Friday, 16 December 2016

भक्ति का दिखावा, भक्ति का अहंकार , और साधना का समर्पण ......

भक्ति का दिखावा, भक्ति का अहंकार , और साधना का समर्पण ......
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किसी भी साधक के लिए सबसे बड़ी बाधा है .... भक्ति का दिखावा और भक्ति का अहंकार|
कई लोग सिर्फ दिखावे के लिए या अपने आप को प्रतिष्ठित कराने के लिए ही भक्ति का दिखावा करते हैं| वे लोग अन्य किसी को नहीं बल्कि अपने आप को ही ठग रहे हैं| जहाँ तक हो सके अपनी साधना को गोपनीय रखें|
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भक्त या साधक होने का अहंकार सबसे बड़ा अहंकार है| इसके दुष्परिणाम भी सबसे अधिक हैं|
इससे बचने का एक ही उपाय है ..... अपनी भक्ति और साधना का फल तुरंत भगवान को अर्पित कर दो, अपने पास बचाकार कुछ भी ना रखो, सब कुछ भगवान को अर्पित कर दो| अपने आप को भी परमात्मा को अर्पित कर दो| कर्ता भाव से मुक्त हो जाओ| हम भगवान के एक उपकरण या खिलौने के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं हैं|
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आप कोई साधना नहीं करते हैं, आपके गुरु महाराज या स्वयं भगवान ही आपके माध्यम से साधना कर रहे हैं ..... यह भाव रखने पर कहीं कोई त्रुटी भी होगी तो उसका शोधन गुरु महाराज या भगवान स्वयं कर देंगे| कर्ता भगवान को बनाइये, स्वयं को नहीं|
प्रभु के प्रेम के अतिरिक्त अन्य कोई भी कामना न रखें| उनके प्रेम पर तो आपका जन्मसिद्ध अधिकार है| अन्य कुछ भी आपका नहीं है|
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ॐ गुरु ॐ | गुरु ॐ | गुरु ॐ ||

विचारपूर्वक दृढ़ निश्चय से किया हुआ हर संकल्प पूर्ण होता है ........

विचारपूर्वक दृढ़ निश्चय से किया हुआ हर संकल्प पूर्ण होता है ........
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एक व्यक्ति का विचारपूर्वक किया हुआ दृढ़ संकल्प भी विश्व के घटना क्रम और विचारों को बदल सकता है| अनेक व्यक्तियों का शिव संकल्प राष्ट्र की नियति बदल सकता है|
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अपने संकल्प को ईश्वर के संकल्प से जोड़कर हम सनातन हिन्दू धर्म की पुनर्स्थापना कर भारतवर्ष को परम वैभव के साथ अध्यात्मिक अखंड हिन्दू राष्ट्र भी बना सकते हैं और रामराज्य की स्थापना भी कर सकते हैं|
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भारत की आत्मा आध्यात्मिक है| भारत का पुनरोत्थान एक प्रचंड आध्यात्मिक शक्ति से होगा| इसके लिए हम सब सब की सहभागिता अपेक्षित है| अब समय आ गया है|
यह कार्य आरम्भ हो चुका है| आप सब इस संकल्प से जुड़िये और परम वैभव युक्त आध्यात्मिक अखंड भारत का ध्यान अपनी चेतना में सदैव कीजिये|
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भारत पुनश्च अखंड होगा और धर्म की पुनर्स्थापना होगी| अज्ञान और असत्य का अन्धकार दूर होगा और भारत माँ अपने परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर विराजमान होगी|
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सत्य सनातन धर्म की जय हो| जयतु वैदिकीसंस्कृतिः जयतु भारतम् |
---जय श्रीराम---
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धी क्या हो सकती है ? .....


