वाले जब साम्यवादियों को गाली देते तो "पंचमांगी" कहते, जो उनकी बड़ी से बड़ी गाली थी|

फिर एक शब्द चला ..... "समाजवादी" जिसको कभी कोई परिभाषित नहीं कर पाया| जहाँ तक मुझे याद है इस शब्द को लोकप्रिय डा.राममनोहर लोहिया ने किया था, फिर श्रीमती इंदिरा गाँधी को भी यह अत्यंत प्रिय था, जिन्होंने संविधान संशोधित कर भारत को समाजवादी धर्मनिरपेक्ष देश घोषित कर दिया| आजकल समाजवादी बोलते ही श्री मुलायम सिंह यादव की छवि सामने आती है| फिर और भी कई वाद चले जैसे "राष्ट्रवाद", "बहुजन समाजवाद" आदि|

पर आजकल एक नई गाली और एक नया वाद चला है और वह है ..... "मनुवाद"|
आजकल चाहे "बहुजन समाजवादी" हों या कांग्रेसी हों, किसी की भी बुराई करते हैं तो उसे "मनुवादी" कहते हैं|
मैं मनुस्मृति को पिछले पचास वर्षों से पढ़ता आया हूँ| उस पर लिखे अनेक विद्वानों के भाष्य भी पढ़े हैं| मनुस्मृति भारत में हज़ारों वर्षों तक एक संविधान की तरह रही है| मुझे तो उसमें कहीं कोई बुराई नहीं दिखी| वह तो सृष्टि के आदि से है| हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए अंग्रेजों ने उसमें कई बातें प्रक्षिप्त कर दी थीं| पर उन प्रक्षिप्त अंशों को निकाला जा रहा है| मनु महाराज तो एक क्षत्रिय राजा थे जिन्होंने एक नई सर्वमान्य व्यवस्था दी जो हज़ारों वर्षों से हैं| उसमें कहीं भी कोई जातिवाद या भेदभाव वाली बात नहीं है|

पता नहीं आजकल के इन तथाकथित राजनयिकों को मनुस्मृति का अध्ययन किये बिना ही उसमें क्या "जातिवाद" या "सम्प्रदायवाद" दिखाई दे रहा है जो किसी की निंदा करने के लिए "जातिवादी" "साम्प्रदायिक" और "मनुवादी" कहते हैं|

सादर धन्यवाद|
जय श्रीराम जय श्रीराम जय श्रीराम!

सनातन वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना के लिए ही भारत का अस्तित्व है .....

सनातन वैदिक धर्म की सम्पूर्ण विश्व में पुनर्प्रतिष्ठा यानि पुनर्स्थापना के लिए ही भारतवर्ष का अस्तित्व अब तक बचा हुआ है| यह एक ऐसा कार्य है जिसे पूरा करना भारतवर्ष की ही नियती में है|
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परमात्मा के प्रति अहैतुकी परम प्रेम, शरणागति, समर्पण, आत्मसाक्षात्कार और समष्टि के कल्याण की भावना सिर्फ सनातन धर्म में ही है| आध्यात्म और विविध दर्शन शास्त्रों का प्राकट्य जितना यहाँ हुआ है उतना अन्यत्र कहीं भी नहीं हुआ है|
बुरे से बुरा समय बीत चुका है| आने वाला समय अब अच्छे से अच्छा ही होगा|
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जब तक भारतवर्ष में आध्यात्म, भक्ति, परमात्मा के प्रति समर्पण और स्वधर्म की चेतना है तब तक भारत भारत ही रहेगा| हमें आवश्यकता है एक ब्रह्मतेज की जो अनेक साधकों की साधना से ही प्रकट होगा|
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मैं पूर्ण ह्रदय से प्रार्थना करता हूँ कि भगवान हम सब का कल्याण करें, हमारी अज्ञानता की ग्रंथियों का नाश करें, उनके स्वरुप का हमें बोध हो, और उनकी पूर्ण कृपा हम पर हो| हम सब के हृदय का सम्पूर्ण प्रेम उन्हें समर्पित हो|
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ॐ नमः शिवाय | ॐ शिव ! ॐ ॐ ॐ !