Thursday, 23 June 2016

आज हमें एक ब्रह्मशक्ति की आवश्यकता है....

भारत में आसुरी शक्तियों को पराभूत करने के लिए हमें साधना द्वारा दैवीय शक्तियों को जागृत कर उनकी सहायता लेनी ही होगी| आज हमें एक ब्रह्मशक्ति की आवश्यकता है| जब ब्रह्मत्व जागृत होगा तो क्षातृत्व भी जागृत होगा| अनेक लोगों को इसके लिए साधना करनी होगी, अन्यथा हम लुप्त हो जायेंगे|
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युवा वर्ग को चाहिए कि वे अपनी देह को तो शक्तिशाली बनाए ही, बुद्धिबल और विवेक को भी बढ़ाएँ|
उपनिषद तो स्पष्ट कहते हैं --- "नायमात्मा बलहीनेनलभ्यः|" यानी बलहीन को परमात्मा नहीं मिलते|

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उपनिषदों का ही उपदेश है --- "अश्मा भव, पर्शुर्भव, हिरण्यमस्तृताम् भव|"
यानी तूँ पहिले तो चट्टान की तरह बन, चाहे कितने भी प्रवाह और प्रहार हों पर अडिग रह|
फिर तूँ परशु की तरह तीक्ष्ण हो, कोई तुझ पर गिरे वह भी कटे और तूँ जिस पर गिरे वह भी कटे|
पर तेरे में स्वर्ण की पवित्रता भी हो, तेरे में कोई खोट न हो|
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हमारे शास्त्रों में कहीं भी कमजोरी का उपदेश नहीं है|
हमारे तो आदर्श हनुमानजी हैं जिनमें अतुलित बल भी हैं और ज्ञानियों में अग्रगण्य भी हैं|
धनुर्धारी भगवान श्रीराम और सुदर्शनचक्रधारी भगवन श्रीकृष्ण हमारे आराध्य देव हैं|
हम शक्ति के उपासक हैं, हमारे हर देवी/देवता के हाथ में अस्त्र शस्त्र हैं|
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भारत का उत्थान होगा तो एक प्रचंड आध्यात्मिक शक्ति से ही होगा जो हमें ही जागृत करनी होगी|

ॐ ॐ ॐ ||

वीर शैव मत ...........

वीर शैव मत पर श्री Jaganath Karanje द्वारा पूछे जाने पर जितना मुझे इसके बारे में ज्ञान है वह प्रस्तुत कर रहा हूँ| मैं न तो इस मत का अनुयायी हूँ और ना ही कोइ विद्वान| जितना एक जिज्ञासु को पता हो सकता है उतना ही पता है| सिद्धांतों की गहराई में न जाकर जो ऊपरी सतह है उसी की चर्चा कर रहा हूँ|
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इस सम्प्रदाय का नाम "वीरशैव", भगवन शिव के गण 'वीरभद्र' के नाम पर पड़ा है जिन्होंने रेणुकाचार्य के रूप में अवतृत होकर वीरपीठ की स्थापना की और इस मत को प्रतिपादित किया|
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स्कन्द पुराण के अंतर्गत शंकर संहिता और माहेश्वर खंड के केदारखंड के सप्तम अध्याय में दिए हुए सिद्धांत और साधन मार्ग ही वीर शैव मत द्वारा स्वीकार्य हैं|
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इस मत के अनुयायियों का मानना है कि ------ वीरभद्र, नंदी, भृंगी, वृषभ और कार्तिकेय ---- इन पाँचों ने पांच आचार्यों के रूप में जन्म लेकर इस मत का प्रचार किया| इस मत के ये ही जगत्गुरू हैं| इन पांच आचार्यों ने भारत में पांच मठों की स्थापना की|
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(1) भगवान रेणुकाचार्य ने वीरपीठ की स्थापना कर्णाटक में भद्रा नदी के किनारे मलय पर्वत के निकट रम्भापुरी में की|
(2) भगवान दारुकाचार्य ने सद्धर्मपीठ की स्थापना उज्जैन में महाकाल मन्दिर के निकट की|
(3) भगवान एकोरामाराध्याचार्य ने वैराग्यपीठ की स्थापना हिमालय में केदारनाथ मंदिर के पास की|
(4) भगवान पंडिताराध्य ने सूर्यपीठ की स्थापना श्रीशैलम में मल्लिकार्जुन मंदिर के पास की|
(5) भगवान विश्वाराध्य ने ज्ञानपीठ की स्थापना वाराणसी में विश्वनाथ मंदिर के पास की| इसे जंगमवाटिका या जंगमवाड़ी भी कहते हैं|
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वीरशैव मत की तीन शाखाएँ हैं ------- (1) लिंगायत, (2) लिंग्वंत, (३) जंगम|
सन 1160 ई. में वीरशैव सम्प्रदाय के एक ब्राह्मण परिवार में आचार्य बासव का जन्म हुआ| उन्होंने भगवान शिव की गहन साधना की और भगवान शिव का साक्षात्कार किया| उन्होंने इसी सम्प्रदाय में एक और उप संप्रदाय --- जंगम -- की स्थापना की| जंगम उपसंप्रदाय में शिखा, यज्ञोपवीत, शिवलिंग, व रुद्राक्ष धारण और भस्म लेपन को अनिवार्य मानते हैं|
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वीरशैव के अतिरिक्त अन्य भी अनेक महान शैव परम्पराएँ हैं| सब के दर्शन अति गहन हैं| सब में गहन आध्यात्मिकता है अतः उन पर इन मंचों पर चर्चा करना असंभव है| कौन सी परंपरा किस के अनुकूल है इसका निर्णय तो स्वयं सृष्टिकर्ता परमात्मा या उनकी शक्ति माँ भगवती ही कर सकती है|
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कुछ शैवाचार्यों के अनुसार सभी शैवागमों के आचार्य दुर्वासा ऋषि हैं| इति|