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कल पूरी रात खाँसी से त्रस्त था, रात को सो नहीं पाया, पूरी रात बहुत खाँसी आई| भोर में बहुत थोड़ी सी देर नींद आई| जब नींद खुली तब एक बड़ी दिव्य अनुभूति हुई| मन में यही प्रश्न उठा कि मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि क्या हो सकती है? अचानक दोनों नासिकाएँ खुल गईं, दोनों नासिकाओं से सांस चलने लगी, सुषुम्ना चैतन्य हो गयी, मैं कमर सीधी कर के बैठ गया और एक दिव्य अलौकिक चेतना में चला गया| पूरा ह्रदय प्रेम से भर उठा| प्रेम भी ऐसा जो अवर्णनीय है| पूरा अस्तित्व प्रेममय हो गया| प्रेमाश्रुओं से नयन भर गए| ऐसा लगा जैसे एक छोटा सा बालक जगन्माता की गोद में बैठा हो और माँ उसे खूब प्रेम कर रही हो| तब इस प्रश्न का उत्तर मिल गया कि जीवन की उच्चतम उपलब्धी क्या हो सकती है| जब प्रत्यक्ष परमात्मा का प्यार चाहे वह अति अल्प मात्रा में ही मिल जाए, तो उससे बड़ी अन्य क्या कोई उपलब्धी हो सकती है? हे जगन्माता, चाहे तुमने अपने प्यार का एक कण ही दिया हो, पर वह मेरे लिए अनमोल है| माँ, मुझे अपनी चेतना में रखो| तुम्हारा प्यार ही मेरे लिए सर्वोच्च उपलब्धी है| तुम्हारे प्रेम की चेतना में निरंतर सचेतन स्थित रहूँ| और कुछ भी नहीं चाहिए| ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

एकोsहं द्वितीयो नास्ति ......

एकोsहं द्वितीयो नास्ति ......
मेरे एक अति प्रिय मित्र मेरा सदा उपहास करते हैं कि मैं कभी गहन अद्वैत वेदांत की बात करता हूँ , और कभी शुद्ध द्वैत की | पर मुझे इसमें कोई आश्चर्य नहीं है |
मेरे लिए किसी भी तरह से द्वैत-अद्वैत, साकार निराकार, मत-मतान्तर और सम्प्रदाय आदि से कोई अंतर नहीं पड़ता| 
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उपासना, उपास्य और उपासक ......... 
दृष्टी, दृश्य और दृष्टा ........
साधक, साध्य और साधना ........
मेरे लिए ये सब मेरे प्रियतम की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ है|
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मेरी यह भौतिक, प्राणिक, मानसिक, और आध्यात्मिक देह भी उसी प्रियतम का रूप हैं| जो वे हैं वे ही मैं हूँ, और जो मैं हूँ वे ही वे हैं|
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यह भेद एक मायावी आवरण मात्र है| ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

Thursday, 15 December 2016

मुझे समर्पण करना सिखाओ ....

मुझे समर्पण करना सिखाओ ....
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हे परमात्मा, हे भगवन, मैं वास्तव में स्वयं को आपमें पूर्णतः समर्पित करना चाहता हूँ| मुझे स्वयं को नहीं पता कि मुझे क्या करना चाहिए| अब तक तो जो कुछ भी किया, लगता है कि वह सब एक ढोंग या दिखावा मात्र ही था| वास्तविकता का नहीं पता| अब स्वयं को और धोखा नहीं देना चाहता| मेरे ह्रदय की सारी कुटिलता का नाश करो|
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मैं स्वयं को खाली करना चाहता हूँ| स्वयं पर कई विचार लाद रखे हैं उन सब से मुक्त करो| अपने स्वरुप का बोध कराओ| चैतन्य में सिर्फ आपकी ही स्मृति रहे| आपका ही निरंतर सत्संग सदैव बना रहे|
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ह्रदय में दहकती इस अतृप्त प्यास को बुझाओ| आप ही मेरी गति हैं और आप ही मेरे आश्रय हैं|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ ||

मानसिक द्वंद्व : ...... आध्यात्म मार्ग की एक बड़ी बाधा ..........

