Monday, 13 February 2017

Would You Be My Valentine ? " "क्या आप मुझसे शादी करेंगे ? ....

" Would You Be My Valentine ? " "क्या आप मुझसे शादी करेंगे ?"
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योरोप और अमेरिका में पहले कोई स्थायी विवाह नहीं करता था| लोग बिना विवाह के रखैलें रखते थे| स्त्री का महत्त्व सिर्फ एक उपयोगी वस्तु की तरह होता था, अप्रिय हो गयी तो बदल ली| वहाँ के सारे दार्शनिक और सम्राट अनेक स्त्रियाँ रखते थे| लोग पशुओं की तरह ही रहते थे| सन 478 ई. में इटली में वेलेंटाइन नाम के एक पादरी ने लोगों को समझा बुझाकर उनके विवाह करवाने आरम्भ कर दिए| वहाँ के सम्राट क्लोडियस को यह बात बुरी लगी और उसने सन 14 फ़रवरी 498 ई को सार्वजनिक रूप से वेलेंटाइन को फांसी दे दी| फांसी से पहिले उन सब को वहाँ साक्षी के रूप में खडा किया जिनका विवाह वेलेंटाइन ने करवाया था| उन सब लोगों ने वेलेंटाइन की याद में वेलेंटाइन डे मनाना आरम्भ कर दिया| वेलेंटाइन डे के सन्देश का अर्थ है .... क्या आप मुझसे विवाह करोगे? अब आप लोगों की इच्छा है आप इस वेलेंटाइन डे को कैसे मनाएँ|
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जो लोग वेलेंटाइन दिवस मनाते हैं उन सब लडके, लडकियों और लड़कियों के नाम से फेसबुक पर खाता चलाने वाले लडकों को भी वेलेंटाइन डे की शुभ कामनाएँ ....... भगवान आपको सद्बुद्धि दे|

परमात्मा का मार्ग .......

परमात्मा का मार्ग .......
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जहाँ तक मेरी सीमित और अल्प बुद्धि सोच सकती है, सुषुम्ना पथ ही परमात्मा का मार्ग है| सुषुम्ना मार्ग से सहस्त्रार और ब्रह्मरंध्र पार कर अनंत ब्रह्म से एकाकार होना योगमार्ग की साधना है|
सभी योगी जो परमात्मा के साक्षात्कार हेतु ध्यान साधना करते हैं, साधनाकाल में अपना मेरुदंड यानि कमर सीधी रखते है और भ्रूमध्य में दृष्टी स्थिर रखते हैं|
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इसका कारण यह है कि जब इन्द्रियों से चेतना हटने लगती है तो प्राण ऊर्जा, आध्यात्मिक नेत्र जिसे तृतीय नेत्र भी कह सकते हैं जो दोनों भौतिक नेत्रों के मध्य में है के और आज्ञाचक्र के मध्य की ओर स्वतः निर्देशित होती है| आध्यात्मिक नेत्र ----- आज्ञा चक्र (जो मस्तिकग्रंथी/मेरुशीर्ष यानि Medulla Oblongata में है) का प्रतिबिम्ब है| आज्ञा चक्र से प्रकाश दोनों आँखों में आता है| भ्रूमध्य में ध्यान से वह प्रकाश भ्रूमध्य में स्थिर रूप से दिखना आरम्भ हो जाता है और योगी की चेतना ब्राह्मीचेतना होने लगती है और ज्योतिर्मय ब्रह्म का आभास होने लगता है| अनाहत नाद भी धीरे धीरे सुनाई देने लगता है|
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भावजगत में सम्पूर्ण समष्टि के साथ स्वयं को एकाकार करें| आप यह देह नहीं बल्कि परमात्मा की अनंतता और उनका सम्पूर्ण प्रेम हैं| शिवनेत्र होकर कूटस्थ में सर्वव्यापी सद्गुरु रूप शिव का ध्यान करें|
निष्ठावान मुमुक्षु का सारा मार्गदर्शन निश्चित रूप से भगवान स्वयं करते हैं और उसकी रक्षा भी होती है| आपकी सारी जिज्ञासाओं के उत्तर और सारी समस्याओं का समाधान परमात्मा में ही मिलेगा|
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यहाँ तक की और इससे आगे की प्रगति साधक गुरु रूप में परमात्मा की कृपा से ही कर सकता है|
गुरुकृपा का पात्र साधक तभी हो सकता है जब उसके आचार विचार सही हों, व भक्ति और समर्पण की पूर्ण भावना हो|
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हठयोग की साधनाओं का उद्देश्य यही है कि साधक स्वस्थ हो और सुषुम्ना पथ पर अग्रसर हो|
पर सबसे महत्वपूर्ण है ----- भक्ति यांनी प्रभु के प्रति परम प्रेम, और उन्हें समर्पित होने की प्रबल अभीप्सा|
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हे परमशिव प्रभु, आप सब का कल्याण करो, आपकी सृष्टि में सब सुखी हों, कोई दुःखी ना हो, सबके ह्रदय में आपके प्रति परम प्रेम जागृत हो, और सब आनंदमय हों|
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ॐ नमः शिवाय! ॐ शिव! ॐ ॐ ॐ||