ॐ स्वस्ति ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ शिव शिव शिव शिव शिव !

माँ ...

वैसे तो परमात्मा --- माता. पिता, बन्धु, सखा और सर्वस्व है पर माँ के रूप में उसकी अभिव्यक्ति सर्वाधिक प्रिय है| माँ के रूप में जितनी करुणा और प्रेम व्यक्त हुआ है वह अन्य किसी रूप में नहीं| अतः परमात्मा का मातृरूप ही सर्वाधिक प्रिय है| माँ का प्रेममय ह्रदय एक महासागर की तरह इतना विस्तृत है कि उसमें हमारी हिमालय सी भूलें भी एक कंकर पत्थर से अधिक नहीं प्रतीत होतीं|
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ह्रदय की भावनाओं को व्यक्त करना चाहूँ तो मातृरूप में भी परमात्मा को कोई मानवी आकार नहीं दे सकता| जगत्जननी माँ हमारे ह्रदय का सम्पूर्ण प्रेम है जिसे पाना ही हमारे जीवन का लक्ष्य हो सकता है|
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माँ के अनेक रूप हैं पर जब साकार सौम्य रूपों की बात करते हैं तो माँ सीता जी का ही मूर्त रूप सामने आता है| हनुमान जी सीता जी की खोज में लंका गए थे, मार्ग में अनेक बाधाएँ आईं| पर सब को पार करते हुए माँ सीता जी को खोज ही लिया| हमारा जीवन भी माँ सीता जी की ही खोज है, उन्हें पाने की अभीप्सा है|
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सीता तत्व हमारे लिए जीवन की पूर्णता है, जिसे पाने के बाद और कुछ भी प्राप्य नहीं है|
वे पूर्ण प्रकाशमय प्रेममय वह अनंत हैं जिसमें सारी सृष्टि समाई है, जिसके परे अन्य कुछ भी नहीं है|
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जगन्माता ..... जीवन में यदि कुछ प्राप्त करने योग्य है तो वे ही हैं| उनसे परे कुछ भी नहीं है|
हमारा स्थान उनके ह्रदय में है| उनका साक्षात्कार, उनका प्रेम हमारे पृथक अस्तित्व की सबसे बड़ी उपलब्धि है| उनको उपलब्ध होना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार और परम कर्तव्य है|
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माँ, तुन्हारी जय हो, हमारा समर्पण स्वीकार करो|
ॐ ॐ ॐ ||

गुरु चरणों में आश्रय और सच्ची गुरु दक्षिणा .....