मानसिक द्वंद्व : ...... आध्यात्म मार्ग की एक बड़ी बाधा ..........
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जब चेतन और अवचेतन मन में संघर्ष रहता है या उन में संतुलन नहीं रहता तो प्राण शक्ति अवरुद्ध हो जाती है| ऐसी अवस्था में व्यक्ति का तारतम्य बाहरी जगत से नहीं रहता, खंडित व्यक्तित्व की भूमिका बन जाती है और मानसिक संतुलन बिगड़ने लगता है|
ऐसी स्थिति में व्यक्ति विक्षिप्त यानि पागल भी हो सकता है|
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यह बड़ी दु:खद परिस्थिति होती है जो आध्यात्म मार्ग के अनेक साधकों विशेषतः योग मार्ग के पथिकों के समक्ष आती है| ऐसी परिस्थिति में साधक को सद्गुरु का सहारा चाहिए|
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ऐसी परिस्थिति का निर्माण तब होता है जब निम्न अधोगामी प्रकृति अवचेतन मन में निहित वासनाओं के प्रभाव से साधक को भोग विलास की ओर खींचती है; और उसकी उन्नत आत्मा ऊर्ध्वगामी शुभ कर्मों के प्रभाव से परमात्मा की ओर आकर्षित करती है| एक तरह की रस्साकशी चैतन्य में होने लगती है और द्वन्द्वात्मक स्थिति उत्पन्न हो जाती है|
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एक शक्ति आपको ऊपर यानि ईश्वर की ओर खींचती है और दूसरी शक्ति विषय-वासनाओं व भोग विलास की ओर| ऐसी स्थिति में पागलपन से बचने का एक ही उपाय है कि उस समय जैसी और जिस परिस्थिति में आप हैं उस का तुरंत त्याग कर दें| अपने से अधिक उन्नत साधकों के साथ या किसी संत महापुरुष सद्गुरु के सान्निध्य में रहें| सात्विक भोजन लें और हर तरह के कुसंग का त्याग करें| ऐसे वातावरण में भूल से भी ना जाएँ जो आपको अपने लक्ष्य यानि परमात्मा से दूर ले जाता है|
वातावरण इच्छा शक्ति से अधिक प्रभावशाली होता है| अतः जो आप बनना चाहते हैं वैसे ही वातावरण और परिस्थिति का निर्माण करें और उसी में रहें| नियमित निरंतर साधना और किसी महापुरुष का आश्रय साधक की हर प्रकार के विक्षेप से रक्षा करता है|
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ॐ तत्सत् | ॐ गुरु | ॐ ॐ ॐ ||

16 दिसंबर को विजयदिवस अवश्य मनाएँ .....