हृदय की एक घनीभूत पीड़ा व्यक्त हुई है .....

मैं सुदर्शन चक्रधारी भगवान श्रीकृष्ण और धनुर्धारी भगवान श्रीराम को नमन करता हूँ जिन्होंने आतताइयों के संहार के लिए अपने हाथों में अस्त्र धारण कर रखे हैं| उनकी चेतना सभी भारतवासियों में जागृत हो| ॐ ॐ ॐ ||
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भारत की प्रत्येक नारी आत्मरक्षा में प्रवीण हो, आतताई के प्राण लेने में भी सक्षम हो, और सदैव अपनी अस्मिता की रक्षा हेतु आत्मोत्सर्ग करने में भी तत्पर हो|
उसे सदा यह बोध रहे कि जीवन में मृत्यु में हर परिस्थिति में भगवान शिव की शक्ति निरंतर उसकी रक्षा कर रही है और करेगी|
हर नारी अबला नहीं सबला बने, भोग्या नहीं पूज्या बने, धर्मरक्षिका बने| ॐ ॐ ॐ ||
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यदि हम आत्मरक्षा करने में समर्थ नहीं हैं, संगठित नहीं हैं, हमारे में समाज व राष्ट्र की चेतना नहीं है, हमारे में आत्म-सम्मान नहीं है, तो हमारा वैभव, समृद्धि, संस्कृति, धर्म, घर-परिवार कुछ भी सुरक्षित नहीं है| न तो हमारे साधू-संत बचेंगे, न हमारे धर्मग्रन्थ, न हमारे देवालय, हमारा भौतिक अस्तित्व भी नहीं बचेगा|
भारत का कितना वैभव था, उस पर विचार करें| हमारी यह स्थिति कैसे हुई उस पर भी विचार करें|
आज जब हमारी अस्मिता पर मर्मान्तक प्रहार हो रहे हैं, तब हमें आत्म-रक्षा में समर्थ और संगठित होना ही होगा|
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अखंड भारत में कितना वैभव था, कितने भव्य मंदिर थे, कितनी महान संस्कृति थी, ज्ञान-विज्ञान की पराकाष्ठा थी, हमारे कितने गुरुकुल थे, कितने महान आचार्य थे, पर आज वह सब कहाँ है? हम क्यों पददलित हुए? हमारा अस्तित्व और हमारी अस्मिता प्रभु की परम कृपा से ही थोड़ी बहुत बची है| उस पर भी आसुरी शक्तियाँ प्रहार कर रही हैं| हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान इतना अधिक क्यों गिर गया है?
चेतना का हमारा स्तर इतना अधिक गिर गया है कि हम अपने अस्तित्व की रक्षा के प्रति भी निरपेक्ष बने हुए हैं|
कहीं न कहीं से कुछ न कुछ हमें पुनः आरम्भ करना ही होगा| हम अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं, इस पर हमें विचार करना ही होगा| ॐ ॐ ॐ ||
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हम आत्महीनता के बोध से मुक्त हों| हमें अपने धर्म और संस्कृति पर अभिमान हो| यह हमारा धर्म ही है जो अहैतुकी भक्ति और परोपकार की शिक्षा देता है| अन्य सभी मतों ने परोपकार के नाम पर परपीडन ही किया है| अन्य मत एक तरह की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्थाएं हैं जिन्होंने अपने मत का उपयोग अपने साम्राज्य विस्तार और अर्थलोलूपता के लिए किया है|
हम विदेशी प्रभाव से मुक्त हों| गर्व से कहो हम हिन्दू हैं| सत्य सनातन धर्म की जय| ॐ ॐ ॐ