गुरु चरणों में आश्रय और सच्ची गुरु दक्षिणा .....
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गुरु तो वे हैं जो सब प्रकार का अज्ञानान्धकार दूर करते हैं| वे सब नाम-रूपों से परे हैं| अंततः वे एक अनुभूति हैं, कूटस्थ ब्रह्म हैं|
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सहस्त्रार में सहस्त्रदल कमल में परम ज्योतिर्मय गुरु का निरंतर ध्यान ही सर्वश्रेष्ठ गुरु-दक्षिणा है| हमारे सर्वस्व पर सिर्फ उन्हीं का अधिकार है| वे ही इस देह रूपी नौका के कर्णधार हैं| सहस्त्रार में उनकी चेतना में निरंतर बने रहना ही वास्तव में गुरु-चरणों में आश्रय है|
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ॐ गुरु ॐ ! गुरु ॐ ! गुरु ॐ ! गुरु ॐ ! गुरु ॐ ! गुरु ॐ !

मेरा अपना स्वराज्य ......

मेरा अपना स्वराज्य .....
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परमात्मा का दिया हुआ एक मेरा अपना स्वराज्य है जिसमें किसी का भी हस्तक्षेप नहीं है| मैं अपने राज्य में बहुत सुखी हूँ| उस साम्राज्य में सारी सृष्टि .... सारी आकाश गंगाएँ, सारे चाँद, तारे, नक्षत्र और परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्तियाँ हैं| जो भी सृष्ट हुआ है, वह सब उस साम्राज्य के भीतर है| उस से बाहर कुछ भी नहीं है|
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वह साम्राज्य भाव-जगत से भी परे कूटस्थ चैतन्य का है| जगन्माता के रूप में परमात्मा स्वयं उसका संचालन और रक्षा कर रहे हैं|
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उस साम्राज्य में सिर्फ प्रेम ही प्रेम और आनंद ही आनंद है| परमात्मा सदा मुझे उसी चेतना में रखे जहाँ समस्त सृष्टि मेरा परिवार है, और समस्त ब्रह्मांड मेरा घर| वही मेरा संसार है| मेरा केंद्र सर्वत्र है, पर परिधि कहीं भी नहीं|
वहाँ कोई अन्धकार नहीं है, सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश है|

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ॐ तत्सत् | ॐ श्री गुरवे नमः | ॐ ॐ ॐ ||

ज्ञान का एकमात्र स्त्रोत परमात्मा है ......

ज्ञान का एकमात्र स्त्रोत है ---- 'परमात्मा'|
पुस्तकों से ज्ञान नहीं मिलता है| पुस्तकों से सूचना मात्र मिलती है|
ज्ञान बाहर नहीं है|
समस्त ज्ञान आपके स्वयं के भीतर है जो परमात्मा की कृपा से ही अनावृत होता है|
ॐ तत्सत्|

पूर्णता कहाँ है ?

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पुर्णमुदच्यते पूर्णश्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

पूरे जीवन में मैं अब तक अपने से बाहर ही पूर्णता ढूंढता रहा पर पूर्णता का कहीं आभास भी नहीं मिला| पर अब लग रहा है कि -------- पूर्णता कहीं मिलेगी तो अंतर में ही मिलेगी|
अब तक मिली तो नहीं है पर लग रहा है कि अवश्य ही मिल जाएगी|
पर अंतर से कोई बहुत सारी शर्तें थोप रहा है| लगता है पूर्णता ही अपनी कीमत माँग रही है| निःशुल्क तो कुछ भी नहीं है|
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अतः आप सब से यही कह सकता हूँ कि पूर्णता को ढूंढें तो अवश्य पर उसकी कीमत भी चुकाने को तैयार रहें|
चलो बता ही देता हूँ कि इसकी क्या कीमत है|
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इसकी कीमत है ------- "प्रभु के प्रति अहैतुकी सम्पूर्ण समर्पण"
यानि Total unconditional surrender to the Divine.

ॐ तत्सत | ॐ शांति शांति शांति ||