कल 16 दिसंबर को विजयदिवस अवश्य मनाएँ .....
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(एक दिन पहिले से ही शुभ कामनाएँ)
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यह राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रश्न है| एक समय ऐसा था जब कई वर्षों तक देश में १६ दिसंबर के दिन प्रभात फेरियाँ निकलती थीं| उत्सव का वातावरण रहता था| आज लगता है लोग उस गौरवशाली दिवस को भूल गए हैं, और कोई उत्साह नहीं दिखाई दे रहा है|
(मुझे अभिमान है कि कुछ समय के लिए मैंने भी सेना में सेवा की है, और पूर्वी क्षेत्र में इस युद्ध में सक्रीय भाग लिया था, अतः मेरी स्मृति में वह पूरा युद्ध है| इससे पूर्व १९६५ के युद्ध में भी मैंने सक्रीय भाग लिया था|)
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आज से ४५ वर्ष पूर्व भारत ने पकिस्तान को निर्णायक पराजय दी और एक नए राष्ट्र बांग्लादेश को जन्म दिया| इस युद्ध की भूमिका बनी थी जब संयुक्त पाकिस्तान के आम चुनाब में आवामी लीग के शेख मुजीबुर्रहमान पूर्ण बहुमत से चुनाव जीते, पर ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने उन्हें पाकिस्तान का प्रधानमन्त्री सिर्फ इसीलिए नहीं बनने दिया कि वे बांग्लाभाषी थे और उर्दू नहीं बोलते थे|
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पूर्व पाकिस्तान ने पश्चिमी पाकिस्तान के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था| पाकिस्तानी सेना ने लाखों बांग्लाभाषियों का विशेषकर बंगाली हिन्दुओं का नरसंहार करना आरम्भ कर दिया| बंगाली हिन्दुओं के तो घरों के बाहर पाकिस्तान समर्थकों द्वारा निशान लगा दिए जाते, और अगले दिन पाकिस्तानी सेना द्वारा उन सब घरों में आग लगा दी जाती, पुरुषों को मार दिया जाता और स्त्रियों का अपहरण कर लिया जाता| हालत यह थी कि पाकिस्तानी फौज खुलेआम बीच सड़क पर वहाँ के हर पुरुष की लुंगी खुलवाकर देखती थी कि वह खतना किया हुआ मुसलमान है या नहीं| मुसलमान ना होने पर उसे वहीँ गोली मार दी जाती|
इतना ही नहीं लाखों बंगलाभाषी मुसलमानों की भी ह्त्या कर दी गयी और उनकी महिलाओं के साथ भी बलात्कार किया गया|
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भारत में शरणार्थियों की बाढ़ सी आ गयी और एक करोड़ से अधिक शरणार्थी भारत में आ गए| शरणार्थियों को भोजन, वस्त्र और आवास देना एक राष्ट्रीय समस्या हो गयी थी| 
पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह जनरल याहया खान ने तत्कालीन पूर्वी पकिस्तान की जन भावनाओं को सैन्य बल से कुचलने का आदेश दे दिया था| जनरल टिक्का खान के नेतृत्व में पाकिस्तानी फौज ने तीस-चालीस लाख अपने ही नागरिकों की ह्त्या की और लाखों महिलाओं के साथ दुराचार किया| वहाँ के बंगाली सेवारत और सेवानिवृत सिपाहियों ने विद्रोह कर के मुक्ति वाहिनी नामक संगठन बनाया और पाकिस्तानी फौज के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध आरम्भ कर दिया| युद्ध आरम्भ होने पर ये मुक्ति वाहिनी के सिपाही ही भारत की सेना को गुप्त सूचनाएं देते थे|
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अमेरिका पूरी तरह से पकिस्तान के साथ था| अमेरिका नहीं चाहता था कि युद्ध में पाकिस्तान हारे| भारत ने रूस के साथ एक सैनिक संधि कर ली थी जिसके तहत अमेरिका यदि भारत पर आक्रमण करता तो रूस भारत की खुल कर सहायता करता| अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र संघ में पूरा प्रयास किया कि युद्ध विराम हो जाए और पकिस्तान की पराजय न हो| पर रूस के निषेधाधिकार के कारण यह संभव नहीं हुआ| अमेरिका ने चीन पर भी दबाव डाला कि वह भारत पर आकमण करे पर चीन इसके लिए तैयार नहीं था| अतंतः अमेरिका ने भारत को डराने के लिए अपना सातवाँ नौसैनिक बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेज दिया| पर तब तक पाकिस्तान की सेना वर्तमान बांग्लादेश में आत्मसमर्पण कर चुकी थी, और उसके 93000 सैनिक गिरफ्तार कर लिए गए थे|
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युद्ध के समय ढाका में पाकिस्तानी सेना आश्वस्त थी कि भारत की सेना मेघना नदी को कभी पार नहीं कर पाएगी| पर बड़ी अदम्य वीरता से भारतीय सेना ने मेघना नदी पार की और ढाका को दूर से घेर लिया| इससे पाकिस्तानी सेना बहुत अधिक भयभीत हो गयी|
14 दिसंबर को भारतीय वायुसेना ने पूर्वी पकिस्तान के गवर्नर भवन पर बम गिरा कर मुख्य हॉल की छत उड़ा दी जब वहाँ एक अति मत्वपूर्ण मीटिंग हो रही थी| वहां गवर्नर मलिक ने डरते हुए कांपते हाथों से वहीँ अपना इस्तीफ़ा लिख दिया|
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16 दिसंबर की सुबह पाकिस्तानी जनरल नियाज़ी के पास ढाका में 26400 सैनिक थे, जबकि भारत के पास सिर्फ़ 3000 सैनिक और वे भी ढाका से 30 किलोमीटर दूर| पर पाकिस्तानी फौज बहुत बुरी तरह डर गयी थी और उसने हार मान ली व आत्मसमर्पण का निर्णय ले लिया| भारतीय सेना के जनरल जैकब जब नियाज़ी के कमरे में घुसे तो वहां सन्नाटा छाया हुआ था और आत्म-समर्पण का दस्तावेज़ मेज़ पर रखा हुआ था|
शाम के साढ़े चार बजे जनरल अरोड़ा हेलिकॉप्टर से ढाका हवाई अड्डे पर उतरे| अरोडा़ और नियाज़ी एक मेज़ के सामने बैठे और दोनों ने आत्म-समर्पण के दस्तवेज़ पर हस्ताक्षर किए| नियाज़ी ने अपने बिल्ले उतारे और अपना रिवॉल्वर जनरल अरोड़ा के हवाले कर दिया| नियाज़ी की आंखों में एक बार फिर आंसू आ गए|
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स्‍थानीय लोग नियाज़ी की हत्‍या पर उतारू नजर आ रहे थे| भारतीय सेना के वरिष्ठ अफ़सरों ने नियाज़ी के चारों तरफ़ एक सुरक्षा घेरा बना दिया और नियाजी को बाहर निकाला|
दिल्ली में प्रधानमन्त्री इंदिरा गाँधी ने देश को जीत की खबर दी और पूरा देश उत्साह से भर गया|
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पश्चिमी क्षेत्र में भी बड़ी वीरता से युद्ध लड़ा गया था| भारतीय नौसेना ने भी बड़ा पराक्रम दिखाया जिसके बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है| सभी को धन्यवाद|
विजय दिवस की अनेकानेक शुभ कामनाएँ |
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जय जननी जय भारत | ॐ ॐ ॐ ||