जब तक पकिस्तान का अस्तित्व है, तब तक भारत में कभी सुख-शांति नहीं हो सकती .....

Feb.13, 2017.

जब तक पकिस्तान का अस्तित्व है, तब तक भारत में कभी सुख-शांति नहीं हो सकती .....
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कश्मीर के कुलगाम जिले में कल शहीद हुए दो जवानों व दो नागरिकों को श्रद्धांजलि| भगवान उनको सद्गति प्रदान करे| घायल हुए जवान शीघ्र स्वस्थ हों|
आतंकवादियों के समर्थन में अलगाववादियों ने आज पूरी कश्मीर घाटी में बंद कर रखा है| जिस समय आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ चल रही थी, कई सौ लोगों की भीड़ आतंकवादियों के समर्थन में नारे लगा रही थी और सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंक रही थी| इतना अधिक भ्रमित कर रखा है पकिस्तान ने कश्मीर के लोगों को मजहब के नाम पर जैसे पकिस्तान में मिलने पर वे स्वर्ग में पहुँच जायेंगे|
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कश्मीर के लोगों को पाकिस्तान की वास्तविकता का नहीं पता है कि पृथ्वी पर यदि कहीं कोई नर्क है तो वह पकिस्तान ही है| पाक अधिकृत कश्मीर के लोग पाकिस्तानियों के हाथों कितने दुखी हैं और नर्क की यंत्रणा झेल रहे हैं, इसका पता संभवतः कश्मीरियों को नहीं है| वहाँ के लोग पकिस्तान से मुक्ति चाहते हैं| पंजाब को छोड़कर पकिस्तान के सभी प्रांत, पाकिस्तान से मुक्त होना चाह्ते हैं|
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पाकिस्तान जैसे कट्टर इस्लामिक देश की चीन जैसे कट्टर नास्तिक देश से मित्रता का एकमात्र कारण भारत से द्वेष है| चीन में मस्जिदों में अज़ान पर, रमजान के महीने में रोज़े रखने पर और इस्लाम की शिक्षा पर पूर्ण प्रतिबन्ध है| चीन में इमामों को सडक पर नचाया जाता है और उनसे कसम दिलवाई जाती है कि वे बच्चों को इस्लाम की शिक्षा नहीं देंगे| चीन में जो मुसलमान सरकारी कर्मचारी हैं उनसे नारे लगवाये जाते हैं कि उनका वेतन अल्लाह से नहीं बल्कि चीन की सरकार से मिलता है| आश्चर्य की बात तो यह है कि मुस्लिम जगत में कोई भी चीन के इस कदम का विरोध नही करता है| भारत के मानवाधिकारवादी भी शांत रहते हैं| दुखद बात तो यह है की भारत में पकिस्तान का विरोध करने वाले को साम्प्रदायिक की उपाधी तुरंत दे दी जाती है| पाकिस्तान एक असत्य और अन्धकार की शक्ति है, जिसका जितनी शीघ्र नाश हो जाए उतनी ही शीघ्र इस विश्व में शान्ति होगी|
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ॐ ॐ ॐ ||

सहज योग .....

सहज योग .....
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मेरे प्रिय निजात्मगण, सप्रेम अभिवादन !
'सहज' का अर्थ क्या होता है ? सहज का अर्थ .... 'आसान' नहीं है| 'सहज' का अर्थ है .... 'सह+ज' यानि जो साथ में जन्मा है| साथ में जो जन्मा है उसके माध्यम से या उसके साथ योग ही सहज योग है|
कोई भी प्राणी जब जन्म लेता है तो उसके साथ जिसका जन्म होता है वह है उसका श्वास| अत: श्वास-प्रश्वास ही सह+ज यानि 'सहज' है|
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महर्षि पतंजलि ने चित्त की वृत्तियों के निरोध को 'योग' परिभाषित किया है| चित्त और उसकी वृत्तियों को समझना बड़ा आवश्यक है| उसको समझे बिना आगे बढना ऐसे ही है जैसे प्राथमिक कक्षाओं को उतीर्ण किये बिना माध्यमिक में प्रवेश लेना|
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चित्त है हमारी चेतना का सूक्ष्मतम केंद्र बिंदु, जिसे समझना बड़ा कठिन है|
चित्त स्वयं को दो प्रकार से व्यक्त करता है .... एक तो मन व वासनाओं के रूप में, और दूसरा श्वास-प्रश्वास के रूप में|
मन व वासनाओं को पकड़ना बड़ा कठिन है| हाँ, साँस को पकड़ा जा सकता है|
योगी लोग कहते हैं कि मानव देह और मन के बीच की कड़ी .... 'प्राण' है|
चंचल प्राण ही मन है| प्राणों को स्थिर कर के ही मन पर नियन्त्रण किया जा सकता है|
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भारत के योगियों ने अपनी साधना से बड़े बड़े महान प्रयोग किये और योग-विज्ञान को प्रकट किया| योगियों ने पाया की श्वास-प्रश्वास कोई स्वतंत्र क्रिया नहीं है बल्कि सूक्ष्म देह में प्राण प्रवाह की ही प्रतिक्रिया है| जब तक देह में प्राणों का प्रवाह है तब तक साँस चलेगी| प्राण प्रवाह बंद होते ही साँस भी बंद हो जायेगी|
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योगियों की स्वयं पर प्रयोग कर की गयी महानतम खोज इस तथ्य का पता लगाना है कि श्वास-प्रश्वास पर ध्यान कर के प्राण तत्व को नियंत्रित किया जा सकता है, और प्राण तत्व पर नियन्त्रण कर के मन पर विजय पाई जा सकती है, मन पर विजय पाना वासनाओं पर विजय पाना है| यही चित्त वृत्तियों का निरोध है|
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फिर चित्त को प्रत्याहार यानि अन्तर्मुखी कर एकाग्रता द्वारा कुछ सुनिश्चित धारणा द्वारा ध्यान किया जा सकता है, और ध्यान द्वारा समाधि लाभ प्राप्त कर परम तत्व यानि परमात्मा के साथ 'योग' यानि समर्पित होकर जुड़ा या उपलब्ध हुआ जा सकता है| फिर इस साधना में सहायक हठ योग आदि का आविष्कार हुआ| फिर यम नियमों की खोज हुई| फिर इस समस्त प्रक्रिया को क्रमबद्ध रूप से सुव्यवस्थित कर योग विज्ञान प्रस्तुत किया गया|
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मूल आधार है श्वास-प्रश्वास पर ध्यान| यही सहज (सह+ज) योग है|
बौद्ध मतानुयायी साधकों ने इसे विपासना यानि विपश्यना और अनापानसति योग कहा जिसमें साथ में कोई मन्त्र नहीं होता है| योगदर्शन व तंत्रागमों और शैवागमों में श्वास-प्रश्वास के साथ दो बीज मन्त्र 'हँ' और 'स:' जोड़कर एक धारणा के साथ ध्यान करते हैं| इसे अजपाजाप कहते हैं|
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इनमें यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) और नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान) की अनिवार्यता इसलिए कर दी गयी क्योंकि योग साधना से कुछ सूक्ष्म शक्तियों का जागरण होता है| यदि साधक के आचार विचार सही नहीं हुए तो या तो उसे मस्तिष्क की कोई गंभीर विकृति हो सकती है या सूक्ष्म जगत की आसुरी शक्तियां उस को अपने अधिकार में लेकर अपना उपकरण बना सकती हैं|
(प्राणायाम एक दुधारी तलवार है| यदि साधक के आचार-विचार सही हैं तो वह उसे देवता बना देती है, और यदि साधक कुविचारी है तो वह असुर यानि राक्षस बन जाता है| इसीलिए सूक्ष्म प्राणायाम साधना को गोपनीय रखा गया है| वह गुरु द्वारा प्रत्यक्ष शिष्य को प्रदान की जाती है| गुरु भी यह विद्या उसकी पात्रता देखकर ही देता है|)
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भारत की विश्व को सबसे बड़ी देन .... आध्यात्म, विविध दर्शन शास्त्र, अहैतुकी परम प्रेम यानि भक्ति व समर्पण की अवधारणा, वेद, वेदांग, पुराणादि अनेक ग्रन्थ, सब के उपकार की भावना के साथ साथ योग दर्शन भी है जिसे भारत की आस्तिक और नास्तिक (बौद्ध, जैन आदि) दोनों परम्पराओं ने स्वीकार किया है||
इस चर्चा का समापन यहीं करता हूँ| धन्यवाद|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

धारणा व ध्यान .....

धारणा व ध्यान .....
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मेरा कोई लक्ष्य नहीं है, मेरे लिए कोई उपलब्धि नहीं है| हर लक्ष्य, हर उपलब्धि मैं स्वयं हूँ| मैं शाश्वत और सम्पूर्ण अस्तित्व हूँ| मैं परमात्व तत्त्व हूँ| मैं यह देह नहीं बल्कि असीम सम्पूर्ण अनंतता हूँ| मेरे सिवा कोई अन्य नहीं है|
शिव शिव शिव | शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि | ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ||
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सारी सृष्टि परमात्मा का साकार रूप है| सम्पूर्ण अस्तित्व परमात्मा है| विविधता उसकी लीला है|
यह मैं, मेरे गुरु और परमात्मा सब एक हैं, उनमें कोई भेद नहीं है| पृथकता का बोध माया है|
ॐ ॐ ॐ ||

ज्ञान का स्त्रोत ....

ज्ञान का स्त्रोत ....
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पुस्तकों का अध्ययन अति आवश्यक है पर यह ध्यान रहे कि पुस्तकें मात्र सूचनाएँ देती हैं, ज्ञान नहीं| ज्ञान का स्त्रोत तो सिर्फ परमात्मा हैं|
पुस्तकों से प्राप्त सूचनाएँ तो एक उच्च स्तर का अज्ञान ही है जो सही ज्ञान पाने की प्रेरणा देता है| यही उसका उपयोग है|
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अच्छी पुस्तकें पढ़ने से सूचना और प्रेरणा तो मिलती ही हैं, साथ साथ लेखक से और जिन के बारे में वह लिखी गयी है से सत्संग भी होता है| अतः सत्साहित्य का खूब स्वाध्याय करना चाहिए|
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पर उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है ---- भगवन की अहैतुकी भक्ति और उन का ध्यान| जो लाभ आठ घंटे के स्वाध्याय से होता है, उससे भी अधिक लाभ एक घंटे की ध्यान साधना से होता है| ध्यान ..... परमात्मा के साथ सत्संग है|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर